पंजाब में संगरूर के एक छोटे से गाँव भदौड़ में जनमे देवेंद्र सत्यार्थी लोकगीतों की खोज में घर से निकले, और अहर्निश लोकगीतों की तलाश करते-करते खुद एक ऐतिहासिक शख्सियत बन गए। महात्मा गाँधी और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का आत्मीय सान्निध्य उन्हें मिला, और अपनी इस निराली धुन में उन्होंने देश की असंख्य परिक्रमाएँ कीं। यह एक नई पहलकदमी थी। एक ऐसा काम जो उनसे पहले कभी किसी ने नहीं किया था। लाखों लोकगीत उन्हें मिले, जिन पर लिखे गए उनके लेख लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर बन गए हैं।
अमृता प्रीतम ने लिखा है कि लोकगीतों की खोज करते-करते देवेंद्र सत्यार्थी खुद एक लोकगीत बन गए। मैं समझता हूँ कि विलक्षण लोकयात्री सत्यार्थी जी की बीहड़ लोकयात्राओं और उसके पीछे छिपे उनके बेहिसाब दुख-तकलीफों और फकीरी को बयान करने के लिए इससे खूबसरत अल्फाज कुछ और नहीं हो सकते।
सच तो यह है कि लोकगीतों की खोज में सत्यार्थी जी ने इस महादेश का चप्पा-चप्पा छान मारा। गाँव-गाँव, डगर-डगर और दूर तक जाती धूल भरी पगडंडियों पर चलते उनके पैर इस देश का एक नया सांस्कृतिक इतिहास लिख रहे थे। फिर कुछ जगहों पर तो वे बार-बार गए और हर बार एक नया खजाना उन्हें हासिल हुआ। जेब में चार पैसे नहीं, पर उनकी अनवरत यात्राएँ जारी थीं। हर जगह किसी खेत की पगडंडी या पेड़ तले बैठकर किसी राहगीर से लोकगीत सुनकर अपनी कॉपी में तल्लीनता से लिखना, और साथ-साथ उनकी भावगंगा में डुबकी लगाना। फिर उसी राहगीर की मदद से वे उसका अर्थ भी लिख लेते।

बाद में किसी सहृदय पाठक या प्रशंसक के घर रुकने का सुयोग मिलता, तो जरा तसल्ली से कॉपी में सँजोए गए उन सुंदर और मर्मस्पर्शी लोकगीतों पर लेख लिखे जाते। ऐसे लेख जो हृदय से निकलते और सीधे हृदय तक जाते थे। देश के अलग-अलग जनपदों के लोकगीतों पर लिखे गए सत्यार्थी जी के वे भावनात्मक लेख ‘माडर्न रिव्यू’, ‘विशाल भारत’ और ‘हंस’ सरीखे पत्रों में छपते, तो पूरे देश का ध्यान उनकी ओर जाता। यहाँ तक कि महात्मा गाँधी, रवींद्रनाथ ठाकुर, मदनमोहन मालवीय, जवाहरलाल नेहरू, राजगोपालाचार्य, के.एम. मुंशी और राहुल सांकृत्यायन तक उनके मुरीद थे।
सत्यार्थी जी की धूल भरी यात्राओं ने उन्हें चाहे कितने अभाव और कष्ट दिए हों, पर उनके प्रति वे यह कहकर कृतज्ञता जताए बगैर नहीं रहे कि इन यात्राओं ने ही उन्हें देश के बड़े से बड़े कर्णधारों, राजनेताओं, चिंतकों, लेखकों और कलाकारों से मिलवाया। जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों के मूर्धन्यों ने भी उनकी इन लोकयात्राओं के लिए खासा आदर प्रकट किया और उत्सुकता से उनके बारे में जानना चाहा। बेशक इनमें से बहुत-से दिग्गजों और मनीषियों ने खुद आगे बढ़कर उनकी मदद भी की। इससे सत्यार्थी जी की ये यात्राएँ आनंदपूर्ण और कुछ आसान भी हो गईं।
