हाल ही में ‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ की घोषणा की गई। इस वर्ष यह सम्मान संयुक्त रूप से ट्विंकल रक्षिता को उनकी कहानी ‘एक चट्टान गिरती है खामोशी की नींद में’ और विजयश्री तनवीर को ‘गांठ’ के लिए देने की घोषणा हुई है। इसके अलावा विशेष जूरी सम्मान शुभम नेगी को उनकी कहानी ‘परछाई’ के लिए दिया जाएगा। ऐसे में पुरवाई के संपादक मंडल ने तय किया है कि हम ये तीनों पुरस्कृत कहानियाँ एक-एक करके अपने पाठकों के लिए उपलब्ध कराएंगे। इस क्रम में आज शुभम नेगी की कहानी ‘परछाई’ को प्रकाशित किया जा रहा है। शेष दोनों कहानियाँ भी अगले दो सप्ताहों में यहाँ प्रकाशित की जाएंगी। – संपादक

इंसान से ज़्यादा होटल का कॉरिडॉर हो चुका था वह। उसके अंदर सीधे रास्ते का अंत एक दीवार थी। जिसे न लांघा जा सकता था, न ही जहाँ से कूदकर जान दी सकती थी। दाएँ-बाएँ कुछ कमरे खुलते थे; सब में अलग-अलग संसार। एक संसार की भनक बग़ल के कमरे में घुटते दूसरे संसार तक को नहीं पहुँचती थी। इंसान कम, होटल का कॉरिडॉर ज़्यादा। वह कमरों में छिपे रहस्यों का हिस्सा था भी, और नहीं भी। कोई उसे देखकर नहीं कह सकता था कि इतने कमरे उसके व्यक्तित्व का भाग हैं। 
अभी वह जिस कॉरिडॉर में था, उसके दोनों तरफ कमरों की लम्बी कतारें थीं। उसने चाबी पर फिर अपना कमरा नंबर जाँचा और आगे की ओर चल पड़ा। दरवाजों पर लगे कैमरे कचोटती आँखों की तरह उसे घूर रहे थे। जैसे सभी दरवाजे फटाक से खुलेंगे और उसे एक भीड़ रँगे हाथ पकड़ लेगी। उसके दिमाग में उन सब सवालों के जवाब घूमने लगे, जो उससे पूछे जा सकते थे। जैसे कि वह इस वक़्त एक होटल में क्यों था। उसके क़दम तेजी से आगे की ओर बढ़ गए। कोई कॉरिडॉर आख़िर कितना लम्बा हो सकता था!
कमरे में पहुँचकर उसने सामान रखा और रूटीन में मुआयना करने लगा। ठंडे शीशे पर उँगली रखकर जाँचा कि कहीं दूसरी ओर कैमरा तो नहीं! फिर बिस्तर पर चढ़कर स्मोक-अलार्म को ध्यान से परखा। उतरकर कमरे की सारी बत्तियाँ बुझाईं और अंधेरे में मोबाइल निकाला। मोबाइल का कैमरा चारों तरफ घुमाकर किसी लाल रोशनी को ढूँढता रहा। उसने कहीं पढ़ा था कि नाईट कैमरे की यूवी किरणें कैमरे में लाल दिखती हैं। यह सारे ‘बेसिक चेक’ करने के बाद वह बिस्तर के कोने पर बैठ गया। कमरे ने भीनी, पीली रोशनी ओढ़ रखी थी। एक दीवार पर बड़ी सी फ्रेंच-विंडो थी, जहाँ से कमरा पूरे शहर को निहार सकता था। खिड़की से थोड़े दूर बेड लगा था, जिसके ऊपर एक बड़ी सी पेंटिंग लटकी थी। खिड़की के बिलकुल उल्टे, एक शीशे ने आधी से ज़्यादा दीवार को घेर रखा था। दीवारों की जगह खिड़की और शीशों की परतें, कमरे को एक खुशनुमा खुलापन दे रही थीं।
