समाज मनुष्य के इर्द-गिर्द जिस परिधि का निर्माण करता है वह व्यक्ति के विकास में सहायक होता है। व्यक्ति से समाज और समाज से व्यक्ति की निर्मिति होती है। जैसा समाज होगा व्यक्ति उससे प्रभावित हुए बिना रह नही सकता है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि परिवेश मनुष्यों के विकास में सक्रिय भूमिका अदा करता है, साथ ही समाज पर वह अपना प्रभाव दिखाता है। अभिप्राय यह कि दोनों के विकास में एक दूसरे की अनिवार्य भूमिका समाहित है।
उदारीकरण ने समाज के सभी वर्ग को सुविधाभोगी बनाने का कार्य किया है। मध्यवर्ग सदा उच्चवर्ग से होड़ लेने में लगा रहता है। इसलिए उसके संघर्ष में इजाफ़ा होता रहता है।जितना ही यह वर्ग अपने संघर्ष को झेलता है उच्चवर्ग से होड़ लेने की भावना उतनी ही प्रबल होती जाती है। इन भावनाओं को बढ़ावा बाज़ार के द्वारा मिलता रहता  है। बाज़ार जरूरत पैदा करता है  जिसे अपनाकर समाज सुविधाभोगी बनता है।ऐसे समाज के व्यक्ति सुविधाभोगी होकर असीमित जरूरतें पैदा कर लेते है जिन्हें पूरा करने में येन -केन -प्रकारेण कोशिश करते हुए अपने मनःताप से उत्तेजित होते रहते हैं।इस स्थिति में युवावर्ग सबसे ज्यादा दिग्भ्रमित होते दिखाई देते हैं। वे अपनी असीमित महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए ऐसे मार्ग का चुनाव कर लेते हैं जो उन्हें अभिशप्त जीवन प्रदान करता है या नकारा बना देता है। अगर एक आध को इस रास्ते मे सफलता मिल भी जाती है तो फिर वह अपने ही द्वारा एकत्रित किये गए सुविधाओं का भोग करने में असक्षम होता है।
हमारे चारों ओर की दुनिया मे जितनी तेजी से बदलाव आया है उतनी ही तेजी से स्त्री और पुरुष दोनों की मानसिकता में भी बदलाव हुआ है। बदलाव के इस प्रचंड अग्नि में  बाज़ार ने समिधा प्रदान करने का कार्य किया है। आज हर चीज़ बिकाऊ बना कर बाज़ार प्रस्तुत कर रहा है।  एक ओर जहां हर चीज़ का खरीदार मौजूद है तो दूसरी और हर चीज़ बेचने को तैयार लोग भी मौजूद हैं। बज़ार प्रदत इस वर्तमान व्यवस्था में एक आम इंसान से वस्तु के रूप में बदलते युवा की कहानी है “कोका किंग।” रजनी मोरवाल द्वारा लिखित इस कहानी में वर्तमान समय मे युवाओं में हो रहे मानसिक बदलावों को बारीकी से रेखांकित किया जा सकता है।कहानी में एक युवक द्वारा, जल्द से जल्द आधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण जिंदगी बिताने के लिए, पुरुष वेश्यावृत्ति अपनाने में कोई आत्म गुरेज नही है ऐसा दिखाया गया है।
दिन प्रतिदिन व्यक्तियों में बढ़ते प्रतिस्पर्धा की भावना उसे कुंठा,निराशा, हताशा की ओर ले जा रही है।व्यक्ति आज स्वयं में संतुलन बनाने में असमर्थ महसूस कर रहा है। लुभावने ऑफर के साथ जिगेलो व्यवसाय के लिए विज्ञापन निकाले जाते हैं, जहाँ सदस्यता शुल्क एवं कमीशन के नाम पर, इस तरह के प्लेटफार्म उपलब्ध कराने वाली एजेंसियां मोटा रकम पहले ही वसूल कर लेती है। कई बार युवा पीढ़ी इसमे ठगी का शिकार हो जाती है। जो लोग इस व्यवसाय में उतरते है उन्हें विभिन्न प्रकार के ड्रग्स प्रोटीन, मादक पदार्थ इत्यादि के सेवन के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे धीरे-धीरे युवाओं का स्वास्थ बिगड़ने लगता है।