धुली हुई सड़क पर नहाई हुई सुबह में लगभग चार महीने बाद प्रसन्ना मैडम ने अपनी कार निकाली है। आमतौर पर वो गाड़ी तभी निकालती हैं जब सड़कें सीधी हो भीड़-भाड़ कम हो। एक साल हुए घर में कार तो आ गई लेकिन गाड़ी को दायें – बाएँ, आगे – पीछे करने में दिक्कत के कारण प्रसन्ना मैडम ऑटो से ही स्कूल जातीं हैं।  पिछले दिनों से शहर में छाई मनहूस चुप्पी के बाद आज स्कूल जाने का मौका मिला है। स्कूल की गेट पर पहुँचते ही गार्ड ने गाड़ी को गेट के बाहर ही फुटपाथ पर लगाने बोल दिया। विद्यालय के बाहर लंबे – लंबे गाजर घास के पौधे उगे हुए हैं उनके सफेद फूल प्रस्फुटित हो चुके हैं। कुछ फूल बीज बन मिट्टी में यूँ गिर चुके हैं जैसे पिछले तीन महीने की प्रसन्ना मैडम की स्मृतियाँ। विद्यालय गेट के अंदर आते ही मैडम को ऐसे लगा पीछे से कोई गुड मॉर्निंग बोला। उस गुड मॉर्निंग की आवाज़ पीछे खींचने लगी। आवाजें भी अजीब होती हैं वो अपने उत्पति स्थान पर युगों तक बनी रहती हैं। किसी बच्चे के  गुड मॉर्निंग के बाद अपने जवाब गुड मॉर्निंग को ढूँढती प्रसन्ना मैडम कहीं खो गईं। 
अप्रैल के पहले दिन से शुरू होता है नया सेशन। वही बच्चे अगली कक्षा में जाते हैं लेकिन पहले दिन का अहसास एक फुर्ती भर देता है। अच्छी साड़ी पहनने के जोश में अपने अंदर एक प्रतिज्ञा कि जो पिछले सत्र में कमी रही उस कमी को दूर करूंगी। पहला दिन और नयी कोंपलों का प्रवेश सब कुछ नया – नया। वही असेंबली ग्राउंड वही बच्चे लेकिन उस दिन की प्रार्थना का जोश बच्चों के नये यूनिफॉर्म कुल मिलाकर एक पॉज़िटिव माहौल बना देते। अप्रैल महीने के आखिर में वार्षिकोत्सव होनेवाला रहता है तो कहीं हारमोनियम तो किसी कमरे में राजस्थानी तो किसी में गुजराती धुन पर नृत्य लहड़ियाँ सुनाई पड़ती थीं। जाने कितने बच्चे मनुहार करते मैडम हमें भी म्यूजिक मैडम से कह कर डांस में रखवा दीजिये। पिछले साल ही दो साड़ियाँ खरीदी थी संभालकर रख दिया था एनुअल फंक्शन में पहनने के लिये। तीन महीने पीछे जाना जैसे वर्षों से किए जा रहे किसी काम का एकबारगी छूट जाना। वैसे छूटता कुछ भी नहीं उसके तन्तु मस्तिष्क में कहीं – न – कहीं उलझे रहते हैं। ऑटो पकड़ स्कूल आने से शुरू होती थी दिन की शुरुआत। 
“भईया अभी हाथ में दस का सिक्का है ले लो।  बाकी हिसाब किताब बाद में करते रहना।” 
ऑटो वाला हाथ में सिक्का लेकर – “जल्दी जाइए मैडम बस घंटी लगने ही वाली है।” 
यह कहते – कहते  रोज़ दिन की तरह ही प्रसन्ना मैडम अपने दोनों बैग लेकर लगभग भागते सीधे ऑफिस के बाहर रजिस्टर में अपनी उपस्थिति का प्रमाण अपने दस्तखत को दर्ज़ कर आगे बढ़ी। 
साथ – ही – साथ सामने कोई शिक्षक साथी दिख रहा है उसे गुड मॉर्निंग अगर कोई बच्चा गुड मॉर्निंग बोल रहा है तो उसे गुड मॉर्निंग बेटा कहते हुए अपनी हल्की मुस्कान बिखेरते सीढ़ियों की तरफ बढ़ गईं। अभी दोनों बैग हाथ में ही साथ ही साथ दूसरे हाथ में बच्चों की अटेंडेंस रजिस्टर है। जल्दी – जल्दी सीढ़ियों को चढ़ते हुए जैसे ही ऊपर वाले तल्ले पर पहुँचती हैं वहाँ रोज़ की भाँति दोनों लड़कियाँ खड़ी हैं। मानो उन लड़कियों को मैम के कदमों की आहट का पता हो। 