उसने मोबाइल में देखा। मानव का अभी तक कोई रिप्लाइ नहीं आया था। एक भीषण शंका ने उस पर प्रहार किया। उसका मन पिछले डेढ़-दो घंटों को एक अनसुलझे मुक़दमे की तरह खोलकर बैठ गया। यह उसकी दिनचर्या का एक अटूट, अवसाद-ग्रस्त हिस्सा था। उसकी हर साँस एक-तिहाई जीवन के साथ दो-तिहाई त्रास बन चुकी थी।
अपने फ्लैट के बाथरूम से निकल कर उसने बाक़ी दोनों कमरों में झाँककर देखा था; कहीं उसके नहाते समय उसका दोस्त वापिस न आ गया हो! हालाँकि फ्लैट के मेनगेट को वह पहले ही अंदर से बंद कर चुका था (और तीन-चार बार चेक भी)। इसके बावजूद वह दोनों कमरों को खाली पाकर ही निश्चिंत हुआ था। दुनिया का कोई भी बंद दरवाजा डर को भीतर घुसने से नहीं रोक सकता था।
समय के साथ उसका डर कुछ घटा तो था, पर फिर भी कार में वह ड्राईवर से नज़रें बचाकर ही बैठता था। शुरुआत में वह बार-बार आगे लगे शीशे में झाँकता रहता था। कहीं इसे पता तो नहीं कि वह होटल क्यों जा रहा है? पता चल जाए तो? उसके दिमाग में तरह-तरह के दृश्य घूमने लगते। उसका शरीर समन्वित भाव से सिहर उठता। सिहरन भी उन दृश्यों को शरीर से बाहर नहीं छिटक पाती।
उसे लगता कि सारी दुनिया की नज़रें हमेशा उसी पर गड़ी हैं। जब भी वह किसी नये इंसान से मिलने जाता तो उसे रह-रहकर एक अजीब बेचैनी होती। कहीं वह झूठा निकला तो? क्या पता किसी की कोई साज़िश हो उसे रँगे हाथों पकड़ने की। जैसे कोई गुट बस इसी ताक में घात लगाए बैठा हो, कि वह किसी लड़के से गले लगे, और सब आकर ज़ोर से कहें – पकड़ा गया! कोई अपराधी था क्या वह? उसके आसपास हँसी-ठहाके गूंजने लगते। वह झटके से अपने आप में लौटता तो ड्राईवर को अपनी ओर देखता पाता। पसीने से तरबतर उसका शरीर उसे अंदर से नोंचने लगता। अक्सर वह होटल से कुछ दूर ही उतर जाया करता था।
समय के साथ धीरे-धीरे यह डर कम हुआ था। एक जिग्‌सॉ पहेली थी जिसके डिब्बे पर एक आदमी की तस्वीर थी। वह बचपन से उसका एक-एक टुकड़ा जोड़ता चला आया था। पर पहेली जब तस्वीर जैसी दिखनी शुरू हुई, उसने सब टुकड़ों को बिखेर दिया। अब वह उन्हें अदल-बदल कर लगा रहा था; जाने किस तस्वीर की तलाश में!
