पिछले कुछ दिनों से मेरे साथ अजीब-सी बात हो रही है। मैं चीजों को भूलने लगा हूं। कभी मैं किसी व्यक्ति का नाम भूल जाता हूं तो कभी किसी लेखक का। मुझे समझ नहीं आ रहा कि ये क्या हो रहा है। कभी-कभी तो बड़ी अजीब सी स्थिति हो जाती है। उस दिन रास्ते में मुझे एक महिला मिली। शायद वह अपने बेटे को स्कूल की बस में बिठाने के लिए जा रही थी। उसने मुझे देखा और मुस्कराकर कहा, नमस्ते। मैंने भी परिचय का भाव चेहरे पर लाकर उसकी नमस्ते का जवाब दे दिया। लेकिन मुझे बिलकुल याद नहीं आया कि वह महिला कौन है। मैंने भरसक याद करने की कोशिश की, लेकिन उस महिला के परिचय के रूप में मुझे कुछ भी याद नहीं आया। हालांकि मैंने इस घटना को सामान्य रूप से ही लिया। मुझे लगा कि हो सकता है, कभी घर पर आई हो और मुझे जानती हो। इसलिए मैंने इस घटना को अनदेखा करना ही सही समझा। कुछ ही दिनों बाद मुझे यह यह महसूस हुआ कि यह घटना ”रियल” में नहीं हुई थी, बल्कि मैंने उस महिला को सपने में देखा था। लेकिन एक दिन इससे भी ज्यादा अजीब घटना हुई। मैं एक सुनसान सी सड़क पर जा रहा था। शाम का समय था। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि यह सड़क बहुत जानी पहचानी है। मैं उस सड़क पर कुछ देर तक चलता रहा। अपनी सोच में डूबा हुआ। फिर मुझे अचानक अहसास हुआ कि इसी सड़क पर एक लड़की का मकान है। मैंने उस लड़की के मकान के पास जल्दी से पहुंचने के लिए अपनी चाल तेज कर दी। काफी देर चलने के बाद भी उस लड़की का मकान नहीं आया। फिर मैं सोचने लगा कि आखिर मैं किस लड़की के घर जा रहा हूं। बहुत सोचने पर भी मुझे यह समझ नहीं आया। फिर भी मैं उस सड़क पर चलता रहा। फिर अचानक अंधेरा गहरा हो गया। सर्दियों के दिन थे। कोहरा भी घना हो गया। मुझे कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया। इससे आगे मुझे कुछ भी याद नहीं रहा। मैं काफी दिन तक यही सोचता रहा कि मैं उस सड़क पर कब गया था, क्यों गया था और किस लड़की से मिलने गया था। लेकिन मुझे कुछ भी समझ नहीं आया। काफी समय बाद मुझे अहसास हुआ कि मैंने इस तरह का कोई सपना देखा होगा।
दरअसल मेरी समस्या यही है। जो कुछ मैं सपने में देखता हूं, वह सब मुझे रियल लगने लगा है और जो मेरे साथ रियल में होता है, वह मुझे सपना दिखाई पड़ता है। मैं इन दोनों के बीच फर्क करने की बहुत कोशिश करता हूं, लेकिन मेरे साथ लगातार होने वाली घटनाएं इस फर्क को खत्म करने पर तुली हुई हैं।
मैं एक एल.आई.जी. फ्लैट में रहता हूं। उसमें दो कमरे हैं। एक कमरा किताबों से भरा हुआ है। इसे आप मेरी लाइब्रेरी भी कह सकते हैं। कमरे की एक दीवार पर बनी अलमारी में तरह-तरह की किताबें हैं। दोस्तोव्स्की, टॉलस्टॉय, गोर्की, चेखफ, कामू, ओ हेनेरी, मोपासां, बाल्ज़ाक, शोलोखोव, लू शुन, पर्ल एस बक, अर्नेस्ट हेमिंग्वे के अलावा हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य इस अलमारी में भरा हुआ है। इस कमरे में एक मेज और एक कुर्सी भी है, जिस पर बैठकर मैं कुछ पढ़ता या लिखता हूं। मेरा अधिकांश समय इसी कमरे में बीतता है। यहां रखी अधिकांश किताबें मैंने पढ़ी हुई हैं। बहुत से उपन्यासों के किरदार मेरे भीतर इस तरह रच-बस गए हैं कि मैं उन्हें भुला नहीं पाता। इस कमरे में बैठे हुए कभी-कभी तो मुझे ऐसे लगता है कि कुछ किरदार किताबों में से बाहर निकल आए हैं। कभी मुझे अपने आस-पास नस्तास्या फिलिपोव्ना दिखाई पड़ती है तो कभी माशलोवा और कभी अन्ना केरोनिना। इन किरदारों से मेरी दोस्ती इतनी ज्यादा हो गई है कि मैं इन्हें हर वक्त अपने आस-पास देखता रहता हूं। बहुत से उपन्यासों की नायिकाओं से मेरी दोस्ती-सी हो गई है। मैं इनसे बातें करता हूं, इनके बारे में सोचता हूं। इनके बीच रहते हुए पता नहीं क्यों मेरे मन में यह धारणा पुख्ता होती जा रही है कि एक ना एक दिन इन किताबों के कुछ किरदार किताबों से बाहर निकल आएंगे। और पिछले कुछ दिनों से तो मानो मैं किसी किरदार के किताब में से बाहर आने की प्रतीक्षा-सी करने लगा हूं।