“मैम रजिस्टर दीजिए।”
क्लास रूम के तरफ से आवाज़ आई – “आज आप बहुत सुंदर लग रही हैं।”
“थैंक यू बच्चों। चलो – चलो ठीक है मैं एक मिनट में आ रही हूँ।”
रजिस्टर पकड़ा कर दोनों बैग लेकर अपने रोज़ के अड्डे बायो-लैब की तरफ चली गईं।
इधर रोज़ रजिस्टर लेने वाली लड़कियों ने क्लास के सभी बच्चों को सचेत कर दिया। 
लैब में सामान रख प्रसन्ना मैडम बच्चों की उपस्थिति लेने पहुँचती हैं।
एक – एककर रोल नंबर से उपस्थिति बोलते – बोलते रोल नंबर ट्वेंटी टू –“ये आज भी नहीं आया।” 
एक बच्चे की आवाज़ आई – “मैम परसों दिखा था।
“कहाँ?”
“जब हमलोग ऑटो से स्कूल आ रहे थे तो रास्ते में।”
“अच्छा” 
दूसरे बच्चे ने कहा – “मैम वो स्कूल यूनिफॉर्म में ही था।”
“फिर स्कूल क्यों नहीं आया” 
 “मुझे नहीं मालूम।”
“ये लड़का न मुझे कहीं का नहीं छोड़ेगा,मुझे इसकी वजह से डांट पड़ने ही वाली है।“
“अच्छा चलो सब लाइन बनाओ तुम लोग ज़्यादा दिमाग मत लगाओ। मैं उसके घर फोन करूंगी।”
“दिशा तुम सीधा नहीं चल सकती।”
“और तुम सिद्धार्थ पैर घसीटकर क्यों चल रहे हो?”
“पता नहीं एकदम कोई मैनर ही नहीं है, जाने कहाँ- कहाँ से ये आते हैं।”
मैडम बच्चों के साथ ही अपने दमखम को दिखाते सबसे पहले असेंबली ग्राउंड में पहुँचती हैं।
फाइनल बेल लग चुकी है दूसरे क्लास के बच्चे भी कहीं सीधी कहीं तिरछी लाइन में ग्राउंड में पहुँच रहे हैं।
इस बीच मैडम चौकस होकर बच्चों के यूनिफॉर्म ,शूज, नाखून चेक कर रही हैं। 
“इशिका तुम्हारे नाखून इतने बड़े क्यों हैं?”
“सॉरी, मैं कल काट लूँगी”।
“और आदिल तुम्हारे शॉक्स बिना रबड़ लगाये नहीं हो सकते नया कब खरीदोगे?”
ड्रम के बीट पर एक – दो – एक करते बच्चे अपनी – अपनी पंक्तियाँ सीधी कर रहे हैं।
कमांडर विद्यार्थी ने कमांड दे दिया प्रार्थना शुरू हो चुकी है।सारे शिक्षक भी प्रार्थना करने की निरर्थक कोशिश कर रहे हैं। 
प्रसन्ना मैडम अपनी कक्षा के बच्चों की पंक्तियों के बीच चलकदमी कर प्रार्थना की लाइनें धीरे-धीरे गुनगुना रही हैं। यहाँ बच्चों को गाने के लिये प्रेरित करने के साथ उनकी बंद आँखों में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करना लक्ष्य है।
“दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना ।
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना।“ 
इन पंक्तियों की समाप्ति के साथ मौन प्रार्थना शुरू हो चुकी है। हज़ार बच्चों के बीच में ऐसी शांति अगर एक सुई भी गिर जाये तो पता चल जाये। प्राइमरी के छोटे बच्चे कभी एक आँख खोल रहे तो दूसरे को बंद करते देख फिर आँखें बंद कर ले रहे हैं। 
तभी असेंबली ग्राउंड से सटे कॉरीडोर में किसी की ज़ोर – ज़ोर से आवाज़ आ सुनाई देने लगी।
“सिक्यूरिटी गार्ड को बुलाओं”
“इन्हें अभी क्यों आने दिया?”
