समाज के प्रति लेखक की जिम्मेदारी होती है - सुषमा मुनीन्द्र 3

वरिष्ठ लेखिका सुषमा मुनीन्द्र से उनकी लेखन-यात्रा और लेखन सहित समकालीन साहित्यिक परिदृश्य से जुड़े विविध विषयों पर पुरवाई टीम की बातचीत

पुरवाई टीम – सुषमा जी अधिकतर महिलायें अध्यापिका बनना चाहती  हैं लेकिन आपने लेखक बनना कब-कैसे चुना ?
सुषमा मुनीन्‍द्र मेरी पारिवारिक पृष्‍ठभूमि साहित्यिक – सांस्कृतिक नहीं है। मैं विज्ञान की विद्यार्थी रही हूँ। विचार तो क्‍या मुझे आभास तक नहीं था, रचनाकार बनूँगी। मुझे लगता है नियति निर्धारित करती है कि व्‍यक्ति को समाज में किस तरह स्‍थापित होना है। मेरे सख्‍त मिजाज न्‍यायाधीश बाबूजी अदालत की तरह घर में भी कठोर न्‍यायाधीश होते थे। शैक्षणिक संस्‍थान के अलावा अन्‍यत्र आना-जाना दुर्लभ किये रहते। यह जरूर रहा पराग, नंदन, धर्मयुग, साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान, कल्‍याण, अखण्‍ड ज्‍योति आदि  पत्रिकायें मँगाते थे। अध्‍ययन में मेरी गहरी रूचि थी। कोर्स की किताबों की तरह पत्रिकायें भी दत्‍त चित्‍त होकर पढ़ती। कदाचित उन्‍हीं दिनों निहायत गुप्‍त तरीके से मेरे भीतर का रचनाकार तैयार हो रहा था। लेखक बनना बिना किसी तैयारी के अनायास हो गया। अब याद नहीं कौन सी तिथि थी, कैसा जज्‍बा, कैसी स्‍फूर्ति कि माह, दो माह के श्रम से कहानी ‘घर’ लिखी जो 1982 में ‘सरिता’ में प्रकाशित हुई। तब से सिलसिला जारी है।
पुरवाई टीम –सुषमा जी आप साहित्यिक रूचि वाली रही हैं, तो हमें अपने शुरूआती जीवन और लेखन  के विषय में बतायें।
सुषमा मुनीन्‍द्र शुरूआती जीवन एकदम साधारण था। आज भी साधारण है। उन्‍नीस साल कडे़ अनुशासन में बीते। हम बहनों को गर्ल्‍स स्‍कूल, गर्ल्‍स कॉंलेज में पढ़ाया गया कि को एड में फुसलाने वाले लड़के मिलेंगे। कड़ा निर्देश था वक्‍त पर कॉंलेज जाकर वक्‍त पर घर लौटना है। शाम को जब सिविल लाइन्‍स के बच्‍चे बाहर खेलते ठीक उसी वक्‍त के लिये ट्यूटर लगा दिया गया कि हम खेलने न जा सकें। ट्यूटर हम सभी भाई-बहनों को एक साथ हिन्‍दी, अँग्रेजी, संस्‍कृत पढ़ाते। उन्‍नीसवें साल में एम0 एस-सी0 (रसायन शास्‍त्र) पूर्वार्द्ध की परीक्षा देती हूँ कि विवाह कर दिया गया कि मांगलिक लड़की के लिये फिर अच्‍छा मैच मिले, न मिले। फाइनल आज तक नहीं हुआ। नये दायित्‍वों के बीच मैं भूलने लगी थी कभी कितना पढ़ती थी।
आरंभिक लेखन किसी उद्देश्‍य को लेकर नहीं हुआ। छपने का आकर्षण जबर्दस्‍त था। धीरे-धीरे लेखन में परिष्‍कार आने लगा। हम जैसे-जैसे आयु और अनुभव में वयस्‍क होते हैं व्‍यष्टि से समष्टि की ओर अग्रसर होते जाते हैं। परिपक्‍वता के साथ मुझे समझ में आने लगा लेखन गम्‍भीर काम है। यहॉं आनंद और संतोष कम बेचैनी और छटपटाहट अधिक है। मैं सराउण्डिंग्‍स को सर्जक की तरह देखने लगी। चीजें कैसी हैं इससे अधिक जरूरी है हम चीजों को कैसे देखते हैं। 2000 के आसपास मेरी कहानियॉं साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने लगीं। सिलसिला जारी है।
पुरवाई टीम –आपके अनुसार किसी अच्‍छी रचना के मापदण्‍ड क्‍या हो सकते हैं ? कहानियों में भाषा, कथ्‍य और कलात्‍मक संतुलन की सीमा क्‍या होनी चाहिये ?
