Sunday, June 23, 2024
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प्रतिभा अधिकारी का यात्रा-संस्मरण – टर्की

‘तुर्की ‘ नाम बचपन में  भूगोल के साथ पढ़ा था पर जैसे ही भूगोल छूटा नाम भी बिसार दिया गया l
ग्रेजुएशन के दिनों में जब यूरोपियन इतिहास पढ़ा तो इस शब्द की आवृत्ति  भी बार -बार हुई पर सच कहूं तो मुझे इस नाम से न लगाव हुआ न ही इस देश को जानने की इच्छा !
हुआ यों कि हैदराबाद में बच्चों के पास कोविड पीरियड में हम दोनों पति- पत्नी ने कुछ टर्किश धारावाहिक देखे, पारिवारिक मूल्यों से भरपूर , आबोहवा और सुंदर लैंडस्केप से भरी इस जगह को देखने की इच्छा बलवती हो गई l अंततः  हम बहनों का यहां भ्रमण का प्रोग्राम बन गया और पांच जन टर्की देश  के पर्यटन को निकल गए l  इस देश की भूमि पर सबसे पहली जगह; जहां हमारे कदम पड़े वह जगह थी – इस्तांबुल!
इस्तांबुल को पहले -पहल पत्रिकाओं और फिल्म में देखा था फिर धारावाहिक देखते हुए, अंतालिया, बोरदोम, इजमिर, कपाडोकिया से मित्रता हो गई l
इस्तांबुल की समृद्धि देखकर आश्चर्य हुआ और अपनी कल्पना से भी अधिक सुंदर लगा l
हमारे देश के धारावाहिक ऐसे क्यों नहीं बनते कि दूर -देश के जनों को; हमारे देश को ज्यादा से ज्यादा जानने की उत्कंठा जाग जाय !!
इस्तांबुल दुनिया का आठवां बड़ा शहर है l ट्राम , बसों , सुंदर कारों और फिएट की पीली टैक्सियों में भागता यह शहर व्यस्त दिखता है l
अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों का यहां भरपूर जमावड़ा रहता है ; खासकर यूरोप के देश के जनों की यह रिफ्रेश होने की फेवरेट डेस्टिनेशन है l
हम लोग  हागिया / आया सोफिया मस्जिद ; जो पहले चर्च था देखने के बाद क्रूज की सांयकालीन सवारी और क्रूज में नाईट पार्टी करके तुर्की के दुनियाभर में प्रसिद्द बाजार ‘ ग्रैंड बाजार ‘ गए | यह तीसरा दिन था |
शब्दों की बाध्यता के चलते मैं यहाँ ग्रैंड बाजार और कपाडोसिया का वरन ही सविस्तार करना चाहूँगी |
ग्रैंड बाज़ार तुर्की
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‘कपालिकार्सी’ का अर्थ है कवर किया हुआ बाजार !
यह दुनिया का सबसे पहला मॉल यानी इकट्ठी दुकानों वाली जगह है ; करीब साढ़े पांच सौ वर्ष पुरानी !
यकीन आया क्या ?
यहाँ क़रीब साठ-बासठ छतों वाली सड़कें और चार हजार के लगभग दुकानें  हैं |
दुनियाभर से आने वाले पर्यटकों की सख्यां यहाँ ढाई लाख से भी ऊपर प्रतिदिन चली जाती है |
हमारे सुबह साढ़े दस बजे पहुँचने पर भी बाजार भरा हुआ था |
टर्की जाएं और ‘ग्रैंड बाजार ‘ न जाएं ! ऐसा हो नहीं सकता !
वो अलग बात है कि यहां विंडो शॉपिंग अधिक की गईं , ढेपू जो कम  थे सामान खरीदने के लिए !
हम बहनों का स्त्रीसुलभ- मन चीजें देखकर मचल – मचल जाता था बस नजरों से जी भरकर देखते , हाथों से कुछ वस्तुओं को नेहपूर्वक स्पर्श किया जाता और आगे बढ़ जाते l
हाय राम ! कितनी सारी नई वस्तुएं !
सैकड़ों किस्म की वनस्पतियों की चाय , बारह तरह की मिठाई , बकलावा , पचास तरह के हैंडमेड साबुन , जैम, जेली , अचार, फ्रूट – लैदर , पचपन भांति के नज़रबट्टू , किशोरियों के लिए हजारों किस्म के जंक और सोने के गहने , जूतों की फैशनेबल रेंज , फर और लैदर के; इटली – फ्रांस के फैशन को मात देते कोट , पुलोवर, ओवरकोट !
