लगभग हर रोज मेरा उससे सामना होता, मैला सा पेटीकोट उस पर कभी कमीज तो कभी कंधों उतरता ब्लाउज जो किसी की मेहरबानी को दर्शाता। किसी साड़ी के टुकड़े को लज्जा वस्त्र बना खुद को उसमें समेटने का असफल प्रयास करती वह | वैसे पुरूषों की नजर से देखूँ तो कोई विशेष आकर्षण नहीं था उस देह में या फिर रहा भी हो तो गरीबी का ग्रहण डस गया था । कंधे पर कपड़े की मैली सी झोली लटकाए नंगे पैर सड़क पर आवाजाही करती, फटी एडियां. पक्का रंग. दुबली काया… गोद में कुपोषित बच्चा लिए जिसके चेहरे पर शायद जूठन लगने की वजह से मक्खियां भिनभिना रही होतीं। बोर्ड ऑफिस पर सिग्नल के लाल होते ही वह किसी अदृष्य शक्ति की भांति प्रकट हो कार के कांच पर दस्तक देती, जैसे ही नजर उस पर उठती, मन कसैला ही हो जाता। पूरे बदन पर मैल की मोटी सी परत जमी दिखाई देती लगता काफी अरसे से उसने कपड़ों की तरह खुद को भी नहीं धोया । उम्र कोई 22 से 25 के बीच रही होगी।
दयनीय मुद्रा में कभी बच्चे की ओर तो कभी अपने उभार लिए हुए पेट की ओर इशारा कर भिक्षा पात्र आगे कर देती | अधिकांश कार में बैठी सवारी उसकी ओर नजर उठाकर भी नहीं देखतीं, फिर भी उसके प्रयास में कहीं कोई हताशा नहीं झलकती ,  शायद  जानती है कि कार की तरह उनके दिल और आँखों में भी शीशे चढ़े हैं । कभी -कभार कोई संवदनशील व्यक्ति कार का काँच खोल उसकी हथेली में एक सिक्का रख देता। सिग्नल के हरा होते ही फिर गाड़ियाँ  उसके दाएं बाएं से निकल जाती। वह पुनः अपने नियत स्थान पर आ खड़ी होती और फिर अगले सिग्नल का इंतजार करती। बारिश में भी वह एक बड़ी सी पोलीथीन ओढे उसमें बच्चे को सिमटाए सिग्नल से अपना तालमेल बैठाती। मैं सोचती ये कैसी माँ है जो अपने बच्चे को साथ ले सड़कों पर लोगों के आगे हाथ पसारे खड़ी रहती है। क्या हमदर्दी भी एक व्यवसाय हो सकता है इस कलयुग में…? क्या ये अबोध बच्चे उसके इस व्यवसाय का जरिया हैं..? पता नहीं। मेरा रोज ही उस ओर से आना जाना रहता। सोचती क्यूँ करती है ये ऐसा, आखिर क्या मजबूरी है…? यूँ हादसों से लोहा लेती, क्या कोई और काम नहीं करने योग्य …? अनगिनत सवाल जेहन में उठते और वह इन सबसे बेफिक्र अपनी ही धुन में रत …। 
हर साल उसकी स्थिति में इजाफा यह होता कि गोद का बच्चा गले में बँधी झोली में आ जाता, झोली का बच्चा उँगली थामें माँ का हमराह बनता, पेट में एक और नया बीज अंकुरित हो चुका होता। पिछले तीन वर्षों से कुछ ऐसा नाता हो गया कि सिग्नल पर रूकते ही मेरी नजर उसे खोजती। सोचती क्या मुझे संवेदना है उस औरत के प्रति…? शायद नहीं…? । फिर क्यों हर रोज वहाँ से निकलते मेरी नजरें उसके लिए बेताब हो जातीं ….? क्यों उसे लेकर कई सवाल जेहन में कुदबुदाने लगते हैं …? मुझे चिंता थी इस बात की कि कहीं किसी कार का पहिया उसे रोंदता हुआ न निकल जाए। कहीं उसकी अंतिम सांसे इन्हीं सड़कों पर किसी गाड़ी के पहिये तले तो नहीं लिखी …? उफ़ ! जाने क्या मजबूरी है इसकी जो ये जोखिम उठाए है। प्रतिदिन  सैंकड़ों लोग जो  सुरक्षा के साथ सफर करते हुए भी हादसों का शिकार हो जाते हैं और यह औरत खतरों से बेपरवाह अपने साथ अपने बच्चों का जीवन भी दाव पर लगाए है। हम शायद इसलिए डरते हैं कि हमारे बाद हमारे परिवार का क्या होगा , जतन से बसाया घर, तिनका.