सुषमा मुनीन्‍द्र रचना कर्म सरल होते हुये भी जटिल होता है अत: मापदण्‍ड तय कर रचना नहीं बनती। जब तक कहानी पूरी नहीं हो जाती, ज्ञात नहीं होता कि वह उत्‍कृष्‍ट होगी, औसत या निम्‍न औसत। यह भी ज्ञात नहीं होता कैसा रूप और आकार ग्रहण कर किस अंत पर पहुँचेगी। मेरा मानना है, तथ्‍य–कथ्‍य में विश्‍वसनीयता, सकारात्‍मक भाव और कथा रस होना चाहिये। इधर भाषा, कथ्‍य, कलात्‍मकता को लेकर बहुत प्रयोग हो रहे हैं। कई बार प्रयोग ऐसा व्‍यापक होता है कि कथानक दब जाता है। स्थितियॉं वास्‍तविक और व्‍यवहारिक नहीं लगतीं। वैसे भाषा का संस्‍कार हमें अपने परिवेश और अध्‍ययन से मिलता है। इसीलिये प्रत्‍येक‍ रचनाकार की अपनी एक स्‍वाभाविఀक भाषा होती है जो थोड़े-बहुत बदलाव के साथ प्रत्‍येक रचना में दिखाई देती है। मैं सहज, सुबोध, प्रवहमान भाषा को पसंद करती हूँ।
पुरवाई टीम – लेखन के कारण क्या आपको व्‍यक्तिगत जीवन में संघर्ष का सामना करना पड़ा ? यदि  हॉं, तो किस तरह के संघर्ष थे ? अगर नहीं तो क्‍यों नहीं ?
सुषमा मुनीन्‍द्र लेखन संघर्ष का दूसरा नाम है। प्रमुखत: स्‍त्री रचनाकार के लिये। हमारे समाज में स्‍त्री और पुरूष में फर्क है। पुरूषों को काम करने के लिये परिवार में अनुकूल वातावरण दिया जाता है। स्त्रियों के काम को परिवार में मान और मान्‍यता तब मिलती है जब वह खुद को साबित करके दिखाती हैं। आज जब पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो पाती हूँ राह आसान नहीं थी। दो बच्‍चों की देख-रेख और पारिवारिक झबार के बीच चुराये गये समय में कागज-कलम थामने का अर्थ परिजनों को कुपित करना था। ‘सम्‍पादक के खेद सहित’लौटती रचनाओं के दौर से गुजर रही थी। यह मेरे लिये सदमे की तरह था। मुझे मानसिक सम्‍बल की जरूरत थी। कुछ हो नहीं रहा है तो कागज काले न कर गृहस्‍थी में पूरा समय दूँ कह कर परिजन हौसला खत्‍म कर रहे थे। जब साहित्यिक पत्रिकाओं में कहानियॉं छपने लगीं, परिजनों ने माना मैं कागज काले नहीं कर रही थी। वह जो था, अभ्‍यास था। कुछ बार कुटुम्‍ब, समूह, समाज के लोगों ने आरोप लगाया कहानी उन पर लिखी गई है। क्‍या कहा जाये ? यदि आप मानते हो कहानी में चित्रित खलपात्र आप हो तो खुद को सुधारने का प्रयास करो। मुझे लगता है प्रत्‍येक रचनाकार को ऐसे आरोप और विवाद से कभी न कभी गुजरना पड़ता है।
पुरवाई टीम – आपकी कहानियों में राजनीति, साम्‍प्रदायिक वैमनस्‍य, सामाजिक विఀद्रोह व सामाजिक विभेद का चित्रण न के बराबर है। ऐसा क्‍यों ?