इस कारण जब उन्हें रिप्लेस किया जाता है तो  वे घोर निराशा के शिकार हो जाते हैं। हालांकि कहानी में इन तथ्यों की ओर कहानीकार का कोई संकेत नही है। इस कहानी में कोका किंग किसी एजेंसी से जुड़ा न होकर स्वतंत्र रूप से अपना व्यवसाय चलाता है। कहानी में नायक की आफ्टर प्ले के बाद जो आत्म ग्लानि की भावना उमड़ती है उसे गौण रूप में संकेत के माध्यम से बताया गया है। जब वह होटल से बाहर निकलने के लिए नहाने के बाद चाय पीकर बाहर जाने की पेशकश करता है। यहाँ जिस अन्तरभवित मनोव्यथा का चित्रण है, उससे नहाने के बाद मुक्ति पाने का संकेत कहानी में दिखाई देता है। विडंबना यह है कि सभी भौतिक सुखों को पाने की होड़ ने इस व्यवसाय से होने वाले नुकसान के विषय में सोचने की शक्ति को कुंद कर दिया है।इसी कारण इस देह व्यापार के हिसाब से तर्क गढ़कर प्रस्तुत किया जाने लगा है। जिसमे मज़े का मज़ा और पैसे का पैसा प्रमुख है।
हमारे देश में सभी महानगरों के महत्वपूर्ण इलाके में जिगेलो व्यवसाय से संबंधित कार्यालय किसी न किसी रूप में मौजूद है। यह डिमांड के हिसाब से माल सप्लाई कराता है। हाई एजुकेटेड, सुदर्शन नौजवानों की मांग और कीमत यहां बहुत ज्यादा है। कहानी में भी इस ओर संकेत किया गया है जब नायक के सौंदर्य की प्रशंसा नायिका अपनी मासूमियत एवं सहजता से करती है। कहानी लेखन की यह विशेषता होती है जब कहानी के माध्यम से कई तथ्यों को उजागर करना होता है तो कथाकार संकेतो के माध्यम से उन्हें दर्शाने का प्रयास करता है। इस कहानी में भी इस प्रयास को समझा जा सकता है। चुकी जिगेलो की बुकिंग रेट ऑर्गेज़्म प्राप्ति के शर्त पर बढ़ती है। इसलिए  इस व्यवसाय को अपनाने वालों को विभिन्न प्रयोग को अपने शरीर पर करना होता है। यह शारीरिक एवं मानसिक दोनो रूप से घातक सिद्ध होता है।                             सुरेंद्र वर्मा के उपन्यास ‘दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता’ में उच्च वर्गीय स्त्री पारुल जिगेलो नील को मुम्बई के सी लिंक पर एक लग्ज़रियस फ्लैट भेंट स्वरूप देकर कहती है कि “सोमपुरिया खानदान की राजदुलारी और शाह परिवार की बहू को जो ऑर्गेज़्म तुमने दिया है उसके लिए यह फ़्लैट फिर भी सस्ता है।” इस कहानी में भी आफ्टर प्ले के बाद न्यायिका की भावुकतापूर्ण बातें और सहर्ष दिए गए नोटों की गड्डी ऑर्गेज़्म प्राप्ति को ही दर्शाता है। सवाल यह उठता है कि दैहिक स्तर पर इसकी प्राप्ति क्या भावात्मक स्तर तक पहुँच पाती है? ओशो ने अपनी पुस्तक संभोग से समाधि की ओर में ऑर्गेज़्म के त्रिस्तरीय व्याख्याओं को पुष्ट करते हुए इसे ब्रम्हानंद सहोदर होने से जोड़ा था जिसे समाधि अवस्था का नाम दिया था। चरम सुख के इस पायदान पर कीमत चुकाकर कुछ प्रयोगों द्वारा, जो इरॉटिक हो सकते है, पहुँचना संदेहास्पद प्रतीत होता है। यह भी संभव है कि काम के गहन बारीकियों से अवगत