इस तरह के मूर्धन्यों में एक ओर प्रेमचंद और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे अपने-अपने क्षेत्रों के दिग्गज थे, तो अज्ञेय और जैंनेद्र सरीखी बड़ी साहित्यिक प्रतिभाएँ भी थीं। बलराज साहनी और साहिर जैसे हरदिल अजीज शख्स थे जिन्होंने आगे जाकर फिल्मी दुनिया में बड़ा नाम कमाया तो पाब्लो नेरूदा भी, जो उस समय विश्वविख्यात शख्सियत बन चुके थे। फिर गुरुदेव टैगोर और महात्मा गाँधी का तो सदैव उन्हें आशीर्वाद मिला ही। और सत्यार्थी जी के उनसे जुड़े अनेक प्रसंग अब ऐतिहासिक थाती बन चुके हैं।
इनमें प्रेमचंद से उनकी मुलाकात लखनऊ में हुई थी। सुबह कोई दस बजे का समय। पहले वे लमही गाँव गए थे, पर वहाँ प्रेमचंद नहीं मिले तो लखनऊ में उनके निवास पर जा पहुँचे। प्रेमचंद से उनकी यह मुलाकात बड़ी अनोखी और यादगार थी। हालाँकि शुरू में वे उन्हें पहचान ही नहीं पाए। प्रेमचंद की सादगी और मामूली वेशभूषा ने उन्हें धोखे में डाल दिया। असल में हुआ यह कि सत्यार्थी जी तो अपनी आदत के अनुसार बगैर सूचना दिए ही पहुँच गए थे। उन्होंने किसी बच्चे से कहा कि मुझे प्रेमचंद जी से मिलना है। वह उन्हें उनके घर तक छोड़ गया।

सत्यार्थी जी सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचे तो देखा, एक व्यक्ति एक डेस्क के आगे बैठा कुछ लिख रहा है। एकदम साधारण-सी धोती, साधारण-सा कुरता…बिल्कुल गँवई रंग-ढंग। सत्यार्थी जी कल्पना ही नहीं कर सके कि यही प्रेमचंद हैं। वे एकदम सीधे-सरल इनसान उन्हें लगे, जिनमें लेखक होने का जरा भी घमंड नहीं था। शायद इसीलिए वे धोखा खा गए। लेकिन इससे वार्तालाप का प्रारंभ बड़ा विनोदपूर्ण था।
जिस समय सत्यार्थी जी पहुँचे, प्रेमचंद अपने उपन्यास पर काम कर रहे थे। बोले, “जरा रुकिए, मैं जरा यह प्रसंग पूरा कर लूँ, फिर जमकर बातें होंगी।”
कुछ देर वे चुपचाप लिखने में लीन रहे, फिर प्रसंग पूरा होने पर पेन बंद करके रखा और सत्यार्थी जी की तरफ मुखातिब हुए। मुक्त अट्टहास के साथ खूब खुलकर बातें हुईं। यों भी प्रेमचंद खूब खुश-खुश और जिंदादिल आदमी थे। बड़ी सजहता से बातें करते थे और सत्यार्थी जी तो इसी के मुरीद थे। उन्होंने पूछा, “उपन्यास लिखते-लिखते जहाँ आप किसी दिन काम खत्म करते हैं, वहीं से अगले दिन शुरुआत करने में मुश्किल नहीं आती?”