तिनका जोड़ी पूँजी का क्या होगा, लगता है इसके पास खोने को कुछ है ही नहीं इस तन के सिवा। जब पेट खाली होगा तो इस तन का भी क्या करेगी …सिग्नल बंद था या शायद खराब उस दिन, सिग्नल की लाइट के साथ भागने की जल्दबाजी जो नहीं थी संयोग से उसका सामना कार वालों के बाद मुझसे हो गया। मैं मानो भरी बैठी थी..उलट पड़ी। 
“तुम्हें डर नहीं लगता रोज इस तरह वाहनों के आगे आती हो। तुम्हारा पति कुछ नहीं कहता …? वह चुप हो गई। शायद उसके पास मेरे इस प्रश्न का कोई उत्तर ही न हो …? शायद उसका कोई पति ही न हो…? या …? उसने मेरे सवालों के जवाब देना उचित न समझा …? फिर ये बच्चे …? क्या इन बच्चों का कोई बाप नहीं…? तो क्या वह …? ,ऐसे कैसे हो सकता है उसमें तो ऐसा कोई आकर्षण नहीं ..! यदि ऐसा है तो क्या पुरूष सिर्फ स्त्री देह का प्यासा है चाहे वह किसी की भी हो…? क्या इन बच्चों की जिन्दगी इसी सिग्नल के आस -पास है …? अगर ऐसा है तो क्या चंद पैसों की खातिर यह अपनी देह से खिलवाड़ नहीं कर रही …?अपने साथ बच्चों के भाग्य को भी धिक्कार नहीं रही … अफसोस! मेरे  सारे प्रश्न अनुत्तरीय रहे।
“ओ! मेडम ..! जरा सम्हल कर ..क्या घर से अनबन कर निकली हो …? सामने का वाहन नजर नहीं आ रहा …?” अचानक सामने से आते वाहनवाले ने चिल्लाते हुए कहा ।
‘उफ! ..इसका कुछ हो न हो इसके चक्कर में मैं जरूर हादसे की शिकार हो जाउँगी।‘ 
“सॉरी भैया ! कहते हुए मैंने अपनी राह ली |” 
बहुत दिनों तक वह वहाँ दिखाई नहीं दी। गुरूवार का दिन थासाईं बाबा के दर्शन करती हुई  घर जाती हूँ । दर्शन कर जैसे ही बाहर निकली कतारबद्ध बैठे मांगने वालों पर नजर गई तो देखा वह तो यहाँ बैठी है, ओह ! उसका फूला हुआ पेट…तो  क्या फिर.. हाँ ! मेरा शक सही था। पास में एक बच्चा फटी और मैली सी शर्ट पहने कटोरे में चंद सिक्के उछालकर खुश हो रहा है, गोद में साल सवा साल का बच्चा नंगे बदन, बहती नाक लिए उसके सूखे स्तनों को चूस रहा है। संभवतः बड़े पेट के कारण वह ठीक से बैठ भी नहीं पा रही थी। पैरों पर काफी सूजन थी देखकर लगता था प्रसव का समय निकट आ गया है। मैंने उसके करीब जाकर बच्चे के हाथ में दो लड्डू प्रसाद स्वरूप रख उससे कहा,
“तुम्हें तकलीफ है तो क्यों बैठी हो …घर क्यों नहीं जातीं.. आराम करो जाकर |” 
मेरी बात सुन वह हल्के से हंस दी जिसमें मुझे हंसी कम पीड़ा अधिक नजर आ रही थी। 
“घर! घर कहां है हमारा?”
“फिर कहाँ रहती हो?”
“इहाँ ई|”
“तुम्हारा पति …?”
“वह खामोश हो इधर.उधर देखने लगी।“तो क्या इनका संसार यूँ ही सड़कों पर .. उसकी खामोशी चुभ रही थी मुझे,
“क्या तुम्हारा पति कुछ नहीं करता …?”
“उ कहां कुछ करता है । दारू पीके पड़ा रहता है|”
“कितना कमा लेती हो इस तरह से|”
“बस 25…50 रूपया , कभी उ भी नहीं।“
“क्या इससे पूरा पड़ जाता है..?”
“कहाँ ?”