न होने के कारण चरमसुख के प्रथम पायदान को ही ऑर्गेज़्म मान लेना यहाँ नियत हो। इस अंतरंग प्रकरण की सच्चाई जो भी हो यह अवश्य है कि इस व्यापार का उफ़ान जोरों पर है। यह व्यापार आज केवल चरमसुख तक सीमित न होकर पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था के प्रति प्रतिकार एवं समकक्षता के कारण भी फल- फूल रहा है। जिस काम मे सदियों से संलग्न पुरुष कोई ग्लानि अनुभव नही करता उसे करने में स्त्री क्यों पीछे रहे। काम जगत में कोई शिकार या शिकारी नही होता है। अगर कोई पक्ष ऐसा सोचता है तो उसके सोच की सीमा सीमित कही जा सकती है। काम के संदर्भ में अगर कोई पक्ष किसी को अपना शिकार बनाता है तो वह उसका शिकार भी होता है। तात्पर्य यह कि इसके लिए सहज समन्वय की आवश्यक्ता होती है। लेकिन पुरुषवादी सोच इसे नकार कर स्वयं को श्रेष्ठ और स्त्री को हीन दिखाने या जताने में लगा रहता है। 
कहानी में कोका किंग को प्रेरणा एक कॉल गर्ल से मिलती है जो गुप्त रूप से देह व्यापार को अपनाकर भौतिक सुख सुविधाओं से दिन प्रतिदिन परिपूर्ण होने लगती है। कहानी का नायक इसी से प्रेरित होकर इस पथ पर अग्रसर हो जाता है। गौर से विचार करे तो पुरुष द्वारा बनाई गई व्यवस्था एक पुरुष को ही पथ विचलित करने का कार्य करती है। तर्क यहाँ पुरुषार्थ से संबंधित दिया जा सकता है। लेकिन व्यवस्था के पड़ते भयंकर परिणाम से मुख मोड़ लेना संभव नही है। सामंतों और राजाओं के युग मे भी यह व्यवसाय हानिकारक सिद्ध हुआ इतिहास जिसकी गवाही देता है। इसमें उलझी युवा पीढ़ी पंगु होकर रह जाती है। “कोका किंग” कहानी बस एक पक्ष को हमारे सामने रखती है जबकि इसका दूसरा भयावह पक्ष यहां अछूता रह जाता है।कहानी में बस एड्स जैसी बीमारी का जिक्र कर लेखिका ने अपना हाथ झाड़ लिया है।
बाज़ार ने जिस प्रकार का चकाचौध समाज में उपस्थित किया है उसे देखते हुए सुविधाभोगी समाज के युवाओं का इस ओर आकर्षित होना कोई आश्चर्य उत्पन्न नही करता है। आज हर व्यक्ति जल्दी में है जो हर उस चीज़ की प्राप्ति चाहता जिससे वह सुखी हो सके बिना समय गवाए। रजनी मोरवाल ने इस स्थिति को सूक्ष्मता से पकड़ कर यहाँ स्पष्ट कर दिया है। कहानी का नायक स्वयं कहता है “बचपन से ही मेरे आंखों को बड़े सपने देखने की लत थी बड़ा घर, लंबी कार, खूब धन दौलत, संपत्ति और ऐश्वर्य के सपने आते थे।” अपने सपनों को पूरा करने के लिए ही वह जिगेलो की वृत्ति को चुनता है। यहाँ नायक कोई बेरोज़गारी का शिकार विवश इंसान नही है। वह नौकरी करता है। उसकी पत्नी भी नौकरी करती है दोनो ने प्रेम विवाह किया है। अपनी नौकरी से उसे प्रतीत होने लगता है कि अपनी इच्छाओं को वह पूर्ण नही कर पायेगा। “छोटी-सी नौकरी में कुछ नही कर पाऊंगा लाइफ़ में इसका अंदेशा था मुझे।” इसी कारण वह इस व्यवसाय को चुनता है। वह कहता है कि “मुझे किसी ने धकेला नही है जबरन, बल्कि मैं खुद इन सब मे दाखिल हुआ, ठीक वैसे जैसे कोई वेश्या या कॉल गर्ल।” सोच समझकर किए गए इस फ़ैसले के लिए उसके भीतर कोई मध्यवर्गीय अपराधबोध नही है। कभी अगर पनपता है तो उसे “जीवन हमारा इसे जीने का अधिकार भी हमारा” जैसे आधुनिक दर्शन के इन वाक्यों से झटक देता है।