प्रेमचंद हँसकर बोले, “नहीं, भीतर कहानी रची-बसी रहती है, इसलिए कोई मुश्किल नहीं आती। फिर अब तो आदत पड़ गई है, कलम अपने आप चल पड़ती है।”
इस पर सत्यार्थी जी को पंजाब की चरखा कातने वालियों की याद आई। वे चरखा कातती हैं और साथ-साथ त्रिंजन गीत गाती भी जाती हैं। पूनी से पूनी जोड़ते हुए वे धागे में इतनी बारीकी से गाँठ लगाती है कि कहीं कोई जोड़ नहीं पता चलता। उनके त्रिंजन गीतों के स्वर और सूत की कताई एकदम साथ-साथ चलती रहती है।
सत्यार्थी जी ने यह बात प्रेमचंद को बताई तो सुनकर वे खूब खुश हुए। हँसकर बोले, “यह तो आपने बहुत अच्छा उदाहरण दिया। आपकी यह बात मुझे हमेशा याद रहेगी।”
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सत्यार्थी जी को राजनेताओं से मिलने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें आम लोगों, लेखकों, कलाकारों और जनता के बीच काम कर रहे समाजकर्मियों से मिलना कहीं अधिक पसंद था। पर गाँधी जी की तरह सत्यार्थी जी पंडित जवाहरलाल नेहरू के भी प्रशंसक थे और उनसे उनकी कई अंतरंग मुलाकातें हुई थीं।
कांग्रेस के फैजपुर अधिवेशन में बैलगाड़ी पर नेहरू जी का जुलूस निकला था। सत्यार्थी जी ने उसका वर्णन फैजपुर अधिवेशन पर लिखे गए अपने सुप्रसिद्ध लेख ‘कांग्रेस गोज टु ए विलेज’ में किया है, जो न्यूयार्क से निकलने वाली पत्रिका ‘एशिया’ में छपा था।
उस सम्मेलन में गाँधी जी की तरह नेहरू जी और पटेल ने भी उनकी लोकयात्राओं के प्रति उत्सुकता प्रकट की थी। साथ ही सम्मेलन में सत्यार्थी जी को कुछ ऐसे अनोखे लोकगीत सुनने को भी मिले, जिनमें नए जमाने का असर था। हालाँकि लोकगीतों का असली रंग भी बरकरार था। कुछ लोकगीतों में इस बात का जिक्र था कि सरदार पटेल की पहले बड़ी-बड़ी मूँछें हुआ करती थीं जो अब गायब हो गईं। कुछ लोकगीतों में बैलगाड़ी पर यात्रा कर रहे नेहरू जी का बड़ा ही मजेदार वर्णन था।
सत्यार्थी जी के लिए ये बड़ी अद्भुत चीजें थीं। इसलिए कि इन लोकगीतों में सीधे-सरल ग्रामवासियों की भावनाएँ थीं। अपने नायकों को अपने अंदाज में देखना और उसी रूप में प्रस्तुत करने में लोगों को आनंद आता है। वही आनंद इन लोकगीतों में फूट पड़ा था। सत्यार्थी जी ने अपने लेख में कांग्रेस अधिवेशन की राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ इन लोकगीतों का भी वर्णन किया है, जो आम जनता के बीच से पैदा हुए थे, पर आज दिग-दिगंत को गुंजारित कर रहे थे और एक बदले हए इतिहास के गवाह बन चुके थे।
जाहिर है, ‘एशिया’ सरीखी अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में छपे सत्यार्थी जी के इस लेख की दूर-दूर तक चर्चा हुई और उसने उन्हें रातोंरात प्रसिद्ध कर दिया।

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मैं इनसे शांतिनिकेतन में मिल चुकी हूँ
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नेहरू जी से सत्यार्थी जी की खासी लंबी और अंतरंग मुलाकात तब हुई, जब वे अंतरिम सरकार में प्रधानमंत्री थे। तब पं. जवाहरलाल नेहरू के घर पर सत्यार्थी जी की उनसे कोई डेढ़-दो घंटे तक बातचीत चली। उनमें एक फ्रेंच पत्रिका के फ्रेंच संपादक भी शामिल थे। आतिथ्य श्रीमती इंदिरा गाँधी ने किया था। जब वे चाय लेकर आईं, नेहरू जी ने सत्यार्थी जी का परिचय कराया। इस पर इंदिरा जी ने मुसकराते हुए कहा, “मैं इनसे शांतिनिकेतन में मिल चुकी हूँ, गुरुदेव टैगोर के साथ!”
