Wednesday, June 12, 2024
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वन्दना यादव का स्तंभ ‘मन के दस्तावेज़’ – क्या हार मान ले कलमकार ?

उठाओ अपनी गांडीव सम कलम, और रचना शुरू करो। जीवन सीमित है। सांसें गिनती की हैं, सब तरह के उहापोह से बाहर निकल कर, वो करो जिसे करने का निर्णय लिया था तुमने। लेखन किसी का थोपा हुआ चरित्र नहीं है, जिसे जी रहे हो तुम। इसे तुमने चुना था। अपने निर्णय से अब पलायन कैसा? ना लिखने का इरादा किस लिए? 

भावनाओं की अधिकता संवेदनशील मन से कलम पकड़वा देती है। कभी-कभी यही भावनाएं, रचनाकार की संवेदनशीलता को ठिठक जाने पर मजबूर कर देती है। उसके चलते हाथों को, मन के तारों को, बाँध भी देती है। यह सब निर्भर करता है घटनाओं के घटते-बढ़ते चक्रव्यूह पर, कि कौनसा तार छिड़ जाए वीणा का और सुर फूट पड़ें झनकार के, सुख-सागर के, वृहद चित्कार के।
कभी-कभी भावों की अधिकता मन के छिपे कोण में, बोल पैदा कर देती है। शब्दों के आकार उभरने लगते हैं। छोटे-छोटे से लगने वाले शब्द, वाक्यों का रूप धर, चिंतन को गहराई देने लगते हैं। देखते ही देखते शब्दों के समूह, रचना प्रक्रिया से गुज़रते हुए साहित्य का वृहद समंदर बन कर उभरने लगते हैं। मगर यही शब्द सरिता, भावों के खेल में क्यों कभी इस कदर आल्हादित हो उठती है कि उमड़ने लगता है तूफान सीने में, उबाल लेने लगता है ज्वालामुखी। मगर हर दर्द बसा रहता है सीने में। एक कतरा लावा भी नहीं फूटता धरती पर, ना ही नम होती हैं आँखें और ना ही रंग पाता है, कागज का कलेजा स्याही से। बस सीने में सुलगती रहती हैं लपटें, धूंआ-धूंआ हो जाता है यक़ीन। स्याह चादर ओढ़ कर बैठ जाता है भरोसे का बदन। जब बहुत कुछ उठ-उठ कर गिरता है हर बार, और जो कहना चाहते हुए भी जुबां चिपक जाए तालू से। जोहरी पढ़ सकें ज़ुबान आँखों की मगर शब्द साथ छोड़ दें, ऐसे में क्या करें? कलम हाथ में लेकर जब ना बरसें आँखें, ना फूटें बोल कलम से और ना ही निकलें शब्द ह्रदय से, तब क्या हार मान ले कलमकार? 
नहीं, इसके लिए तो नहीं उठाई थी ना कलम। जब पहली बार बगावत की थी चुप्पी साधने से और अपने विचारों को आवाज़ देने का निर्णय लिया था, तब रूक जाने का तो नहीं सोचा था ना! फिर, अब थकान कैसी? रूकना किस के लिए? भीतर जमीं खामोश को तोड़ने से परहेज कैसा?
उठाओ अपनी गांडीव सम कलम, और रचना शुरू करो। जीवन सीमित है। सांसें गिनती की हैं, सब तरह के उहापोह से बाहर निकल कर, वो करो जिसे करने का निर्णय लिया था तुमने। लेखन किसी का थोपा हुआ चरित्र नहीं है, जिसे जी रहे हो तुम। इसे तुमने चुना था। अपने निर्णय से अब पलायन कैसा? ना लिखने का इरादा किस लिए? 
उठो, अपने निर्णय पर अडिग रहना ही एकमात्र उपाय है तुम्हारे पास। कलम उठाओ, और नया रचो। कुछ अद्भुत जो सिर्फ तुम जानते हो, उसे अपने तक रखने का अधिकार नहीं है तुम्हें। जो इस वक्त तुम्हारा है, उसे लिख दो जिससे वह सबका हो जाए। जब तुम्हारा लिखा हुआ, पाठकों को अपना लगने लगेगा, उस पल तुम्हें जो सुकून मिलेगा, वह अवर्णनीय होगा। गर्व कर सकोगे तुम अपने विचारों पर, लेखनी पर। खुद को सुख और शांती देने से तुम अपने आप को रोक नहीं सकते, इसीलिए उठो और कागज-कलम, मोबाईल या लैपटॉप जो तुम्हें सुगम लगता है, उसकी ओर  हाथ बढ़ाओ। जो साधन रूचिकर लगता है, उसे माध्यम बना कर लिखो। ख़ूब लिखो, जब तक तुम्हारे पास कुछ नया कहने को है, कहते रहो, लिखते रहो।
वन्दना यादव
वन्दना यादव
चर्चित लेखिका. संपर्क - yvandana184@gmail.com
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5 टिप्पणी

  1. वाकई सराहनीय व प्रेरणादायक लेख। वन्दना जी को अनेक साधुवाद। मन के कोने कोने में उत्साह संचार करने वाला लेख।

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