“फिर क्यों इस तरह सड़क पर मारी-मारी फिरती हो, खुद को और बच्चों को भी जोखिम में डालती हो। कोई टक्कर मार गया तो जिन्दगी भर को अपाहिज हो जाओगी। जानती हो ना !”वो मेरा मुंह तक रही थी,
“इससे तो अच्छा हो किसी के घर झाडू बर्तन कर कमा लोगी।“
“कौन देगा हमें काम.. आप देंगी काम..?” मैं आवाक ! इसकी तो उम्मीद ही नहीं की थी। अपने पर दाव देख झुंझला गई मैं ,खुद को कोसती वहाँ से चल दी। नाटकबाज औरत है …, लोगों से सहानुभूति पसंद है उसे, मरने दो मुझे क्या…अब नहीं पूछूंगी। खुद को भाषण देती वहाँ से चल पड़ी, जानती जो थी भाषण से पोषण नहीं होता।
अब वह सिग्नल के पास दिखाई नहीं देती ,उसने कारों का पीछा करना छोड़ दिया था, शायद ! उसे मंदिर के अहाते की पनाह भली लगी …, या फिर यहाँ-वहाँ भागने की शक्ति नहीं रही उसमें शायद ! उस दिन भी गुरूवार था। मैंने देखा वह बैठी है पेट का वह बालक जो अब लगभग बीस –पच्चीस दिन का हो गया होगा उसे कपड़े में कुछ इस तरह लपेट रखा था कि बस आँख ही दिखाई दे रही थी। वह उस बालक की दुहाई देकर भीख मांग रही थी इतने नन्हें बालक को देख लोगों कीं सवेदना जाग रही थी। लोग पास बिछे कपड़े पर कुछ सिक्के डाल रहे थे। छोटा बच्चा उन्हें सहेजकर ढिग लगा रहा था। औरत बार-बार हथेली को सिर पर लगा देने वालों का शुक्रिया अदा कर रही थी। मैंने उसे प्रसाद देते हुए पूछा,
“क्या हुआए बेटा या बेटी?”
उसने मेरी बात को अनसुना कर दिया और मुझे अनदेखा। मैं एक बार फिर आहत हुई। एक अनपढ़ गंवार, मैली-कुचैली, जाहिल औरत से बार – बार  अपमानित हो मन चोटिल हो गया। खुद को कोसने लगी , आखिर क्यों चली आती हूँ  बार-बार अपना अपमान कराने ?”
तभी एक औरत जो शायद उसी की बिरादरी की थी। उसके पास बैठ भीख मांगती हो , उसकी प्रतियोगी थी शायद …, एक वर्दी वाले को साथ लेकर आयी ।
“देखो साब ! इस बच्चे को ,यही है वह जिसके बारे में मैं बता रही थी ।“ वर्दी वाला डंडा ठोकर कर औरत को घमकाते हुए कहा ,
“किसका है ये बच्चा?”
“साहब मेरा बच्चा है, सच्ची केह रही, भरोसा नहीं तो पूछ लो सबसे |”
“साली ! मुझे कानून बताती है। खोल इस बच्चे को…इस तरह क्यों लपेट रखा है ?” देखते ही देखते भीड़ जमा हो गई। 
“खोलती है कि लगाऊं डंडा |”
“खोलती है साब… खोलती है ..|”कहते हुए उसने प्रतिशोध भरी आंखों से उस औरत को घूरा  वह जो अपनी जीत पर इठला रही थी। हाँ ! उसकी प्रतिद्वंदी थी, बच्चे पर से कपड़ा हटते ही कुछ बदबू सी महसूस की लोगों ने नाक पर कपड़ा लगा लिया। तभी वह औरत चिल्ला पड़ी, 
“देखा साहब! मैं सही थी.. ये बच्चा मर चुका है। कैसी कुलटा औरत है अभी भी उसके नाम पर मांग रही है|” लोग अचंभित थे वर्दी वाला चिल्लाया, 
“क्या ये सच है..? बोल सच क्या है..?” उसके डंडा खड़खडाने से दोनों बच्चे सहमकर उससे चिपक गए। 
“सच बताती है कि ले चलूँ  बड़े साहब के पास।“ वर्दी वाले ने ऊँचे स्वर में कहा ।
इस बार वह कांपते हाथों को जोड़ बोली,
“नहीं साब बड़े साब के पास नहीं… वो मुझे बंद कर देगा…मेंरे छोटे-छोटे बच्चे हैं साब कोई नहीं है उनका ..मैं बताती हूँ साब! सच्ची-सच्ची बताती हूँ । ये बच्चा जिंदा नहीं है साब…।“ 
“क्या ..!!!” सभी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे। 
“हाँ साब! ये मर गया है|”
“कब मरा?”
“कल ।“
“फिर इसे दफनाया क्यों नहीं। इस तरह लेकर क्यों घूम रही हैं ?”
“क्या करती साब ! तीन पेट खाली है। इस बच्चे को दिखाकर कुछ मांग लेती थी । सो परसों रात ये भी मर गया। सोचा एक दो दिन और मांग लूँ फिर तो दफनाना ही है।
डॉ लता अग्रवाल
पिछले 9 वर्षों से आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर संचालन, कहानी तथा कविताओं का प्रसारण , राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में रचनाएँ प्रकाशित | कविता संग्रह : मैं बरगद, आँचल, सिसकती दास्तान, हस्ताक्षर हैं पिता | कहानी संग्रह : सिंदूर का सुख, साँझी बेटियाँ | उपन्यास - मंगलमुखी | लघुकथा, समीक्षा आदि की भी पुस्तकें प्रकाशित | संपर्क - agrawallata8@gmail.com

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