और जब नेहरू जी ने इंदिरा को पास बैठकर चाय पीने को कहा, तो उनका विनम्रतापूर्वक साफ इनकार। इंदिरा जी का कहना था, “मैं भला अपने गुरु जी के सामने कुर्सी पर कैसे बैठ सकती हूँ?”
इस घटना की पृष्ठभूमि भी सत्यार्थी जी से ही पता चली। असल में सत्यार्थी जी अकसर शांतिनिकेतन में जाते थे और वहाँ हजारी बाबू से उनकी मुलाकात होती थी। एक बार द्विवेदी जी अस्वस्थ थे तो उन्होंने सत्यार्थी जी से कहा कि आज मेरी जगह आप जाकर पढ़ा दीजिए।
सत्यार्थी जी हैरान। बोले, “आपकी जगह मैं कैसे पढ़ा सकता हूँ? मैं तो आपके विषय का विद्वान नहीं हूँ।”
इस पर द्विवेदी जी का जवाब था, “आपको इसकी क्या जरूरत है? आप तो जो विषय अच्छा लगे, उसी को लेकर बच्चों से बातें करें। वही विद्यार्थियों के लिए आनंददायक विषय बन जाएगा।”
और सत्यार्थी जी ने जिस कक्षा में पढ़ाया था, उसमें इंदिरा गाँधी छात्र के रूप में मौजूद थीं।
हालाँकि यायावर साहित्यकार का पढ़ाना भी क्या था! उन्होंने लोकगीतों की चर्चा करते हुए, अपनी घुमक्कड़ी के रोमांचक प्रसंगों का जिक्र किया था और बच्चों को यह खासा रुचिकर लगा था। फिर तो ऐसा अकसर होता कि द्विवेदी जी सत्यार्थी जी को अपनी कक्षा में बुला लेते और फिर यायावर को अपनी यात्रओं के दुर्लभ प्रसंग और अनुभव सुनाने के लिए कहते। बच्चे बड़े कौतुक और आदर के साथ सुनते। इस अद्भुत लोकयात्री के लिए उनके मन में सम्मान और श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो गया था।
यही बरसों बाद इंदिरा गाँधी को भी याद रहा। और सत्यार्थी जी के लिए उनके मन में जीवन भर एक गुरु जैसा ही आदर रहा।
नेहरू जी बाद में प्रधानमंत्री हुए, तब भी उनसे सत्यार्थी जी की कई मुलाकातें हुईं। 1956 में पी.ई.एन. सम्मेलन में सोफिया वाडिया ने नेहरू जी का सत्यार्थी जी से परिचय कराया, तो वे हँसकर बोले, “कॉल हिम फोकलोर इंडिया…!”
बांग्ला के महान कथाकार शरतचंद्र से भी सत्यार्थी जी की बड़ी अंतरंग मुलाकात हुई थी। सत्यार्थी जी बर्मा की यात्रा से लौटे थे, उसके कुछ ही अरसे बाद उनका शरत से मिलने का संयोग बना। उस मुलाकात में सत्यार्थी जी देर तक बर्मा-यात्रा के अपने दुर्लभ अनुभव उनसे शेयर करते रहे थे। उसी में शरत ने दिलीपकुमार राय को लिखे अपने एक पत्र का भी जिक्र किया था कि “तुम लिखना तो जानते हा, ‘न लिखना’ नहीं जानते।”
सत्यार्थी जी ने अपनी बर्मा-यात्रा पर ‘इरावती’ शीर्षक से संस्मरण लिखा था। उन्होंने वह शरत को पढ़ने को दिया तो वे इस बात से प्रसन्न हुए कि इसमें अनावश्यक विस्तार नहीं है। रचना सुनकर प्रसन्न होकर बोले, “सुंदर, अति सुंदर!”