उस दिन दोपहर का वक्त था। मैं अपनी लाइब्रेरी में कुर्सी पर बैठा था। अपने हाथों को मैंने फोल्ड करके मेज पर रखा हुआ था और सिर हाथों में फंसा रखा था। कुछ देर मैं आंखें बंद करके इसी तरह लेटा रहा। मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था और मैं कुछ सोचना नहीं चाहता था। पता नहीं कब मेरी आंख लग गई। यह भी नहीं पता कि सचमुच मेरी आंख लगी थी या मुझे नींद में होने का भ्रम हो रहा था। हां, मेरे सिर में कुछ भारीपन-सा जरूर महसूस हो रहा था। मैंने अपने सिर को हाथों की गिरफ्त से आजाद किया। कमरे में काफी अंधेरा था। यहां सूरज की रोशनी बहुत कम आती है। वैसे भी कमरा हमेशा बंद ही रहता है। मैंने आंखें खोलकर सामने की ओर देखा। किताबें उसी तरह खामोश अपनी जगह लगी हुई थी। सब कुछ वैसा ही था जैसा मेरे लेटने से पहले था। कहीं कुछ भी नहीं बदला था। मैं कुछ देर इसी तरह किताबों को देखता रहा। अचानक मुझे लगा कि किताबों के बीच में से एक जोड़ी आंखें मुझे देख रही हैं। मैंने अपने सिर को एक जोर का झटका दिया। सोचा, शायद ये मेरा भ्रम होगा। मैंने कुछ क्षण के लिए अपनी आंखें उधर से हटा लीं, जहां मुझे एक जोड़ी आंखें दिखाई दी थीं। मैंने बाकी कमरे को देखा, सब कुछ यथावत था। यानी मैं कोई सपना नहीं देख रहा था। मैंने दोबारा किताबों की तरफ नजरें घुमाईं। मुझे आश्चर्य हुआ… वही आंखें टकटकी लगाए फिर से मुझे देख रही थीं। मैंने गौर से देखा। बड़ी-बड़ी आँखे और सलीके से लगाया काजल, आंखों की पुतली इस तरह इधर से उधर घूम रही थी मानो अपने घर का पता भूल गयी हों। मुझे उन आंखों में बालपन, शरारत और रूमानियत सबकुछ नजर आ रहा था। मैंने अपने आप से कहा, यकीनन बहुत सुंदर आंखें हैं। लेकिन सिर्फ आंखें। काश ये आंखें एक पूरी लड़की में तब्दील हो सकतीं ! शायद उसने मेरे मन की बात सुन ली थी। मैंने देखा अब वह एक जोड़ी आंखें एक पूरी लड़की में बदल चुकी थीं। एकबारगी मुझे लगा कि कहीं ये सचमुच किसी उपन्यास की ही नायिका तो नहीं। मेरे मन में अनेक नायिकाओं का ख्याल आया, लेकिन किसी की भी शक्ल इससे नहीं मिलती थी। मैंने एक बार फिर उसकी ओर ध्यान से देखा। पांच फिट चार या पांच इंच का कद होगा, गोरा रंग, कंधों तक झूलते बाल, पतले-पतले होंठ और लंबी नाक। मैं इसी पसोपेश में था कि उससे कैसे बात करूं। तभी अचानक उस लड़की ने अपना दायां हाथ मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा ‘चौंकिए मत! मैं जीती-जागती लड़की हूं। मेरा नाम हुमा है।’
उसका हाथ अब भी मेरे हाथ में था। मैंने देखा कि उसकी पतली-पतली उंगुलियां बेहद खूबसूरत हैं। मुझे लगा कि मैंने इससे ज्यादा नाजुक हाथ पहले कभी नहीं देखा। मैं कुछ कहने की सोच ही रहा था कि हुमा फिर बोली, ‘मैं जब आई तब आप सो रहे थे, इसलिए मैं किताबों के पीछे छिप गई। अब मेरे जाने का समय हो गया है, मैं फिर आऊंगी।’ मैं उससे कुछ पूछता इससे पहले ही हुमा जा चुकी थी।
हुमा चली गई थी, लेकिन उसका अक्स मेरे जेहन में दर्ज हो चुका था। शुरू में तो मुझे यही लगा था कि हुमा नाम की उस लड़की को मैंने सपने में ही देखा होगा। लेकिन उसका रोमांटिक अंदाज में हाथ मिलाना, उसकी आंखें, उसके बाल मुझसे कह रहे थे कि ये सपना नहीं है। हुमा अड़ोस-पड़ोस में रहने वाली कोई लड़की होगी। मुझसे मिलने आई होगी। मुझे सोता देखकर किताबों के पीछे छिप गई होगी। हुमा… हुमा… कितना खूबसूरत नाम है। मैंने कहीं पढ़ा था हुमा एक काल्पनिक पक्षी को कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पक्षी की छाया किसी पर पड़ जाए तो उसकी हर मनोकामना पूरी हो जाती है। फिर तो मेरी भी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी। मेरे पास तो हुमा खुद चलकर आई है। यानी अब मेरी हर मनोकामना पूरी हो जाएगी। लेकिन मेरी मनोकामना है क्या? हुमा। पता नहीं अब वह कब आएगी।
