“आ जाओ आ जाओ बाई-सा खुशबू खरीद लेयो,
“ओ बाबू सा खुशबू ले जाओ, घर महकाओ” 16 -17 साल का वह राजस्थानी लड़का अपने राजस्थानी पहनावे में वैसा ही लग रहा था जैसा उसे लगना चाहिए । मुझे कोई अनोखी बात नज़र नहीं आई, सोचा कोई नकली सुगंध वाली अगरबत्ती बेच रहा होगा । देशी विदेशी पर्यटकों की भीड़ को चीरता यहाँ वहाँ डोलता वह खुशबू की पिटारी लिए भाग दौड़ कर रहा था ।
अचानक उसकी आवाज़ ने ध्यान खींचा, “ये लो मैडम बच्ची की मुस्कान की खुशबू, ये लो दिल फरेब आशिक का इतर, ये महबूबा की महक, ये मेहंदी की गमक, अरे ले लो भाई पानी की खुशबू, मिट्टी का सौंधापन ले लो, अरे बासमती चावल की खुशबू लो, पहले प्यार की, झरते हर सिंगार की खुशबू लो, माँ की खुशबू ले लो, अरे पूरा पिटारा है भाई खुशबू ले लो खुशबू “।
“वाओ क्या मार्केटिंग कर रहा है लड़का”, मुझे उसके अपने उत्पाद को बेचने के इस मौलिक तरीके ने अपनी और खींचा, जानता था बढ़ा चढ़ा कर बता रहा है, यही तो मार्केटिंग है, एक बड़ी कंपनी के मार्केटिंग मैनेजर की हैसियत वाला मैं, मुझसे बेहतर कौन जानता है अपने उत्पाद को बेचने के इस हुनर को, मशक्कत और झूठ का सच, कॉन्फ्रेंस में आया हूँ, शहर से दूर रेगिस्तान के बीचों बीच इस होटल में ठहरा था, जहाँ ये राजस्थानी लोगों के डेरे भी हैं । इस लड़के में हुनर भी है, मशक्कत भी और झूठ तो क्या दिलकश अंदाज़ में बोल रहा है जैसे सच में ऐसी सुगंध का कोई खज़ाना हो इसके पास । बहुत आगे जाएगा बेटा, बिना डिग्री के भी क्या स्किल्स है भाई, दुकान पर बैठ बैठ कर बाज़ार से हुनर सीखने वालों के आगे तो सारी डिग्री फेल है भैया”, मैं मन ही मन बुदबुदाया और उठ खड़ा हुआ कमरे में जाने के लिए । एक उड़ती सी नज़र उस लड़के पर डाली वह अपनी खुशबू बेचने में मगन था, गुलाब, केवड़ा, चमेली, मोगरा, खस और भी कई लेकिन वह इन्ही को, पहले प्यार की खुशबू, मेहंदी की महक कह कह कर अनूठा प्रभाव पैदा कर रहा था और ग्राहक देख, उसका चेहरा देख लोक गीत गा गा कर मनोरंजन भी कर रहा था । “केसरिया बालम आओ जी पधारो नी म्हारे देश” हर जगह गाए जाने वाले इस गीत की पंक्तियाँ सुना सुना कर, “ए अठे आई जा, वाँ लुगाया होन खरीदेगी इके”, अपने साथ वाले छोटे लड़के को इशारा कर वह बुलाने लगा।
मैं उसकी कलाकारी, स्किल्स पर मुस्कुराए बिना न रह सका । एक पुराने महल को होटल में तब्दील कर यह राजस्थानी होटल अपनी स्थापत्य कला में बेजोड़ था, रंग बिरंगें काँचों के शीशे, मेहराब, कंगूरे, छज्जे, झरोखे, रंग बिरंगें फर्श और चटक रंग और बंधेज के पर्दे, उनके पास लटकी कठपुतलियां, घुंघरू और प्रादेशिक हस्त शिल्प से सजे कमरे| अजीब है मनुष्य भी जहाँ जिस चीज की कमी