Monday, May 11, 2026
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  रेणुका अस्थाना की कहानी- हाथी

“बाबा, हाथी बहुत गंदा होता है ना” …अपनी बहुत सारी छोटी बड़ी गाड़ियों को एक दूसरे पर चढ़ाते, गिराते, टकराते रोहित ने बालू से पूछा जो डॉक्टर कार्तिक की लॉन की क्यारियों में गुलदाउदी के पौधे लगा रहा था ।

“नहीं बाबू , कौन बोला आपसे…हाथी काहे वास्ते गन्दा होता है ?” हाथ में पकड़े पौधों को बहुत ही कोमलता से मिट्टी में रोपते बालू ने हँस कर रोहित को पलट कर देखा ।

…वह सब को मारता है । पटक–पटक कर मारता है। “ रोहित ने अपनी गाड़ियों को एक दूसरे पर पटकते हुए समझाया। “ कल पापा आपको और मम्मी को बता रहे थे न कि एक रात सब्जी वाले चौराहे पर एक हाथी ने किसी आदमी को मारा था ।”

“दौड़ा–दौड़ा कर….अपने बड़े से पैर के नीचे… रोहित ने गाड़ी के साथ अपने शब्दों को भी खींचा था । बालू बच्चे को सुनता चुपचाप पौधा लगाता  रहा । बच्चा गाड़ियों को चलाता, भिड़ाता अपने में खुश होता रहा । इस तरह कुछ देर दोनों चुप थे, अपनी-अपनी दुनिया में ।

“ बाबा, हाथी क्यों सबको मारता है ?” अपनी सारी गाड़ियों को झूले पर फेंक बच्चा फिर से अपने प्रश्न के साथ लौट कर बालू के बगल में आकर बैठ गया । क्यारी से निकाली मिट्टी को मुट्ठी में भर कर लगा लड्डू बनाने ।

“ हाथी क्या सबको मारेगा बाबू …खिन्नता से उसने क्यारी की लाल मिट्टी  को देखा था । “ साला एक आदमी मरा तो इतना चिल्ला-चिल्ली (शोर-शराबा) जब बहुत हाथी मरे तब कुछ नहीं ? अजब बिधान है ठाकुर का … अपने आप में बोलता, बालू ने हाथ में पकड़े गुलदाउदी के पौधे के टुकड़े कर मिट्टी में गाड़ दिया ।

“ क्या बोले बाबा…क्या बोले आप ?” रोहित मिट्टी फेंक बालू के और पास खिसक आया ।

“ कुछ नहीं बाबू, तुम जा के खेलो । देखो, उंहा सारी गाड़ी उलटी पड़ी है ।”

“ नहीं, मैं नहीं जाऊँगा । पहले आप बताइए आप क्या बोले ? “

“ हम बोल रहा था कि हाथी काहे वास्ते कोई को मारेगा । ऊ बेचारा तो खुदै भूख से मर रहा है ….

“ तो खाना क्यों नही खाता ?”

“ जानते हो बाबा मेरी बुक में लिखा है – हाथी गन्ना खाता है । हरी-हरी पत्तियाँ खाता है …

“मिट्टी से उठो बाबू ।” बालू ने रोहित को मिट्टी से उठाते हुए कहा । चलो इहां से । ई सब बात अभी तुम्हारे समझ में नहीं आएगी । बच्चा हो तुम   बाबू । समझे ?” रोहित के कपड़े से मिट्टी झाड बालू ने उसे फिर से झूले पर बैठा दिया । “ तुम अब यहीं से बात करो नहीं तो ई साफ़-साफ़ कपड़ा गन्दा हो जाएगा और मम्मी…मारेगा तब ।”

“ बाबा, आपने हाथी देखा है ।“

बालू के चेहरे पर बच्चों सी चमक उभर आई “ हाँ बाबू देखा है… हाथी …. हाथी का बच्चा …सब देखा है … । बहुत अच्छा लगता है जब अपने छोटे – छोटे बच्चन को बड़ा-बड़ा हाथी चारो ओर से घेर कर झुण्ड में ले चलता है । बहुत छोटे बच्चा को तो अपने पैर के बीच में ले चलता है… बालू ने गले में लपेटा अंगौछा निकाल कर दोनों पैर के बीच में डाल कर चल कर दिखाया । रोहित हंसने लगा ।

“ वाह रे ठाकुर…अहा रे ठाकुर जी की लीला ?” खुद से बड़बड़ाते बालू ने आंख बंद कर दोनों हाथ आकाश की ओर उठा कर जोड़ लिए ।

“आपने बहुत सारे हाथी देखे ?” रोहित की ऑंखें आश्चर्य से फ़ैल गईं ।

“ हां बाबू, झुण्ड का झुण्ड ।”

“ हमने दो देखे। “ बच्चे ने अपनी दो उंगलियाँ उठा कर बालू को समझाया । बच्चे की उंगलियां देख बालू हँस पड़ा ।

“ हाथी कहाँ रहता….

