सन् 2004 की बात है जब इन्होंने मुझे भी अपने साथ जम्मू ले जाने का फैसला लिया। इनके साथ जाने की खुशी तो अलग थी ही और फिर जम्मू जैसी खूबसूरत जगह में रहने का ख्याल ही रोमांचित कर रहा था। ट्रेन का सारा सफर सपने संजोते पूरा किया। फिर बस का सफर और उन बर्फीले पहाड़ों के बीच से गुजरते सर्पीले रास्ते मेरे सपनों पर चांदी की परत चढ़ा रहे थे। वहां से हम कार करके चंद्रकोट  तक पहुंचे। एक सिविलियन होने के नाते एक ऐसी जगह पर पहुंचना जहां पर कंपनी और आर्मी वालों का गेट कॉमन था एक अलग ही अनुभव दे रहा था। वहाँ एक तरफ राज की कंपनी के लोग रहते थे दूसरी तरफ आर्मी वालों का रेजिडेंशियल एरिया और उसके बाद पीछे आर्मी का कैंप था।
शुरू में सब अच्छा लगा, अच्छा आज भी लगता है लेकिन मन अधरत में रहता है। रोज रात में ट्रेनिंग केम्प से फायरिंग की आवाजें आती थीं। शुरू शुरू में तोे मैं अक्सर नींद से उठ जाया करती थी और रात भर नींद नहीं आती थी लेकिन डर नहीं लगता था। डर तब लगता था जब राज ऑफिस से आ कर अक्सर बाहर हो रहे आतंकी वारदातों के बारे में बताया करते थे। ऐसी बातों को सुनकर मन आतंकित हो जाता था।  लोगों तक तो सिर्फ 25 प्रतिशत बातें ही पहुंच पाती हैं वह भी न्यूज़ चैनल के जरिए, यहाँ जो कुछ घटता है  वो इन्हीं वादियों में दब कर रह जाता है। अब तो धीरे-धीरे इस जगह की आदत पड़ गई है।
कुछ दिन बाद मैंने यहीं की कंपनी के स्कूल में टीचर की जॉब कर ली। मैं इंग्लिश और कंप्यूटर पढ़ाती थी। वैसे तो बच्चों के संग समय बिताना मुझे अच्छा लगता था लेकिन यहाँ के बच्चों में कुछ अलग ही भोलापन था जो मन मोह लेता था। अक्सर स्कूल से घर वापस लौटते वक्त हम लोग की स्कूल बस बीच में रोक दी जाती, कभी कुछ सुनने में आता तो कभी कुछ। एक बार तो हम लोग स्कूल के लिए निकले ही थे कि बस को रोक दिया गया और वहाँ खड़े- खड़े ही स्कूल ओवर होने का समय भी बीत गया और हम करीब चार बजे जा कर घर पहुँचे। बाद में पता चला की दो आतंकवादियों को पकड़ा गया है, उन दोनों के पास ग्रेनेड और बम बरामद हुए थे। कुछ दिन बाद की ही बात है राज अमरनाथ यात्रा के लिए ऑफिस के लोगों के साथ ही निकल रहे थे और यहाँ से कुछ दूर पर ही उन लोगों को रास्ते में रोक दिया गया था। तीन घण्टे बाद जब रास्ता खुला तब पता चला कि आतंकवादियों ने उस रास्ते पर माइन्स बिछा रखी थी। घटनाएं तो बहुत सुनने में आईं लेकिन हमारी आर्मी हर बार सफल होती थी।
करीब दो साल बाद हमारा परिवार बढ़ा और विनायक हमारे घर में आया। उसके थोड़ा बड़ा होते ही मैंने उसका दाखिला भी अपने ही स्कूल में करवा दिया अब विंकू भी मेरे साथ ही स्कूल जाया करता था।
अब इन खूबसूरत पहाड़ियों की छवि मन को बहुत ऊबाने लगी। मन बस दिल्ली भागने का करता है या फिर अपने गांव। यहां मन सिर्फ अधरत में ही रहता। जब भी लगता है कि अब यहाँ सब सामान्य हो गया है कुछ ना कुछ ऐसा हो जाता कि मन आतंकित हो ही जाता है। विंकू धीरे-धीरेे पाँच साल का हो गया और उसका मन यहां के बच्चों के संग लगने लग गया। दिल्ली जाता तो भी यहाँ हो की ही बातें करता लेकिन शायद वह हमारे मन को नहीं समझ पाता है। यूं तो हमारा मन भी यहाँ लग गया था और देखते-देखते आठ साल पूरे हो गए थे। अगर बाहर हो रही घटनाओं को नजरअंदाज किया जाए तो यहां का माहौल बहुत अच्छा था सब मिल जुल कर रहते थे। कोई भी त्यौहार हो हम सब मिलकर मनाया करते थे दिक्कतों को मिलकर सुलझाया करते थे। एक अपनापन था हम सभी में, गिने-चुने परिवार थे, सब में प्रेम भाव था।
