तस्वीर में हैं संतोष श्रीवास्तव, रेखा मैत्र, अंजन संधीर, रज़ा साहब, हंडी मीडिया के संपादकपरिवार, कुलदीप सिंह, कपिल जी, अनंत श्रीमली, देवी नागरानी, संतोष, खन्ना मुजफरपुरी, और शैलेंद्र जी- ब्लू शर्ट में!
ज़िंदगी की नाव को इस पार से उस पार तक ले जाने वाले गीतकार शैलेंद्र कुमार नहीं रहे “उनका हमारे बीच होना न होना उस एक पल ने तय किया, जो चोरों की मानिंद रात को घर में घुस आया, “ बुधवार 21, दिसंबर 2011, सुबह-सुबह खन्ना मुज़फ्फ़रपुरी ने यह मनहूस ख़बर दी–“हमारे परम मित्र शैलेन्द्रजी नहीं रहे।“
अचानक ही हमारे बीच से, हमारे हाथों से वह ज़िंदगी खुद को रिहा कर गयी….जी हाँ! स्वर्गीय श्री जीवतराम सेतपाल जी के साहित्य का एक अंश “आँखों के आईने से” आज भी सजीव होकर आँखों के सामने रक्स कर रहा है,: “वह जा रही है, बहुत दूर जा चुकी है, कमबख़्त ने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा और मैं उसे दूर से, दूर तक जाता हुआ देखती रहा । वह धीरे-धीरे एक छोटे से धुंधले आकार में बदल गयी और मेरा दिल उसके साथ ही लटकता चला गया।“
इसी माह की 10 तारीख़, शनिवार, 2011 कालीना यूनिवरसिटी के भव्य भवन में एक ग़ज़ल-गोष्टी में मैंने उन्हें आख़िरी बार ग़ज़ल पाठ करते हुए सुना और वह यही मिसरा है जो मुझे याद आता है: “कहता है हक़ीक़त आईना, सच मानिए” ग़ज़ल सुनाते हुए तालियों के बीच वो जैसे अपने आप से बतिया रहे थे, पर सभी सुनते रहे, और मैं सोचती रही कि उस छोटे बहर की ग़ज़ल में उन्होने कितनी बड़ी सचाई का बयान किया है। अजीब संदर्भ है- जीवन की गाड़ी के संदर्भ में कितना सच है, जो यकायक चलते चलते रुक जाती है।
रेत पे लिखा / शब्दों का संसार / बेनिशां हुआ वहीं उस महफिल में
मौजूद उर्दू के वरिष्ठ शायर ताज़दार साहब का एक शेर जो दिल को सहलाता रहा कुछ इस तरह रहा:
किस हिमाक़त से किनारे पे उछाला हमको
देखली हमने समंदर की भी औक़ात मियां
शैलेन्द्र जी के लिखे अनेक गीत लोगों की ज़बान पर छिड़े रहते है, वे किसी भी महफिल में हों, आवाज़ें उठती है, “जिंदगी की नाव चले” तरन्नुम में गायें ; यह उनका ही नहीं हम सभी मुंबई वालों का पसंद-दीदा गीत रहा, कितना अच्छा लगता रहा उसे सुनते हुए, जैसे कोई पानी की लहरों पर शब्दों को सहलाया जा रहा हो।
किसी शायर ने सच कहा है— मैं थोड़ी देर जिसपे सर रखकर बैठता हूँ वो पत्थर की नहीं, उम्मीदों की दीवार है कोई रिश्तों सारी उम्मीदें यहीं आकर ख़त्म हो जाती है, मन मायूसी से घिर आता है, खामुशी हैरान है इस पल और उस पल के बीच के फासले पर…
सामने आज के, उसका भी कभी कल होगा
है अभी जो साथ अंतिम वो कभी पल होगा
क्या कभी चूक सका उसका निशाना ‘देवी’
मौत से बचके निकलना तो कोई छल होगा।
पर दिल अभी मानता ही नहीं—महसूस करते हुए कह उठता है तुम्हारे हर कदम की आहट हम महसूस करते हैं। वो टूटे दिल की झनकार भी हमारे दिल की पगडंडी से गुज़र कर जाती है।