नीना सिन्हा की दो लघुकथाएँ

1 - जीवन की डगर “बाल सखा विवेक की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाए और  इंतजार करते हमें लगभग साढ़े तीन वर्ष हो गए हैं, रुचिका! कठोर शब्दों के लिए क्षमा चाहता हूँ - या तो वह स्वेच्छापूर्वक कहीं चला गया है, या उसके साथ कुछ...

उर्वी वानिया सिंह की लघुकथा – समझदारी

आज शाम छत पर ठहल थे हुए मैंने देखा  कि मस्जिद से पंछी आकर हमारी छत पर बैठ गया और वहाँ पंछियो के लिए रखे गए पानी से पानी पीने लगा। वहाँ पहले से एक पंछी बैठा था। उसने आगन्तुक पंछी से बोला, "तुम कहाँ से...

बालकृष्ण गुप्ता ‘गुरु’ की दो लघुकथाएँ

1 - बच्चे, बम, बर्बाद  पता नहीं कहाँ से आकर कौओं ने काँव-काँव कर कहा, “उठ जाओ, उठ जाओ।” पत्नी ने प्यार से कहा, “चाय पीकर फ्रेश हो जाओ।” कड़ी-मीठी चाय पता नहीं क्यों बेहद कड़वी लगी। टीवी ऑन किया, तो युद्ध में कूदे देशों...

दिलीप कुमार की लघुकथा – चल भाग यहाँ से

"चल, भाग यहाँ से “ “चल, भाग यहां से “ जैसे ही उसने सुना ,वो अपनी जगह से थोड़ी दूर खिसक गयी।वहीं से उसने इस बात पर गौर किया कि भंडारा खत्म हो चुका था। बचा -खुचा सामान भंडार गृह में रखा जा चुका था...

रेखा श्रीवास्तव की लघुकथा – उजड़ा चमन

 "अरे ! ये क्या? कहीं भी हरियाली नहीं ।" मन एक बार उजड़े पहाड़ों को देखकर विचलित हो गया।     "कहाँ गई वो रौनक , श्रद्धा से भरी भीड़ भाड़ और रोशनी से जगमगाता छोटा सा बाजार।" मन स्वीकार ही नहीं कर पा रहा...

डॉ. पद्मावती की लघुकथा – शंका

गणेश उत्सव की तैयारियाँ चल रही थी । वह भगवान की मूर्तियाँ बनाता था ।मिट्टी की मूर्तियों में जान फूंक देता था। आज अचानक मूर्ति पर काम करते हुए उसके हाथ रुक गए। एक प्रश्न कुछ दिन से मन मन को मथ रहा था। आज पूछ ही डाला ! “सुनो…कुछ कहना है…देखो न !” “आँखें तुमने अभी नहीं बना यी ।केवल सुन सकता हूँ ,क्या समस्या है तुम्हारी ?” “सोचता हूँ… कह दूँ या नहीं ! कह दूँ क्या?” “अवश्य !” “शंका है छोटी सी “। “हाँ ।हाँ ,कहो निःसंकोच ।” “बुरा न मानोगे? सजा तो न दोगे?” “इतना विश्वास है मुझ पर तो सजा कैसी?” “ठीक है …तो बताओ ..क्या तुमने मुझे बनाया या मैं तुम्हें बना रहा हूँ?” “तुम्हारा मन क्या कहता है?” “मन कहता है तुमने मुझे बनाया और बुद्धि कहती है कि मैं तुम्हें बना रहा हूँ। शंका का...