संजय मासूम की तीन ग़ज़लें
शाम ग़ायब है, सहर ग़ायब है ।
ये जली बस्तियाँ बताती हैं ।
इल्म ना राम, ना रहीम को है ।
दोस्त सोचो ! तिलिस्म किसका है ।
डर का दर्शन समझ ना पाए तुम।
मुझमें सहरा बाक़ी है ।
इश्क़ में मर के देख लिया।
बोल रहा है पिंजरा भी ।
सभी मुखौटे हैरां हैं।
जब उसके दीदार हुए।
राजा-रानी ख़ुश तो हैं ।
जब तक चिड़ियाँ ज़िंदा हैं।
काँटे तो उग आये हैं ।
अनदेखा, अनजाना सा डर आता है,
नई इमारत देख के आँखें खुश तो हैं,
बारिश की बूँदें जब प्यास बढ़ाती हैं,
नाम-घरौंदे होते हैं जिस तट पर, क्यों?
छोड़ के जो जाता है, तनहा करता है ,
सब कुछ दिख कर भी जब नहीं दिखाई दे
मंज़िल को कुछ दूर उठा ले जाता है !
संजय मासूम
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वाह आफरीन हैं तीनों की तीनों ग़ज़ल।
किसी को ग़ज़ल लिखने का गुर सीखना हो तो साहब ने तीन नज़ीर पेश कर दी है।छोटे छोटे मगर मानीखेज सतरें।
पुरवाई पत्रिका परिवार और संपादक को दिली मुबारकबाद।आपकी वजह से यह पढ़ने को मिली हैं।
आदरणीय संजय जी!
आपकी तीनों ही गज़लें अच्छी लगीं।हम अक्सर कहते रहे हैं कि ग़ज़ल का व्याकरण हम नहीं जानते पर रूह से निकली भावनाएँ दिल में दस्तक देती हैं । पहली ग़ज़ल मार्मिक है।इससे सांप्रदायिक दुर्भावनाओं की गंध आती है।साम्प्रदायिक दुर्भावनाओं में ऐसे लोग नुकसान उठाते हैं जिनका उन सब से कोई वास्ता ही नहीं होता है। और दोनों ही पक्षों का नुकसान होता है। कुछ शेर जो अच्छे लगे-
इल्म ना राम ना रहीम को है।
कैसे दोनों ही का घर ग़ायब है।।
जब तक चिड़ियाँ ज़िंदा हैं।
तब तक दुनिया बाक़ी है ।
तीसरी ग़ज़ल पूरी ही बहुत अच्छी लगी। बेहतरीन ग़ज़लों के लिये आपको बधाइयाँ
भाई संजय मासूम की ये ग़ज़लें हमारे समाज का जीवंत दस्तावेज हैं। उन्होंने बड़ी संजीदगी और साफगोई से हमारे चारों ओर छितराए विद्रूप को बखूबी उजागर किया है। मुझे लगता है संजय मासूम की ये ग़ज़लें नाइंसाफियों का एक मुकम्मल बयान है। अपसंस्कृतिमूलक व्यवस्था को लेकर संजय के भीतर जो आग धधक रही है, उसका उनवान भी हैं।
मैं कोई ग़ज़लगो नहीं हूँ लेकिन गजलों का एक दुरस्त पाठक जरूर हूँ। उस नाते कह सकता हूँ कि संजय जी की इन ग़ज़लों में दरिया की रवानी है, फूलों पर मड़राती-अठखेलियाँ करतीं तितलियों के लहुलूहान जख्मी पंख हैं। दूर कहीं फिरकापरस्ती की आग में जलती हुई बस्तियों की आग की लपटें हैं… और …और ….*धड़ तुम्हारा, मेरा सर गायब है।*
डॉ० रामशंकर भारती