इस आवाज़ को सुन असेम्बली थोड़ी देर के लिए सन्नाटे में आ गई। कमांडर बच्चे  ने मौन प्रार्थना खत्म करने का कमांड दे दिया।
बच्चों में खुसर – फुसर शुरू हो गई।
शिक्षक भी छुप छुपाकर मामले को समझने में लग गए।
शिक्षकों को प्रिंसिपल की आवाज़ समझ में आ गई थी लेकिन मामला ठीक से सामने नहीं आ रहा है।
सभा को विसर्जित कर दिया गया। कदम – कदम बढ़ाए जा ड्रम बीट के साथ सुनाई देने लगा। बच्चे अपनी – अपनी कक्षाओं की तरफ बढ़ने लगे। तभी स्कूल का चपरासी शिक्षकों की तरफ आता दिखा। सारे शिक्षक फिर खुसर – फुसर शुरू किए पता नहीं क्या हुआ होगा ?
“प्रसन्ना मैडम आपको साहब बुला रहे हैं!”  प्रसन्ना मैडम प्रिन्सिपल चेम्बर की तरफ बढ़ने लगीं तो एक – दो टीचरों ने ‘बेस्ट ऑफ लक’ विश भी कर दिया। 
एक डर और अनजाने शंका के बीच में प्रसन्ना मैडम प्रिंसिपल के चैंबर में पहुंची।
वहाँ अपने क्लास के बच्चे और एक अधेर उम्र के व्यक्ति को देख धक्क से लगा। 
“मैडम ये आपकी क्लास का बच्चा है?”
“येस सर”
“कितने दिनों से स्कूल नहीं आ रहा?”
“यही कोई दस – बारह दिनों से।”
“आपने मुझे सूचना दी?”
“पेरेंट को फोन किया?”
“सर फोन लगाया था स्वीच ऑफ बता रहा था।” 
बीच – बीच में बच्चों से पूछते रही हूँ।
प्रिंसिपल ने बच्चे को क्लास में भेज दिया। फिर उस अधेर व्यक्ति संभवत : उस रोल नंबर ट्वेंटी टू के गार्जियन हैं।
प्रिंसिपल ने कहा – “मैं स्कूल की समस्या स्कूल में निपटा लूँगा।” 
“लेकिन अब आप ही बताइये आप बोल रहे कि आप उसके नाना हैं। घर में दूसरा कोई देखने वाला नहीं है आप यहाँ अकेले रहते हैं। पिछले दस दिनों से स्कूल नहीं आ रहा।“ 
“आपको नहीं पता!”  घर से कहाँ जा रहा क्या कर रहा आपको पता ही नहीं? आप कहाँ काम करते हैं?”
“साहब मैं रेलवे का एक छोटा कर्मचारी हूँ यहीं वर्कशॉप में काम करता हूँ।“
“फिर बच्चे के लिए समय नहीं; एडमिशन हो गया आपकी जिम्मेदारी खत्म।“
“वो तो आज मुझे स्कूल आने में थोड़ी देर हो गई,  मेरी नज़र इसके स्कूल यूनिफॉर्म पर पड़ गई।”
आपके नंबर पर कॉल करने पर फोन नहीं लगा फिर आपके पते पर सिक्यूरिटी गार्ड को भेजा। आपकी लापरवाही पर मुझे बहुत तेज गुस्सा आ रहा है। आप ऐसा कीजिये इसकी टीसी लेकर कहीं दूसरी जगह दाखिला करवा दीजिये।”
उस अधेर आदमी के साथ प्रसन्ना मैडम आसन्न खतरे को भांप काटो तो खून नहीं की स्थिति में चुपचाप खड़ी हैं।
रोल नंबर ट्वेंटी टू के गार्जियन भी प्रिंसिपल के विकराल रूप को देख अब चुप्पी को चुना।  
थोड़ी देर बाद मौके की नजाकत को समझ प्रसन्ना मैडम ने कहा – “सर, सॉरी नेक्स्ट टाइम से ऐसा कुछ नहीं होगा।” 
“क्या मैं पेरेंट के साथ बाहर जाकर बात कर सकती हूँ?”
“देखिये जाइए आखिर माजरा क्या है?”
“आप ही सोचिए हर काम अगर प्रिंसिपल ही देखेगा तो क्लास – टीचर और बाकी टीचरों का क्या काम?”
