Friday, April 17, 2026
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अनूदित कहानी – जाड़े की लंबी रात (मूल : अलीफ़ा रिफ़ात, अनुवाद : नासिरा शर्मा)

इस  कहानी का जो विषय है, वह अस्मत आपा की लिहाफ़ की याद ताज़ा कर देता है। उन से भी पहले बहुत कुछ इस विषय पर लिखा गया है जब पत्नी से लापरवाह मर्द बाहर जाना अपने पौरुष की कसौटी समझता था। इस विषय पर बनी फ़िल्म ‘साहब, बीवी और ग़ुलाम’ को कौन भूल सकता है और आज भी यह दर्द बहुत सी औरतों का मुक़द्दर है।

– तेजेन्द्र शर्मा –

सोने और जागने की कैफ़ियत के उस एक पल में… समय की क़ैद से बाहर सरकता वह पल जो कभी समाप्त न होने का अहसास दिलाता है। वर्तमान की झिर्रियों से मछली की फिसलन की तरह आती आवाज़ों ने ज़जोबिया की सुनने की शक्ति को जैसे मज़बूत ज़मीन पर लाकर छोड़ दिया था।
मेढ़कों की बिना ठहरे मशीनी टर्राहट और खेतों में दूसरे सिरे पर देहाती कुत्तों के जवाब में भौंकते हुए कुत्ते जैसे भेदभरी भाषा में सूचना देने का न समाप्त होनेवाला सिलसिला जारी रखे थे।
एकाएक उसे अहसास हुआ कि बिस्तर पर वह बिलकुल तन्हा है, अकेली। दूसरी चीज़ जो हरकत में थी वह दीवार पर बदलते हुए साए थे जो लैंप में ख़त्म होते तेल के कारण बन बिगड़ रहे थे। उसे विश्वास हो गया था कि अब उसकी आँखों में नींद का बसेरा नहीं उतरेगा। उसका दिल चाह रहा था कि जल्दी से दिन सुबह की नमाज़ के साथ निकल जाए।
जैसे-जैसे वह अपने शौहर की वापसी का इंतज़ार कर रही थी, अतीत की यादें सरगोशियाँ बन उसके ज़हन पर छाती जा रही थीं। उसने हर रात की तरह अपने को बचपन की यादों की तरफ़ धक्का दे दिया। जहाँ बच्चे अपने लिए बिना संघर्ष के अपनी जगह ख़ुद ब ख़ुद बना लेते थे। एक घर में मिली सुरक्षा जहाँ स्नेह और देख-रेख बच्चों का हक़ था। इन सारी चीज़ों को पाने के लिए उसे काम नहीं करना पड़ता था। जहाँ मौत का राज न था और दुख कभी एक रात से ज़्यादा नहीं ठहरा।
वह देहात की गलियों में अपनी सखियों के संग यह गाना बिना समझे हुए ‘अपने गले लगा लूंगी’ एक विशेष लय के साथ ताली बजाते हुए गाती थी। अपनी मर्जी से खेलतीं फिर घर आ जातीं फिर खेलने भाग जाती थीं। कभी- कभार चाँदनी रातों में अपनी जवान सखियों के साथ सैर को जातीं और गाना गाने लगतीं जैसे…
जाड़े की लंबी रात है 
मुझे गले लगा लो !