एक दिन की बात है, राज और बाकी सभी ऑफिस जाने वाले लोग ऑफिस जा चुके थे। दोपहर के समय हम सभी औरतें अपना काम खत्म कर के, पीछे वाले अपने छोटे गेट के पास यूँ ही बातें कर रहे थे तभी गुप्ताइन जी ने बताया की आजकल एक पागल औरत आसपास में देखी गई है। आर्मी कैम्प वाले कॉमन गेट से कितनी बार वापस लौटाई भी गयी है। पता नहीं कौन है कहाँ से आई है। हम सब ये बात खत्म कर के उठने ही वाले थे की वो पगली औरत हमारे गेट से घुस कर हम लोगों की तरफ बढ़ी। हम सभी सकपका गए।
वो हम लोग के पास आकर कुछ खाने के लिए मांगने लगी। हम लोग पहले तो उसे देख कर हंस दिए लेकिन इस तरह एकाएक सबका एक साथ हंसना अच्छा नहीं लगा इसलिए हम सभी चुप हो गए और फिर दोबारा हम सब की  खुसर फुसर चालू हो गई। तभी पांडे जी की औरत उठकर गई और उससे कुछ खाना ला कर दे दिया बस एक दिन की बात थी और वह औरत रोज- रोज छुप छुपा कर आने लग गयी।
रोज गेट के पास आ कर  बाहर बैठ जाए और घंटों तक अपने आप में ही बातें करे। बातें भी उसकी कुछ ऐसी होती थी कि हंसने को तो जी चाहता था लेकिन एक पागल औरत पर हँसना शोभा नहीं देता था। दयावश मैंने भी उसे कई बार खाना दिया। गज़ब की औरत थी बाल उलझे हुए, कपड़े फटे हुए और देह पूरी मिट्टी में सनी होती थी। कभी कभी हम उसे कंघी दे कर उसे बाल झड़ने के लिए कहते तो कंघी लेकर चली जाती फिर अगले दिन वैसे ही आ कर बाहर बैठ जाती थी।
बुरा तब लगता था जब उसका मासिक धर्म आता और वो वैसे ही गंदे कपड़े पहने घूमती रहती। तब कोई उसे बाहर भी नहीं बैठने देता था। जब वो पास की नदी से नहा कर आती तब हम उसे पास आने देते। उसे देख बहुत दया आती थी, करीब तीस या बत्तीस साल की होगी वो औरत और वैसा ही उसका यौवन। ना जाने क्या हुआ होगा उसके साथ जो ऐसे पागल की तरह घूमती रहती है।
अगले कुछ दिन तक वो नहीं आई तो मन में सभी के खलबली मची हुई थी और कुछ पता भी नहीं चल रहा था। फिर एक दिन राज ने ही ऑफिस से आ कर बताया कि कुछ लड़कों ने उसके साथ गलत कर दिया है। सुन कर बहुत बुरा लगा लेकिन एक हफ्ते बाद ही वो फिर से दिखाई देने लगी तब जा कर जान में जान आयी। अब कुछ शांत सी रहने लगी थी वो। और अब हम सभी उसका ख्याल भी रखने लगे थे। खाना तो समय से कोई ना कोई दे ही देता था लेकिन अब हम लोग उसे कभी कंघी दे कर बाल झड़ने का इशारा कर के समझाते तो बाल भी झाड़ लेती। तेल भी लगा लेती।
लेकिन कमाल की थी गेट के पास घण्टों तक अकेले बैठ कर अपने में ही ना जाने क्या बात करती रहती, कभी कभी अंग्रेज़ी के शब्द भी बोलती बीच में,  तो कभी सुरीले गाने गाया करती। सबका मन लगाए रखती। एक परिवार के हिस्से की तरह वो भी दिन भर यहाँ ही बिताया करती और रात में ना जाने कहाँ चली जाती थी। हालाँकि इधर बीच मैं उसे खाना वगैरह नहीं दे पाती थी। आजकल स्कूल से बहुत देर हो जाया करती। बच्चों को नाटक और गाने की प्रैक्टिस मुझे ही करवानी थी। एक दिन स्कूल से लौटी तो बाहर गेट पर ही भीड़ लगी हुई थी।
वहाँ जाने की हिम्मत तो नहीं हुई लेकिन जब तक भीड़ छंटती राज आ गए। जब तक उन्होंने बताया नहीं मन में एक बेचैनी सी लगी रही की आखिर हमारे कैम्पस के पास क्या हो सकता है। फिर उन्होंने आ कर बताया की उस पगली औरत का पति आया था और साथ ले जा रहा था लेकिन वो नहीं जा रही थी इसलिए  उसे उसने मारा भी बहुत। ये बात सुन कर बहुत बुरा लगा कि कैसे लोग हैं एक तो अपनी पत्नी को इतने दिन तक ऐसे छोड़ दिया और अब आ कर मारा भी उसको। कितना सुरीला गाती है, अंग्रेजी भी बोल लेती है।