प्रिंसिपल से नज़र चुराती सॉरी सर कहकर मैडम बाहर आ गईं। साथ ही साथ रॉल नंबर ट्वेंटी टू यानि आदित्य के नानाजी भी बाहर कॉरिडोर में आ गये।
“मैं शाम में कॉल करूंगी आप आदित्य की मम्मी से बात करा देंगे।”
“जी मैडम! आपको नहीं पता आदित्य की मम्मी इस दुनिया में नहीं हैं। उसके पापा ने दूसरी शादी कर ली अब वो मेरे पास ही रहता है। मैं परेशान हूँ गाँव में पढ़ने की सुविधा थी नहीं तो यहीं ले आया। अब समझ में आ रहा लड़का हो या लड़की उसको पालना बहुत मुश्किल है। और तो और ड्यूटी और बच्चे की पढ़ाई को संभालना इतना भी आसान नहीं।” 
एक क्षण को प्रसन्ना मैडम बिल्कुल थम सी गईं।
“दरअसल इस स्कूल में आए मुझे ज्यादा दिन नहीं हुए हैं। और पेरेंट मीटिंग में भी किसी से मुलाक़ात नहीं हुई थी इस कारण सारी बात मुझे नहीं पता।”
प्रसन्ना मैडम थोड़ी देर चुप रहीं फिर बोलीं –“एक काम करेंगे कल से आदित्य मेरे ऑटो में स्कूल आयेगा। वो स्कूल आ रहा है कि यह पता चल जायेगा और आपकी यह समस्या दूर हो जायेगी।”
एक अप्रत्याशित प्रस्ताव जिसे सुनकर आदित्य के नानाजी हाथ जोड़ने लगे।
“अरे! आप यह क्या कर रहे हैं? यह सब मुझे सेशन के लगभग आखिर में पता चला नहीं तो मैं इसे शुरू से देखती। चलिए कोई नहीं; आप निश्चिंत रहें!”
एक आश्वस्ति की अनुभूति के साथ आदित्य के नाना जी ने विदा ली।
दूसरी घंटी लग चुकी है; मैडम जल्दी – जल्दी अपनी कक्षा में जा रही है। उनके दिमाग में एक उथल – पुथल है कि आखिर यह बच्चा कहाँ रुक जाता था? पहले भी वह कक्षाओं में अनुपस्थित रहा है। उसका उसके विषय का होम वर्क भी कभी पूरा नहीं रहता था। इतने बच्चों का सब कुछ कैसे पता रखूँ के चक्कर में बच्चों के एनेकडोटल रिपोर्ट भी पूरे नहीं थे। बच्चों का इतिहास,भूगोल जानना इतना भी आसान नहीं इन्हें तो क्षणों में बदला जा सकता है।  
अपने साफ और तेज काम की वजह से चर्चित प्रसन्ना मैडम को अपने–आप पर गुस्सा भी आ रहा है। आख़िर वो भी तो अपनी कक्षा के सभी बच्चों को ठीक से जान सकती है। मन में एक बोझ के साथ संतोष भी था कि चलो! कम-से-कम वो बच्चा ऑटो में साथ आयेगा। 
स्टाफ रूम में तरह–तरह की चर्चा और एक नई चुनौती के बीच मैडम ने आज का दिन पूरा किया।
दूसरे दिन ऑटोवाले को इंतज़ार नहीं करना पड़ा। मैडम ने ऑटोवाले को कहा – “भैया आप ही तो रोज़ मुझे  लाते हो क्यों न महीने में एक दिन किराया लिया करो और सुनो वो रोड नंबर छ: में भी रोज़ चलना है; वहाँ से एक बच्चा मेरे साथ स्कूल जायेगा।” 
ऑटोवाले ने महीने की कुछ बढ़ी हुई रकम की मांग की और रोज़ आने को तैयार हो गया। मैडम ने आदित्य के नानाजी को फोन कर दिया आप आदित्य को घर के बाहर लेकर खड़े रहें मैं आ रही हूँ।
आदित्य और ऑटो में साथ हैं। रॉल नंबर ट्वेंटी टू क्लास का बदमाश बच्चा मैडम की उपस्थिति से डरा – सहमा एक अच्छे बच्चे की तरह चुपचाप बैठा हुआ है। 
मैडम ने बात शुरू की – “तुम कितने बजे उठते हो?”