अंतरराष्ट्रीय हैंडबैग्स और पर्स से मुकाबिला करते सैकड़ों डिजाइन ,
नक्काशी वाले सामान , टेबलक्लॉथ के एक से एक बढ़कर डिजाइन , क्रोशिए का थ्रेडवर्क , कटवर्क कपड़े , नवेली शर्मीली दुल्हन के लिए साजोसामान , ख़ास तुर्किश जेवर , काश्मीर से लेकर तुर्क के गर्म शॉल – दुशाले , इत्र , कार्पेट आदि -आदि !
हमें जिस वस्तु की दरकार थी वह थी ब्लू आई यानी नजरबट्टू और चाय !
मैंने आज तक केवल देशी तुलसी और इटैलियन यानी बदरीनाथ जी की तुलसी , अपराजिता के पुष्पों को ही सुखाकर चाय के रूप में इस्तेमाल किया है पर वहां चाय के प्रकार देखकर अपने भारतीय नेचरल रिसोर्सेज यानी वनस्पतियों को भुला देने का दुःख हुआ l
ख़ासकर हमारा उत्तराखंड तो हर्बल वनस्पति में सिरमौर नहीं तो कम भी नहीं !
तुलसी , कैलेनडुला , ब्राह्मी, गुलबंफ्शा, अजूबी , विभिन्न प्रकार की चाय , कैमोमाइल पुष्प , हजारी, दूर्वा , जौ , ज्वारे , देशी गुलाब , स्विस रोज , दाड़ीम , अनार , कद्दू , गुड़हल के विभिन्न प्रकार , माल्टा , नींबू , कागज़ी नींबू , दालचीनी , सौंफ , बड़ी , छोटी इलायची , अश्वगंधा , बेल , किलमोड़ी , कांटेदार घिंघारू / स्मॉल फारेस्ट ऐप्पल आदि -आदि उत्तराखंड में आम हैं l
टर्की में लगभग प्रत्येक पीने लायक वनस्पति और फलों को सुखाकर बेचा जा रहा था l दुकान के लकड़ी के  पारंपरिक  खाने मसालों और चायों की खुशबू से सराबोर थे l
बकलावा ! न ! यह मुझे नापसंद है , वैसे केक , पेस्ट्री और चॉकलेट या शर्करा -पैक्टीनयुक्त मिठाइयों से भला हम भारतीयों की दुग्ध मिठाइयों , बेसन लड्डू , मैसूर पाक , मूंग हलवा , बालमिठाई, सिंगौड़ी , मथुरा पेड़ा , कानपुर पेड़ा , रसमलाई , रसगुल्ले , गुलाब जामुन , काला जाम , कस्टर्ड पाउडर कलाकंद , कलाकंद , खजूर मिठाई , सोहन हलुवा , सोन पापड़ी , चंद्रकला , गुजिया , बालूशाही, मिल्क केक , मिल्क सैंडविच , मलाई सैंडविच , रबड़ी का भोग लगाने वाली जिह्वा शांत हो सकती क्या !!
…. फिर भी कुछ डिब्बे मिठाई और चॉकलेट खरीद लिए गए l
चॉकलेट और चाय दुकानदार ग्राहकों को टेस्ट करने को दे रहे थे l रंगीन चाय वहां की गुनगुने मौसम में लुभा रही थी | अनार , ब्लू बेरी की चाय से मन प्रसन्न हो गया |
आधा -अधूरा बाज़ार घूमकर अपने कमर को लकथक और पैरों को टीस लगने तक चूर कर हम वापस लौट आए l
यहां इंटरनेशनल टूरिस्ट छाया हुआ था , दुकानदारों के सामान की बिक्री चरम पर थी l
यह चित्र नमूनेभर हैं l
यहाँ बारगेनिंग अवश्य करें |
दूकानदार अमूमन शांत थे पर दोएक चिढ़े मिज़ाज वाले भी मिले |
Turkish delight के नाम पर कुछ मिठाइयां खरीदी गईं l
दुनिया में भोजन और मिठाइयों के जितने प्रकार और स्वाद हमारे भारत में हैं उतने किसी भी मुल्क में नहीं !
भोजन और मिठाइयां तो अपने देश के ही अच्छे ! बन, ब्रेड , पफ और चीज़ , मक्खन भी कोई खाना हुआ भला ! मगर फिर भी मेरा अपना मानना है ( मुझे भोजन से अधिक लगाव नहीं है ) यदि मुझे घूमने को मिल जाय तो मैं प्रत्येक स्थिति में खुश रहूंगी l
अब कुछ ख़ास जनों की भांति पूरी , कचौड़ी , फाफड़ा , थेपला , पापड़ , सत्तू , बीकानेरी, हल्दीराम भुजिया विदेशी टूर पर भी क्यों लेकर जाना भला !
