छोटे शहरों में हर मोहल्ले में एक ठलुआ क्लब होता है, जो अथाई या तख्तो पर जुटता है | इस क्लब के सदस्य मलूकादास के चेले होते हैं और “अजगर करे ना चाकरी …..कहावत को चरितार्थ करते हुए कोई काम करना अपनी तौहीन समझते हैं | पर इनके पास पूरे महल्ले को सलाह देने का ठेका होता है वो भी एकदम मुफ्त | इनमे एक और खास गुण होता है भले ही अजगर की तरह शरीर हिले ना हिले पर इनके दिमाग और जुबान बिना किसी रोक टोक के शताब्दी की गति से दौड़ते रहते हैं और इन्ही के बल पर मोहल्ले का चलता फिरता अखबार बन जाते हैं |
इनकी नजर तो इतनी पैनी होती है कि कोई भी खबर इनकी नजरों से चूक ही नहीं सकती| किसकी बहु को कौन सा महीना चल रहा है ये इनकी नजरें तुरंत तौल लेती हैं| और तो और यदि कोई महिला या कन्या इनके सामने से गुजरे तो ये नजरों से ही उसे गंतव्य तक छोड़ दें | ये अपनी सूंघने की शक्ति में तो कुत्ते को भी पछाड दें कुछ होने से पहले ही सूंघ लेते हैं यानि किसकी बेटी का किस से टांका भिड़ा है और कब तक भाग जायेगी ये सूंघ कर ही बता देते हैं |

