बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित “मोहरे” कथाकार दिलीप जैन का पांचवा उपन्यास है। इसके पूर्व कथाकार के “देर आयद…”, “जांच अभी जारी है”, “दर-ब-दर”, “रूप-राशि” उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। दिलीप जैन पंजाब नेशनल बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक थे।यह उपन्यास पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली की सच्चाइयों से रूबरू करवाता है। यह एक कोलाज है। सत्य को उकेरता कोलाज। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक पुलिस विभाग की अनियमितताओं, दलालोंऔर नेताओं की दखलंदाजी के कच्चे चिठ्ठों को उद्घाटित करने में सफल हुए है। इस कृति मेंपुलिस विभाग के कर्मचारियों-अधिकारियों, दलालोंऔर नेताओंके विविध रंग-रूप दिखाई देते हैं।
इस उपन्यास का मुख्य पात्र एक ईमानदार पुलिस अधिकारी है, जो न केवल अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित है, बल्कि उसने अपने चरित्र की अखंडता को बनाए रखते हुए पुलिस विभाग की भ्रष्ट व्यवस्था में भी अपने आपको शुद्ध और बेदाग रखा है। यह कथा एक ऐसे व्यक्ति की है, जो अपने उच्च नैतिक मूल्यों से प्रेरित होकर पुलिस जैसी भ्रष्ट व्यवस्था में भी अपनी राह को सच्चाई और ईमानदारी से तय करता है।इस पुलिस अधिकारी को अपने करियर की शुरुआत से ही यह अहसास हो जाता है कि पुलिस विभाग भ्रष्टाचार से ग्रस्त हैऔर यह भ्रष्टाचार केवल नीचे से ऊपर तक ही नहीं, बल्कि ऊपर से नीचे की ओर फैल चुका है। यह विडंबना है कि विभाग के छोटे कर्मचारी तो थोड़ी-सी सुविधा पर संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन अधिकारीगण महंगे शराब और अन्य विलासिताओं के लिए लालायित रहते हैं। हालांकि, उसने यह समझ लिया कि जब तक वह अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी को बनाए रखेगा, तब तक वह खुद को इस भ्रष्टाचार के जाल में नहीं फंसा सकता।इस कृति का सन्देश यह है कि दुनिया को सुधारना मुश्किल हो सकता है, लेकिन स्वयं को भ्रष्टाचार से बचाए रखना और सत्य, न्याय और ईमानदारी के रास्ते पर चलना संभव है। यह उपन्यास हमारे समाज के लिए एक प्रेरणा है कि हमें अपने उच्च नैतिक मूल्यों को किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ना चाहिए, चाहे कितनी भी बुरी परिस्थितियाँ क्यों न हों। अधिकाँश लोग इस तरह की परिस्थितियों में दब जाते हैं, लेकिन यह पुलिस अधिकारी इस सच्चाई को साबित करता है कि ईमानदारी और चरित्र की शक्ति से किसी भी बुराई से बचा जा सकता है।
उपन्यास के कथानक में मौलिकता और स्वाभाविकता है। कथाकार दिलीप जैन ने इस उपन्यास की कहानी को इस तरह ढाला है कि वह पाठक को अपने रौं में बहाकर ले जाती है। उपन्यास के पात्र गढ़े हुए नहीं लगते हैं, सभी पात्र जीवंत लगते हैं। प्रत्येक पात्र अपने-अपने चरित्र का निर्माण स्वयं करता है। पुस्तक के प्रत्येक पात्र की अपनी चारित्रिक विशेषता है, अपना परिवेश है जिसे लेखक ने सफलतापूर्वक निरूपित किया है। इस उपन्यास में दिखने वाले चेहरे हमारे बहुत करीबी परिवेश के जीते-जागते चेहरे हैं। मुख्य पात्र की विवशता बड़े संजीव ढंग से लेखक द्वारा चित्रित हुई है। कथाकार ने घटनाक्रम से अधिक वहाँ पात्रों के मनोभावों और उनके अंदर चल रहे अंतर्द्वन्द्वों को अभिव्यक्त किया है। उपन्यास में मुख्य पात्र का मानसिक ऊहापोह प्रखर रूप में विद्यमान है। इस उपन्यास में प्रयुक्त कथानुकूलितपरिवेश, पात्रों की अनुभूतियों, पात्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण उपन्यासकार की उत्कृष्ट कला-कौशलता का परिचय देती है।