सुर ..एक अनचाही लड़की का सफ़र- लेखिका नीलिमा शर्मा, प्रकाशक- शिवना प्रकाशन
समीक्षा – ज्योत्सना कपिल, मूल्य – 400 रुपये
एक सशक्त कहानीकार के रूप में नीलिमा जी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। नीलिमा जी से परिचय तो ग्यारह बरस पुराना हो चुका है और उन्हें पढ़ा भी खूब है। उनकी कलम की मैं प्रशंसक हूँ। कई बेहतरीन कहानियाँ उनकी कलम द्वारा रची गई हैं, बुनी गई हैं। ऐसे में उनके सद्य प्रकाशित उपन्यास ‘सुर’ के विषय में सूचना मिली तो उसके प्रति दिलचस्पी होना लाज़मी था। इस उपन्यास का प्रकाशन शिवना प्रकाशन द्वारा किया गया है। मुखपृष्ठ बहुत कलात्मक है। गहरे नीले रंग की बेकग्राउंड उसमें बने चेहरे। गहरा नीला रंग प्रतीक है ध्यान का और उसमें उकेरे चेहरे बहुत कुछ कहते हैं। जब एक बार आप ध्यान की अवस्था में चले जाते हैं तो पूरा संसार पारदर्शी हो उठता है और आपको सब कुछ एकदम स्पष्ट नज़र आने लगता है।
उपन्यास का शीर्षक सुनकर एकबारगी लगता है कि शायद इसकी कहानी में सुरों की, संगीत की बात होगी, परन्तु जब पढ़ना शुरू किया तो मालूम हुआ कि ‘सुर’ नायिका का नाम है। यह एक ऐसी लड़की के जीवन और उसके संघर्षों की दास्तान है, जिसका जन्म उसकी अपनी माँ के लिए अनचाहा था। जो पहले तो गर्भधारण के लिए ही तैयार नहीं थी और फिर उसके गर्भ से एक पुत्री का जन्म लेना उसके लिए सारे अरमानों का राख हो जाना ही था। उसकी माँ नीता एक ऐसे परिवार में पली- बढ़ी थी, जहाँ लड़की का होना एक अभिशाप के समान था। ऐसे में नीता की मानसिकता भी यही बन गई थी कि पुत्री परिवार के लिए बोझ होती है। उसके जन्म लेने का अर्थ है माता- पिता के लिए सारी उम्र बस उसके दहेज़ के इंतज़ाम में खपा देना।
कहानी की शुरुआत होती है सुर के लेबर पेन से। वह घर में बिलकुल अकेली है, उसके गर्भ का आठवाँ महीना चल रहा है। ऐसे में वह थोड़ी निश्चिन्त थी कि अभी प्रसव होने में समय है। परन्तु तभी उसकी तबियत बिगड़ने लगती है। पहले तो वह अपने पति के घर आने की प्रतीक्षा करना चाहती है, परन्तु जब उसकी दशा अधिक बिगड़ जाती है तो पड़ोस में रहने वाले, पति के ताया जी और ताई जी उसे लेकर हॉस्पिटल भागते हैं। ऑपरेशन थिएटर में सुर को महसूस होता है कि जैसे उसकी चेतना उसकी देह का त्याग कर चुकी है। फिर उसके मस्तिष्क में अपने माता -पिता के विवाह, उसके जन्म और अब तक के कठिनाइयों भरे सारे जीवन की घटनाएं चलने लगती हैं। पढ़ते हुए एक बार लगता है कि अब सुर नहीं बचेगी। परन्तु अभी तो उसके हिस्से का संघर्ष बाकी था।
पूरी कहानी बहुत तनाव भरे माहौल में गुजरती है। कहानी के पात्रों की मनःस्थिति, उनकी सामाजिक, धार्मिक और मनोवैज्ञानिक दशा का विवरण बहुत सूक्ष्मता से किया गया है। उपन्यास की सारी घटनाएं पाठक को अपनी दृष्टि के समक्ष किसी चलचित्र की भांति चलती हुई महसूस होंगी। बारीक से बारीक विवरण बहुत सशक्त अंदाज में दिया गया है। पंजाबी की ढेरों कहावतें, सूक्तियों ने कथानक बहुत जीवंत अंदाज़ से प्रस्तुत किया है। इसे पढ़कर एक मध्यम वर्गीय पंजाबी परिवार की सोच, उसके पूर्वाग्रह से आपका परिचय बखूबी होता है। जब एक स्त्री गर्भवस्था में होती है तब उसका मानसिक रूप से शांत होना अत्यंत आवश्यक है। परन्तु अगर वह अशांत है, तनाव में है तो उसके क्या-क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं, यह इस कहानी को पढ़कर आप समझ सकते हैं। वह तनाव और चिंता उसके गर्भस्थ शिशु में कैसे शारीरिक एवं मानसिक विकार ला सकती है यह चिंतन ही सिहरन पैदा करता है। यह सभी कुछ लेखिका द्वारा बहुत कुशलतापूर्वक पिरोया गया है। भाषा परिस्थिति एवं पात्रानुकूल है। कहानी में प्रवाह बना रहा और कहीं भी अवरोध महसूस नहीं होता है। पात्र की मनोदशा के अनुसार पाठक उसके सुख -दुःख में डूबता उतराता है।
सवा दो सौ पेज की पुस्तक पढ़ते हुए कहीं भी पाठक ठहर नहीं पाएगा और उत्सुकता लगातार बनी रहेगी ऐसा मेरा दावा है। नायिका की परिस्थितियों से पाठक द्रवित हुए बिना नहीं रहेगा। कई जगह नायिका के साथ होने वाले अन्याय पर क्रोध भी बहुत आता है। फिर अपने मानसिक सुकून को हासिल करने के लिए सुर जो तरीका अख्तियार करती है वह पढ़कर तसल्ली महसूस होती है। उसका व्यक्तित्व एक बुद्धिमान एवं बहुत सुदृढ़ लड़की के रूप में विकसित हुआ है। कुल मिलाकर ‘सुर‘ एक रोचक, बेहतरीन और मनोवैज्ञानिक रूप से सफल कहानी बन पड़ी है। इसके सृजन के लिए मैं नीलिमा जी को बहुत बधाई एवं शुभकामनायें देती हूँ। मुझे विश्वास है कि इस कृति का साहित्य जगत में स्वागत एवं सराहना होगी। आगे भी आपसे ऐसे ही बेहतरीन लेखन की अपेक्षा रहेगी।
- ज्योत्स्ना ‘कपिल’
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