अभिप्राय यह कि नायक अपने व्यवसाय के लिए नैतिक और भावनात्मक स्तर पर पूर्णतः सजग है। वह ईज़ी मनी के राह का अन्वेषी है जिस पर चलने में वह आत्म भर्त्सना महसूस नही करता। उसका उदेश्य पैसा बनाना और सुविधा पूर्ण जीवन व्यतीत करना है। इसी के परिणाम स्वरूप वह “कोका किंग”के रूप में स्वयं की परिणत करता है। “मैं अपने भीतर कोका किंग को ईजाद किया फिर ये सिलसिला चल निकला। मैं ईज़ी मनी के गुण सीख गया था।” मूल रूप से नायक ज़्यादा से ज़्यादा रुपए कमाए जाने के प्रयोजन को लेकर चलता है चाहे वह जैसे सिद्ध हो।
नायक का जिगेलो व्यवसाय में हाथ आजमाना बाज़ारी करण की देन है। अगर डिमांड है तो सप्लाई निश्चित है। आज महिलाएं खुलकर इनका उपयोग कर रही हैं। वर्तमान समय मे महिलाएं उस आधुनिक स्तर पर पहुँच चूंकि है जब वे ऑर्गेज़्म प्राप्ति के लिए खुले मंच पर बहस करती दिखाई देतीं है। यह बहस केवल बहस तक नही है बल्कि बाज़ार के माध्यम से इसकी पूर्ति की जा रही है। इसके लिए भारी भरकम कीमत चुकाई जा रही है।ऑर्गेज़्म प्राप्ति को जिस तीन स्तर पर बांटा गया है उसकी एक झलक मात्र कहानी में दिखाई देती है। आफ्टर प्ले के बाद के संवादों में फ़ॉर प्ले की ताज़गी में जिस अर्थहीन नैतिकता का सवाल संवाद में आता है उसका विस्तार कहानीकार की ओर से न दिया जाना खटकता है। प्रश्न यह है कि क्या क़ीमत देकर ऑर्गेज़्म के तीनों स्तर को प्राप्त कर लिया जाता है? क्या नैतिकता और भावनात्मकता का द्वंद्व आड़े नही आता? उत्तर शायद ना में हो। कहानी में नायिका ऑर्गेज़्म प्राप्ति के बाद ही भुगतान करती है। ऑर्गेज़्म के तीसरे स्तर से उसका कुछ लेना देना नही है। वह सेक्स विदाउट किस का विरोध करती दिखाई देती है यही उसके भवावृति को उजागर करता है। वैसे यह कहानी स्त्री और ऑर्गेज़्म को ध्यान में रखकर नही लिखी गई है। रजनी मोरवाल यहाँ स्त्री मनोवृति को खुलकर उजागार करती दिखाई नही देतीं हैं। संक्षेप में बस जीवन के ऊब को बताकर स्त्री का बचाव करती दिखाई देती हैं। कदाचित यह उनके स्त्री होने के कारण हो। बढ़ते उम्र के साथ स्त्री के सौंदर्य चिंता को वे जरूर दिखाती हैं। कहानी में जब वह ढलती उम्र में ढलकते उरोजों के लिए स्पेशल ब्रा का जिक्र करती हैं।स्त्री लेखन के कारण ही कहानी के शुरुआत से  कहानीकार स्त्री के पक्ष में दिखाई देती हैं। स्त्री द्वारा  इस बाज़ार को प्रोत्साहित करना मात्र पुरुष से उस निकटता को प्राप्त करना नही है जिसमे वर्षों से पुरुष संलग्न रहा है।यह  समानता की तलाश के बहाने से दैहिक शिखर बिंदु पर स्वछंदता का भोग  है।
