Wednesday, June 12, 2024
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वन्दना यादव का स्तंभ ‘मन के दस्तावेज़’ – हे जल, तुम जीवन

तुम, सबके अपने। अतिथि सत्कार किए तुमसे। भोग का भैरवी राग भी तुम। कन्यादान किए तुमसे, डोली की विदा भी तुम। चरण-पथार तुम्हीं से, माथे कुमकुम का श्रृंगार भी तुम। स्वागत-जल में तुम अपने, पराए हुए  तब ना पूछा पानी भी। दावत की शान, तुम्हें हर रंग में ढ़ाले हुए। मोती का पानी तुम, आँख की लाज-हया-शर्म तुमसे। कामगारों के भोजन से उठते पसीने की महक तुम। धरती का तीन भाग तुम, और देह का बस तीन ही भाग छूटा तुमसे। 

पानी, जल, नीर, उदक, तोय, सारंग, तेरे कितने नाम, कितने रंग और ना जाने कितने ही रूप। तेरे बिन सृष्टि की कल्पना असंभव।  जीवन की परिभाषा अर्थहीन। तुम जीवन,  परिश्रम, तपस्या-त्याग और समर्पण भी तुम्हीं। वेदना भी तुम, और तुम ही खुशी। तुम अपने भी, पराए भी। तुम ही आदि, तुम्हीं अंत। तुम निर्जन, तुम ही आगत-स्वागत और दावत। किस स्वरूप में देखूं, हर रूप तेरा फैला हुआ है चारों ओर जिसके नाम अनेक और क्षेत्र, सीमाओं से परे। हर क़तरे का वजूद तुम, मगर अपना स्वरूप नगण्य। 
पानी, तुम बादल से गिरे, हुए बरसात। ठहरे पोखर में, बने तालाब। फैले विस्तृत, बने सागर। चल पड़े निरंतर, बन कर नदिया। पीने को मिले, हुए अमृत और आँखों से गिरे, खारे आंसू। 
तुम हर रूप-रंग में साथ मेरे। रंगहीन तुम मगर हर रंग में मिल जाते। खुशी के रंग में शर्बत, दुख का सादा पानी, उदास शामों के गर्म साथी। चाय-कॉफी, दूध भी तुम। बाल घुट्टी का चीनी-पानी, मोक्ष प्राप्ती का गंगा जल अमृत। पानी, तुम हर क्षण जीवन और मृत्यु पर्यन्त बैतरणी नदि।
तुम, सबके अपने। अतिथि सत्कार किए तुमसे। भोग का भैरवी राग भी तुम। कन्यादान किए तुमसे, डोली की विदा भी तुम। चरण-पथार तुम्हीं से, माथे कुमकुम का श्रृंगार भी तुम। स्वागत-जल में तुम अपने, पराए हुए  तब ना पूछा पानी भी। दावत की शान, तुम्हें हर रंग में ढ़ाले हुए। मोती का पानी तुम, आँख की लाज-हया-शर्म तुमसे। कामगारों के भोजन से उठते पसीने की महक तुम। धरती का तीन भाग तुम, और देह का बस तीन ही भाग छूटा तुमसे। 
सृष्टि का आदि भी तुम और अंत भी तुमसे। प्रथम अंकुर का प्रमाण तुम्हीं। विनाश ज्वाला का सागर भी तुम। हे जल,  तुम विस्तृत अनंत। तुम मानव के श्रेष्ठ गुरू जो अनथक बढ़ता चलता नदिया में। दुर्गम पर्वत शिखाओं से गिरा, तीव्र धार बन। बह जाता हिम शिखरों से, विशाल शिलाएं लिए। तुम प्रेरणा जीवन की, निरंतर बढ़ते रहने का मर्म तुम में।
सुख-भोग का त्याग कर निर्जन वन हो या मरूभूमि, बढ़ते रहना हर क्षण आगे। भयमुक्ती का पाठ, तुझसे ही सीखा मानव ने। तुमने सीख दी शत्रु को अपनाने की, प्रेम में गौण हो जाने की। एक देश की बेटी नदिया बन, तृप्त करती दूसरे देश को, यह महानता भी सीखी तुझसे। भूमि के टुकड़े पर लड़ते दो शत्रु देशों के बीच, तुम फैले शांतिस्वरूप। जल, तुम महान गुरू, त्यागी, तपस्वी और जीवन आधार भी तुम ही।
नीर, तुम हर क्षण घेरे रहते ब्रम्हांड। तुम से सीखा समर्पण। दूध में मिले, धवल हुए।  रक्त में, रंजित लाल। दवा में घुल अमृत बने, मिले सागर में हुए कड़वे, बेहाल। जिस से मिले, आत्मसात कर लिए उसके गुण। जीवन का सार – समर्पण है, तुमसे जाना।
“कीलालं” – एक और रंग जीवन का – क्रोध। जब बिगड़े, बने बाढ, सुनामी, तूफान कभी चक्रवात। तुम इस रूप में भी शिक्षक हो, शांति के प्रेरणा स्त्रोत। विनाश का प्रमाण तुम्हीं से। वीभत्स रूप समक्ष। तुम उग्र रूप – लीलने को आतुर संपूर्ण सृष्टि। इतने पर भी, तासीर शांत। 
आकाश की आशा तुम, धरती पर गिरे बन बरसात मगर जब ह्रदय लगे आघात, मन पिघल उठे बन आंसू और जब छा जाए खुशी बेशुमार, झड़ी लगे सावन-सी आँखों में – झनक उठे मल्हार। 
जल, तुम जीवन, सखा, माता-पिता तुम।  तुम्हीं सृष्टि, तुम कोमल, कठोर भी तुम ही। क्रोध भयंकर तुम। कोमल और सुंदरता भी तुम। जीवन का हर स्वरूप तुम में। सब रंग और सारे रस-श्रृंगार भी तुमसे। हे जल, तुम जीवन और जीवन, तुम ही जल! रस – श्रृंगार सलिल!
वन्दना यादव
वन्दना यादव
चर्चित लेखिका. संपर्क - yvandana184@gmail.com
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