पुस्तक का नाम : मैं मनु (आत्मकथा) लेखक : प्रकाश मनु प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली।प्रकाशन-वर्ष : 2021 पृष्ठ संख्या : 320 मूल्य : 399 रुपए
हिंदी में आत्मकथा लिखने की परंपरा काफी समृद्ध है। हिंदी बाल साहित्य लेखन में अपना संपूर्ण जीवन लगा देने वाले प्रकाश मनु ने भी अपनी आत्मकथा ‘मैं मनु’ लिखकर उसके विकास-क्रम में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। प्रकाश मनु की आत्मकथा चार खंडों में प्रकाशित होनी है। उन्हीं चार खंडों में से प्रथम खंड है, ‘मैं मनु’।
प्रकाश मनु की इस आत्मकथा को पढ़ने से पहले इस पुस्तक के आवरण की मैं अवश्य चर्चा करना चाहूँगा। पुस्तक के बाहरी आवरण पर ‘मैं मनु!’ लिखे होने के साथ ही उनका चित्र लगा हुआ है, हँसते हुए। चमकदार माथा। सिर, भौंह व मूँछों के पके हुए छोटे-छोटे बाल। आँखों पर चश्मा लगाए। खद्दर का कुरता पहने व जेब में पेन। अद्भुत चित्र! देखने से ही उनकी सरलता, सहजता और और भोलेपन का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। चित्र के नीचे प्रकाशक की ओर से लिखे शब्द हैं, ‘बच्चों की अद्भुत दुनिया के रचनाकार, प्रणम्य संपादक, लेखक एवं कवि प्रकाश मनु जी की आत्मकथा’। वास्तव में प्रकाश मनु के बाल साहित्य में उनकी मौलिक तथा संपादित कृतियों व उनके समर्पण को देखकर आश्चर्य होता है।
पुस्तक के समर्पण की ये पंक्तियाँ भी मन में अंकित हो जाती हैं, “माँ, पिता जी, बलराज भाईसाहब, बड़ी भैन जी, कश्मीरी भाईसाहब और कृष्ण भाईसाहब को याद करते हुए, जिनकी स्मृतियाँ इस आत्मकथा के शब्द-शब्द में समाई हुई हैं…!” पढ़कर अनुमान लगाया जा सकता है कि इतने सारे लोगों की करुण मृत्यु के तांडव को मनु ने अपनी आँखों देखा है। उन्होंने इस असहनीय वज्राघात को कैसे सहा होगा?
इस आत्मकथा की भूमिका ‘मेरी कहानी : कुछ भूली कुछ भटकी सी!’ से यह तो ज्ञात होता है कि प्रकाश मनु ने अनिश्चितता से निश्चितता को, कतिपय से समग्रता को प्राप्त किया है। वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि उनका संपूर्ण जीवन केवल और केवल साहित्य ही है—
“मैं ऐसा क्यों हूँ? किसने मुझे ऐसा बनाया? कौन मुझे साहित्य की राह पर ले आया?…और फिर इस राह पर चलते हुए किसने मुझे ऐसा पगला दिया कि रात-दिन…रात-दिन…साहित्य, साहित्य और बस साहित्य। साहित्य मेरा मन, साहित्य मेरा प्राण, साहित्य मेरा शरीर, साहित्य मेरा ओढ़ना, साहित्य मेरा बिछौना और शायद साँस भी मैं साहित्य में ही ले पाता हूँ?”