दूर देश जाएं तो वहीं का भोजन करें और उन पलों को जिएं l

तुर्की की नज़र का टीका / ईविल-आई
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‘डीठ’ के टीके बचपन में ; मां द्वारा जब भाई -बहनों को लगाए गए तो संज्ञान में आए l
आंखों में काजल लगाकर बचे हुए काजल से माथे के साइड में एक टिक्का लगा देना जैसे अपरिहार्य कार्य था l
चाहे बाद में भाई – बहन की नीली -हरी आँखें काजल मलकर ढड़वा जैसी हो जाती थीं पर मां को अपने बच्चे उस हाल में भी प्रिय थे l
मेरे हरी आंखों वाले भाई और नीली आंखों वाली बहन उस ‘ मोसे वाले रोबेन ‘ मुंह में हम बड़ी बहनों को एक आंख भले न लगते पर मां बड़ी सुकून में दिखती थी l
जब मैं स्वयं मां बनी तो तब यह प्रथा की मैं स्वयं प्रथम साक्षी बनी l
क्यों कहते होंगे लोग भारत को कई भ्रमित प्रथाओं का देश !
यह प्रथाएं जाने – अनजाने प्रत्येक कबीले , संप्रदाय या देश में व्याप्त हैं l
हो न हो यह प्रथा मां के दिल से ही निकली होगी , कितने डर -कितने भ्रम रहते हैं एक मां को अपने संतान के प्रति ना !
यही नहीं बुरी नज़र की तो काजल , तावीज़, काले , लाल प्रतिष्ठा -पूजा किए धागों की अलग ही दुनिया है l राई, नमक, मिर्च से लेकर माष-चावल की परखन तक भी !
बच्चे का अत्यधिक रोना , दूध उलटना , मुंह निस्तेज दिखना आदि -आदि सब बुरी नज़र के अंतर्गत मां के अलिखित नोट्स हैं l
ऐसा माना जाता रहा है कि छोटे बच्चे को ही क्या बल्कि बड़ों को भी नज़र लगती है , और तो और अपनी नज़र तक भी !
यह तुर्की की Evil’s eye है यानी नज़रबट्टू !
जबकि यह मूल रूप से वहां की प्रथा नहीं पर अब वहां प्रसिद्ध है l यह मेसोपोटामिया की प्रथा थी l
दुकानें क्या ; प्रतिष्ठान या रेस्त्रां तक में बुरी नज़र की काट के रूप में यह बड़ा नेत्र वहां अवस्थित था , मुख्य दर
– ओ – दीवार से लेकर भीतर तक भी !
इसके टर्किश ब्लू रंग हमें भले लगे , नज़रबट्टू होगा वहां ; यहां तो हम इसे सजावटी आयटम की भांति ट्रीट करेंगे !
बाद में मैंने नोटिस किया की कुछ दुकानों के आगे और कपाडोकिया में खाली जमीनों पर रोपे गए सूखे पेड़ों पर यह भी कृत्रिम रूप से फल -फूल रहा l
पर्यटकों और स्थानीय लोगों ने इसे हमारे यहां की रक्तवर्णी मौली की भांति उस पेड़ से as a wish बांधा था यानी ब्लू आई के कई पेड़ ऊंचे पहाड़, रूखी रेतीली भूमि पर अपनी असंख्य नीली बड़ी – छोटी आंखों के साथ ध्यान आकर्षित कर रहे थे l
हम लोगों ने कोई विश तो मांगी ही नहीं या बांधी ही नहीं पर इनको खरीद अवश्य लाए l
भारत में दुकानों में टंगे हुए ताज़े , पीले करारे नींबू और हरी तीखी मिर्चा का रंग संयोजन मुझे बड़ा लुभाता रहा है पर इसे अमल में नहीं ला पाई l वॉल हैंगिंग की तौर पर यह सुंदर डेकोरेशन है l
आजकल एक और वॉल हैंगिंग और चली है जो कि टर्की की ही है –
ड्रीम कैचर !
क्रोशिए के बनी, लटकती लतरों वाली खूबसूरत वॉल हैंगिंग !