“ जंगल में । वहीँ उसका थान …बाड़ी (घर) है । पौधों को उठाए वह अपनी क्यारी में पौधे लगाने लगा ।

…..नहीं वह चिड़ियाघर में भी रहता है । मैंने लखनऊ में देखा है । पापा के साथ मैं उसकी पीठ पर भी बैठा हूँ ।

“ ओ तो उसका घोर (घर) नहीं , उसका घोर तो जंगल में है जैसे आपका मुरादाबाद में। ” पौधों को लगाता बालू हँस रहा था ।

“ फिर जंगल से वो कैसे चौराहे पर आता है …ये जंगल है कहाँ। मैंने तो कभी नहीं देखा ?”

“ है बाबू । बहु…त दूर । ”

“ ओ पहाड़ देख रहे हो ….बालू ने झूले पर बैठे बच्चे को ऊँगली के इशारे से कई किलोमीटर तक फैले दलमा पहाड़ को दिखा कर समझाया “ ओ के पार जंगल है । बहुतै बड़ा जंगल । ”

“ अच्छा ! तो… वहाँ शेर ..स्टैग.. खरगोश ..ये सारे हैं ? ” और बच्चे ने अपने ढेर सारे प्रश्नों से बालू को भी छोटा बच्चा बना दिया । एक अबोध सा बच्चा जो नहीं जानता जंगल के बाहर का जीवन । नहीं समझता बौद्धिक समझदारी । जिसके भीतर, बहुत कुछ ख़तम होने के बाद आज भी बचपन का वह जंगल सांस ले रहा था जिसमें घने बांस, सागवान के जंगल थे । खट्टे – मीठे बेरों की महक बिखेरती झाड़ियाँ थीं । खिले-खिले महुए की तीखी सुगंध  थी । जड़ी बूटियों की लताएँ थीं और थी टेशू के दहकते लाल रंग से रंगी  मिट्टी । मन झूम उठता था माँदर की थाप पर, अपनी–अपनी खुशियों के साथ अपने–अपने सुर-ताल में बहकता । आकाश से पृथ्वी के हर उस पर्त को बांधता, सहेजता जिसमें उन्माद भी था और एक मुलायम स्पंदन के साथ ही ठहराव के लिए संवरती जमीन भी । बहुत कुछ था जंगल के भीतर की दुनिया में जहां जंगल के बाहर की दुनियां की तरह अपनी पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए लूट का लोभ नहीं था । किसी से उसका हक़ छीन लेने का धर्म नहीं था ।

बालू की बंद आंखों में पूरा जंगल अपना जीवन संजोए किसी वृत्तचित्र सा घूम रहा था और वह! किसी हिरन सा कुलांचें मारता दौड़ता .. नाचता गाता जा रहा था …

का फूल फुइल गेलरे
बन में चरका दिसे
सरइ फूल फूईल गेलरे
बन में चरके दीसे….

होंठ गुनगुना रहे थे उंगलियाँ मिट्टी में थिरक रही थीं और बंद आंखें एक दिवास्वप्न में डूब रही थीं … “ क्या गा रहे हो बाबा …बच्चे की आवाज़ से लय टूट गई । सिकुड़ गया वह तुरंत रोपे पौधों सा । आंख खोल हँस पड़ा । ना जाने क्या मन में आया, सारे पौधों को गीले बोरी के टुकड़े में लपेट एक पेड़ की छावं में रख कर बच्चे के पास आकर उसे झूला झूलाने लगा ।

“ ए जो पहाड़ देख रहे हो …. बालू ने पीछे दूर फैले दलमा पहाड़ के फैलाव को अपनी अंक से नापते दिखाया था …बहुत पहिले पहाड़ी के ई पार और ऊ पार जंगलै जंगल था । ढेर सारा जंगल ,,,,, हमरा बाबा का बाबा सब यहीं जन्मा । यहीं जिया । तब सब बहुत सुखी था … बहुत खुस। लकड़ी, पत्ता, फल, बहुत कुछ इहाँ था । मांसो भी । ”

“ सब बहुत सुखी था .. हम सब लोग पर …धीरे–धीरे सब गुम गया । ”

“ ई पढ़ा लिखा मानुस पहिले जंगल काटा । बाघ, हरिन मारा और फिर ….  बम से पहाड़ उड़ाया …और ..

“हाथी? ”

“ हाथी भी मारा बाबू … एक दिन सब बिका दिया … कौन जाने कहाँ ? हमरा भी हाथी का भी … बालू के माथे की रेखाएं बिना उम्र के सिकुड़ गईं ।

………

“ ऊ लोग बाबू बन गए .. राजा .. और हम बेघर । ” कूछ देर अपने में ही खोए बालू ने डूबती आवाज़ में कहा ।

“ हम मानुष तो जी लिए बाबू पर जनावर दूसरा जंगल कहाँ पाएं । उनका तो सब गुमा गया … कैसे समझाएं तुम्हें । “ दूर पहाड़ को देखते बालू ने दोनों हाथ सर पर टिका दिए ।

“ हाथी तो बऊड़ा रहा है बेचारा…

“ यही में कहीं धान मिलता है तो कहीं पत्ता और कहीं हँड़िया ( कच्ची शराब) । धान पाए तो पेट भर जाता है पर हँड़िया पाए तो मद (नशा) ही मिलेगा न… फिर… ऊ भागता है

“ बोका लोग उसको दउडाता है …ईंटा फेकता है तो ऊ दभी भागता है मारने के वास्ते ।

“ लोग कहते हैं हाथी पागल है … दउड़ाता है …साला ई आदमी लोग पागल है… ई पढ़ा लिखा आदमी….