कुछ दिनों तक हुमा मेरे जेहन पर छाई रही। लेकिन हुमा नहीं आई। मैं अपनी लाइब्रेरी में बैठा रोज हुमा का इंतजार करता रहता। कई बार मैंने मेज पर सिर रखकर सोने की कोशिश भी की, लेकिन हुमा नहीं आई। एक दिन मैं अपनी लाइब्रेरी में बैठा सो रहा था। तभी एक महिला मुझे खाना देने के लिए आई। उसने थाली मेज पर रखते हुए कहा, ‘हर समय सोते रहते हो, खाना रखा है खा लेना।‘ मैं जब तक पलटकर देखता, वह महिला जा चुकी थी। मैंने धीरे-धीरे खाना खाया और थाली को मेज के नीचे ही रख दिया। मैं सोचने लगा ये महिला कौन है। उसके हाव-भाव और खाना देने के अंदाज से ऐसा लग रहा था मानो वह मेरी पत्नी हो। मैंने दिमाग पर जोर डालने की कोशिश की। जल्द ही मुझे याद आ गया कि यह महिला अक्सर मेरे सपने में आती है। कभी-कभी इस महिला के साथ छह-सात साल का एक बच्चा भी दिखाई पड़ता है। सपने में यह महिला खुद को मेरी पत्नी बताती है और उस बच्चे को अपना और मेरा बेटा। मुझे लगता है यह महिला पिछले कई सालों से मेरे सपने में आ रही है। मुझे यह सोचकर बड़ा अजीब सा लगा। क्या सपने में आने वाली किसी महिला से भी आपका स्थाई रिश्ता बन सकता है? क्या ऐसा भी हो सकता है कि किसी व्यक्ति का पूरा परिवार सपने में ही उसके साथ रहता हो? लेकिन ऐसा हो रहा है। बराबर हो रहा है। पिछले कई सालों से हो रहा है। एक दिन उसने सपने में आने वाली उस औरत को हुमा नाम से आवाज लगाई। उस औरत ने गुस्से में कहा, ‘अब मेरा नाम भी भूल गये। तुम जैसे आदमी से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। हमारे विवाह को सात साल हो गए हैं और तुम्हें कुछ याद नहीं रहता। कम से कम मेरा नाम तो याद रखा करो… सपना नाम है मेरा सपना।’
सपना… सपने भी अजीब होते हैं। उस वक्त तो और भी अजीब जब सपनों में आने वाले किरदार आपसे जबरदस्ती का रिश्ता बनाने की कोशिश करें। अगर मैं सपने पर यकीन करूं तो सपना मेरी पत्नी है और मेरा एक बेटा है छह-सात साल का।
दोपहर का समय था मैं अपनी लाइब्रेरी में बैठा था। पता नहीं क्यों आज मुझे हुमा की बहुत याद आ रही थी, लेकिन उसका कहीं कोई पता नहीं था। मेरे मन में रह-रह कर यह ख्याल भी आ रहा था कि कहीं मैंने हुमा को सपने में ही तो नहीं देखा। पर ऐसा कैसे हो सकता है। हुमा को मैंने बिल्कुल साफ देखा था। उसकी दो बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें, दोनों कंधों पर झूलते बाल और वो उसकी पतली-लंबी नाजुक उंगुलियां… नहीं… नहीं…ये सब सपना नहीं हो सकता। हुमा फिर आएगी। वो मुझसे कह कर गई थी और उसकी आंखों की पाकीज़गी कह रही थी कि वो लड़की कभी झूठ नहीं बोल सकती। पता नहीं यही सब सोचते-सोचते कब मेरी आंख लग गई। मैं कितनी देर सोया, ये भी मुझे याद नहीं। समय क्या हुआ होगा? पता नहीं। मैंने अपने इस कमरे में घड़ी नहीं लगा रखी है और सूरज की रोशनी भी इस कमरे तक नहीं पहुंच पाती, इसलिए समय का पता भी नहीं चल पाता। लेकिन जब मेरी आंख खुली तो सबसे पहले मेरी नजर हुमा पर पड़ी। वह मुझे एकटक देख रही थी। कुछ क्षण मैं भी उसे देखता रहा। फिर मैंने कहा, ‘कहां गायब हो गई थी। मैं कितने दिन से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।‘
हुमा खिलखिलाकर हंस दी। कुछ देर इसी तरह हंसने के बाद उसने कहा, ‘लेकिन आप मेरा इंतजार क्यों कर रहे थे?
