Wednesday, May 22, 2024
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प्रेमा झा की कविता – माँ

एक दिन सबकी माँ मर जाएगी
बहुत छोटी थी जब सहेली ने कहा था
और मैं रोती हुई एकदम-से चुप हो गई थी
तारीख़ अब तक नहीं मरी
माँ मर गई
हर बार की तरह इस बार भी
मुझे वो पत्थर न छूने वाली बात याद दिलाती है
फिर कुछ बरस हुए
सहेली को भी वक़्त के बाघ ने खा लिया
मैंने वो सब खो दिया जो जीवन में बहुत जरूरी थी
जैसे छाँव, पेड़, हंसी और बारिश
मैं जीवन से बड़ी हूँ अब
आस-पास पगलाई दुनिया दिखती है
इससे मुझे कुछ नहीं चाहिए
जरा देर के लिए है
सब एक दिन ख़त्म हो जाएगा
फिर मैं समुद्र में एक ख़त डालूंगी और खूब शिकायतें लगाऊँगी
इस दुनिया की
उम्मीद करती हूँ कि उसे सुन लिया जाएगा
इंतज़ार में फिर दिन गुमशुदा हो जाएंगे
जैसे खोती जा रही है सब बातें
दिन और रात!
माँ खोयी हुई हवा में समुद्र से मिलेगी
और आँखों में पानी भर देगी
माँ क्या है?
मैंने आंसू-नमक के स्वाद को मुंह में घुलते हुए समुद्र से पूछा
माँ आंसू और सहेली दोनों है
समुद्र ने उठती लहरों में कहा इसे!
समुद्र का पानी खारा है
अब मुझे उस पर माँ को चुरा लेने का शक़ है!
प्रेमा झा
प्रेमा झा
देश की प्रतीष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ और कहानियाँ प्रकाशित. चर्चित रचनाओं में लव जेहाद, ककनूस, बंद दरवाज़ा, हवा महल और एक थी सारा विशेष तौर पर पाठकों द्वारा पसंद की गई. हंस में छपी कहानी “मिस लैला झूठ में क्यों जीती हैं?” खासा चर्चा में रही है. फ़िलवक्त अपने एक उपन्यास को लेकर शोधरत हैं. सम्पर्क - prema23284@gmail.com
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