लेखक ने पात्रों के मनोविज्ञान को भली-भांति निरूपित किया है और साथ ही उनके स्वभाव को भी रूपायित किया है।भारतीय संस्कृति में व्यक्तित्व निर्माण में परिवार का एक अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है। परिवार न केवल शारीरिक देखभाल करता है, बल्कि यह व्यक्ति के आदर्शों, मूल्यों और संस्कारों के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाता है। मुख्य पात्र के पिताजी अपने बेटे को भारतीय संस्कृति, जीवन के आदर्शों और जीवन मूल्यों से परिचित करवाते हैं। इस साहित्यिक कृति में मुख्य पात्र के अन्य पात्रों से संवाद और उनके रिश्ते सहज रूप से उसके व्यक्तित्व को आकार देते हैं।
पुस्तक में यहाँ वहाँ बिखरे सूत्र वाक्य उपन्यास के विचार सौंदर्य को पुष्ट करते हैं। जैसे –
“गाली तो हमारी जबान पे चढ़ी है, साहब। बात बात में मुंह से निकल ही जाती है। वो क्या है ना कि ये महकमा ही ऐसा है जहां हमारा पाला अमूमन एलएलबी यानी लुच्चे, लफंगों, बदमाशों से ही पड़ता है। उन पर हम हर बार बेंत तो नहीं चला सकते। ऐसे में हमें गालियों से ही काम चलाना पड़ता है। इसलिए ये गालियां तो अब हमारा तकिया कलाम हो गई है।” (पृष्ठ 11)
“किसी की रिपोर्ट लिखने या नहीं लिखने का फैसला लेने के बारे में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। विधायक जी के बेटे के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाकर ये छुटभैये नेता हमारी नौकरी खतरे में डालना चाहते हैं। अच्छा हुआ तुमने रिपोर्ट नहीं लिखी। वरना कल ही मेरा और तुम्हारा बोरिया बिस्तर यहां से गोल हो गया होता।” (पृष्ठ 23)
“हमारी जवाबदारी हमें पता है। तुम हमें ज्ञान मत दो। बल्कि ऐसा करो कि कोने की पान वाली दूकान पर अकसर एक लड़का खड़ा होकर लोगों को भड़काता रहता है। उसे पकड़कर लॉक अप में डाल दो।”
“किस जुर्म में?”
“जुर्म हम बाद में देख लेंगे। ऊपर से मंत्रीजी का फोन आया है। वह लड़का बहुत राजनीति झाड़ रहा है आजकल। उसको सबक सिखाना है।”
“राजनीति करना तो कोई जुर्म नहीं है।” मैंने अपना मत व्यक्त किया।
“यह देखना हमारा काम नहीं है। ऊपर से निर्देश आए हैं हमें तो उनका पालन करना है।”(पृष्ठ 82)
उपन्यास में इस तरह की अभिव्यक्ति शिल्प में बेजोड़ है और लेखक की रचनात्मक सामर्थ्य का जीवंत दस्तावेज है। इस उपन्यास में सजीव, सार्थक, स्वाभाविक और सरल संवादों का प्रयोग किया गया है।इस पुस्तक में पुलिस विभाग की कार्यशैली चित्रित की गई हैं। आलोच्य कृति का शीर्षक“मोहरे” अत्यंत सार्थक है।उपन्यास शिल्प और औपन्यासिक कला की दृष्टि से सफल रचना है। इस उपन्यास के बुनावट में कहीं भी ढीलापन नहीं है। मुख्य पात्र की संवेदनाओं को कथाकार ने जिस तरह से इस उपन्यास में संप्रेषित किया है वह काबिलेतारीफ़ है। यह कृति मानवीय संवेदनाओं के प्रति कथाकार के दायित्व बोध को दर्शाती है। “मोहरे” अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यास बन पड़ा है। उपन्यासरोचकहैऔरअपनेपरिवेशसेपाठकोंकोअंततकबांधेरखनेमेंसक्षमहै।यह उपन्यास सिर्फ पठनीय ही नहीं है, संग्रहणीय भी है। यहकृति पुलिस विभाग के कार्यकलापों पर बहुत ही स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करती है यह उपन्यास बेहद पठनीय है और पाठक की चेतना को झकझोरता है। भाषा सरल और सहज है। आशा है यह उपन्यास साहित्य जगत में काफी लोकप्रिय होगा।