दो साल पहले जब वह दिल्ली आया था तो अंकित के साथ पीजी में रहता था। उन दिनों उसमें इतना साहस नहीं था कि वह किसी को कुछ बता सके। वह अक्सर सोचता कि यह कैसी विडम्बना है कि दुनिया से प्यार की बात करने के लिए साहस जुटाना पड़े, पर गोलियाँ आराम से चौराहों पर दागी जाएँ। यह सब उसके स्ट्रेट दोस्त शायद कभी नहीं समझ पाते। हर तरफ़ स्त्री-पुरुष प्रेम के किले थे। जहाँ आबादी के एक बड़े हिस्से का प्रवेश वर्जित था। स्त्री-पुरुष प्रेम का आधिक्य था। कविताएँ, कहानियाँ, नाटक, फिल्में, संगीत – सब। दुनिया की सब कंपनियाँ, सब विज्ञापन, सब प्रचार, सब भाषण समाज-निर्माण में समाज के कुछ हिस्सों को भूल गये थे। इतना शोर था कि समलैंगिक प्रेम के हक़ में सड़कों पर आकर चिल्लाना मजबूरी था। फिर दुनिया को यह चिल्लाना शोर जान पड़ता था।
यह वह समय था जब सुप्रीम-कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया था। इन्हीं दिनों में लोगों का कहना था कि अब ‘इन लोगों’ के लिए सब ठीक हो जाएगा। इन्हीं दिनों में उसके कॉलेज के दोस्त एक के बाद एक होमोफोबिक बात करते थे। इन्हीं दिनों में वह उन पर हँसने का नाटक कर दिया करता। इन्हीं दिनों में वह पकड़े जाने के डर से बीच-बीच में गे लोगों के बारे में कोई घटिया टिप्पणी उगल देता था। इन्हीं दिनों में काग़ज़ों में सब सही हो चुका था। इन्हीं दिनों में उसके भीतर एक दलदल उभर आया था, जिसमें अनगिनत लाशें धँसती जाती थीं। इन्हीं दिनों में अतीत, वर्तमान, और भविष्य का भद्दा दर्पण था; बीते सैंकड़ों साल समाहित थे। इन्हीं दिनों में से किसी एक निराश दिन अंकित ने उसे पकड़ लिया था।
पीजी के शुरुआती दिनों में अंकित के पास कोई पुराना मोबाइल था, जिस पर बस कॉल ही हो पाती थी। उसका नया फोन आने में कुछ दिन थे। नये शहर का शुरुआती जोश था। अंकित के फोन में सुविधा नहीं थी, तो दोनों एक ही फोन पर टिंडर चलाते थे। वह अंकित को अपना अकाउंट बंद करके देता था। बेहद बचकाने दिन थे।
ऐसे एक दिन, जाने कब अंकित ने नामालूमी में उसका फोन उठा लिया। वह उस समय वहाँ नहीं था। अंकित ने टिंडर पर अपना अकाउंट खोलना चाहा, और उसके सामने दर्जन लड़कों के मैसेज खुल गये। यह बात अंकित ने उसे कुछ दिन बाद बतायी थी।
दोनों साथ बाल कटवाने जा रहे थे। पीजी से पैदल दूरी पर एक सैलून था। रास्ते में अंकित ने उसका फोन माँगा। ऐसे तो दोनों में यह चलता था, पर उस दिन अंकित के चेहरे पर एक मज़ाक़िया मुस्कान थी। वह सारी उम्र अपने ऊपर एक गहरे राज़ का पर्दा लेकर चला था। उसे लगता था कि उसके ऊपर एक मोटा, खुरदुरा कम्बल है। जिसे वह उतारकर फेंक दे, तो दुनिया के सामने नंगा होना पड़े। सर्दी उसे तड़पा कर मार दे। और अगर उस बोझिल कम्बल को न उतारे, तो सारी उम्र उस बेहूदा बोझ से धँसता जाए। इस राज़ का दबाव इतना गहरा था कि कोई कभी अजीब बर्ताव करे, तो उसकी सुई सीधे यहीं पहुँचती कि कहीं सबको पता तो नहीं लग गया? उसके सामने ढेरों सवालों की फ़ेहरिश्त तैयार हो जाती और वह जवाब खोजने शुरू कर देता। अंकित की मुस्कान ने भी उसके अंदर उदासी और संशय की कसैली गन्ध छोड़ दी थी। उसने फोन देने से इंकार किया।
“क्या हुआ है?”