“यही कोई छ: बजे”। 
“टिफिन लिये हो?”
“हाँ बिस्किट लाया हूँ। आज नाना जी को लेट हो गया।” 
थोड़ा – बहुत बात करते दोनों स्कूल पहुँच गये। रोज़ भाग–भागकर स्कूल जानेवाली मैडम आज समय से दस मिनट पहले हैं।
सीढ़ियों के पास मैडम का इंतज़ार करती लड़कियाँ वहीं हैं। अटेंडेंस के समय रॉल नंबर ट्वेंटी टू की उपस्थिति ने प्रसन्ना मैडम को कहीं से पूरा कर रखा है। आज अपने क्लास के पूरे चालीस बच्चों के आने से उनकी खुशी बाहर से भी देखी जा सकती है। दिन-भर कभी ऊपर तो कभी नीचे की कक्षाओं में भागते – भागते आज का दिन लगभग बीतने ही वाला है। 
सातवीं घंटी लग चुकी है प्रसन्ना मैडम अपनी नई क्लास में जाने ही वाली है। अचानक  उनकी क्लास का एक बच्चा दौड़ते हुए उनके पास पहुंचा – “मैम-मैम आदित्य के पास मोबाईल है अभी वाशरूम में किसी से बात कर रहा था।”
मैडम थोड़े गुस्से में और थोड़ी सशंकित होकर बोली – “तुम जाओ मैं देखती हूँ और ये बात किसी दूसरे बच्चे या टीचर से नहीं करना।” 
मैडम का दिमाग फिर तरह – तरह की बातों को सोचने लगा। इस आठवीं के बच्चे के पास मोबाईल कहाँ से आया? क्या उसके नानाजी इस बात को जानते हैं? इस उम्र के बच्चे माँ की सख़्त जरूरत होती है… आदि, आदि। मैडम मन – ही – मन प्रार्थना करने लगी कि यह बात प्रिंसिपल तक न जाये नहीं तो इस रॉल नंबर ट्वेंटी टू के कारण मेमो जरूर मिलेगा। कैसे भी आखिरी पीरियड बीत जाए बाकी तो ऑटो में संभाल लूँगी। 
सातवीं और आठवीं घंटी दोनों के समय आज प्रसन्ना मैडम बच्चों से बहुत ही बेरुखी से बात की। आज अपनी चहेती दोनों बच्चियों को भी बिना मतलब डांट दिया। 
फ़िलहाल अब छुट्टी हो चुकी है। बाहर ऑटो वाला और आदित्य दोनों इंतज़ार कर रहे हैं। मैडम अपने गुस्से को जाहिर नहीं होने दी बड़े ही प्यार से कहा – “अरे! आदित्य तुम्हें इंतज़ार करना पड़ा आज रजिस्टर को चपरासी ने  थोड़ा लेट बाहर निकाला इस कारण सिग्नेचर करने में देरी हो गई।” 
“कैसा रहा तुम्हारा आज का दिन?” 
आदित्य ने सकुचाते हुए कहा –“मैडम ठीक ही रहा।” 
ऑटो चल चुकी है। 
“और बताओ तुम्हें पढ़ना कैसा लगता है?”
“मैडम मुझे पढ़ना ठीक लगता है लेकिन स्कूल आना पसंद नहीं।”
ऐसा क्यों? क्लास में तुम्हारा कोई दोस्त नहीं है क्या?
“मैडम मैंने इस स्कूल में लेट एड्मिशन लिया यहाँ मेरा कोई पक्का दोस्त नहीं है। सब मेरी चुगली करते रहते हैं।”
“किस बात की?”
“कभी दोस्तों से लड़ाई की बात तो कभी कॉपी – किताब चोरी का इल्जाम”।
“मैडम अभी आप यहाँ नई हैं इस कारण उतनी शिकायतें नहीं करते होंगे।”
“नाना जी भी मेरी शिकायतों से आजीज होकर कई बार नाम कटवाने बोलते हैं।” 
मैडम ने बड़े ही प्यार से कहा- “अच्छा! तुम ख़ुद ही बताओ आज तुमने कुछ गलत काम किया है।“
आदित्य ने थोड़ा सोचते हुए कहा – नहीं तो।   
“आदित्य तुम जरा अपना बैग देना।” 
आदित्य थोड़ा सहमा लेकिन बैग मैडम को थमा दिया। जब मैडम ने बैग में इधर – उधर ढूँढना शुरू किया तब आदित्य के चेहरे की रेखाएँ स्पष्ट रूप से दिख रहीं हैं। लेकिन वो डरा हुआ नही दिख रहा है। एक ढीठ की तरह आदित्य मैडम को देख रहा है।  
मैडम ने बैग से एक स्मार्ट फोन निकाला।  
“ये क्या है?”