होती ही उसको किसी विकल्प से पूरा कर लेता है, प्रकृति ने जिसे रंग देने में कंजूसी की उसने अपने लिए कितने रंग बना लिए, गोल घुमावदार सीढ़ी से होते हुए मैं यह सोचने लगा । कमरे में पहुँचा तो रूम सर्विस वालों ने कमरा साफ कर रूम फ्रेशनर छिड़क दिया था, एक तीखी गंध ने मेरा स्वागत किया, इस गंध ने मुझे बचपन में पापा के सरकारी गेस्ट हाउस में फैली गंध की याद दिला दी ।
मैं उस खुशबू के सहारे बचपन में पहुँच गया । पापा का सरकारी गेस्ट हाउस, साफ सुथरा, दौरे पर कई बार हम भी जाते । इसी खुशबू में माँ के महंगे परफ्यूम की खुशबू भी महसूस हुई । मुझे तो माँ हमेशा महकती ही लगती थी, इतर लगाए ना लगाए, माँ की अपनी एक गंध होती है जो सांस या दिमाग में ही नहीं आत्मा में समा जाती है, माँ की खुशबू से बड़ा कोई इतर नहीं होता, लेकिन तभी…
एक तेज़, भभकती, बदबू से मेरे नथुने फड़क उठे, लेकिन वो बदबू कहाँ थी, तेज इतर लगाती थी वो औरत जिसे मैंने उस रात पापा के साथ देखा था । माँ तो मेरे पास सोई थी फिर वह औरत, पिता के पास लेटी उस औरत को देख मेरे मन में न जाने कैसी बदबू उत्सर्जित की कि आज भी मेरी छठी ग्रंथि वैसी बदबू से सामने वाले को तौल लेती है ।
कितने सालों से तो यह सुगंध, दुर्गंध का खेल चल रहा है मेरे साथ, कभी सब एक साथ महसूस होने लगती हैं, तो कभी कुछ नहीं, संसार गंधहीन हो जाता है |
उस तेज बदबू ने एक झटका सा दिया मैं वर्तमान में लौट आया । तो क्या सचमुच खुशबू याद रहती हैं । क्या मुझ पर उस इत्रफ़रोश का जादू छा गया है जो मैं महक के सहारे लोगो से जुड़ गया । मैने अपने चेहरे पर पानी के छींटे मारे और बाथ टब में उतर गया । पानी में खुशबू थी शायद गुलाब की, शायद इसलिए कि असली गुलाब को सूंघे तो बरसों हो गए, अब तो हरकहीं नकली खुशबुओं का डेरा है, घर में, आफिस में, होटल में रूम फ्रेशनर, कार में एयर फ्रेशनर, सुबह आठ बजे भी ए सी चलाकर बैठते हैं, कहाँ से आए हवा की खुशबू, पत्तों की गंध, ओह यह मुझे क्या होता जा रहा है, क्या उस लड़के के पास कोई जादू है, या सम्मोहन जिसने मुझ पर ऐसा असर किया । कहीं ऐसा तो नहीं खुशबू में कुछ मिला कर कोई घटना को अंजाम देना हो, मैं पसीने पसीने हो गया, तुरंत बाथ टब से निकला, एक कप कॉफी बनाई और पी गया थोड़ा बेहतर लगा, सोचा “सब ठीक है, साला डरपोक इंसान, नकली ज़िन्दगी, नकली लोगों से डील करते करते खुद से विश्वास उठ गया है, दूसरों पर से भी, सब दुश्मन से लगते हैं, उस लड़के को मुझमें क्योंकर इंटरेस्ट होने लगा, इतने धन्ना सेठ हैं यहाँ, मैं अपनी बेवकूफी पर हँस पड़ा, सिगरेट जला बालकनी में आ गया, देखा वह लड़का अपना सामान समेटे जा रहा है, जाते जाते पलट कर मेरी तरफ देख मुस्कुराया, एक रहस्यमयी मुस्कुराहट, मेरी रीढ़ की हड्डी झनझना गई और मैं तेजी से अंदर आ गया ।