और मैं तुम्हें जाड़े की लंबी रात में 
गले लगा लूँगी।
यह गीत वह बिना थके तालियों के संग गाती रहती। फिर अचानक जवानी में दाखिल होते ही उसकी उभरती छातियाँ माँ के गर्भ में पलते बच्चे की तरह उसकी खुरदरी क़मीज़ से नज़र आने लगीं और यूँ उसका खेलना-घूमना हमजोलियों के साथ बंद हो गया। कुछ दिनों बाद उसकी शादी उसके चचा के बेटे हमदान से कर दी गई ताकि ख़ानदान की ज़मीन ख़ानदान के पास ही रहे और इस तरह अपने भरे पूरे देहाती घर से वह खेतों के उस पार अपने शौहर की तन्हा कोठी में चली गई। इसकी दो मंज़िलें थीं, सामने का स्वागत द्वार का हिस्सा पत्थरों से चिना हुआ था। सर्दियों में इस्तेमाल में आनेवाले कमरों का फ़र्श लकड़ी का था। कोठी के चारों तरफ़ फलों के पेड़ और सब्ज़ियों की क्यारियाँ थीं जिसका अहाता ऊँची गारे से बनी दीवारों से घिरा हुआ था। जिसके ऊपर टूटे हुए शीशे लगे थे।
उसे अच्छी तरह से याद है कि उसकी शादी के दिन जब उसे पहली बार उसे बड़े द्वार से ले जाया गया था तो सामने दीवार पर रंग से बनी बड़े ऊँट की तस्वीर जो मालिक मकान के हज करने की बात बताती थी और सुर्ख रंग ही में हाथों के छापे थे, जो बुरी नज़र से बचाने के लिए थे। फिर वह रात आई जब हमदान उसे इसी बिस्तर तक ले आया था। वह एक बड़ी पीड़ादायक रात थी, किसी भी ऐसे अनुभव से दूर जिससे पहले कभी वह गुज़री हो।
इसके बाद ऐसा सैकड़ों बार हुआ जब दर्द ने नफ़रत की जगह ले ली। उसके पति का अपने खुरदरे हाथों से उसके जिस्म को मसलना, उसकी बदबूदार साँसें, अशीश की बू में लिथड़ा हुआ थूक भी शामिल था। अपने पति की सेवा और बच्चों की ख़ातिर उसने ख़ुद को एक बीवी और माँ के रूप में ढाल लिया था। एक औरत जो शादी और घर से उस समय तक अपने को सुरक्षित महसूस करती है, जब तक वह उसे क़ब्र में नहीं डाल आते हैं।
वह पहली रात याद है, जब उसका शौहर उसके पास बिस्तर में मौजूद न था। किस तरह उसने जागकर अपने शौहर को ढूँढ़ना शुरू कर दिया था। अंत में भट्ठी के पास पत्थर की बेंच पर उसे जवान नौकरानी के साथ लेटे पाया था और जब वह अपने शौहर के साथ वापस अपने कमरे में लौटी तो ज़जोबिया ने अपनी सारी पालन-पोषण और परंपरा के विरुद्ध सब कुछ भुलाकर अपने शौहर से तलाक़ माँगी थी। जिस पर वह उसकी तरफ़ पीठ करके बोला था- “मैं क्यों तुम्हें तलाक़ दूँ? तुम अपनी माँ के पास जाकर उससे अपने बाप के बारे में, जिसका ज़्यादा वक़्त मुसल्ले (नमाज़ स्थल) पर गुज़रता है सवाल क्यों नहीं करतीं। सो जाओ और बात को ज़्यादा न बढ़ाओ।”