“कुछ दिखाना है।”
उसके अंदर का दलदल लावा बनकर उबलने लगा। टालमटोल में ही अंकित ने उसे बात बता दी। उसे सब ओर काले चकत्ते दिखायी देने लगे। वह ख़ुद कोई धब्बा बनकर उनके बीच कहीं गिर पड़ा था। दो-तीन कदम वह चुपचाप चले। फिर अचानक उसके पैर मुड़कर पीजी आ गये।
वह पूरा दिन औंधे मुँह लेटा रहा। तकिये में चेहरा गाड़े। काश तकिये के भीतर एक गहरा कुआँ होता जिसमें वह ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ पाता। हम आँगन में निकलते थे तो दाना चुगती चिड़ियाँ उड़कर हमारे लिए जगह खाली कर देतीं। सड़क पर मोटर लेकर आते तो जंगल के जानवर एक ओर हटकर जगह छोड़ते। हम खेतों में जाते तो पौधों को हटाकर जगह बना लेते। हमने सारे संसार को अपने लिए जगह बनाने पर मजबूर कर दिया था। इसके बावजूद, हम ऐसी कोई जगह नहीं बना पाये थे जहाँ एक हारा हुआ इंसान बेझिझक, खुलकर रो सके।
जब अंकित वापिस आया, तो भी वह लेटा था। उसके बाद भी वह पूरा दिन लेटा रहा। चुपचाप। रात में वह अचानक उठा। सामने के बिस्तर पर बैठा अंकित उसकी ओर मुड़ गया। अंकित एकटक उसकी तरफ़ देख रहा था, जब उसने बोलना शुरू किया।
“देखो, मेरे बारे में बहुत सी बातें किसी को भी नहीं पता। घर पे, तुमको, कॉलेज वालों, स्कूल वालों… किसी को भी नहीं। तो आई वुड रियली लाइक दिस टू बी अ सीक्रेट। आई नो, तुम किसी को नहीं बताओगे पर फिर भी।”
अंकित बिना बोले उसे सुन रहा था।
“मेरे लिए यह नया है… ऐसे… किसी को पता होना। अभी भी काँप रहा हूँ। नहीं हो पाता मुझसे।”
उसने अपने दोनों हाथों को मुट्ठी में भींच लिया। ऐसा करने से एक पल के लिए सारी उदासी हथेलियों में बंद हो जाती थी।
“बाइसेक्सुअल हूँ मैं… यह पहली बार है कि मैं यह बोल रहा हूँ। ख़ुद से बोला है तो मन में बोला है। बाहर पहली बार है।”
इतना कहते उसके गालों पर आँसू लुढ़क आये। अंकित ने उसके बिस्तर पर आकर उसके हाथ थाम लिये।
“यार… मुझे नहीं पता था तू इतना सैड फ़ील करेगा। नहीं तो मैं कभी बात नहीं करता इस बारे में। यह सब तो मैंने सोचा भी नहीं था। मुझे तो लगा था किसी ने प्रैंक किया है तेरे साथ… लड़कों को स्वाइप करके। पर चिल्ल है। तू प्लीज़ रो मत।”
उसे थोड़ा सहारा महसूस हुआ। पर साथ ही निराशा कि उसके फोन पर सब प्र्त्यक्ष देखने पर भी, अंकित के मन में पहला विचार किसी प्रैंक का आया था। हमारे आसपास की कहानियों की ज़ुबानें कटी पड़ी थीं। इन चीज़ों पर इतनी ख़ामोशी थी, कि पर्दा हटने के बाद भी दर्शक बस पर्दा ही देख पाते थे। कैसी दुनिया रच डाली थी हमने!
अंकित के हाथ थामने से उसके अंदर कुछ पिघल गया था, जो बाहर आ रहा था। उसके गालों पर एक धार बन आयी थी। अंकित ने उठकर उसे ज़ोर से गले लगा लिया। उसे एहसास हुआ कि गले लगने से कितनी जानें बचायी जा सकती हैं। काफ़ी देर तक गले लगने के बाद वह वापिस शांत हो गया। उसने मज़ाक़ में ख़ुद को कोसते हुए कहा-
“वैसे… प्रैंक वुड हैव बीन बैटर। मेरे दिमाग में यह बहाना क्यों नहीं आया?”
दोनों हँस पड़े। उसे लगा कि उस दस-बाइ-दस कमरे की दीवारें तेज़ी से दूर भागी जा रही हैं। छत आसमान से जा मिली है। उसे इतना खुला पहले कभी महसूस नहीं हुआ था। 
कैब में बैठते ही उसने मानव को मैसेज कर दिया था – ऑन माई वे। फिर खोलकर देखा। मानव ने मैसेज पढ़ लिया था पर कोई रिप्लाइ नहीं आया था। स्क्रीन में से संदेह का एक गाढ़ा झोंका निकला और कार में पसर गया। अगर यह मानव से उसकी पहली मुलाक़ात होती, तो शायद वह वापिस लौट जाता। संदेह की धुन्ध में वह ख़ुद को समझाने की कोशिश कर रहा था कि उसके मोबाइल पर हरकत हुई।
पापा की कॉल! इन्हें कैसे पता चल गया? उसके मन में सबसे पहला ख़याल यही आया। लम्बी साँस भरकर उसने फोन उठाया।
“हैलो, पापा नमस्ते।”
“हैलो, क्या कर रहे हो बेटा?”