“फोन” 
“ये तुम्हारे पास क्यों है? तुम्हें पता नहीं स्कूल फोन लाना मना है। मैं तुम्हारे नाना जी को फोन करूँ? अब तुम्हें टीसी दिलवाने में ही भलाई है। तुम अपने साथ जाने कितने बच्चों को बर्बाद करोगे।सही – सही बताओ।” 
“मैडम ये मेरा फोन नहीं है ये मेरे दोस्त का है। स्कूल में बाकी बच्चे भी तो फोन लाते हैं। बाकी बच्चे मेरे ऊपर धौंस दिखाते थे। इस कारण मैं दोस्त का फोन स्कूल लाया। हमलोग बस गेम खेलते हैं। मेरे नानाजी के पास स्मार्ट फोन नहीं है।”
उस बच्चे में कुछ तो है जो उसकी गलतियों के बाद भी मैडम को डांटने से रोक देता है। मैडम उस बदमाश बच्चे के मासूमियत में फंस जाती हैं या मैडम का बच्चों से लगाव। 
अभी भी यही हुआ। मैडम ने उसकी कहानी पर भरोसा किया। फिर समझाया स्कूल छोडकर तुमलोग गेम खेलने जाते हो यह अच्छा नहीं है । तुम क्लास में जवाब तो ठीक देते हो। मुझे तुम्हारे नानाजी पर दया आती है तुम्हारा कितना ख़्याल रखते हैं। तुम्हारा भी तो कुछ फर्ज बनता है।
मैडम की बातों को सुन सहमा सा बैठा आदित्य बोला मैम एक बार माफ कर दीजिए– “आप नानाजी को मत बताना।”
“अब तुम यह मोबाईल अपने दोस्त को लौटा देना आइंदा ऐसी गलती मत करना।” 
मैडम को भरोसा है आदित्य कहीं – न – कहीं मुझसे जुड़ गया है। कुछ भी गलत करने के पहले रोज़ ऑटो मे आते – जाते समझाई गई बातों पर ध्यान देगा। 
एक अनदेखे और अनजाने समझौते के तहत आदित्य में परिवर्तन दिखने लगा। रोज़ स्कूल आना सारे काम समय पर करना, इधर कुछ दिनों से असेंबली प्रोग्राम में भाग लेना। 
मैडम के साथ ऑटो में आने के कारण बच्चे आदित्य को जानने लगें हैं। आजकल जाने-अनजाने में आदित्य भी अपनी धौंस जमा देता है। प्रसन्ना मैडम को यह भीतर से एक ख़ुशी भी देता है दूसरी तरफ यह अंदेशा बना रहता है कि उनकी निष्पक्षता पर कोई बट्टा न लगे। उन्हें मालूम है जोश-जोश में इस तलवार की धार पर चलना शुरू तो कर दिया पता नहीं आगे क्या होगा?