अगले दिन शौहर ने उसे सोने की बालियाँ लाकर दीं और मुहब्बत से उसे चूम लिया था। इसके बाद भी गुज़रते समय के साथ-साथ इस तरह की रातें दोहराई जाती रहीं और उसे सोने और जवाहरात के तोहफ़े मिलते रहे। और जवान ख़ादिमाएँ (सेविकाएँ) उसकी मर्ज़ी से तब्दील होती रहीं क्योंकि वह घर का मालिक था। अपने बाप के लिए जो शंकाएँ उस मनहूस रात को दिमाग़ में शौहर की बात से उभरी थीं, वह उसे लगातार परेशान करती रहीं। ऐसा आदमी जो नेक और पवित्र, जिसका गाँव में आदर और दबदबा था। जो स्नेही भी था। बचपन में उसे अपने कंधे पर बिठाकर जो पैगंबरों के क़िस्से सुनाता था। उसके बारे में कही बातों में कोई सच्चाई हो सकती है कि वह भी अपनी पत्नी के सो जाने के बाद किसी दूसरी औरत के बिस्तर में चला जाए? सिर्फ़ अपने बाप का ख़्याल …उसके चोगे में फैली हुई इत्र की ख़ुशबू और वह अपने चेहरे को नज़दीक ले जाकर महसूस करती और यह बात उसे विश्वास और संतोष देती कि उसका बाप एक अच्छा इंसान था दुनिया में कहीं कोई बुराई न थी।
उस सुबह अपनी माँ के आने पर, जो पुल’ पार कर खाने का सामान गधे पर लाद कर गाँव से नौकर के साथ पहुँची थी, उसने इस बारे में कोई बात नहीं की। लेकिन त्योहार के दिन जब उसकी माँ क़ब्रिस्तान में अपने शौहर की क़ब्र पर फ़ातिहा पढ़ने पहुँची और अपनी बेटी के घर तक का रास्ता पार किया तो गाँव की ख़ैरियत और काम के बारे में पूछने के बाद जब वह चाय पीने बैठीं तो उसने अपनी माँ से आख़िर पूछ ही लिया। वह सवाल जो उसे अरसे से परेशान किए हुए था! उसकी माँ ने अपनी आँखें झुकाकर चाय के गिलास को घूरते हुए कहा-
“सारे मर्द एक जैसे होते हैं।”
“क्या मेरा बाप भी?”
“हाँ, बेटी!” माँ ने तेज़ी से चाय सुड़कते हुए कहा, “वह भी एक मर्द था। ख़ुदा उस पर अपनी रहमत का साया करे।”
वह चाहती थी कि उसकी माँ कुछ और कहे। क्या उसने भी इसी तरह के डरावने ख़्वाब देखे हैं? लेकिन उसकी माँ ने सिर्फ़ उसे नज़र भर देखा। जिसने उसके सवालों पर विराम लगा दिया। जैसे वह वर्जित क्षेत्र हो और उस पर विस्तार से कोई बात नहीं की जा सकती है। माँ दुआ पढ़ने में व्यस्त हो गई और वह भी माँ के साथ मसरूफ़ हो गई।
अब तो उसकी माँ भी मर चुकी है।
ख़ुद उसका शौहर भी अब उसके बाप की उम्र का हो चला है। अब तो नमाज़ पढ़ते हुए उसकी हड्डियाँ बोलती हैं, तो भी वह रातों को गायब रहता है। वह अब भी जेवरात की शक्ल में उसके दिए उपहार स्वीकार करती है!
उसे विश्वास है कि एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब वह संतुष्ट हो जाएगा। मगर कब…?
कब वह समय आएगा?