उस रात नींद में भी खुश्बुओं का डेरा रहा जैसे मेरी नींद, मेरे ख्वाब भी किसी अनजाने से इतर से महक रहें हों, दिमाग के जिस हिस्से में खुशबुएँ सोई रहती हैं और अचानक वैसी ही खुशबू के संपर्क में आने से जाग जाती है, न सिर्फ खुशबुएँ जाग जाती हैं बल्कि पूरे के पूरे घटनाक्रम, लोग भी याद आ जाते हैं शायद इसे ही यादे कहतें हैं, यादे और क्या हैं बीती बातों की महकती डलिया ही तो है | क्या सिर्फ महकती डलिया ही, दुर्गंध से बजबजाता कूड़ेदान या सेप्टिक टैंक नहीं ? हाँ वो भी तो जहाँ से आने वाली दुर्गंध अब भी उबकाई ले आती है। सोचते सोचते खुशबू के समंदर में डुबकियाँ लगाते भूले बिसरे लोगों को देखते कब मैं गहरी नींद में खो गया पता ही नहीं चला ।
सुबह दरवाजे की घंटी से नींद खुली, बैरा चाय लेकर हाज़िर था, ठंड के दिन थे, अदरक की तेज गंध ने नाक को फड़का दिया, अहा क्या महक थी, फिर चाय लेकर बालकनी में आ गया, गुनगुनी धूप खिल गई थी, हवा बदन में कंपकंपी दे रही थी और धूप में खड़ा होना अच्छा लग रहा था, तभी वही लड़का दूर टीले पर दिखा अपने ऊँट के साथ, उसके साथ छोटा लड़का भी था, जाने क्या जादू था उस लड़के में मैंने फटाफट चाय खतम की और ओवरकोट लपेटे सीढ़ियां उतर उस और भागा जहाँ वह लड़का दिख रहा था |
मैं लगभग दौड़ते हुए उसके पास पहुँचा, वह अपने ऊँट को लेकर इधर उधर डौल रहा था। मैंने आवाज़ लगाई, “क्यों भाई आज खुशबुओं का पिटारा कहाँ है तुम्हारा”।
“बाबू सा इनने तो ऊँट के गू मूत में भी खुशबू आवे है, जाने कैसी नाक ले के पैदा हुओ है, केवे है कि हर चीज़ की खुशबू होवे है, इंसान की भी, मैं धरती की सारी खुशबुओं को इतर बनानो चाहूँ , बोले है बावरो” साथ वाला दूसरा लड़का बोला।
मैं धक से रह गया यह गंवार छोरा है या कोई वैज्ञानिक या कि कोई सिद्ध । अब उसकी बात जानने के लिए मैंने उसकी तरफ देखा तो वह बोला, “चुप रे तू के जाने, या बड़ी बात है तू छोटो है अभी”।
मैंने हँसते हुए कहा, “तुम बहुत बड़े हो”।
वह थोड़ा झेंपता सा बोला, “न बाबूसा, बड़ो ना, पर इस कम अकल से तो बड़ो हूँ”।
“हाँ, हाँ, तुम बहुत बड़े वाले हो भाई,” मैं अभी भी उसकी मार्केटिंग स्किल के बारे में ही बोल रहा था ।
“चलो ज़रा दिखाओ तो अपना इत्र का पिटारा देखें कौन कौन सी खुशबुएँ बटोर रखी है तुमने” मैंने कहा।
वह दौड़ कर अपना पिटारा निकाल लाया, सैकड़ों तरह की खुशबुओं की रंग बिरंगी बोतलें थी, मैंने कुतूहल से पूछा, “कल जो बोल रहे थे न महबूबा की महक, मेहंदी की गमक, बासमती चावल की, वो खुशबुएँ, वो कहाँ हैं ?