इस तरह सत्यार्थी जी को अपनी रचना पर महान कथाशिल्पी शरत का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

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तुम यह गलती मत करना
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उस दौर की चर्चित हस्तियों में बनारसीदास चतुर्वेदी के साथ तो उनका लंबा सान्निध्य था। चतुर्वेदी जी द्वारा ‘विशाल भारत’ में छापे गए लेखों ने ही सत्यार्थी जी को हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठित किया। दूर-दूर तक उन लेखों की चर्चा हुई। गाँधी जी और गुरुदेव ने भी उन्हें पढ़ा और बड़े प्यार से उनका उल्लेख किया है। फिर गाँधी जी से सत्यार्थी जी को मिलवाने वाले भी बनारसीदास चतुर्वेदी ही थे जिन्हें उनके मित्र प्यार से ‘चौबे’ जी कहकर बुलाते थे। सत्यार्थी जी से उनके संबंध बहुत कुछ घरेलू किस्म के थे। चौबे जी की शख्सियत और अंतरंग क्षणों के बारे में चर्चा चलने पर सत्यार्थी जी अकसर कहा करते थे, “बनारसीदास चतुर्वेदी कुछ अलग ही कद-काठी के लेखक-पत्रकार थे। मैंने तो उन्हें नि:स्वार्थ भाव से लोगों का भला करने वाला ही पाया। बड़े कठिन दिनों में उन्होंने मेरी मदद की।”
चतुर्वेदी जी के मन में इस बात को लेकर बड़ा मलाल था कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। सत्यार्थी जी के आगे यह कनफेस करते हुए वे अकसर कहा करते थे, “देखो महाराज, मैंने तो अपनी पत्नी के साथ बहुत कठोरता का बर्ताव किया, उनका ज्यादा ध्यान नहीं रखा, पर तुम यह गलती मत करना।”
उन दिनों सत्यार्थी जी की बड़ी इच्छा थी कि हिंदी में प्रकाशित उनके लेखों की एक किताब छप जाए! किताब छपवाने के लिए वे घर से पाँच सौ रुपए लेकर आए थे। जब उन्होंने चतुर्वेदी जी से इसका जिक्र किया और उनसे प्रकाशक ढूँढ़ने में मदद करने के लिए कहा, तो जवाब मिला, “न-न, ऐसी गलती मत करना! पैसे देकर किताब छपाना ठीक नहीं है। जब लेखक के रूप में तुम्हारी प्रसिद्धि हो जाएगी, तो वे खुद-ब-खुद किताब छापेंगे। ये रुपए वापस घर भेज दो।”
सत्यार्थी जी ने कहा, “लेकिन चतुर्वेदी जी, घर से पाँच सौ रुपए लेकर मैं चला था। उनमें से कुछ रुपए तो खाने वगैरह पर खर्च हो गए, तो अब…?”
इस पर चतुर्वेदी जी का जवाब था, “जो पैसे खर्च हो गए, उन्हें मैं पूरा कर देता हूँ। तुम कल ही घर पर मनीआर्डर कर दो।”
कुछ समय बाद सत्यार्थी जी ने उन्हें घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया। लेकिन चौबे जी ने शर्त रखी, “जब तुम्हारी पत्नी के हाथ में सोने की चूड़ियाँ और गले में सोने का हार होगा, तभी मैं भोजन करने आऊँगा।”
बड़ी कड़ी शर्त थी। सत्यार्थी जी की समझ में नहीं आता था कि वे क्या करें? भला सोने की चूड़ियाँ और सोने का गलहार कहाँ से लाएँ? चतुर्वेदी जी ने कहा तो नेकनीयती से ही था कि इसी बहाने शायद घर में कोई चीज जुड़ जाए, पर लोक यायावर की हालत खस्ता थी। सो उनकी शर्त पूरी होने का सवाल ही नहीं था। इधर चौबे जी भी अपनी जिद के पक्के थे।
हारकर सत्यार्थी जी ने एक रास्ता निकाला। लोकमाता ने एक दिन के लिए पड़ोस की अपनी एक मुँहबोली बहन मालती से गहने माँग लिए। और तब चौबे जी उनके घर भोजन के लिए आए!