उसकी सोच का दायरा इंतज़ार में ढलता और प्रश्न करता हुआ उसे थका देता था।
थोड़े समय के लिए उसे महसूस ज़रूर हुआ था कि उसका शौहर बदल चुका है। फिर अचानक एक जवान नौकरानी ने उसके हुक्म को मानने से साफ़ इंकार कर दिया। वह अच्छी तरह समझ चुकी थी, ऐसा क्यों है? शौहर ने उस ख़ादिमा को वापस उसके गाँव जाने दिया और कुछ दिनों बाद ही एक और लड़की जो अभी बच्ची ही थी, उसे घर बुला लिया। शुरू के दिनों में वह बच्ची माँ को याद करते हुए अकसर रोया करती थी… ।यहाँ इस घर के अलावा वह कहाँ जा सकती थी…यह कैसे हो सकता था? आख़िर क्यों वह अपने पैरों के सामने ठंडे बुझते आतिशदान के अंगारों को इस तरह ताक रही थी। उसे नीचे जाना चाहिए या नहीं वह फ़ैसला नहीं कर पा रही थी। उसने अपने शौहर के झिझकते क़दमों की धीमी आवाज़ सुनी और अपनी आँखें बंद कर लीं। वह चुपचाप उसके पास आकर लेटा और सर तक चादर तान कर लेटा और उसी पल वह सो गया।
अपने शौहर के लिए जमा घृणा जो अब अरसे बाद  ठंडी भावनाओं में ढल चुकी थी। वह आशा भी कि सब कुछ बदल जाएगा, निराशा में बदल चुकी थी। लेकिन प्यार किए और किए जाने की कसक बदन में उसी तरह मौजूद थी जैसे देखने और सूँघने की। लैंप की बत्ती भड़की तो उसने नन्हे से सूराख़ की तरफ़ देखा, जहाँ से पौ फटने से पहले की सुरमई छटा कमरे में झाँक रही थी। अपनी साँसों को रोके हुए वह बिस्तर से नीचे उतरी और टटोलती हुई वह कमरे से बाहर निकलने के लिए आगे बढ़ी और सीढ़ियों से उतर कर वह भट्ठी के क़रीब जा पहुँची, जहाँ वह लड़की सो रही थी।
लड़की ने सर उठाया, “ज़जोबिया कुछ हुआ।”
“कुछ भी नहीं हुआ नरगिस,” उसने जवाब दिया, “कोई बात नहीं, उठो मेरे लिए गर्म पानी लाओ ताकि मैं नहा सकूँ।”
वह कमरे की तरफ़ वापस पलटी। उसका शौहर अभी भी गहरी नींद में डूबा हुआ था। वह तौलिया और अँगीठी उठाकर गुसलख़ाने की तरफ़ चली गई और अंदर जाकर उसने अँगीठी में कोयले दहकाए और टीन की लगन को जो दीवार से टिकीं थी, उसे उठाकर ज़मीन पर रखा। इस बीच नरगिस गर्म पानी का जग, जिसमें गुलाब जल मिला हुआ था, उठाए हुए दाखिल हुई। ज़जोबिया ने अपना नाइट गाउन उतारा और लगन में बैठ गई। जैसे ही उसने नरगिस की तरफ़ देखा, उसने मुँह दूसरी तरफ़ फेर लिया।
“नरगिस ! घबराओ मत! तुम भी अपने कपड़े उतार दो ताकि मेरी कमर धो सको।” लड़की ने अपने सर के ऊपर से कपड़े उतारे और मालकिन की तरफ़ मुड़ी। ज़जोबिया ने लड़की के बदन को नज़र भर देखा और उसके दिमाग़ में शोला- सा लपका कि वह भी कभी इतने ही खूबसूरत बदन की मालकिन थी। वह लड़की से यह बात कहने ही जा रही थी फिर अचानक ख़्याल बदल उसने कहा, “मुझे उम्मीद है कि तुम यहाँ ख़ुश होगी नरगिस, ख़ुदा ने चाहा तो तुम इस घर में लंबे समय तक रहोगी।”
इतना कहकर वह लगन में आलथी-पालथी मार कर बैठ गई ताकि उसके बदन पर नरगिस पानी डाल सके।
“देखो, इस झावें से मेरी कमर को रगड़ो।” उसने कहा और ज्यों ही लड़की उसके ऊपर झुकी तो ज़जोबिया को उसकी सख़्त छातियाँ अपने कंधों से रगड़ती महसूस हुईं।
“सख़्ती से रगड़ो।” उसने कहा, “सख़्त और सख़्त!” झावें ने उसकी कमर को बुरी तरह छील डाला था!