वैसे यहां अपने प्रयाग वाले घर में एक भी नहीं है l
नई जेनरेशन अपने सपनों को पूरा करते हुए इन कैचर्स को भी ख़ासी तवज्जो देती है l  ईश्वर से प्रार्थना है कि जिसके नेत्रों के आगे से यह पोस्ट गुजरे उसे बुरी नज़र न लगे
१- कपाडोसिया, गर्म गैस- गुब्बारे की सवारी
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इस्तांबुल में तीन दिन हो चुके थे , जितना घूमना था घूम लिया था l
The Blue mosque के नाम से प्रसिद्ध मस्जिद का शिल्प नहीं देख पाए क्योंकि वहां मरम्मत का कार्य चल रहा था जबकि यह हमारी आइटीनरी में था l
टर्की जाने से पहले मैंने इंस्टाग्राम पर हॉट बलून टूर की एक आभासी राइड ली थी , मैं बच्चों की भांति एक्साइटेड थी l
ख़्वाब पूरा होने की उम्मीद में मैंने कई दिवास्वप्न बुने थे और बाहर से शांति के आवरण में स्वयं को ढक लिया था l
चौथे दिन हमें अल्लसुबह इस्तांबुल डोमेस्टिक एअरपोर्ट से कपाडोसिया के लिए फ्लाइट पकड़नी थी l
टिकट ; टूर प्लानर से पहले ही बुक्ड थे l नियत समय गाड़ी लेने आ गई , पिछले तीन दिनों की भांति सुबह ठंडी हवा थी l
ग्यारह बजे फ्लाइट कपाडोसिया के लिए उड़ चली l
अरे वाह ! एक झपकी क्या लगी कपाडोसिया पहुंच गए !
हम पांचों रोमांचित थे l
यहां यह एयरपोर्ट kaysiri जगह पर है l यह आर्मी का एयरपोर्ट है क्योंकि वहां जगह – जगह फोर्स से संबंधित एयरक्राफ्ट सजे थे जबकि हम सिविलियन बोइंग से ही आए थे l
यहां एक सत्तर साल के करीब की उम्र का हट्टा – कट्टा तुर्किश व्यक्ति हमारे नाम का कार्ड लेकर खड़ा था l
टैक्सी ( बड़ी SUV ) तेज रफ़्तार से अपने गंतव्य की ओर उन्मुख थी l हाईवे पर कोई भीड़ नहीं थी l सड़क के अगल – बगल रूखे मैदानों के साथ रेत के गोल पहाड़नुमा टीले थे l
कहीं -कहीं प्लांटेशन किया गया था , उस रूखी भूमि पर यह एक हरे ठप्पे या पैच की तरह प्रतीत होता l
तेज रफ़्तार होते हुए भी हमें सब्र नहीं था पर वास्तव में यह दूरी तीस- बत्तीस के करीब थी l
बीच – बीच में कई बो लगी और फूलों से सजी गाड़ियां पास होती जा रहीं थीं ; ओह ! ये किसी दुल्हन के प्री वैडिंग शूट या निकाह के लिए जाने वाली कारें थीं l
रौखड़ , मिट्टी , चट्टानें , चौड़ी सड़क पार कर  हम  लोग कपडोसिया पहुंच गए |
अंतरजाल पर जिन सहस्त्रों मंदिरनुमा चट्टानों वाले घरों या रेतीली चट्टानों को देखने का उत्सुक -कौतुक था ; वह अब सत्य बन आंखों के आगे था l
‘ऑटोमन केव होटल ‘ में लगभग साढ़े बारह तक हम सैटल हो गए l
यह एक हवेलीनुमा घर को तोड़कर दोबारा बनाया होटल था जिसका भीतरी शिल्प पहाड़ों के होटलों की भांति था , लकड़ी की मोटी बल्लियों , शहतीरों वाली छतें और लकड़ी का फर्श !
अहा ! लैवेंडर , अंगूर , जंगली छोटे सेब / घिंघारु , पुराने दरवाजे , खिड़की और सबसे सुन्दर पुराना अंगीठीनुमा ग्रिल करने का  कलात्मक बुखारा !
मेरा मोबाइल अपने ऐक्टिव मोड में आ गया l मैं एक पल भी बर्बाद नहीं करना चाहती थी l
हम थके थे , मौसम खुशनुमा ठंडभरा था तो हम झपकियां लेने बिस्तरों में धंस गए l
लंच अभी बाकी था |
कपाडोसिया २- गतांक से आगे
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कपाडोसिया को मैंने इंस्टाग्राम के द्वारा मनभर देखा था या यूं कहें कि हॉट – एयर बलून की क्रियाकलाप को ध्यान से देखा l
यह अजनबी नाम मुझे प्रारंभ में याद नहीं हुआ , मैं प्रोग्राम की आइटीनरी बनाते -डिस्कस करते अक्सर बच्चों से इसे मैसापोटामिया कहती या उससे रिलेट करती पर अंत में यह शब्द याद हो ही गया l
कपाडोसिया टर्की का मध्य भाग है , जहां मीलों लम्बे रूखे – मैदान , शंकु के आकार यानी शंक्वाकार चट्टानें हैं l इन चट्टानों से मिट्टी -रेत निकल चुकी है पर ठोस रेतीली मिट्टी से बनी चट्टानों के कुनबे पूरे -पूरे गांव के भांति लगते हैं l
मुख्य सड़क से आते हुऐ हमें तुर्की की राजधानी ‘ अंकारा ‘ का बोर्ड भी दिखा था ; हूक सी उठी काश ! अंकारा भी जा पाते !