जरूर पति ने ही कुछ किया होगा जो ऐसे पागल हो गयी। अब उस पर हम सभी को और दया आने लगी, सभी की सहानुभूति उस पर बढ़ गयी। जिसके फलस्वरूप वो अब अक्सर यहीं कैम्पस के बाहर ही रात को सो जाया करती और अब वो अपना ज्यादा समय यहाँ ही बिताती थी। लेकिन उसके यहाँ सोने पर आर्मी वालों ने ऑब्जेक्शन किया। आर्मी और हमारा एक गेट कॉमन होने की वजह से ये ऑब्जेक्शन उठा। ऊपर से स्वतंत्रता दिवस भी आ रहा था जिसकी वजह से उसे रात को यहाँ बाहर से भी हटा दिया जाता था।
अब कैम्पस की सभी औरतों को रात में उसकी चिंता लगी रहती। मेरे चिंता करने पर राज बहुत गुस्सा करते थे। उनका कहना था कि ऐसी औरतों का कोई भरोसा नहीं, कहाँ से आई है कौन है। मेरे ये कहने पर की पति आया तो था लेने लेकिन वो गयी नहीं। इस पर उनका कहना था उसके पति को कौन जानता है और ये औरत पागल है तो पति के साथ क्यों नहीं गयी। रुकने का दिमाग कैसे आया। राज की बात सुन कर मुझे भी लगा जैसे शायद उनकी ही बात सही है।
वो रात थी जिसके बाद मैंने उस पर ध्यान देना भी कम कर दिया था। इधर घटनाएं भी बहुत बढ़ गयी थीं। स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस, पास आते ही वारदातें बढ़ ही जाती थीं। लेकिन यहाँ की औरतें कहती थी कि अपनी कम्पनी के कैम्पस में कुछ नहीं होगा क्योंकि सालाना कुछ करोड़ रुपए आतंकवादियों को जाते है जिस बात की पुष्टि इन्होंने कभी नहीं की। लेकिन फिर भी एक डर तो बना ही रहता था।
अब स्वतंत्रता दिवस को करीब दस दिन ही बचे होंगे। दिमागी तौर पर बहुत सी चीज़ें घेरे हुए थीं। स्कूल में देर तक रुक कर प्रैक्टिस करवाना फिर घर आ कर उतना ही काम ऊपर से बाहर चल रही कड़ाई। कल का इतवार ही बचा था बहुत काम निपटाने थे। सुबह आँख खुलते ही काम में लग गयी विंकू का भी स्कूल प्रोजेक्ट पूरा करवाना था। घर का सारा काम खत्म कर के मैं विंकू का प्रोजेक्ट बनाने बैठ गयी। ये कुछ सामान लेने बाहर चलेे गए। तभी बाहर से शोर सुनाई दिया। हम सभी बाहर निकले।
इस बार आर्मी की पूरी टुकड़ी गेट के पास थी। हम सभी पीछे ही खड़े थे। मेरा मन कुछ धक धक करने लगा। राज अभी तक नहीं आए थे। और आर्मी वालों की भीड़ थी कि बढ़ती ही जा रही थी। जान में जान तब आई जब राज घर आए। उनके आने पर पूछा कि क्या हुआ तो कुछ नहीं बोले बस मुस्कुरा कर घर के अंदर चले गए।  तभी भीड़ छटने लगी और देखा की उस पगली को आर्मी वाले गिरफ्तार कर के ले जा रहे थे।
बात खुली तो पता चला की आज सुबह ही वो कैम्पस के पास वाली दुकान पर जा कर पेंसिल सेल माँग रही थी और बदले में उसने कड़क पाँच सौ का नोट दिया। शक पड़ते ही दुकान वाले ने आर्मी में ये बात बताई और जब उसके रहने वाली जगह को देखा गया जहाँ वो रात बिताती थी वहाँ एक पिस्तौल, ट्रांसमीटर, काफी सारे सेल, हजार और पांच सौ के नोट मिले। ये घटना स्वतंत्रता दिवस से आठ दिन पहले की बात है। उस दुकान वाले की समझदारी से एक बड़ा हादसा होने से टल गया साथ ही हम सब का भ्रम टूट।
मेरा तो इनकी बात सुन कर कुछ लगाव कम हो भी गया था लेकिन बाकी लोग बहुत ज़्यादा सदमे में थे। कुछ दिन बाद पता चला कि जो उसका पति आया था और जिन लड़को को पुलिस ने उसे तंग करने पर पकड़ा था वो सभी आतंकवादी थे और स्वतंत्रता दिवस पर बम फोड़ने की तैयारी में थे। ये हादसा टल तो गया था लेकिन काफी दिन तक हम सब के ज़हन से नहीं गया।
आज जम्मू से दिल्ली आए भी पाँच साल बीत गए लेकिन ये बात जहन से नहीं जाती। अब किसी भी पागल लड़की को देखती हूँ तो लगता है की सब झूठ है।

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