मैं इस सवाल का क्या जवाब देता। यह सवाल तो मैंने खुद से भी कभी नहीं पूछा था कि मैं उसका इंतजार क्यों करता हूं। इसलिए मैं हुमा के इस सवाल पर चुप ही रहा। उसने मेरी चुप्पी को नोट किया और फिर वह खुद ही बोली, ‘मैं जिससे भी मिलती हूं, वह मेरा इंतजार करता ही है। मेरे दोस्त कहते हैं कि मुझमें जरूर कोई न कोई ऐसी बात है जो लोग मेरी तरफ आकर्षित होते हैं। आप तो शायद लेखक हैं। आप बताइए मुझमें ऐसी क्या बात है। दरअसल मैं आप से इसीलिए मिलना चाहती थी… कोई कहता है मेरी हंसी बहुत अच्छी है… कोई मेरी आंखों पर फिदा रहता है… कोई कहता है मैं बोलती बहुत अच्छा हूं… आप बताइए मुझमें क्या अच्छा है?’ वह बेसाख्ता बोले जा रही थी और मैं मुग्ध भाव से उसे देख रहा था। उसने मेरे जवाब का भी इंतजार नहीं किया और फिर बोलने लगी, मुझे लगता है, मैं शरारती हूं, सबसे मस्ती करती हूं, सबके साथ हंसती बोलती हूं, इसलिए लोग मुझे पसंद करते हैं। और एक बात मैं आपको बताऊं? उसने फिर मेरे जवाब का इंतजार नहीं किया और बोलने लगी, मुझे इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि कौन मुझे पसंद करता है और कौन नहीं करता। बस मैं जिसके साथ हंसने बोलने में कम्फर्टेबल होती हूं उसी के साथ बोलती हूं। मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ उसकी बातों को सुनता रहा। पता नहीं मैं उसकी बातों को सुन रहा था या केवल देख रहा था। मेरी चुप्पी को तोड़ते हुए उसने कहा, आप लगता है बहुत गंभीर व्यक्ति हैं….लेखक हैं ना….सच कहूं मुझे गंभीर लोग बिलकुल पसंद नहीं हैं। मेरा मन किया कि अपनी सारी गंभीरता को कहीं दूर ले जाकर फेंक आऊं। आज पहली बार अपने गंभीर होने पर मुझे अफ़सोस हो रहा था। मैं बिलकुल उसके जैसा हो जाना चाहता था। एक पल के लिए वह चुप गयी थी…मुझे एकटक देख रही थी और मौके का फायदा उठाकर मैंने उससे पूछ लिया, मुझे तो लगता है जो लोग बहुत हंसते हैं, वे ज्यादा गंभीर होते हैं। मैंने देखा पहली बार वह थोड़ी सी गंभीर हुई। फिर गंभीरता से कहने लगी, आपसे एक बात सच कहूं? मैंने सहमति में अपना सिर हिला दिया। वह कहने लगी, मैं इस दुनिया की नहीं हूं….मेरे सारे दोस्त कहते हैं मैं किसी दूसरे प्लेनेट से आई हूं। मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी सी पैदा हो गयी। मेरे मन में एक बार फिर यह डर पैदा हुआ कि कहीं हुमा सचमुच ही कोई सपना ना हो। वह फिर कहने लगी, आप बताओ क्या मैं इस दुनिया की नहीं लगती….क्या आपको भी मैं किसी दूसरे प्लेनेट से आई हुई लगती हूं? मैंने इस बार हुमा की आंखों में देखते हुए कहा, नहीं तुम बाकायदा इसी दुनिया की हो….लेकिन तुम्हारे भीतर किसी तरह का छल कपट नहीं है….तुम एकदम पाक़ हो और आज की दुनिया में ऐसे लोग मुश्किल से मिलते हैं। इसलिए लोग तुम्हें दूसरे प्लेनेट का मानते हैं।
अचानक वह जोर जोर से हंसने लगी। हंसते-हंसते हुए ही उसने कहा, चलो मुझे एक इनसान तो ऐसा मिला जो मुझे इस दुनिया की मानता है…इसलिए मेरी और आपकी खूब जमेगी…वह हंसती रही… हंसती रही…हंसती रही और मैं बस उसे देखता रहा। मुझे यह भी नहीं पता चला वह कब चली गयी……।
अब तक यह तय हो चुका था कि हुमा कोई सपना नहीं है। वह बाकायदा एक जीती जागती लड़की है, जो हंसती है, बातें करती है….सजती-संवरती हैं और आंखों में ढेर सारा काजल लगाती है। हुमा और मेरे बीच एक रिश्ता सा बनने लगा था। जब उसकी इच्छा होती वह मेरे पास आ जाती। कभी वह मेरी किताबों को देखती रहती और कभी मुझे। वह अपनी अधिकांश बातें मुझसे शेयर करने लगी। छोटी से छोटी बात वह सबसे पहले आकर मुझे बताती। यहां तक कि उसने किस बाजार से ईयररिंग खरीदा…किस बाजार से काजल…किस बाजार से हेयर बैंड….किस बाजार से टॉप….। मुझे अपने ऊपर आश्चर्य होता। मेरी इस तरह की बातों में कभी कोई रुचि नहीं रही थी, लेकिन मैंने नोट किया कि हुमा की इन बातों में मैं अब रुचि लेने लगा था। मैं केवल रुचि ही नहीं ले रहा था बल्कि उन्हें याद भी रख रहा था। और अब हुमा भी इन सब बातों को महसूस करने लगी कि मैं उसकी बातचीत में रुचि लेने लगा हूं।
मैं कई बार अकेले में यह भी सोचने लगा था कि इस बार हुमा जीन्स या टॉप में आएगी या सलवार सूट में। और हमेशा मेरा अनुमान सही निकलता। कुछ ही मुलाकातों में मैंने पाया कि उसमें और मुझमें कई चीजों की समानता है। हम दोनों का स्वभाव एक जैसा था, पसंद-नापसंद मिलती जुलती थी, दोनों को ही नीला रंग पसंद था। खाने पीने में भी हुमा को वही चीजें पसंद थीं जो मुझे पसंद थीं। हम दोनों इन समानताओं पर खूब खुश होते। पता नहीं क्यों एक दूसरे में खोजी गयी हर समानता हमें और करीब ला रही थी। एक दिन हुमा ने मुझे बताया, आपको पता है जिस दिन मेरा जन्म हुआ था उस दिन दिल्ली में बहुत जोर का तूफान आया था। मैंने कहा, तुम्हारे पैदा होने पर तूफान तो आना ही था। फिर उसने उत्साह से पूछा, जब आप पैदा हुए थे तब भी क्या तूफान आया था? अचानक मुझे अपने पिता द्वारा बचपन में कही गयी बात याद आ गयी। उन्होंने मुझे बताया था कि तेरे जन्म के समय दिल्ली में बहुत तूफान आया था। हुमा को यह जानकर बहुत खुशी हुई। बाद में हम दोनों ने पाया कि हमारा जन्म भी सुबह पांच बजे हुआ था। यह एक और ऐसी समानता थी, जिसने हमें थोड़ा सा और करीब कर दिया। एक दूसरे में समानताएं खोजते खोजते मुझे अहसास हुआ कि कहीं हम दोनों एक दूसरे से प्रेम तो नहीं करने लगे?