“कुछ नहीं… क्यों?” वह सकपकाया। 
“अरे ऐसे ही। मतलब… सब ठीक है न?”
“ओह! हाँ जी, सब ठीक। आप?”
“इधर भी। कुछ नहीं, ये तेरी मम्मी बात करने को कह रही थी तो…”
पापा ने फोन मम्मी के पास दिया। कुछ देर हालचाल हुआ और बस। मम्मी पापा के सामने खुलकर बात नहीं कर पाती थी। पापा के पास बात करने को ख़ास कुछ रहता नहीं था।
अगर इन्हें सच में पता चल जाए, तो? यह सवाल एक भूल-भुलैया की तरह अक्सर उसके सामने खड़ा हो जाता था। वह छटपटाता, दरवाजे ढूँढता, दौड़ता, चीखता, पर जहाँ भी जाता, अंत में ख़ुद को वहीं पाता जहाँ से शुरू किया था। कुछ सवाल ऐसे थे, जिनके जवाब लिखने की लिपि का अभी आविष्कार नहीं हुआ था।
उसके घर के हालात ठीक नहीं थे। रिश्ते पाँव में काँटों की तरह धँसे पड़े थे। बिना आँसू बहाये दो कदम भी चलना दूभर था। ऐसे हालात में, वह एक और बोझ कैसे डाल दे सब पर? उसने एक अँग्रेजी फिल्म देखी थी, जिसमें सब मुसीबतों के बाद अंत में लड़के को सबका साथ मिल गया था। उस रात वह भर-भर कर रोया था। उसके बाद उसने क्वियर कहानियों में ‘हैप्पी-एंडिंग’ देखना बंद कर दिया था। यह उसका सच नहीं था। यह उसका अंत नहीं था।
कभी जब वह बहुत खुश होता तो सोचता कि घर पर सब बता दे। जो उसे अभी इतना मानते हैं, उसके नाम से शेखियाँ बघारते हैं, वो क्या नहीं समझेंगे? जो हमेशा से उसे आदर्श बालक मानते आये, उनके लिए क्या एक ही चीज़ सब ख़त्म कर देगी? कर देगी तो करे! जिनके लिए यह एक बात सब कुछ बदल सकती है, उनसे रिश्ता ही क्या रखना? पर रिश्ता किस-किस से तोड़े? क्या सब कुछ दाँव पर लगा दे? दाँव! खेल चल रहा है क्या? यह क्या है? यह कैसा अँधेरा है, जहाँ कोई किरण भटकती तक नहीं पहुँचती? यह कैसा सराब है? यह क्या बार-बार मन में उठता है? उसे लगता जैसे उसकी श्वास-नली में लाल चींटियों की लम्बी कतार चली है, उसकी आँखों को कचोटने। वह फफक कर रो पड़ता।
ऐसे ही असंख्य आँसुओं के पन्ने पलटते उसने ठान लिया था कि वह घर पर कभी कुछ नहीं बताएगा। लेकिन कभी कुछ नहीं बताने के लिए उसे हमेशा अकेले रहना पड़ना था। वह किसी और इंसान को बेमतलब इस भट्टी में नहीं  झोंक सकता था। यही वजह थी कि वह किसी से भी ‘सिरियस’ नहीं होना चाहता था। पिछले दो सालों से यही चल रहा था। वह दूसरी-तीसरी मुलाक़ात के बाद खुद को रोक लेता। फिर मानव?
मानव! पिछले कुछ घंटों को खंगालकर उसने फिर मोबाइल देखा। मानव का मैसेज अभी तक नहीं आया था। 
उसने कमरे की चाबी की फोटो लेकर मानव को भेजी – “कहाँ”?
इस बार रिप्लाई आ गया – “ऑन माई वे। लेट होने के लिए सॉरी!”
