कन्हैया तुम अनादि, तुम्हारे रूप हैं अनंत,
निमिष में करते हो कितने प्रबंध
कभी मुरली -मनोहर
कभी कंस- संहारक
कभी नटखट नंद बालक
कभी विश्व के धारक
कभी राधा संग प्रेम में मग्न
और कभी बिल्कुल निस्संग
कभी रुक्मिणी हरण और
सोलह हजार स्त्रियों का वरण
कभी धुरंधर कूटनीतिज्ञ और द्वारकाधिपति
कभी पांडवों के सखा, दूत,
कहीं अर्जुन के उपदेशक, विराट रूप
यदि गोपियों का वस्त्र चुराया
तो द्रौपदी की लज्जा को वस्त्र ओढ़ाया
अर्जुन के हाथ भीष्म को शर-शैय्या दी
पुनः अर्जुन से कह, भीष्म को गंगा की धारा दी
युधिष्ठिर से छ्द्म-मिथ्या बुलवाया
तदुपरांत उन्हीं को राज्य सिंहासन दिलाया
गोपियों के संग रास में रमे रहे,
साथ ही गीता का वैराग्य भी कहते गए
नंद-यशोदा को बाल-लीला दिखाई,
मथुरा पहुँचकर
सभी की सुदबुध बिरसाई
मथुरा छोड़ा कभी रणछोड़ कहाते
और महाभारत में विजयश्री दिलाते
गुरुकुल में सुदामा की चोरी पकड़ी
बाद में उन्हें अकूत संपदा सौंप दी …
विरोधाभासों से भरे हो
परन्तु निरुर्मि सागर से शान्त दिखते हो
सृष्टि के संहारक हो
तुम्हीं जगत कारण, प्रजा पालक हो
नटवर तुम्हारी लीला न्यारी है
प्रत्येक छवि मोहने वाली है
कविता - कृष्ण चरित्र (जन्माष्टमी के अवसर पर) - शैली 3
– शैली
चल-भाष: 9140076535
लखनऊ, उत्तर प्रदेश.

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