सुषमा मुनीन्‍द्र रचनाकार अपने परिवार, परिवेश, पर्यावरण, परिपाटी, प्रचलन, पृष्‍ठभूमि से कथ्‍य ग्रहण करते हैं। कहानी फैक्‍ट और फिक्‍शन का संयोजन होती है।  कल्‍पना वास्‍तविఀकता से खाद-पानी लेती है। बिना अनुभव के प्रामाणिक कहानी नहीं बनती। मुझे राजनीति और साम्‍प्रदायिकता (साम्‍प्रदायिकता भी एक किस्‍म की राजनीति ही है।) की मात्र उतनी ही जानकारी है जो पत्र-पत्रिकाओं, खबर चैनलों के माध्‍यम से मुझ तक पहुँचती है। वैसे मेरी गणित, सरपंचिन, बड़े धोखे हैं इस राह में, मेरो विधायक हेरानो है आदि कहानियॉं राजनीतिक स्‍वरूप को स्‍पष्‍ट करती हैं।
‘गणित’ कहानी का नेशनल स्‍कूल ऑंफ ड्रामा, दिल्‍ली में डॉं0 देवेन्‍द्र राज अंकुर ने मंचन किया। इसी तरह कहानी ‘पत्‍थरों का शहर’ में हिन्‍दू-मुस्लिम वैमनस्‍य, ‘परिणय’में सवर्ण-दलित घृणा, ‘दर्द ही जिसकी दास्‍तां रही’ में आदिवासी संघर्ष, ‘योग क्षेम’ में धार्मिक संस्‍थानों के ढकोसलों का चित्रण हुआ है।
पुरवाई टीम – रचनाकार के लिये सामाजिक और वैचारिक प्रतिबध्दता को कितना जरूरी मानती हैं ?
सुषमा मुनीन्‍द्र – समाज के प्रति आम आदमी की अपेक्षा रचनाकार की जिम्‍मेदारी अधिक होती है। रचनाकार समाज को दिशा देते हैं। वे जो लिखते हैं उससे पाठकों को दृष्टि, विवेक, संज्ञान मिलता है। साहित्‍य अपने समय और सरोकारों को उन अगली पीढि़यों तक ले जाता है जो वर्तमान समय में मौजूद नहीं हैं। इसलिये रचनाकार को फंतासी, भ्रम,  अनावश्‍यक नैरेशन में न पड़ यथार्थ को वास्‍तविकता और प्रामाणिकता के साथ लिखना चाहिये।
परिवार टूट रहे हैं, हिंसक समाज की रचना हो रही है, पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति के प्रभाव से युवा भ्रमित हो रहे हैं, सरकारी, गैर सरकारी संस्‍थानों में अनियतिता व्‍याप्‍त है, आतंकवाद और प्रदूषण बढ़ रहा है। ऐसे संक्रमण काल में रचनाकार का दायित्‍व बढ़ जाता है। वे ऐसा लिखें कि पारिवारिक – सामाजिक संरचना मजबूत हो, मनुष्‍य का मनुष्‍य पर भरोसा बढ़े, आमजन के तनाव और दबाव कम हो, समाज में सकारात्मक भाव विकसित हो, अच्‍छे नागरिक तैयार हों, लोग नागरिक अधिकारों के साथ नागरिक दायित्‍वों को याद रखें।
पुरवाई टीम – कहानी लेखन के अलावा आपने समीक्षा भी की है। समीक्षा आलोचना को आप कैसे देखती हैं ? किसी भी लेखक के लिये कितना आवश्‍यक है कि उसे समीक्षकों की सराहना मिले ?
सुषमा मुनीन्‍द्र इधर मैंने लगभग 50 पुस्‍तकों की समीक्षा की है। आलोचना कठिन काम है। रचना को नीर-क्षीर विवेक से पढ़ना होता है। समीक्षा लेखक और पाठक दोनों  को दृष्टि देती है। पाठक पुस्‍तक पढ़ने के लिये प्रेरित होते हैं, लेखक को उन जरूरी बिंदुओं की जानकारी मिलती है जिस पर वे ध्‍यान नहीं दे पाये थे। इधर कहा जा रहा है आलोचना निष्‍पक्ष और गम्‍भीर भाव से नहीं की जा रही है। इस वृत्ति के चलते अक्‍सर अच्‍छी कहानियॉं अलोकप्रिय रह जाती हैं, जेनुइन रचनाकार अल्‍पज्ञात। जबकि अच्‍छा साहित्‍य अधिक लोगों तक पहुँचे तभी साहित्‍य की उपयोगिता है। लेखकों को समीक्षकों की सराहना मिलनी चाहिये पर उन्‍हें यह समझ भी विकसित करना होगी सराहना उचित है या कृत्रिम।
पुरवाई टीम – वर्तमान साहित्यिक परिदृश्‍य पर आप कितना निगाह रखती हैं ? इसे लेकर कितना आशान्वित हैं?