संदेह की शक्ल का आदमी खिड़की से बाहर कूद गया और उसके चेहरे पर मुस्कान घिर आयी। हालांकि वह मानव से मिला ऑनलाइन ही था, पर उनके ऑफिस पास ही थे। पहली बार उनका मिलना लंच पर ही हुआ था; उसकी बाक़ी डेट्स से अलग। वह नेहरू प्लेस में एक रेस्तराँ के बाहर मिले थे। मानव उन लोगों में से था जिनकी मुस्कुराहट उनके चेहरे का हस्ताक्षर होती है। मुस्कुराने पर उसकी आँखें भींच जाती थीं। तब लगता कि उसकी मुस्कुराहटें एक अलग और बेहद खूबसूरत दुनिया का द्वार थीं। मानव उससे तीन-चार साल बड़ा था। यह उसकी पूरी उपस्थिति में भी झलकता था। उसका चरित्र दो बड़ी बाहों की तरह था, जो दुनिया के हर ख़तरे से बचा सकती थीं। वह दोपहर एक लंबे आत्मीय आलिंगन की तरह बीती।
यह पहली बार था कि वह किसी से दिन में मिला हो। वरना लोगों से मिलना शाम या रात में किसी होटल के कमरे पर हुआ करता था। उनके साथ सड़कों पर टहलने के लिए वह बिस्तर से होकर गुज़रता था। अपने-अपने कपड़े वापिस पहनते हुए वह डिनर का कोई प्लान बनाते, और वह वहीं से फ्लैट लौट आता। फिर नया दिन, कोई नया इंसान, या किसी पुराने के साथ वही ‘नो स्ट्रिंग्स अटैच्ड’।
मानव के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ था। उन्होंने उस दोपहर जो भी बातें की थीं, उनमें उनके शरीर का कोई ज़िक्र नहीं था। उन्होंने अपने अतीत बाँटे थे, सपनों को आँखों से समेट टेबल पर बिखेरा था, मुस्कुराहटों को कात कर कुछ तो बुन डाला था। वह हमेशा से सोचता था कि इंसान ने सब बनाया पर रोने की जगह नहीं बना पाया। उस दिन उसने जाना था कि यही वह जगह थी। यही वह जगह थी जहाँ रोया जा सकता था, बिखरा जा सकता था, बिलखा जा सकता था। हालांकि यही वह जगह थी जहाँ इस सब की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती थी।
उस दिन के बाद भी वह कई बार मिले। दोपहरों में ही। वह मानव से कभी डिनर पर चलने को कहता तो मानव टाल देता। मानव दिन में ही मिलना चाहता था; ऑफिस के समय। मानव की इस ज़िद को वो समझ नहीं पाता। पर जैसा था उसने चलने दिया। फिर एक दिन मानव ने ख़ुद कहा होटल चलने को। उसने ख़ुद ही आज का दिन चुना था। यह कहते समय मानव की आँखें असामान्य तरीके से झुकी हुई थीं। उसने मानव का हाथ थामते हुए कहा था-
“अरे! आपको प्रॉब्ल्म है तो ठीक है ना! रहने देते हैं। क्या ज़रूरी है?”
मानव ने मुस्कान का बोझ ऊपर उठाते हुए जवाब दिया था-
“नहीं, आई रियली वांट टू… बस यह है कि… नथिंग।”
मानव की हिचकिचाहट पर उसे अजीब तो लगा था, पर वह जानता था कि वह पहली बार किसी लड़के से इस तरह मिला है। उसे अपनी पहली मुलाक़ात की हिचकिचाहट और डर याद हो आये थे। उसने मानव के हाथ पर पकड़ कस ली थी।
उसे होटल पहुँचे हुए एक घंटे से ऊपर हो गया था कि किसी ने दरवाजा खटखटाया। मानव आ गया था।
“आई एम सोओ…ओ सॉरी!” 