आज कितना बुरा लगा जब स्टाफ रूम में सोमा मैडम ने सबके सामने बोला कि- “आज आपका चहेता होम –वर्क बनाकर नहीं आया था। पूछने पर उसके पास हज़ार बहाने हैं।” 
आज घर जाते समय उसे समझाऊँगी यही कहकर प्रसन्ना मैडम ने उस दाग को धोना चाहा। ऑटो से लौटते वक्त फिर आदित्य को नसीहतें मिली। आदित्य के जीवन का जो कोना खाली था उसे प्रसन्ना मैडम उसे सुधारने के नाम पर भर रहीं हैं। कभी उसके लिए अलग से टिफ़िन लाना तो कभी उससे पूरे क्लास की बातें करना। वह खुलते – खुलते इतना खुल गया कि उसे दस मिनट का ऑटो का सफर अच्छा लगने लगा। मैडम के कामों में जाने या अनजाने में आदित्य कहीं–न-कहीं शामिल हो गया है। 
प्रसन्ना मैडम ने भी स्कूल में मोबाईल पकड़ने का जैसे एक अभियान ही शुरू कर दिया। कुछ शिक्षकों के साथ मिलकर प्रार्थना के समय बैग चेक तो बच्चों की जूत्ता चेकिंग में कुछ मोबाईल पकड़े। बच्चों में अब दहशत का माहौल रहता है। आदित्य ने बताया मैडम अब बच्चे मोबाइल नहीं लाते।
प्रसन्ना मैडम वैसे भी अपने काम के बल पर सभी की चहेती है। इधर प्रिन्सिपल ने कुछ विशेष जिम्मेदारियाँ भी थमा दी है। 
बच्चों की वार्षिक परीक्षायेँ होने वाली हैं। आदित्य ने अपनी सभी अनचाही हरकतों पर विराम लगा दिया है। 
बच्चों की परीक्षाएँ समाप्त हो गईं हैं। स्कूल में आजकल सारे शिक्षक कॉपी मूल्यांकन और रिजल्ट बनाने में लगे हुए हैं। रिजल्ट लगभग पूरे हुए कि एक दिन अचानक शहर के साथ स्कूल को भी बंद हो गया। 
बच्चों की तो परीक्षा खत्म होने के बाद की छुट्टियाँ चल रहीं हैं। मार्च के आखिर में बच्चे अपने माता – पिता के साथ रिजल्ट लेने आते हैं। अबकी बार वैबसाइट पर परिणाम निकाल दिये गए। आदित्य ने लगभग सभी विषयों में अच्छे नंबर पाये हैं। 
सत्र के शुरुआत की घोषणा हो चुकी है। अब शिक्षकों को तकनीकी रूप से दक्ष होना है। 
एक ज्ञात रोग के अज्ञात भय जिसमें एक – दूसरे को संक्रमित होने और करने की संभावनाएं हैं इस कारण बच्चे स्कूल नहीं आ सकते। रोज की कक्षाओं की जगह ऑनलाइन क्लासों ने ले ली है। प्रसन्ना मैडम की दिनचर्या बदल चुकी है। अब भागभाग कर स्कूल नहीं जाना है। मैडम की कक्षा के बच्चे अगली कक्षा में प्रोमोट हो चुके हैं। प्रसन्ना मैडम को एक नई क्लास की क्लास टीचर बना दिया गया है। हालांकि वो अपना विषय अपने प्रमोटेड बच्चों को भी पढ़ा रही हैं। सत्र की शुरुआत में हर वर्ष की तरह बच्चों ने कक्षा के लिए कॉपियों और किताबों का इंतज़ाम कर लिया है। कभी उत्साहित बच्चे ऑनलाइन क्लास का इंतज़ार करते हैं। शुरू में कम बच्चे क्लास करने आते फिर धीरे – धीरे बच्चों की संख्या बढने लगी। इधर संक्रमण के खतरों को देखते हुए स्कूल खुलने की कोई संभावना नहीं दिखती है। लगभग सारे शिक्षकों ने इस तकनीक को आत्मसात कर लिया। शतप्रतिशत ना सही स्कूल ना छूटे बच्चे पढ़ना ना भूले के लक्ष्य की ओर शिक्षक और बच्चे बढ़ने लगे हैं। 
अब कक्षाओं के निरीक्षण और परीक्षण के कारण अत्यधिक सतर्कता बरती जाने लगी है। प्राचार्य ने शिक्षकों को आदेश दे दिया है कि हर बच्चे को कक्षाओं में लाया जाये। शिक्षकों ने फोन से बच्चों से कहकर अपनी कक्षा में उपस्थिति बढ़ाने का अभियान शुरू कर दिया है। सिर्फ़ बच्चों के नाम के अक्षरों में बच्चों की उपस्थिति का अहसास करती प्रसन्ना मैडम अब बच्चों को अपना विडियो ऑन करने बोलने लगी हैं। चहकते बच्चों से चालीस मिनट में एक आध मिनट बात करती हैं तो वो मायूस हैं। अब बच्चे होमवर्क भी जमा करने लगे हैं। बच्चे अपने स्मार्ट फोन से फोटो खींच होम वर्क भेज रहे हैं।
अपने विषय की कक्षा में आदित्य यानि रोल नंबर ट्वेंटी टू की तलाश पूरी नहीं हो पा रही है। बच्चों के विडियो ऑन करवाने के उदेश्य के पीछे आदित्य को देखना भी एक लक्ष्य है। मैडम ने फोन लगाना चाहा उसके नानाजी का फोन पहुँच से बाहर बताता है। दूसरे नंबर से भी फोन करना चाहा बात नहीं हो पा रही है। प्रसन्ना मैडम अपने ऑटो के सफ़र के साथ आदित्य को याद कर परेशान रहने लगी हैं। मैडम ने दूसरे बच्चों से जानना चाहा आदित्य कहाँ है? 