उसने हँसते हुए कहा, “बाबू साब म्हारी माँ केवे है, दिमाग में खुशबुओं को ढेर होय है, बाहर की खुशबू तो केवल दिखावो है, और भी केवे थी हर इंसान की खुशबू होय है, इंसान की क्यों साब हर जानवर की, धरती की हर चीज़ की खुशबू होय है, म्हारे तो ऐसो लागे, अब देखो गाय के पास से गुजरो तो अलग, कुत्ता के पास अलग, बिल्ली की अलग, चूँहा की अलग, घोडा की अलग, ऊँट की अलग, पेचान जाओ ना साब कि कौन सो जानवर है”।
“ओह हो सच्ची बोल रहा है लड़का हर जानवर की गंध तो होती ही है, देहगंध” मैंने सोचा।
“साब मिटटी की गंध, फूल की गंध, हर पत्ता की अलग गंध, साब जी यहाँ तक की इधर रेत की गंध होवे है, समन्दर की, नदी की, अलग अलग पानी की, और तो और साब पत्थर की गंध भी होवे है”।
“सच हम इतनी सारी सुगंधों के बीच रहते हैं,” ऐसे तो कभी मैंने सोचा नहीं, वह फिर बोला, “अच्छा साब जी कोई एक चीज़ बतावो जिसकी कोई गंध न हो”।
विज्ञान में तो रंगहीन, गंधहीन सी चीज़े बताई हैं, लेकिन इस लडके ने मुझे उलझा दिया, इसकी नज़र से जैसे देखने लगा महसूस करने लगा कि हाँ बिना गंध का तो कुछ भी नहीं |
“सोचो सोचो” , वह शरारत से मुस्कुरा रहा था, जैसे मुझे चुनौती दे रहा और कह रहा हो तुम्हारी सारी डिग्रीयां यहाँ फेल है भाई”
मुझे चुप देख बोला, “सुख की भी गंध होय है साब, दुःख की भी, यहाँ तक की मौत की भी, डर की भी खुशबू होवे है भाई सा” कहते कहते ऐसी रहस्यमय आँखों से उसने मुझे देखा कि मैं सहम गया, सच में जैसे एक अजीब सी गंध ने मुझे घेर लिया था, हाँ यह डर की गंध ही तो थी, जिसने मुझे बचपन में अँधेरे में जाते वक्त महसूस होती थी, वैसा ही भाव अभी अभी मुझे महसूस हुआ |
वह लड़का हँसा “बाबूसा मिलो कुछ बिना गंध को, ना इंसान का आस पास इतना इतर बिखरा पड़ा है कि कोई और इतर की जरूरत कोणी, पर ये बात मैं सबके ना समझाऊँ, नहीं तो म्हारी दुकान ना बंद हो जावेगी सा“ |
“माँ की गंध याद है साब, बहन की, और मेहबूबा की, तीनों गंध में अंतर है साब”
मैं चौंक पड़ा सच ही तो है, तीनों को याद करते अलग सी तरंग उठती है, क्या यह लड़का उसी को खुशबू कह रहा है, शायद हाँ, लेकिन सच में अवचेतन में जो अपने हैं उनसे जुडी हर याद की महक है, साइंस कहता है माँ के दूध की महक बच्चे के अवचेतन में हमेशा बसी होती है, वही महक उसे अपने बच्चे में भी आती है जब वह अपनी माँ के दूध में महकता है | बहन के स्नेह की सच में अलग है, पहले प्यार की महक से, ना, कहाँ कोई इतर लगाती थी विशाखा उसकी बचपन की दोस्त, लेकिन देखो तो कैसे उसकी याद आते ही उसकी खुशबू का झोँका जैसे पूरे वजूद पर छा गया, मैंने आँखे बंद कर ली जैसे किसी ने मुझे मजबूर किया हो आँख बंद करने को, विशाखा और खुशबू । सच में जैसे झरते हरसिंगार के नीचे खड़े होने का अहसास हुआ, प्यार की खुशबू, तो क्या वासना की गंध भी होती है, घबरा कर मैने आँखे खोल ली, हाँ वासना की भी गंध तो होती ही है ना, उस औरत के पापा से मिलने आने पर खीज का जो भाव आता था, वह उस सड़ांध की बदबू ही तो होती थी, नापसंदगी की भी गंध होती है, वह गंध अवचेतन को बदबू से भर देती और हम उस इंसान को नापसंद करने लगते हैं। किसी का आना महकता झौंका, किसी का सड़ांध, माँ की मजबूरी की, रुआन्सी सी, जैसे सीलन भरे बरसात के दिन सी गंध अवसाद में भर देती थी, इतने छोटे भी न थे कि समझ नही सकते थे |