—— 
लेखक परिचय
अलीफ़ा रिफ़ात का जन्म मिस्र देश में ५ जून १९३० में हुआ । वह अरबी भाषा की महत्वपूर्ण महिला लेखिकाओं में से एक हैं।इनकी कहानियों के विषय गाँव, मर्द और स्त्री- पुरूष हैं। अलीफ़ा जिस तरह की कहानियाँ लिखती थीं। उस में जोउसे पढ़कर जान पहचान के लोगों और रिश्तेदारों  में उनके चरित्रों की चर्चा के कारण उनके परिवार वालों को बहुत सुनना पड़ता था जिसके कारण उनके पति ने उनके लेखन पर रोक लगा दी। न लिखने के कारण वह घुटतीं थीं। इसके चलते वह सख़्त बीमार पड़ गईं। उनका यह हाल देखकर पति ने लिखने की इजाज़त दे दी।अलीफ़ा ने नाम बदल फिर से लिखना शुरू कर दिया।उनका कहना था कि पत्नी को प्यार देना मर्दों के शब्दकोश में नहीं होता है।औरत भी इंसान है उसकी भी अपनी ख़्वाहिशें और अरमानहैं। वह पति के साथ खूब घूमी फिरीं और १९७९ में जब उनका इंतक़ाल हो गया तो भी उन्होंने अपनी यात्राएँ जारी रखीं और लेखन भी। उनको मिस्र का महत्वपूर्ण एकसीलेंसी अवार्ड भी मिला। उनकी चर्चित रचनाएँ इव रिटर्न्स टू एटम,हूँ कैन मैन बी , द प्रेयर आफ लव , द फ्राँस ज्वेलर्स, आन ए  लाँग विंटर नाइट ।उनकी कहानियों के अनेक भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। उनके उठाए  विषय आज भी इंसानी समस्याओं की मूल कठिनाइयों में शामिल हैं।
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1 टिप्पणी

  1. आदरणीय नासिरा जी
    मिश्र की अरबी भाषा की महत्वपूर्ण महिला लेखिका अलीफ़ा रिफ़ात के संपूर्ण परिचय के साथ हमने आपके द्वारा अनूदित कहानी ,”जाड़े की लंबी रात” पढ़ी।।
    बेहद,बेहद तकलीफ हुई
    साहब बीबी और गुलाम पिक्चर हमारी देखी हुई है।
    एक गाना याद आया-
    *नारी जीवन भी क्या जीवन है*
    *हर ज़ुल्म सहे, खामोश रहे।*
    कितनी अजीब बात है कि देह और भूख से ऊपर पुरुष कुछ और सोच ही नहीं पाता है! जीवन का सिर्फ एक ही उद्देश्य और एक ही प्राप्य महसूस होता है। ज़जोबिया की पीड़ा महसूस हुई। भरोसे का टूटना बहुत तकलीफ देता है पिता पर कितना विश्वास होता है! पर माँ से यह सुनना कि हर पुरुष एक जैसा होता है। मानो दिल छलनी हो जाता है।
    अंत तो बेहद मार्मिक है। और वह छोटी बच्ची बेचारी नरगिस!!!!
    कहानी की मूल लेखिका अलीफ़ा रिफ़ात का जीवन परिचय भी असामान्य था। बहुत हिम्मत की उन्होंने लिखने की।
    पुरुष सत्ता एक स्त्री की देह को मसल कर अपने आप को शहंशाह सा महसूस करती है। काश वो समझ पाती कि अपनी पत्नी की नजर में वह सबसे निकृष्टतम व्यक्ति रहता है।
    अलीफ़ा जी के साहस को प्रणाम
    आपके माध्यम से कहानियाँ पढ़ने के लिये मिल रही हैं। पर हमने सच में भी ऐसे कुछ मुस्लिम परिवारों को देखा है।
    हालांकि वक्त बदल रहा है ,लोगों की सोच बदल रही है और शायद अब स्थितियाँ भी बदल रही हों! क्योंकि कुछ अच्छे परिवार भी हमने देखे हैं जिनसे हम लोग भी काफी पारिवारिक रहे।
    शुक्रिया नासिरा जी! आपके माध्यम से क्षेत्र विशेष की कहानियों को पढ़ पा रहे हैं!

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