क्या है आखिर यहां ! रेतीली मिट्टी , एकाध वृक्ष , अंगूरों की बेलें !
बस !
फिर भी इस स्थान के लिए पर्यटक इतने बेताब क्यों रहते हैं भला !
क्योंकि वहां की सरकार , मुट्ठीभर जनता ने इस स्थान को आकर्षक बना दिया है l
हम जिस आबादी वाले स्थान में थे उसका नाम गोरीम था l यहां होटल के आसपास ही पुलिस का एक बड़ा सा कार्यालय था ; वहां लगे बोर्ड को देखकर मैंने संज्ञान लिया l
तीन बजे लंच के बाद हम वहां मार्केट घूमने गए थे हालांकि हमारे टूर प्लानर ने वहां हमें ओपन एयर म्यूजियम के बारे में बताया था पर मेरे साथ के बाकी यात्रियों को वहां जाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी l
मैंने और दीदी ने लंच के बजाय तीस -तीस लीरा में भुट्टे खरीदे और वही खाए l
हल्की बारिश ने वहां की मुल्तानी मिट्टी के रंग जैसी मिट्टी को गीला कर रखा था l मौसम नम और ठंडा था l [ यह अक्तूबर का महीना था ]
नीचे बाजार छोटी थी पर वहां इस्तांबुल बाजार जैसे गिफ्ट , सोवनिअर लगभग सभी छोटे – बड़े आयटम और आकर्षक गलीचे थे l
इस बाजार के ऊपरी हिस्से वही मंदिरों जैसी पहाड़ियों से घिरे थे l
हम सबका पहाड़ी मन ऊपर टॉप पर जाने को उल्लसित हो उठा और तिरछी चढ़ाई चढ़ते हम लोग ऊपर की पहाड़ियां घूम आए l
इन शंक्वाकार पहाड़ियों को काटकर वहां के बुतकार ( यहां बुतकार पहाड़ी टर्म में लिखा है , हमारा कुमाऊं इस शब्द को खूब प्रयोग करता है l ) जनों ने होटलों में तब्दील किया है और विदेशी पर्यटकों की सुविधा का इंतजाम भी किया है l
इन होटलों को देखकर मुझे भूले – बिसरे अलीबाबा , मरजीना याद हो आए l
नीचे शो रूम और रेस्तरां के आगे एक -एक आड़ू का पेड़ देखकर हैरानी हुई जिसमें आड़ू भी लगे थे l यह पेड़ कितनी मुश्किलों से लगाए और जिलाए गए होंगे सोचकर मैं पेड़ लगाने वाले की जिजीविषा पर कुर्बान हुई l
अरबोरियो / तुर्किश या रिसेटो वाले चावल भरे बैंगन , टमाटर , ब्रेड , ग्रिल सब्जी , चीज , मक्खन हमें अब रात्रि को तो बिल्कुल भी खाने का मन नहीं था l ( तुर्किश कुजीन के बारे में डिटेल्स पुस्तक में लिखा जायेगा )
हमारे होटल ने हमें एक भारतीय रेस्तरां सुझाया ; जो एक किलोमीटर दूर था l
‘ India Gate Restaurant ‘
वाव ! टर्की में अपने देश का नाम देखकर मन कितना मुदित था बता नहीं सकती !