मैं इस प्रेम से बचना चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि मेरे मन में प्रेम का कोई भी अहसास पैदा हो। लिहाजा मैंने अपने और हुमा के बीच में असमानताएं खोजनी शुरू कर दीं। पता नहीं यह संयोग था या हम दोनों की प्रेम साजिश कि हमें एक दूसरे में एक भी असमानता नहीं मिली। और मौजूद समानताएं हमें प्रेम मार्ग पर ले जाने के लिए बजिद्द दिखाई देने लगीं।
उस दिन मैं रोज ही की तरह अपने कमरे में बैठा था। मैं तुर्गनेव के उपन्यास ”पहला प्यार” को पढ़ने की कोशिश कर रहा था। हालांकि यह उपन्यास मैं पहले पढ़ चुका था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से प्रेम कहानियां पढ़ने की मेरी इच्छा बलवती हो रही थी। पता नहीं इसकी वजह हुमा थी या वे समानताएं, जो हम दोनों के बीच पाई गयी थीं। मैं बार बार उपन्यास की नायिका जिनैदा की तुलना हुमा से करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन हर बार मुझे हुमा जिनैदा से बेहतर दिखाई पड़ रही थी। मेरी सोच इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हो रही थी कि जिनैदा की तरह ही हुमा भी मेरे साथ छल कर सकती है। वह मुझसे प्रेम का अभिनय करते हुए किसी और से प्रेम कर सकती है। मुझे हुमा जिनैदा से ज्यादा पाक़साफ और ईमानदार दिखाई पड़ रही थी। मुझे यह भी स्पष्ट रूप से लग रहा था कि जिस तरह मैं अपने रिश्ते के प्रति ईमानदार हूं, ठीक उसी तरह हुमा भी अपने रिश्ते के प्रति ईमानदार होगी। ऐसा मानने की वजह यह भी थी कि हम दोनों का मिज़ाज़ एक जैसा था और हम एक दूसरे में बेपनाह समानताएं खोज चुके थे।
मेरे जेहन में हमेशा अजीब-अजीब ख्याल आते रहते हैं। एक दिन मैंने सोचा कि हुमा मेरे सपनों में क्यों नहीं आती। इस बात को सोचने का यूं कोई अर्थ नहीं था, लेकिन मुझे लगा कि हुमा को मेरे सपने में जरूर आना चाहिए। मैं दिन रात हुमा के ही बारे में सोच रहा था। वह मेरे चेतन और अवचेतन दोनों जगह छाई हुई थी, इसलिए उसे हर हाल में मेरे सपनों में आना चाहिए था। बस उस दिन के बाद से मैं हर समय निद्रा की सी स्थिति में रहने लगा। और इस बात का इंतजार करने लगा कि हुमा किस दिन मेरे सपने में आती है। हालांकि यह बड़ी अजीब सी इच्छा थी कि जो लड़की मुझे रियल में मिलने आती थी, उसे मैं अपने सपने में देखना चाहता था।
उस दिन दोपहर का वक्त था। मैं अपने कमरे में बैठा था। पता नहीं जाग रहा था या सो रहा था। मेरी नजरें दरवाजे पर लगी थीं। शायद मैं हुमा का ही इंतजार कर रहा था-सपने में या वास्तव में इस बात का भी मुझे अंदाजा नहीं है। मैं कितनी देर इसी तरह बैठा रहा मुझे पता ही नहीं चला। वक्त बीतता रहा…बीतता रहा। और इतना बीत गया, मैंने हुमा के आने की उम्मीद छोड़ दी। क्या चीजें हमेशा तभी होती हैं, जब इनसान उनके होने की उम्मीद छोड़ देता है? मैं हुमा के अतिरिक्त कुछ और सोचने की कोशिश करने लगा। हर बार मैं कोई और बात सोचता और हर बार वह बात हुमा तक पहुंच जाती। मुझे आश्चर्य हुआ कि क्या हुमा मेरे जीवन की धुरी बनती जा रही है? क्यों हर बात घूमफिर कर हुमा पर ही आकर ठहर जाती है। पता नहीं मैं कितनी देर इसी तरह की अनर्गल बातें सोचता रहा और सोचते-सोचते मैं अपने भीतर की दुनिया में प्रवेश कर गया। मैं बाहर की दुनिया की कोई आहट नहीं सुन रहा था। अचानक मेरी नजर सामने बैठी हुमा पर गयीं। यानी हुमा आ चुकी है। मैंने पहली बार उसे बेहद ध्यान से देखा। उसने ब्लू जीन्स के ऊपर एक पारदर्शी सा टॉप पहना हुआ था-शायद पिंक कलर का या बेज कलर का। मुझे उस टॉप के भीतर की सारी दुनिया दिखाई दे रही थी। हुमा को यह समझते देर नहीं लगी कि उसके टॉप पर मेरी आंखें गड़ीं हैं। लेकिन उसने बिना किसी संकोच के कहा, मैंने इसके अंदर भी इनर पहना हुआ है। इसलिए भीतर की जिस दुनिया को आप देखने की कोशिश कर रहे हैं, वह निर्वस्त्र नहीं है। मुझे अपने आप पर शर्मिंदगी-सी महसूस हुई। लेकिन हुमा के सामने यह कहने का कोई औचित्य नहीं था कि मेरी नजरें उसके टॉप के भीतर की दुनिया को कैच करने की कोशिश नहीं कर रही हैं। हुमा एकदम सहज थी। वह उत्साह से बताने लगी कि उसने