पूनम झा की लघुकथा – डाकिया

"अजी ओ टिल्लू के बाबू, आप रोज जो ई वर्दी पहिन के अपने काम पे जावत हो। अब त मोबाइले से सब बात हो जावत है । सो चिट्ठी-पत्री तो अब बंदे हो गईल, तो दिन भर तुम का करत हो ? हमका त...

वंदना पाण्डेय की लघुकथा – अघोरी

मेरे कस्बे के बाहर अभी कुछ दिनों से एक अघोरी धूनी रमा रहा था..। वेशभूषा वही....सर पर जटाएँ... नेत्र जैसे दो सुर्ख अंगारे चेहरे पर जड़े हों....पूरे शरीर में राख का लेप, हाथ में एक डंडा और गले में लटकी हुयी इंसान की खोपड़ी.... लोग...

हरदीप सबरवाल की लघुकथा – अपने अपने भ्रमण

यूं दिन तो था किसी बुजुर्ग की अंतिम अरदास और भोग का, पर अलग-अलग शहरों में बसे उन ममेरे, मौसेरे भाई बहनों के वर्षों बाद मिलने का भी मौका या उत्सव था, ज्यादातर सब एक दूसरे से कटे हुए, या यदा कदा फोन पर...

कामिनी गुप्ता की दो लघुकथाएँ

1 - किलेबंदी एक बार रियासत में कुछ अराजक तत्वों ने राजा को कमज़ोर करने और हटाने के मकसद से राजा के खिलाफ विद्रोह का माहौल बनाने का विचार किया। उन्हें कोई ऐसी बात नहीं मिल रही थी जिसके जरिए वो अपने मकसद को पूरा कर...

उषा साहू की लघुकथा – सा’ब

इंट्रो यह ब्रिटिश के जमाने की कहानी है ।  उन दिनों  भारतीय मातहतों के साथ पशुतुल्य  सलूक किया जाता था । इनके जमीर को चकनाचूर करके रख दिया जाता था ।  मातहत भी इनकी गुलामी करने को अभिशप्त थे । लेकिन कभी न कभी उनका...

बालकृष्ण गुप्ता ‘गुरु’ की दो लघुकथाएँ

परछाईं सीमा की ओर प्रस्थान करने को आतुर फौजी पिता की गोद में चढ़ते हुए बेटे ने कहा, ‘पापा, मैं भी आपके साथ जाऊंगा।’ ‘नहीं बेटे नहीं। अभी तुम्हारे खेलने-खाने के दिन हैं।’ ‘पापा, मम्मी अपनी सहेलियों को बता रही थी, ‘आप दुश्मनों के खून की होली...