पिछले चार दिनों से भारतीय भोजन न मिलने से पैदा हुई भुखान अब चरम पर थी l
रेस्तरां पर्यटकों से भरा था , कुछ फ़्रेंच पर्यटक समोसा ऑर्डर कर रहे थे कुछ मुंह पानी के बताशों से भरे थे l
एक युवा हिंदी बोलते आया l मेरे मुंह से निकला ‘ ये हिंदी कौन बोल रहा ! ‘
“मैं बोला मैम ” कहता हुआ वह युवक सामने था l
भोजन का ऑर्डर देना छोड़ जैसे बिछड़े भाई से मिली होंगी मैं ; पूछा –
‘इंडिया से हो ? ‘
“नो मैम अफगानिस्तान से ”
‘ फिर इतनी हिंदी कैसे आती ?’ चौंकते हुए बोली l
“बोलते -बोलते आ गया ”
होटल का युवा मैनेजर और युवा लंबी लड़की प्रत्येक की टेबल पर व्यक्तिगत रूप से जाकर मेन्यू देख रहे थे साथ ही उनकी रेस रेस्तरां के किचन की ओर भी जारी थी l
पूछने पर पता चला लड़की तुर्किस्तान की थी और लड़का लद्दाख का ! दोनों यहां के विश्वविद्यालय से ‘ इंटरनेशनल रिलेशन ‘ में पी एच डी कर रहे थे ; फिर क्या था सामान्यतया कम बोलने वाले मेरे पतिदेव को टॉपिक मिल पड़ा और उन्होंने दोनों बच्चों की लगभग क्लास ही ले ली l दोनों बच्चे खुश दिखे , लड़का तो हिंदी बढ़िया जानता था पर लड़की केवल इंग्लिश बोल रही थी l
उस दिन दालचीनी की खुशबू से सराबोर हिंदुस्तानी भोजन खाया गया और तृप्त होकर बाहर निकले l
सामने नुक्कड़ पर एक बच्चा आइसक्रीम पार्लर लगाए हुए था l
मुझे तुर्किश तरीके से आइसक्रीम सर्व करने वाले पर बड़ी कोफ्त होती है पर हमने उस युवक को तुर्किश तरीके का ललचाता क़ायदा देर तक पेश नहीं करने दिया | चटचटी/ शाद जैसी चिपकने वाली ; कम क्रीमी आइसक्रीम ठंड में शौक से खाई गई l
किशोर उम्र का बच्चा मेरी दीदी की बिंदी देखकर माधुरी दीक्षित और हिंदी फ़िल्मों का जिक्र करने लगा और प्रसन्न दिखा l
पैदल चलते हम होटल वापस आ गए l
कपाडोसिया -३ गतांक से आगे
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सांझ हल्की बारिश थी , रात्रि भी बादल छाए थे l हल्की बूंदा – बांदी अभी भी थी l
हमारे होटल के मैनेजर ने बताया कि कई बार हॉट बलून राइड कैंसिल भी हो जाती है और दो दिन से बलून  फ्लाइट्स कैंसिल हुईं थीं l
यह सुनकर आकाश के काले बादल हम सबके चेहरों पर उदासी बन उमड़ आए l हे भगवान ! हमारा अब इतनी दूर आना यूं ही जाया न हो !
हम कल के आने वाले मौसम की चमकीली धूप की कामना करते हुए सो गए l सुबह पाँच बजे गाड़ी आने वाली थी l
अगले दिन अल्लसुबह  हम सब ग्रीन टी पीकर तैयार थे l
Thank God ! आज के दिन के लिए !
हमारी उत्सुकता बढ़ाते हुए गाड़ी हमें दाहिनी ओर मेन सड़क से होकर ले गई l अब गाड़ी ने फिर दाहिने रूखे मैदान वाला ऊबड़ खाबड़ रास्ता पकड़ लिया और तीन – चार किलोमीटर बाद गाड़ी उन मंदिर जैसी चट्टानों से घिरे बड़े मैदानी भाग में खड़ी हो गई l
हाय ! कितना अच्छा लग रहा ! जैसे महालक्ष्मी वाली अमावस्या वाली रात्रि !