“ बाबू … बाबू …

“ सो गए …..

“ ऐसे ही सब सो जाता है । कोई नहीं सुनता जंगल… जनावर को …

 

  •  रेणुका अस्थाना, भिवाड़ी , राजस्थान, 9982448126

 

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2 टिप्पणी

  1. रेणुका अस्थाना की बेहद संवेदनशील कहानी बालमन का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करती है।मानव का पशुओं के प्रति निर्मम व्यवहार और बालू की संवेदना मन को प्रभावित करती.है। अनुभवी पिता मौन रह जाते हैं बच्चे को क्या बताएं ? हाथी किसी को नहीं.मारता ,वह भूखा क्यों रहता है?।जैसा कि कहानी में वर्णित है–हम बोल रहा था कि हाथी काहे वास्ते कोई को मारेगा। उ बेचारा तो खुदै भूख से मर रहा है …

    “ तो खाना क्यों नही खाता?”

    “जानते हो बाबा मेरी बुक में लिखा है – हाथी गन्ना खाता है। हरी हरी पत्तियाँ …

    “ मिट्टी से उठो बाबू।” बालू ने रोहित को मिट्टी से उठाते हुए कहा। चलो इहां से। ई सब बात अभी तुम्हारे समझ में नहीं आने वाली।बच्चा हो तुम..बच्चा , समझे।”।बहुत अच्छी कहानी।यह कहानी मैने पहले भी पढी है। रेणुका मेरी प्रिय सहेली भी हैं इसलिए उनकी रचनात्मकता से बखूबी परिचित हूं।बहुत बहुत बधाई रेणु ,हार्दिक शुभ कामनाएं।आपके सुंदर सृजन के लिए।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

  2. रेणुका जी!
    आपकी कहानी पढ़ी।
    जिस तरह स्थितियाँ बदल रही हैं, जंगल कट रहे हैं और वन्य पशुओं के रहने की दिक्कतें आ रही हैं, सब चिंताजनक है। कहानी भी इसी दर्द को बयाँ करती है।
    बच्चे नादान होते हैं,समझते नहीं,जो सुनते हैं वह सही लगता है।
    जब रोहित कहता है, “बाबा, हाथी क्यों सबको मारता है?”
    बाबा !जो शायद माली का काम करते थे,”हाथी क्या सबको मारेगा बाबू!” वह उस समय खिन्न था ।
    वह मन में बड़बड़ाता है-
    “साला एक आदमी मरा तो इतना चिल्ला चिल्ली(शोर- शराबा) जब बहुत हाथी मरे तब कुछ नहीं?अजब बिधान है ठाकुर का…

    यह कथ्य यह बताता है कि वह माली जिसे बच्चा बाबा कहकर बुलाता है, किसी ऐसी पीड़ा से त्रस्त है जो हाथियों को लेकर है।
    आगे वह और कहता है,”हम बोल रहा था कि हाथी काहे वास्ते कोई को मारेगा?ऊ बेचारा तो खुदै भूख से मर रहा है।”
    यह कथ्य संकेत देता है पर्यावरण की ओर ,जहाँ जंगल कट रहे हैं और पशुओं के रहने का ठिकाना छिन रहा है।
    इंसान अपने स्वार्थ के लिए जंगलों को काट रहा है। बड़ी-बड़ी माल्टियाँ बन रही हैं।
    वन्य पशुओं के रहने के लिए कहीं ठिकाना नहीं है।हाथी तो प्रतीकात्मकता में प्रतिनिधित्व कर रहा है इस बात का।

    जब जंगलों में वन्य पशुओं को खाने को नहीं मिलेगा तो वह भूख से व्याकुल होकर शहर की ओर आएंगे ही।
    बाबा याद करते हैं अपना समय, जब पहाड़ के पीछे जंगल में हो उन्होंने अपना सबसे सुखमय जीवन बिताया था।
    अपने स्वार्थ के लिए इंसान जंगलों को खोखला कर रहा है। वृक्षारोपण तो कर नहीं पाता।
    भविष्य में होने वाले पर्यावरण के नुकसान को इंसान अभी समझ नहीं पा रहा है।
    पूरी कहानी का केंद्रीय भाव यही है कि जंगल न काटें।वन्य पशुओं का रहवास स्थल उनसे न छीना जाए।
    इसी पीड़ा को आपने बहुत ही मार्मिकता के साथ कथा में बाँधा है।

    एक महत्वपूर्ण विषय पर बेहतरीन कहानी लिखने के लिए आपको बधाई ।

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