किसी ने बताया उसके नानाजी अपने गाँव गये हैं इस कारण उससे बात नहीं हो पा रही है। कक्षाएं चलने लगी महीने का सिलेबस पूरा होने लगा सत्तर प्रतिशत से ज्यादा बच्चों की उपस्थिति रहने लगी। प्रसन्ना मैडम अपने इस आभासी कक्षा में बच्चों की अनुभूतियों को महसूस करने लगीं। बच्चे अपने दोस्तों को एक – दो मिनट के लिए सुनकर अपनी दुनिया में खोने लगे हैं। 
आज मैडम के व्हाट्ट्सप्प पर एक अनजाने नंबर से क्लासवर्क के कुछ फोटो आए। मैडम ने चेक कर वापस कर दिया। हालांकि गृह – कार्य जमा करने की यह जगह नहीं है। फिर दूसरे दिन भी पीछे के पाठों के गृह कार्य के फोटो आये । 
आज मैडम गुस्से में है ये बच्चे समझते क्यों नहीं? 
“मना कर रखा है फिर भी यहाँ होम वर्क क्यों जमा करते हैं? मोबाईल में स्पेस नहीं रहेगा फिर दूसरे काम कैसे करूंगी? अभी बताती हूँ! इस नंबर वाले बच्चे को।”
मैडम ने मैसेज किया “हू र यू”?
“आई एम आदित्य” 
मैडम ने झट फोन लगाया – “तुम कहाँ हो? तुम्हारा फोन नंबर बदल गया क्या? ऑनलाइन क्लास क्यों नहीं कर रहे हो?”
“मैडम मैं नानाजी के साथ गाँव गया था। गाँव जाते समय नानाजी का फोन कहीं गिर गया और अभी नानाजी के पास उतने पैसे नहीं कि स्मार्ट फोन खरीदा जा सके। मैं एक पुराने फोन से आपके विषय का फोटो खींच भेजता हूँ यहाँ व्हाट्ट्सप्प चल जाता है बाकी कुछ नहीं।”
प्रसन्ना मैडम ने थूक घोंटते हुए ठीक है बेटा मैं देखती हूँ ? मैडम की आँखों के सामने बिन फोन वाले दीपक, खुशी, आकृति सभी के चेहरे घूमने लगे।  
एक दिन प्रिन्सिपल के आदेश आया सभी शिक्षकों को कल विद्यालय आना है। सारे शिक्षकों के साथ मैडम स्कूल की दीवारों के इर्द – गिर्द रॉल नंबर ट्वेंटी टू के साथ दूसरे बच्चों को ढूंढ रही हैं। बरामदे में पैर घसीटते बच्चों के जूत्तों की आवाज़ कानों में बज रहे हैं । 
मीटिंग में प्रिन्सिपल ने हर एक शिक्षक से उनकी ऑनलाइन क्लास में उपस्थित और अनुपस्थित छात्रों का ब्योरा लिया। मीटिंग समाप्त हो चुकी है। प्रिन्सिपल अपने चैंबर में जा चुके हैं। 
अनीता मैडम ने लगभग डांटते हुए कहा – “क्यों? प्रसन्ना तुम्हें तो बड़ी चिंता हो रही है। प्रोफेशनल बनो ज़्यादा इमोशनल बनोगी तो ख़ुद के साथ हमें भी डांट खिलवाओगी। 
जी मैडम! आइंदा से ख़्याल रखूंगी।  
प्रसन्ना मैडम की आवाज़ में आदित्य जैसे बच्चों की बेआवाज भावनाएं कहीं दम तोड़ती हुई नज़र आ रही है। फिर  कल से ऑनलाइन क्लाससेस का नया टाईम-टेबल मिल चुका है।
प्रसन्ना मैडम सूनी सड़क पर भी थरथराते हाथों से ड्राइव कर घर पहुँचने ही वाली हैं।

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