प्रकाश से भरी कंदीले मैदान में यत्र – तत्र बिखरी हुई थीं l
उजास अभी दूर थी , हमारा गैस गुब्बारे वाला ; हमारा ही इन्तजार कर रहा था l
इतने बड़े ! हमने जलते – बुझते गुब्बारों के बीच गुब्बारों को देखा l
ये हमारी कल्पना से बहुत बड़े थे l
करीब चार फीट ऊंची और सोलह -चौदह फीट लम्बी फाइबर केन से बनी बास्केट मुसाफिरों के स्वागत में तैनात थी l
उसकी दीवारों पर पैर रखने के लिए खांचे बने थे और एक पोर्टेबल सीढ़ी भी थी l बास्केट के ऊपरी किनारों के हिस्से पर रेगजीन या लैदर की चौड़ी कवर्ड पाइपिंग थी l
हम सब संतुलन बनाकर बास्केट में खड़े हो गए l
पर्यटकों में अधिकतर पचास से अधिक उम्र के थे, कुछ ही युवा जोड़े थे l
हम लोगो के शरीर उत्सुकता और नई सवारी के मोह में जैसे फूल जितने हल्के हो गए थे , हड्डियों का दर्द छूमंतर था , घुटने – एंकल की चसक दूर थी , एक नई स्फूर्ति के चलते सब उस बास्केट में सवार हो गए l
बास्केट के केंद्र में दो चमकीले स्टील जैसे गैस सिलेंडर थे l रस्सियों के सहारे गुब्बारा तना हुआ था l गैस सिलेंडरों को नेवी ब्लू यूनिफॉर्म पहने हुए दो व्यक्ति बार – बार लाइटर द्वारा जला रहे थे जिससे बड़ी सी लौ भरभराती हुई आवाज़ के साथ निकलती और गुब्बारा थोड़ा – थोड़ा मूवमेंट करने लगा l
इससे पहले कि गुब्बारा उड़ता ; दोनों पायलट्स ने बास्केट में सवार यात्रियों को अपने परिचय के साथ कुछ आवश्यक निर्देश दिए l
इन निर्देशों में महत्वपूर्ण निर्देश था कि लैंडिंग के वक्त पैनिक नहीं होना है l अगर हवा के रुख़ से गुब्बारे का संतुलन बिगड़ा तो हमें किस ओर को झुकना है l
हमें भय तो जरा भी नहीं लगा पर उत्सुकता मिश्रित हर्ष हिलोरें लेने लगा l
मैं और मेरी बहन की नजरें मोबाइल पर थीं और कान पायलट द्वय लेवेंट , एमरे के निर्देशों को सुन रहे थे l
दूर जमीन पर पसरे , कुछ टेक- ऑफ करते गुब्बारों की तस्वीरें खींच ली गईं l
भरभराते लौ के शोर , जलती लौ की गर्माहट के बीच गुब्बारा उड़ चला l जब लौ तेज होती गुब्बारा तेजी से ऊपर उड़ता l
कई बार ऐसा लगता कि गुब्बारा स्थिर है l
अब भोर की उजास से सम्पूर्ण वातावरण आच्छादित था , दूर ऊपर दाएं क्षितिज पर सूर्यदेव के प्रकट होने से पहले की आभा थी l
कपाडोसिया ; गोरीम का यह हिस्सा सैकड़ों बलूनों की उड़ान से भरा था l
किंग , डिजनी , क्वीन , सुल्तान , रॉकी , सेनेम , गुल , फतूश , जान कई गुब्बारों के नामों को मैं पढ़ रही थी l
ऐमरे , लेवेंट का वायरलेस पर वार्तालाप जारी था l
कपाडोसिया की यह घाटी अभी गुब्बारोंनुमा पुष्पों से शोभायमान थी l गुब्बारे घाटी की सैर कराते हुए आबादी वाली जगह के ऊपर से गुजर रहे थे , आश्चर्य कि हर गुब्बारे का अपना निश्चित रास्ता था l
नीचे घाटी पर गाड़ियों , सड़कों , चट्टानों और गुब्बारों के मनमोहक दृश्य दिख रहे थे l
मैं दूर क्षितिज पर सूर्यदेव के उगने के दृश्य को लेकर प्रतीक्षा में थी पर वहां लंबी रेखा में झीने बादलों के गुच्छेदार पर्दे पड़े थे l
करीब एक घंटा घाटी के ऊपर निश्चित ऊंचाई में उड़ने और सैर कराने के बाद गुब्बारा अब धरा पर उतरने की मंशा में था l
पायलट ने फिर निर्देश दोहराए l
गुब्बारा नीचे उतरने लगा l धरती से जब इसकी ऊंचाई करीब तीस फीट रह गई थी तो नीचे चार सहायक पहियों वाली ट्रॉली खींचते दिखे l
ओह ! गुब्बारे की सवारी के उत्साह ने मेरा ध्यान भटका दिया था , पहले नोटिस नहीं किया कि हमारी बास्केट किस पर खड़ी थी l