इस बाज़ार में सुदर्शन पुरुष की बोली स्त्रियों द्वारा लगाया जाना एक प्रकार से पुरुषवर्चस्व के उस व्यवस्था को टक्कर देने की कोशिश है जिस पर पुरुष वर्षों से बस अपना अधिकार समझता रहा है।स्त्रियां जब अपने देह पर अपने अधिकार की बात करती है तो स्वाभाविक है अपने हिसाब से उसका उपयोग करें। जिस काम को पुरुष समाज वर्षों से करता आ रहा है वह स्त्री के लिए ही वर्जित क्यों हो? वेश्यावृत्ति चाहे स्त्री द्वारा अपनाई जाए या पुरुषों द्वारा इसके उपभोक्ता के रूप में स्त्री हो या पुरुष विसंगतियां परिवार और समाज के लिए दोनो से उपजती है। सुविधाभोगी समाज के व्यक्ति भोगवाद को बढ़ावा देने के कारण इस तथ्य को अनदेखा कर देते है।व्यक्ति के लिए सलिल अश्लील का फर्क देह व्यापार में गौण हो जाता है। जिगेलो व्यवसाय में ऑब्सिन, इरॉटिक, परवर्ट जैसे शब्द फ़ैंटेसी मात्र हैं।इनका विकृत उपयोग इस बाज़ार में उछाल का कारण बनता है।यह व्यापार  ऑर्गेज़्म प्राप्ति तक सीमित न होकर युग्मो द्वारा  पर्वर्स फैंटेसी के रूप को अपनाए जाने के कारण भी बढ़ा है। इतना अवश्य है कि वेश्यावृति का यह व्यवसाय पुरुष द्वारा सहजता से नही निभ सकता है क्योंकि सक्रियता उसकी नियति है। भारतीय मिथक के अनुसार स्त्रियों में सहवास की शक्ति सदा बनी रहेगी यह वरदान देवराज इंद्र ने उसे प्रदान किया था। अगर यह वरदान पुरुषों को प्राप्त होता तो आज समाज की क्या स्थिति होती यह सोच कर ही अंतर्मन कांप उठता है। जिगेलो का यह व्यवसाय युवाओं को केवल मालामाल कर रहा हो ऐसा नही है। बहुत सारे युवा इसमे ठगी एवं असाध्य रोग के शिकार हो रहे हैं। इस बात का ध्यान कहानी के नायक को भी है। तभी स्त्री और पुरुष दोनों इस पर अपनी राय रखते नज़र आते हैं। नायक द्वारा यह कहा जाना कि “धंधे का उसूल है सेक्स विदाउट लव बट नॉट विदाउट कण्डोम आख़िर सुरक्षा में समझदारी है।” उसकी सजगता को दर्शाता है।इसी प्रकार प्रगाढ़ चुम्बन के लिए स्लाइवा के टच होने जैसी बातें करके कहानी में आधुनिक बीमारियों की ओर संकेत किया गया है। यह  अवश्य है कि कहानी संकेत में कई गूढतत्व को व्यक्त करने में सक्षम है।
रजनी मोरवाल ने कहानी में कुछ नया प्रयोग नही किया है। विषय वस्तु समयानुकूल अवश्य है। कथ्य को स्पष्ट करने के लिए कथोपकथन का सहारा लिया गया है। भाषिक संरचना अति साधारण  जिसमें साहित्यिकता का अभाव है। एकाध जगह पर कहानी का तारतम्य टूटता दिखाई देता है।कहानी में कथ्य का कसाव न होना किसी सधी लेखनी का परिचायक नही बन पाता है। कथा के बिखराव को कुशलता से अंत मे सहेज लिया गया है। कल्पना ने यथार्थ को दबाया है लेकिन कथा में कथ्य की पुष्टि सहजता से हो जाती है। कह जा सकता है कि क्या लिखना है इसका पता तो लेखिका को है लेकिन कैसे लिखना है इसके लिए संदर्भ की गहराई में उतरना आवश्यक है।शीर्षक प्रतीकात्मक है जो मटका किंग से प्रेरित लगता है। कहानी के विषय वस्तु पर बात करे तो हिंदी में बहुत पहले सुरेंद्र वर्मा ने “दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता” नामक उपन्यास इस विषय पर काफ़ी विस्तार से एवं यथार्थ परक ढंग से लिखा है जिसमे क्राइम, पूँजी और स्त्री का उत्पीड़क रूप दृष्टिगत होता है। अमृत लाल नगर ने “खंजन नयन” उपन्यास में एक गौण पात्र के रूप में इस विषय को दिखाया है। इसी प्रकार शंकर वसु ने बंगला के “चौरंगी” उपन्यास में एक ऐसे ही गौण पात्र का सृजन किया है। अजय नावरिया ने भी इस विषय पर लिखा है। रजनी मोरवाल ने कहानी के माध्यम से इस विषय को वर्तमान संदर्भ में उकेरा है जो बाज़ार के वर्चस्व एवं उसके उपभोग की उत्कट इच्छा को प्रस्तुत करता है।