अपने पीछे दरवाजे को तसल्ली से बंद करके मानव उसके गले लगा। उसने उसे थोड़ा और कसकर अपनी माफ़ी दे दी। मानव ने पूरे कमरे पर नज़र घुमायी और अपने तरीक़े से आँखें भींचकर मुस्कुरा दिया।
अब वह बिस्तर के एक कोने पर बैठे थे। पैर लटकाये; एक के बग़ल एक। वह मानव से पूछना चाह रहा था कि सब ठीक है या नहीं। मानव शायद यह जानता था, इसलिए उसने उसका हाथ थाम लिया। दोनों के शरीर में बराबर आवृत्ति की सिहरन दौड़ गयी। वह कुछ कहने वाला था कि मानव का चेहरा उसके नज़दीक आया। मानव ने बहुत सहेजकर, हल्के से, उसके गालों पर एक सकुचाता चुम्बन रखा। उसके गालों से एक सिहरी दौड़ी और होठों पर मुस्कान बन कर फैल गयी। उसने अपना दायाँ हाथ मानव की कमर के गिर्द डालकर उसे पास खींचा। मानव के शरीर ने विरोध उतार फेंका। दोनों के चेहरे पास आते गये और अंत में सिर्फ एक चेहरा बचा। कौन किसके होंठ हैं? कौन किसका चेहरा? उसने अपना बायाँ हाथ मानव के चेहरे से उतारकर उसकी गर्दन तक फिसलाया। अपनी उँगली को उसके सीने पर ले जाकर उसकी शर्ट के बटन खोलता, हाथ सरकता गया। मानव का बदन हज़ारों छुई-मुई के पौधों की तरह खुलता-बंद होता रहा। जब हाथ उसकी बेल्ट पर टहलने लगा, तो मानव के हाथ ने उसे एकदम रोका। दोनों के होंठ अभी भी अपनी-अपनी जगहें ढूँढ रहे थे। उसकी आँखें मानव की आँखों के सामने प्रश्नवाचक चिन्ह बनकर अटक गयीं। मानव ने आँखें बंद कीं और होंठ हटाकर एक लम्बी साँस ली; जैसे अपने भीतर किसी को अनुमति भेज रहा हो। फिर मानव ने उसे हल्का धक्का दिया। उसका आधा शरीर बिस्तर पर लेट गया। मानव उसकी टाँगों के पास बैठा और उसकी पैंट के बटन खोलने लगा। इस पर उसने अपने दोनों हाथ मोड़कर, बिस्तर पर टिके अपने सिर के नीचे रख लिये। मानव ने उसे मुँह में भरा, तो उसके अंदर कई ज्वालामुखियों से फूल उफन कर फूटे। उसे लगा कोई उस पर गरम रोशनी बुरक रहा हो। अपने सिर के नीचे से हाथ निकाल उसने मानव के बालों को पकड़ा। उसके अपने सिर का ऊपरी हिस्सा बिस्तर में धँसा और ठुड्डी छत की ओर उठ गयी। उसकी साँस और मानव के सिर की आवृत्ति बराबर हो गयी। कमरे का हर कोना लम्बी, ऊँची आहें छोड़ने लगा।
तेज़ी से चलते शरीरों की जैसे चाबी ख़त्म हुई हो, वैसे मानव धीरे-धीरे, और फिर एकदम से रुका। मानव के शरीर ने ख़ुद को बिस्तर से दूर छिटक दिया। बिस्तर पर लेटे उसके बदन में चेतना आयी। वह उठा।
“क्या हुआ?”
वह एकटकी से ज़मीन पर बैठे मानव में झाँक रहा था। कहीं उसी से कुछ ग़लती तो नहीं हुई? उसने आगे झुकते हुए मानव के कंधे पर हाथ रखा।
“क्या हुआ है? समथिंग रौंग?”
मानव ने सरसरी निगाह से उसकी ओर देखा और कंधा घुमाकर उसका हाथ झटक दिया। मानव का शरीर अपराध-बोध का शाब्दिक अर्थ लग रहा था। उसने अपनी पैंट ऊपर खींचकर बंद की और मानव की ओर हाथ बढ़ाया। मानव उठकर खिड़की के पास चला गया। उसके पैर का अंगूठा फ़र्श को कुरेदने लगा। आँखें खिड़की को। उसे शायद अंदर घुटन हो रही थी तो उसने खिड़की खोल दी। फिर शायद किसी रहस्य के खुलने के डर से वापिस बंद कर दी। खिड़की के ऊपर लगी फॉल-लाइट से बनी उसकी परछाई बहुत छोटी दिख रही थी। कुछ देर पहले फूल उगलते ज्वालामुखियों को पूरा कमरा भुला चुका था।
बहुत देर की चुप्पी के बाद दोनों एक साथ बोल पड़े-
“यू नो आप मुझसे बात कर सकते हो, राइट?”