यह टॉप कहां से खरीदा है। हम दोनों के बीच कुछ पल चुप्पी सी छाई रही। मैं सोच रहा था पता नहीं हुमा क्या सोच रही होगी। लेकिन हुमा कुछ नहीं सोच रही थी। इस चुप्पी का फायदा उठाकर मैंने अपने भीतर के सारे साहस को इकट्ठा करते हुए कहा, हुमा, क्या मैं तुम्हें ”किस” कर सकता हूं? पल भर के लिए हुमा मेरी तरफ देखती रही। मैंने देखा उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक दिखाई दे रही थी। वह मेरे ”किस” करने के प्रस्ताव पर ना संकोचग्रस्त हुई और ना ही उसके भीतर शर्मिंदगी पैदा हुई। मैंने उसके मासूम से चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया और उसके माथे पर एक चुंबन अंकित कर दिया। जीवन में पहली बार मैंने इस तरह किसी लड़की के चेहरों को अपने दोनों हाथों में लिया था।  मैं यह भी नहीं कह सकता कि यह प्यार का ही चुंबन था। लेकिन यह मुझे जरूर लगा कि एक चुंबन दो लोगों को किस कदर एक दूसरे के करीब ले आता है। कुछ देर मैं इसी तरह चुंबन की मधुर स्मृतियों में खोया रहा। मैं जान बूझकर हुमा की ओर देखने से बच रहा था। कुछ समय इसी तरह बीत गया। अचानक मेरी नजर सामने की कुर्सी पर गयी तो मैंने देखा कि हुमा जा चुकी थी।
कुछ दिन तो मैं चुंबन वाली घटना का मुझ पर गहरा असर रहा, लेकिन फिर मेरे जेहन में एक बात बैठ गयी कि हो या ना हो चुंबन वाली घटना सपने में ही घटी होगी। मैंने खुद को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन किसी भी सूरत में यह घटना मुझे रियल में घटी हुई नहीं लगी। मैं इस घटना के सपना होने या ना होने को लेकर खुद से ही तर्क-वितर्क करता रहा। और अंत में इसी नतीजे पर पहुंचा कि यह घटना एक सपना ही थी। फिर भी मुझे इस बात की खुशी थी कि हुमा मेरे सपने में आई और मैंने उसे माथे पर ”किस” किया।
पता नहीं इस तरह कितने दिन बीत गए, लेकिन हुमा नहीं आई। पता नहीं क्यों इस बार मैं हुमा का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहा था। जितना मैं उसका इंतजार कर रहा था, वह आने में उतनी ही देर कर रही थी। मैं इंतजार करता रहा… करता रहा… और करता रहा। जब काफी दिन इसी तरह बीत गए, तो मेरे मन में फिर ये शंका पैदा हुई कि कहीं हुमा का आना और मुझसे बातें करना भी तो एक सपना ही नहीं था। मैं बार-बार अपने स्वभाव को दोष दे रहा था कि क्यों मुझे रियल में घटी कोई घटना सपने जैसी जान पड़ती है और सपनों को मैं रियल समझने लगता हूं। धीरे-धीरे मेरा ये विश्वास पक्का होता जा रहा था कि हुमा नाम की कोई लड़की नहीं है। कोई ऐसी लड़की नहीं है, जो मुझसे मिलने आती है या मुझसे बात करती है। अब मैंने अपने कमरे में हुमा का इंतजार छोड़ दिया था। पर फिर भी वह मेरे जेहन में छाई रहती थी, और मन के किसी अंधेरे कोने में यह विश्वास था कि हुमा आएगी। उस दिन दोपहर को मैं अपने कमरे में बैठा हुआ था। अचानक मुझे हुमा की हंसी की आवाज सुनाई देने लगी। पल भर को मुझे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। लेकिन यकीन ना करने वाली कोई बात नहीं थी-हुमा एकदम मेरे सामने बैठी थी-मुश्किल से एक फीट की दूरी पर। मैं उससे पूछना चाहता था कि वह इतने दिनों कहां रही लेकिन मैंने पूछा नहीं। मुझे लगा उसकी निजी जिंदगी है, मैं क्यों उसके बारे में सवाल पूछूं। अचानक मेरी नजर हुमा के कपड़ों पर पड़ी। उसने बैज कलर की टॉप और जीन्स पहनी हुई थी। मुझे याद आया उस दिन भी वह यही टॉप पहन कर आई थी, जब मैंने पहली बार उसके ”फोरहैड” पर ”किस” किया था। यानी वह सपना नहीं था। मैंने देखा उसकी आंखों में उस पहले चुंबन का कोई निशान नहीं था। वह पहले की तरह ही बेसाख्ता बोले जा रही थी… ‘‘मैं शॉपिंग करने गई थी… पता है मैंने तीन टॉप खरीदे, एक कुरता भी खरीदा और हां मैंने दो झुमकी भी खरीदी… बहुत क्यूट हैं दोनों… और मैं ने एक न्यू चप्पल भी खरीदी है… उस पर एक पिंक कलर का फूल भी बना है…. वो भी बहुत क्यूट है… और मार्किट में मैंने बहुत सारी चीज़ें भी खाईं… गोलगप्पे… काला-खट्टा… और हां मैं तीन दिन के लिए अपनी नानी घर भी गई थी…’’