आप लेखक कैसे हो गए? इस प्रश्न का उत्तर बड़ी विनम्रता के साथ देते हुए वे कहते हैं, “शायद लेखक होने के सिवाय मैं कुछ और हो ही नहीं सकता था, इसलिए मैं लेखक बना।”
प्रकाश मनु अपने लेखक होने के पीछे स्वयं का अंतर्मुखी होना और किसी भी विषय पर चिंतन करना मानते हैं, और यह शत प्रतिशत सत्य भी है, क्योंकि यही चिंतनशीलता व्यक्ति को संवेदनशील और भावुक बनाती है और एक सच्चे साहित्यकार में इन दोनों गुणों का होना लाज़िमी है। मनु जी बचपन की सुनी कहानियों में अधकू की कहानी को कभी नहीं भूल पाए, जिसके सिर्फ एक हाथ, एक पैर था, फिर भी तमाम मुसीबतों का सामना करके वह अपने जीवन को सफलता की राह पर ले जाता है। अधकू के चरित्र ने प्रकाश मनु को बेहद प्रभावित किया है और उनके लेखक बनने के पीछे उसका बड़ा हाथ है।
मनु जी की आत्मकथा बहुत सरल, सरस, बोधगम्य है, साथ ही घटनाओं की तारतम्यता भी उसमें विद्यमान है, जिससे पाठक रुचि लेकर उसे पढ़ता है। देखा जाए तो घटनाएँ बड़ी साधारण सी हैं, लेकिन उन्हें रोचकता के साथ प्रस्तुत किया गया है। मनु जी ने उन छोटी-छोटी घटनाओं का भी पूरा विवरण प्रस्तुत किया है, जिन्होंने उनके बाल मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ी है।
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अब हम चलते हैं उस पड़ाव की ओर, जहाँ एक भोला संवेदनशील कुक्कू अपने जीवन का सफर शुरू करता है, और तमाम मुश्किलों, बाधाओं और बड़े उतार-चढ़ाव के बाद आखिर जो हिंदी के मूर्धन्य बाल साहित्यकार प्रकाश मनु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कहानी आरंभ करने से पूर्व उनके परिवार के बारे में थोड़ी जानकारी अवश्य देना चाहूँगा। कुक्कू यानी प्रकाश मनु के पिता उसके दादा की इकलौती संतान थे। लेकिन कुक्कू अपने माता-पिता की नौ संतानों (सात भाई व दो बहनें) में भगवान श्री कृष्ण के समान आठवीं संतान है। प्रकाश मनु से एक बड़ी बहन तथा पाँच बड़े भाई पाकिस्तान के कुरड़ गाँव में जनमे, जो खुशाब तहसील, जिला सरगोधा में है, और शेष तीन प्रकाश मनु सहित एक बहन, दो भाइयों का जन्म भारत के शिकोहाबाद नगर में हुआ।
आजादी के बाद भारत-पाक विभाजन के दौरान प्रकाश मनु के परिवार को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा तथा इन हालात में पाकिस्तान को छोड़कर भारत में विस्थापित होना पड़ा। विस्थापन की तकलीफों से जूझते हुए उनके पिता, दादा तथा दोनों बड़े भाई फेरीवाले बनकर अपने परिवार का गुजर-बसर करते थे। वे अमृतसर से पगड़ियाँ खरीदकर लाते और अंबाला में बेचा करते थे। कुछ समय बाद परिवार इन स्थितियों से उबरा। किंतु लगता है, यह ईश्वर को मंजूर न था और तभी मनु जी के परिवार में मृत्यु का ऐसा सिलसिला चला, जैसे वृक्ष से बारी-बारी पत्ते गिर रहे हों। स्वयं प्रकाश मनु के शब्दों में—
“पर इस बीच जिंदगी के थपेड़े भी कम नहीं रहे। हम भाई-बहनों में बलराज भाईसाहब जो हमारे सबसे बड़े भाई थे, कोई बत्तीस वर्ष की अवस्था में ही चले गए। वे आकस्मिक हृदयाघात से गए। अभी कुछ अरसा पहले ही कश्मीरी भाईसाहब अपने जीवन-कहानी पूरी कर गए। हम भाइयों में जो सबसे सरल, शांत और बुद्धिमान थे, और जिन्हें हमेशा मुसकराते हुए देखा, वे कृष्ण भाईसाहब भी नहीं रहे। मुझसे कोई तीन बरस बड़े श्याम भाईसाहब तो बरसों पहले ही चले गए। वे असमय ही गए। श्याम भैया की मृत्यु का घाव मन में अब भी इतना ताजा है कि उनकी मृत्यु कल की बात लगती है, लेकिन अभी-अभी हिसाब लगाने बैठा तो मैं चौंका। श्याम भैया को गुजरे कोई इकतीस साल बीत चुके हैं।”




लंबी समीक्षा है किंतु रोचक है ।आजकल के व्यस्त जीवन में पढ़ने का समय निकालना ही बहुत बड़ी उपलब्धि है। भाऊ राव महंत को बधाई ।मूल लेखक मनु जी को नमस्कार ।।
प्रणय श्रीवास्तव अश्क