सुषमा मुनीन्‍द्र जबसे अक्षर, शब्‍द, वाक्‍य, भाषा बनी साहित्‍य प्र‍गति ही करता गया। भाषा और व्‍याकरण को बनाने में साहित्‍य का बहुत बड़ा योगदान है। आज तीन या बल्कि चार पीढ़ियों के रचनाकार सक्रिय हैं। स्‍त्री रचनाकारों की संतोषजनक संख्‍या है। पत्रिकाओं, पुस्‍तकों का प्रकाशन बढ़ रहा है। इंटरनेट के जरिये साहित्‍य सरलता से पाठकों तक पहुँच रहा है। इक्‍कीसवीं सदी का जबर्दस्‍त बदलाव हमारे समय के साहित्‍य में सम्‍पूर्णता से दर्ज हो रहा है, आगे की पीढि़यॉं साहित्‍य के माध्‍यम से इस बदलाव से परिचित होंगी यह मुझे रोमांचित करता है। अफसोस बस यह है अँग्रेजी साहित्‍य को जो महत्‍व मिलता है, हिंदी साहित्‍य को नहीं मिल रहा है।
पुरवाई टीम – क्‍या आपने कभी मॉंग पर लेखन किया है जैसा कि आजकल चलन   है ? ऑंनलाइन पोर्टल पर आ रही सीरिज और प्रकाशकों द्वारा बताये गये विषय पर बहुत से लोग लिख रहे हैं। क्या आपने कभी इस तरह का लेखन किया है ?
सुषमा मुनीन्‍द्र नहीं। अवसर नहीं मिला। मॉंग पर लिखना मेरी क्षमता में भी नहीं है। कुछ पत्रिकायें तय विषय में विशेषांक निकालती हैं। तय विषय में कहानी संकलन निकाले जाते हैं। यदि मेरे पास विषय से संबंधित कहानियॉं हैं तो मैं उन्‍हें जरूर देती हूँ।
पुरवाई टीम – आपने लगभग 350 से ऊपर  कहानियॉं लिखी हैं। ढेरों समीक्षायें, दो उपन्‍यास भी। आपकी लगभग सभी रचनायें देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लगातार छपती हैं। आजकल एक किताब आने पर ही  लेखक स्वयं का महिमा मंडन करने/करवाने लगते हैं | इस प्रवृत्ति पर आपका क्‍या विचार है ?
सुषमा मुनीन्‍द्र इधर यह चलन दिखाई दे रहा है सिर्फ एक पुस्तक प्रकाशन के आधार पर हरेक रचनाकार का महिमा मंडन करना रचनाकार के लिये प्रोत्‍साहन कम घातक अधिक है। जो भी रचनाकार मूर्धन्‍य माने गये उन्‍होंने सुदीर्ध साहित्‍य साधना की है। रचनाकार महिमा मंडन से उत्‍साहित हों लेकिन आत्‍ममुग्‍ध न होने लगें। क्योंकि इस तरह  उनकी प्रतिस्‍पर्धा स्‍वयं से हो गई है। हरदम बेहतर कहानी की उनसे उम्‍मीद की जायेगी। उम्‍मीद पूरी नहीं करेंगे तो स्‍क्रूटनी होगी। किसी भी रचनाकार की प्रत्‍येक रचना बेहतर नहीं हो सकती। औसत और निम्‍न औसत होती है। मैं तो आज भी खुद को प्रोबेशन पीरियड में पाती हूँ। यह एक यात्रा है जो अंतिम सॉंस तक अधूरी ही रहेगी। नये रचनाकारों को कालजयी भाव के भ्रम से बचना होगा। फेलियर को मैं जरूरी मानती हूँ। वहीं से चुनौती मिलती है, चिंतन के रास्‍ते प्रशस्‍त होते हैं।
पुरवाई टीम – सुषमा जी आप आजकल क्‍या लिख रही हैं ?
सुषमा मुनीन्‍द्र सिर्फ और सिर्फ कहानी। मैं इसी विधा  में सहज महसूस करती हूँ। चाहती हूँ स्‍वास्‍थ्‍य ठीक रहे, स्‍मृति सुचारू रहे ताकि निर्बाध लिख सकूँ। मेरा मानना है रचनाकार को अपनी सेहत की देखभाल एसेट की तरह करनी चाहिये कि अपनी सृजन क्षमता का उपयोग अधिक से अधिक करें और साहित्‍य जगत को बहुत कुछ दें।
पुरवाई टीम – सुषमा जी पुरवाई टीम से बातचीत करने के लिये आपका बहुत आभार।
सुषमा मुनीन्‍द्र – पुरवाई टीम और पुरवाई पत्रिका को मेरा भी आभार और शुभकामनायें।

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