“आई हैव समथिंग टू टेल यू।”
खिड़की के सहारे खड़ा मानव, कुछ देर तक अंदर उफनते भाप को ज़ुबान तक उठाने की कोशिश में लगा रहा। कभी इस, कभी उस पैर पर हिलता रहा। जैसे वह जो कहने जा रहा है, उसे पहले अपने हर अंग को बता देना चाहता हो। उसकी परछाई मुद्राएँ बदलती रही। बड़ी मशक़्क़त के बाद उसके भीतर से किसी शब्द ने बाहर कदम रखा।
“आई एम रियली सॉरी!”
“हुआ क्या है?”
“मुझे पता था यही होगा। मुझे आना ही नहीं चाहिए था।”
“अरे यार, डरा क्यों रहे हो आप?”
“आई एम सॉरी।”
“अरे बोलो तो! इट्स ओके!”
मानव के दोनों हाथों ने एक दूसरे को पकड़ा, फिर छोड़ा, फिर वापिस पकड़ लिया।
“मैं… आई एम मैरिड।”
मानव के इतना बोलने पर उसे लगा जैसे उसके अंदर एक पेड़ के मोटे तने पर कुल्हाड़ी चली हो। फिर एक और, एक और, कईं और। उसके अंदर एक पूरा जंगल कट गया। उनका कमरा जो वैसे भी चुप ही था, उसे लगा कि उसने अब चुप्पी का आधिकारिक ऐलान कर दिया हो। उसी चुप में मानव अभी भी बोल रहा था।
“आई नो मुझे यह पहले क्लियर करना चाहिए था। इट्स ऑल माई फ़ाल्ट। मेरी ही ग़लती है। बट क्या करूँ मैं भी? आई केयर फॉर हर। उसकी क्या ग़लती है? पर ग़लती मेरी भी क्या है? बंधे पड़े हैं बस। आई डोंट नो…”
मानव बोलता जा रहा था। वह उसे अपलक निहार रहा था। यह कैसा जीवन है? किसकी बलि दी जा रही है, और चढ़ावा चढ़ किसे रहा है? कितनी ज़िंदगियाँ एक-दूसरे से बँधकर और बिखर गयी हैं। किसके कितने जंगल हैं जो कटे पड़े हैं? किसके हाथों पर कुल्हाड़ियों के निशान हैं? किसकी आँखों में पैनी धार की स्मृतियाँ?
“नाटक चल रहा है। और हम एक्टर। कितने शरीर एक्ट में हैं। शरीर तो चलो फिर भी एक्टिंग करता रहे, पर मन का क्या? मन कब तक झूठ जिये? पर जो भी है, मुझे तुम्हें बता देना चाहिए था। प्लीज़ तुम यह किसी से मत-“
उसने जाकर मानव को गले लगा लिया। गले लगने से ज़िंदगियाँ बचायी जा सकती थीं। वह जानता था। मानव फूट पड़ा। मानव उसके सारे प्रश्न जानता था। वह मानव के सारे उत्तर। उनके बीच एक उल्का पिंड आकर गिरा था। वह बहुत देर तक, एक-दूसरे की मौजूदगी से उसे बुझाने की कोशिश करते रहे। उसकी परछाई में मानव की परछाई घुली हुई थी। उसे एक पल के लिए लगा कि दोनों किरदार वही निभा रहा है। जैसे मानव कोई और नहीं, समय के किसी और सूरज से बनी उसी की छाया है। यह ख़याल उसे बेहद भयावह लगा। उसने मानव के माथे को चूमा और हटकर उसके बग़ल खड़ा हो गया।
फ़र्श पर फैली एक परछाई, दूसरी के साथ होकर भी, उल्टी दिशा में मुड़ गयी।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.