वह बोलती जा रही थी, लगातार बोलती जा रही थी। पता नहीं क्या-क्या। पता नहीं मैं उसकी बातें सुन रहा था या उसे देख रहा था। कितनी देर वह इसी तरह बोलती रही, मुझे इसका भी अंदाजा नहीं है। लेकिन जब मैंने उससे कुछ कहना चाहा तो मैंने देखा कि वह जा चुकी थी।
अब एक बात तय हो गयी थी। हुमा नाम की सचमुच एक लड़की है, जो मेरे पास नियमित रूप से आती है, बातें करती हैं, मेरे साथ हंसती है और मुझसे अपने जीवन की हर चीज शेयर करती है। वह मुझसे प्यार करती है या नहीं यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। हालांकि उसके हावभाव से ऐसा लग रहा था कि वह मुझसे प्यार करने लगी है। इस दौरान मैंने एक और बात नोट की। अब सपना नाम की वह औरत सपने में नहीं आ रही थी। इस बात ने भी मेरे इस विश्वास को पुख्ता किया कि हुमा नाम की एक लड़की है, जो शायद मुझसे प्यार करती है और जिसे मैं प्यार करता हूं या करना चाहता हूं। मैंने देखा कि धीरे-धीरे मेरी दुनिया हुमा के चारों ओर सिमटती जा रही थी। और सपना इस दुनिया में कहीं नहीं थी। मैंने यह भी पाया कि अब मैं पहले से ज्यादा खुश रहने लगा था। मैं जिन चीजों पर पहले कभी ध्यान नहीं दिया करता था, अब मैं उन पर भी ध्यान देने लगा था। रोज नहाना, अच्छी तरह तैयार होना, अपने साथ साथ हुमा के कपड़ों पर भी अब मेरा ध्यान जाने लगा था। एक दिन मैंने शीशे में देखा तो पाया कि अब मैं पहले से ज्यादा अच्छा लगने लगा हूं।
‘देख रही हूं, आजकल बहुत सजने-संवरने लगे हो,‘ सपना ने कहा था। इसके कुछ दिन बाद तक मैंने ठीक से तैयार होना भी बंद कर दिया। सपना और मेरे बीच बहुत लंबे समय बाद हुआ ये एकतरफा संवाद था। कुछ दिनों तक मैं यह तय नहीं कर पाया कि यह बात सपने में कही गई थी या ऐेसे ही अपने आप मेरे जेहन में आ गई। अगर ये बात सचमुच सपने में कही गई थी तो इसका सीधा सा मतलब था कि सपना ने अब भी मेरे सपनों में आना बंद नहीं किया है। सपने में भी उसके दिशा-निर्देश ठीक वैसे ही होते हैं, जैसे कोई पत्नी रियल में अपने पति को निर्देश देती है… ये मत खाओ… ये मत पहनो… ये आप पर सूट नहीं करता… आप सामान जहां से उठाते हैं, वहीं क्यों नहीं रखते… आप जब भी कमरे में आते हैं आपके शूज के साथ इतनी सारी धूल आ जाती है… पायदान से पैर साफ करके क्यों नहीं आते… मैं दिन में दस बार झाड़ू लगाती हूं… लेकिन तुम पुरूष औरत के काम की अहमियत कभी नहीं समझते। सपना की ये ”इंस्ट्रक्शंस” हर समय मेरे जेहन में घूमती रहती हैं। क्या सपने में भी कोई महिला किसी को इस तरह के इंस्ट्रक्शंस दे सकती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सपना सचमुच में मेरी पत्नी हो?
‘क्या बात है आजकल आप बहुत गंदे रहने लगे हो… ’ हुमा ने कहा और एकटक मुझे देख रही थी। मुझे थोड़ा सा आश्चर्य हुआ। सपना कहती है, मैं आजकल बहुत सजने-संवरने लगा हूं। यानी उसे मेरा सजना-संवरना अच्छा नहीं लगता और हुमा? हुमा को मैं गंदा अच्छा नहीं लगता। ये हुमा और सपना इतनी विरोधी क्यों हैं? कहीं इसलिए तो नहीं कि इनमें से एक सपना है और एक हकीकत। लेकिन कौन सपना है और कौन हकीकत? कम से कम हुमा तो सपना नहीं हो सकती। वह रोज मुझसे मिलती है, मुझसे बातें करती हैं, शरारतें करती है, मेरे साथ हंसती है और एक बार तो मैंने उसके ”फोरहेड” पर ”किस” भी किया है। नहीं… नहीं… हुमा सपना नहीं हो सकती। इसका मतलब सपना ही सपना है।
धीरे-धीरे हुमा और मेरे बीच अंतरंगता बढ़ती गयी। हर समय हुमा मेरे पास होती। हर पल मुझे ऐसा लगता कि मैं उससे ही बातें कर रहा हूं। हम हंस रहे हैं, बोल रहे हैं, खेल रहे हैं और प्यार कर रहे हैं। मैं पल भर के लिए भी हुमा से दूरी बर्दाश्त नहीं कर पाता। कभी अगर ऐसा हो जाता कि हम दोनों ना मिलें तो वह दिन मेरे लिए काफी त्रासद होता था। उस दिन में हर वक्त झुंझलाया हुआ रहता था। किसी भी दूसरे व्यक्ति से बात करने का मेरा मन नहीं होता। यही नहीं, हुमा की उपस्थिति में किसी दूसरे व्यक्ति का आना या उसका फोन आना भी मुझे अच्छा नहीं लगता था। एक बार हुमा ने मुझे कहा भी, आप हर समय इतना गुस्से में क्यों रहते हो? क्यों दूसरे लोगों को हर समय डांटते रहते हो?