कोई भी रचना मूल रूप से रचना तभी मानी जाती है जब वह समय से संवाद करे। “कोका किंग” कहानी में इस विशेषता की तलाश की जा सकती है। रचनात्मक स्तर पर कहानी भले ही सुगठित नही हो लेकिन विषय वस्तु में सामयिक चेतना से उपजे मनोभाव का रेखांकन किया जा सकता है। कहानी प्रस्तुत रूप में जिस उपभोगवादी प्रवृत्ति को उजागर करती है वह चिंतन के कई स्तर तक पहुचता है। परत दर परत विचार करने पर यह नैतिक सामाजिक एवं आर्थिक पहलुओं पर विचार करने का अवसर प्रदान करती है। आठ सदस्यों वाले एक निम्नवर्गीय परिवार का पुरुष कहानी में अगर कोका किंग की भूमिका में उतरता है तो उसके पीछे अर्थ की बड़ी भूमिका है। बावजूद इसके कोका किंग अपने नैतिक संघातों से बच नही पता तभी बेटियों की शादी की चिंता में इस धंधे को छोड़ने की बात करता है। पत्नी या पति से उपजी उदासी और बाज़ार प्रदत उपकरणों से निखरे गए सौंदर्य का इस रूप में उपयोग यहां भयावह प्रतीत होने लगता है। एक तरफ जहाँ इंटरनेट पर वर्जिनिटी की बोली लगाकर ऊँचे मूल्यों पर वर्जिनिटी के उपयोग का विस्तृत बाज़ार फैला है वहीं कोका किंग जैसे लोग अपने वेबसाइट द्वारा उपभोक्ता को यह भरोसा दिलाने में लगे रहते हैं कि वह बिस्तर का घोड़ा सिद्ध होगा अर्थात चुकाए गए मूल्य का पूर्ण उपयोग। देह व्यापार के इस बज़ार प्रदत खेल में स्त्री और पुरुष दोनों  सामान्य दिखाई दे रहे हैं। दोनो में जैसे होड़ लगी हो इस व्यपार के लाभ को ज्यादा से ज्यादा भोगे जाने की। यह अंधी दौड़ कहाँ रुकेगी यह तो कालगति तय करेगी। लेकिन टॉलस्टॉय की प्रसिद्ध कहानी  “दो गज़ ज़मीन”में प्रतीकात्मक रूप से उपभोग के बढ़ते इस होड़ का अंत तलाश किया जा सकता है। ऑब्सिन फैंटेसी में नितम्बो पर कोड़े द्वारा प्रहार करने से लेकर विपरीत लिंग के कपड़े पहनने तथा शरीर पर पेंटिंग के माध्यम से भ्रम उतपन्न करने वाले  कलात्मक बिम्बो का उपयोग कर जिस  ऑर्गेज़्म प्राप्ति का भ्रम यहाँ तैयार किया जाता है, जिनमे अन्य पशुवत अश्लील क्रियाए एवं प्राकृतिक क्रिया का अप्राकृतिक उपयोग शामिल है, वह अगर विकृत न लगकर मनोरंजक लगती है तो स्पष्ट है कि मनुष्य दैहिक अनुभूतियों के रागात्मक ऊर्जा से परिचित नही है। शरीर के संभावनाओं की तलाश इसमे खिलवाड़ मात्र प्रतीत होता है। यह अवश्य कहा जा सकता  है कि बौद्धिक स्तर पर “कोका किंग”कहानी में कई आयामो की तलाश संभव  है। यह तलाश कहानी को सतही तौर पर पढ़कर पूरी नही की जा सकती  जरूरत इसे पढ़कर गहराई से इस पर विचार करने की है।
रवि रंजन कुमार ठाकुर का की कलम से - सुविधाभोगी समाज में युवाओं का शॉर्टकट : "कोका किंग" 3
रवि रंजन कुमार ठाकुर
मोब.-8384049497
पता- मकान न.-F44b,गली-2,मंगल बज़ार रोड,लक्ष्मी नगर ,नई दिल्ली -110092

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