जैसे प्लेन लैंड करने से पहले छोटे – छोटे पर मजबूत पहिए अपनी बॉडी से बाहर निकालता है वैसे ही गुब्बारों से बड़ी मोटी चार सिंथेटिक रस्सियां झूलने लगी और गुब्बारे की लैंडिंग प्रक्रिया शुरु हो गई l
नीचे कुछ सहायक लकड़ी , स्टील की बॉडी वाली ट्रॉली की पोजिशन देख रहे थे कुछ ने गुब्बारों से निकली रस्सियों को खींच कर संतुलन और लैंडिंग को आसान किया और गैस की लौ से ऊंचाई चढ़ता जो गुब्बारा शान से उड़ रहा था वह अब गैस से वंचित होकर थके योद्धा की भांति पिचक कर एक ओर गिर पड़ा l
चार मुस्तैद जन रस्सियों में चटपट गुब्बारे को लपेटने लगे l चालीस -पचास फीट या इससे भी अधिक ऊंचा लंबा – चौड़ा गुब्बारा अब रस्सियों में कैद होकर तह बनने की प्रक्रिया में था l
इस गुब्बारे का कपड़ा शायद पैराशूट जैसे कपड़े का रहा होगा l
हमारी बास्केट ट्रॉली में लैंड कर गई थी l उतरने की प्रक्रिया के बाद एक पायलट ने सावधान होकर सफलतापूर्वक कुछ भाषण सा दियाl
यह गैस बलून उड़ाने की परंपरा फ्रांस से शुरु हुई थी और कालांतर में यूरोप होते हुए पूरे विश्व में फैल गई l
टर्की ने इस रूखी घाटी को गुब्बारों के लिए संरक्षित कर ख़ास बना दिया है l
पायलट ने मुस्कुराते हुए कुछ कहा , यानी अब शैम्पेन सेरेमनी की बारी थी l
इस गैस गुब्बारे के इतिहास पर लेवेंट ने एक छोटी जानकारी देकर इतिश्री की और सहायकों ने तुरंत एक छोटे टेबल पर सुंदर कढ़ाई वाला टेबलक्लॉथ बिछाकर चमचमाते स्टेम ग्लासेज सजा दिए l
जिनको शैम्पेन पीनी थी उनकी तो बांछे खिल गई l
इतनी सुबह शैंपेन !
खुद के लिए नहीं तो पायलेट की सफलतापूर्वक उड़ान के लिए पी लो मुसाफिरों !
अधिकतर मुसाफिरों ने एक घूंट में ही वह हल्के पीले रंग का बुलबुलों वाला ड्रिंक गटका लिया l
न – न ! पीठ लौटाकर ऐसे नहीं जाना है ! मुझे जैसा ऐसा ही लगा l
दूसरे पायलट ने खाली हुए एक ग्लास में टर्किश लीरा के नोट डाले यानी !!
हां ; अब बाकी सवारियों ने भी कुछ – कुछ लीरा नोट ग्लासेज में डाले l
टिप लेने का उनका यह आइडिया यूनीक था l
मैंने तुंरत ग्लासेज गिने , करीब छब्बीस ग्लासेज थे l
पता है हम कितने लोग थे बास्केट में !! छब्बीस !
मैंने सद्य: प्राप्त अपना सामान्य ज्ञान का प्रसार किया l
” नहीं अट्ठाईस लोग थे , दो पायलट भी तो थे l”
बहन के हस्बैंड ने मुझे तुरन्त करेक्ट किया l
ओह ; थैंक यू l
एक बार फिर ठंडी फिजा में बिखरी गर्म गैसों की रंगीन कंदीलों के इस उत्सव को जी भर निहारकर हमने वापस गाड़ी की राह ली l
रात्रि हमारे होटल के मैनेजर ने बताया कि आज पूरे १६५ बलून कपाडोसिया के आकाश पर थे जबकि मुझे इनकी संख्या अधिक लगी l
( भारत में कर्नाटक , गुजरात में यह एडवेंचर सुविधा है l बाकी जगह तलाश कर पाठक अपने मालूमात से मुझे भी समृद्ध करें ! वीडियो और चित्र मेरे और बहन के लिए हुए हैं l )
आप सब पाठकों के जल्द ही यात्रा पर जाने की शुभेच्छा के साथ –

प्रतिभा अधिकारी
कुछ मासिक पत्रिकाओं में छपे कथेतर , दैनिक भास्कर की पत्रिका ‘अहा जिन्दगी ‘ में कुछ कथेतर, गोरखपुर से संपादित पत्रिका में कवितायें , ‘ जीवन बुनने में ‘ गढ़वाल से निकली पत्रिका में कवितायें |
लेखक – यात्रा किताबें
हिमालय से ऐल्प्स तक [ कुमाऊं और यूरोप यात्रा ] ओ मरिया पिताशे [ गोवा यात्रा ] पिटारी [ कथेतर संकलन ]
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1 टिप्पणी

  1. प्रतिभा अधिकारी जी का जीवन्त यात्रा वर्णन बहुत पसन्द आया।मानो भारत में रहते हुए आपके साथ टर्की घूमने का आनन्द मिल गया। शुक्रिया आपका। भी

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