गाँधी जी से सत्यार्थी जी की पहली मुलाकात चौबे जी ने ही करवाई थी। बहुत संक्षिप्त सी मुलाकात थी। पर उसमें गाँधी जी से खूब खुलकर बातें हुई थीं। उसमें ‘विशाल भारत’ की भी चर्चा हुई जिसके संपादक चतुर्वेदी जी थे। बातों-बातों में चतुर्वेदी जी ने गाँधी जी से कहा, “बापू, मैं ‘विशाल भारत’ में आपके खिलाफ भी बहुत कुछ लिखता रहता हूँ।”
इस पर गाँधी जी हँसकर बोले थे, “कोई सुनता भी है?” सुनकर बनारसीदास चतुर्वेदी झेंपकर रह गए थे।…
यह पूरा प्रसंग मुझे सत्यार्थी जी ने खूब रस लेकर सुनाया था। फिर बात को गाँधी जी की ओर मोड़ते हुए उन्होंने कहा, “आपने गौर नहीं किया! चौबे जी की बात सुनकर गाँधी जी ने यह नहीं कहा कि कोई पढ़ता भी है? उन्होंने कहा, कोई सुनता भी है! यह था खुली भाषा का एक्सप्रेशन, जिसे गाँधी जी से सीखा जा सकता था।”
‘विशाल भारत’ के दफ्तर में ही बृजमोहन वर्मा हुआ करते थे। अपाहिज थे, बैसाखियों के सहारे चलते थे, लेकिन बड़े ही जिंदादिल इनसान थे और सत्यार्थी जी का खूब उत्साह बढ़ाया करते थे। ‘विशाल भारत’ में सत्यार्थी जी के इतने लेख छपे, इसका श्रेय उनको भी जाता है।
“शुरू में मैं सोचता था कि बनारसीदास चतुर्वेदी ये लेख मुझे पर कृपा करने के लिए छापते हैं, ताकि मुझे पारिश्रमिक मिलता रहे और इस तरह मेरी झोली में थोड़ी भीख डाल देते थे। पर बाद में बनारसीदास चतुर्वेदी ने ‘विशाल भारत’ में खुद एक लेख लिखा कि सत्यार्थी जी के लेख छापकर हम उन पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे अपने लेख ‘विशाल भारत’ में छपने के लिए देते हैं, यह ‘विशाल भारत’ पर उनका अहसान है। हालाँकि इस प्रशंसा से मेरा कोई सिर कहीं फिर गया। इसलिए कि मैं तो खुद को साहित्य का विद्यार्थी मानता था, आज भी मानता हूँ। और एक छोटे बच्चे से भी सीखने को तैयार हूँ।” सत्यार्थी जी की विनम्र आत्मस्वीकृति!
फिर एक मजेदार प्रसंग उन्होंने और सुनाया। बनारसीदास चतुर्वेदी ने एक पत्र में सत्यार्थी जी ‘डॉ. देवेंद्र सत्यार्थी’ कहकर संबोधित किया था। यायावर सत्यार्थी ने सोचा, मजाक में उन्होंने यह लिखा होगा। सो टाल गए। कुछ रोज बाद एक पत्र फिर आया उनका। उसमें उन्होंने लिखा, “आपने ध्यान दिया, पिछले पत्र में मैंने आपको ‘डॉ. देवेंद्र सत्यार्थी’ कहकर संबोधित किया था। असल में आपका लोकगीतों पर जो काम है, उस पर आपको कब की डॉक्टरेट मिल जानी चाहिए थी। मुझे उम्मीद है, कोई न कोई यूनिवर्सिटी इसके लिए आगे आएगी और जो भी यूनिवर्सिटी आपको डॉक्टरेट प्रदान करेगी, वह ऐसा करके आपको नहीं, खुद को ही सम्मानित करेगी।”
इससे सत्यार्थी जी के प्रति उनके सम्मान और विश्वास का भी पता चलता है।


