Wednesday, May 22, 2024
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वन्दना यादव का स्तंभ ‘मन के दस्तावेज़’ – बरखा बहार आई

बरसात अपने साथ अलग-सा जोश ले कर आती है। निराशा के बादल छंट जाते हैं और ऐसा होते ही आशा की, उम्मीद की फुहारें तन-मन भिगोने लगती हैं।
असल में पिछली बरसातों को बीते इतना वक्त बीत चुका होता है कि गर्मी झेलते हुए तमाम नदी-नाले और पोखर-तालाब सूखने लगते हैं। जीवन की सिंचित करते जलस्त्रोत अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे होते हैं। एक-एक दिन किसी तपस्या-सा गुजरता है और अंतत: जब आकाश में काले-काले बादल उमड़-घुमड़ कर धरती की प्यास बुझाने आते हैं, निराशा की जगह आशा जाग उठती हो। यक़ीन होने लगता है कि कठिन समय बीत गया है।
इस बार भी बरखा, अपने साथ बहार का संदेश लाई है। कहना होगा कि जीवन का कठिन समय बीत गया है। उम्मीदों के दिन आ गए हैं। जितनी मेहनत की थी, उसके धरती से बीज बन कर अंकुरित होने का समय आ गया है। बंजर धरती को खेती योग्य बनाने में आपने जो पसीना बहाया था, वह थकान, नन्हें अंकुर को देखते ही मिट जाएगी। बरसात से मिलने वाली नमी से जल्द ही पौधा बढ़ेगा। फलने-फूलने लगेगा। परिश्रम का परिणाम मिलने की उम्मीद बंधने लगेगी। इसीलिए जब समय कठोर हो, उन दिनों सही समय आने के इंतज़ार में हाथ पर हाथ धरे बैठे ना रहें। ऐसे में अन्न उपजाने वाले किसान को अपना गुरू मान लें। वह तपती गर्मियों में पत्थर हो चुकी धरती पर फावड़ा चलाता है। वह ऐसे कठिन समय में धरती की गुडाई, निराई करता है जिससे सही समय आते ही बिजाई कर सके। इससे उलट चींटियों को देखिए, वे वर्ष भर बारिशों के मौसम के लिए भोजन जोड़ती हैं। अपना जीवन सुचारू रूप से चलाने के लिए वे पूरे वर्ष मेहनत करती हैं।
आप भी अपने जीवन के किसान बनिए जो कठोर मेहनत करते हुए जीवन की अपनी पसंद की फसल काटने की तैयारी करने का मन बना चुका है। मेहनत करते हुए अपना मनोबल बनाए रखें। थकान को दूर भगाने के लिए कुछ गुनगुनाइए। ऐसे तन-मन भिगोने वाले दिनों के लिए सलिल चौधरी का लिखा गीत, “ओ सजना बरखा बहार आई, नैनों में प्यार लाई…” ज़रूर गुनगुनाइए। यक़ीन मानिए कि जीवनपथ आसान हो या ना हो मगर संगीतबद्ध होने के बाद आसान लगने लगता है।
वन्दना यादव
वन्दना यादव
चर्चित लेखिका. संपर्क - yvandana184@gmail.com
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