मैंने जवाब दिया, जो समय मैं तुम्हारे साथ बिताता हूं, उसका एक अंश भी मैं किसी दूसरे के साथ नहीं बांटना चाहता। वह मेरे चेहरे की तरफ देखती रही और फिर उसने कहा, नहीं बात यह नहीं है। बात दरअसल यह है कि आपको हर समय यह डर सताता है कि कहीं मैं आपकी जिंदगी से दूर ना चली जाऊं। शायद हुमा ठीक कह रही थी, मैंने सोचा। उसने फिर कहा, लेकिन मैं आपसे कभी दूर नहीं जाऊंगी, मर कर भी नहीं। और अगर व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो मैं आपकी हूं ही कहां? हम दोनों आध्यात्मिक रूप से ही जुड़े हैं। यह भी सच है कि हम एक दूसरे को बेहद पसंद करते हैं, शायद एक दूसरे से बेहद प्यार भी करते हैं। लेकिन फिर भी दुनियावी नजर में हम एक दूसरे के लिए सपना ही हैं। हम एक दूसरे के कभी नहीं हो सकते।
इसके काफी दिन बाद तक मेरी हुमा से कोई बात नहीं हुई। और मैं फिर बार बार यह सोचने लगा कि कहीं हुमा सचमुच सपना ही तो नहीं है। आखिर उसने यह क्यों कहा कि हम एक दूसरे के लिए सपना ही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हुमा सपना ही हो?
हर समय सपनों की दुनिया में मत रहा करो, जिंदगी सपना नहीं है, आज फिर सपना ने मुझसे कहा। लेकिन मैं उसे कैसे समझाऊं कि मैं खुद सपनों में नहीं रहना चाहता। मैं भी रियल वर्ल्ड में ही रहना चाहता हूं। लेकिन मुझे यह पता हीं नहीं चलता कि रियल वर्ल्ड और अनरियल वर्ल्ड में क्या फर्क है। मैं पूरी दुनिया को समझाना चाहता हूं कि हुमा मेरे लिए रियल वर्ल्ड का किरदार है, वह कोई सपना नहीं है, लेकिन कोई इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होता। मैं लोगों को बताना चाहता हूं कि मैं हुमा से और हुमा मुझ से प्यार करती है, लेकिन किसी को इस बात पर यकीन नहीं आता।  मैंने सोचा कि हुमा से इस बारे में बात करूंगा और उससे पूछूंगा कि क्या तुम मेरे जीवन में किसी ड्रीम की तरह हो?
उस दिन हुमा आई तो मैं कुछ आवेश में था। मैं हर हाल में यह साबित करना चाहता था कि हुमा कोई सपना नहीं है। वह सचमुच की जीती जागती लड़की है। मैंने हुमा को अपने गले से लगाया और उसे बेतहाशा चूमने लगा। मैंने उसके माथे पर, गाल पर, कंधों पर किस किया। जब वह मेरे बाजुओं में कसमसाने के लिए बेचैन हो गयी तो मैंने उसके कंधे पर एक लव बर्ड-चुंबन का एक गहरा निशान, जो कई दिनों तक बना रहता है- बना दिया। किसी तरह हुमा मेरे बाजुओं से छूटने में सफल हो गया और चली गयी। लेकिन अब मुझे यह विश्वास हो गया था कि हुमा कोई सपना नहीं है। हो सकता है अब हुमा कभी लौटकर ना आए लेकिन फिर भी मैंने यह साबित कर दिया था कि हुमा कोई सपना नहीं है। अब पूरी दुनिया इसे सपना मानती रहे तो भी मैं यही कहूंगा-यह सपना नहीं है।
सुधांशु गुप्त
जन्म। लगभग तीन दशक पत्रकारिता में ग़ुजारने के बाद अब स्वतंत्र लेखन। सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। अनेक कहानियों का रेडियो से प्रसारण। अनेक क्षेत्रीय भाषायों के साहित्यिक उपन्यासों का रेडियो रूपांतरण किया। वीडियो के लिए भी अनेक धारावाहिक लिखे। खाली कॉफी हाउस, उसके साथ चाय का आख़िरी कप और स्माइल प्लीज़ नाम से तीन कहानी संग्रह प्रकाशित। युवा महिला रचनाकारों का एक संग्रह बग़ावती कोरस नाम से संपादित। संपर्क - 9810936423

2 टिप्पणी

  1. हुमा जब आपके संग नहीं होती तो मेरे संग होती है, कभी कभी तो वो मेरे संग भी होती है और आपके संग भी, वो हवा में तैरती है और कभी यहाँ कभी वहां हूँ-हां करते करते उससे बतियाते दिन बीत जाता हैं, है ना! कभी कभी तो लगता हैं दिन ही नहीं पूरा जीवन बीत गया हूँ – हाँ करते करते- करते रहो!

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