ये लड़का तो वैज्ञानिक है, जिसे तरंग कहते हैं यह उसे खुशबू कह रहा है मैं उसके कहे पर रीझ गया ।
एक लिजलीजी सी गंध नथुनों में भरने लगी ऐसी जैसे किसी गीली सी चिकनी सतह पर हाथ पड़ जाने पर घिन होने लगती है, हाँ वह आदमी जो पापा के साथ घर आता था उसे देख बहन कैसे डर जाती थी, मैं भी उससे चिढ़ता था, एक बार जबरन बहन को गोद में बिठाने लगा तो अपनी बहन की आँखों में न जाने कैसा कातर भाव देखा कि उस आदमी के हाथ में जोर से काट खाया था मैं, वह आदमी बिलबिला उठा हालांकि पापा ने एक तमाचा ज़रुर जड़ दिया था मुझे, लेकिन अपनी बहन को बचाने का सुख मिला, फिर तो वह जब जब आता तब तब मैं अपनी बहन के आस पास मंडराता रहता, उसकी गंध से उबकाई आने लगी, अब भी जी कैसा कैसा हो जाता है | उसके बाद जब कभी ऐसे भाव वाला कोई इंसान आता तो उसके पास की गंध से मैं उसके भाव जान लेता हूँ, जाने कैसे गंध को लेकर मेरी इंद्रियाँ अतिरिक्त चैतन्य हो गई थीं | मेरा बस चलता तो ऐसी सारी गंध वाले इंसानों को ही मिटा देता | लेकिन इसी अतिरिक्त चैतन्य ग्रंथियों ने एक तरफ मुझे कई बार सचेत किया, तो मेरे जीवन से विशाखा को दूर भी कर दिया” एक ठंडी सांस भरी और दवाई की शीशी से कुछ दवाएं निकाल कर खा ली, कहीं फिर दौरा न पड़ जाए |
करीब 16 बरस हो गए, पापा के साथ एक टूर पर आया था इस जगह, तब से अब तक बहुत कुछ बदल गया। छोटे होटल बड़े हो गए, वर्ल्ड क्लास फेसेलिटि मिलने लगी है, लोक संगीत लोक कला को दुनिया भर में पहचान मिल रही है। लेकिन इन बंजारों की ज़िंदगी अभी भी वैसी ही है, वही ऊँट, वही नृत्य करती अपने बदन के लोच से कितनों के जी धड़काती ये लड़कियाँ।
जाने तो कैसा सम्मोहन होता है इनमें, पक्के साँवले रंग पर काले कपड़े, आँखों में गहरा काजल और चेहरे पर हाथों पर गुदने के निशान, इस लड़के के हाथ और चेहरे पर भी गुदने के निशान थे, आँखों में काजल, कान में बालियों और मर्दों के पहने जाने वाले सारे गहने आज उसकी आवाज़ से हट कर उसकी वेशभूषा पर ध्यान दिया। यूँ कुछ चीजें इतनी बाय डिफाल्ट सी नज़र आती है कि जब तक उन पर ध्यान न दो कुछ विशेष नज़र नहीं आता। 15 दिनों से सब जगह ऐसे ही पहनावे देखने की आदि मेरी आँखों ने उसके पहनावे को बाद में नोटिस किया, उसका चेहरा आज और ध्यान से देख जाने कैसा जाना पहचाना सा आँखे देख तो मैं सिहर गया,
पापा… पापा
लेकिन…
इतने साल पहले यहाँ आये थे…
एक दिन सुबह सुबह माँ को रोते झगड़ते देखा था…
पिता रूरल डेवलपमेंट में काम से गए थे, सो सात दिन बाद लौटे थे यहाँ से ।
उनके लौटते ही घर के माहौल में जाने अजीब सी गंध भर जाती थी, डर की, गुस्से की और…
मौत की गंध भी होती है ना, पिता की मौत के कुछ दिन पहले से कैसी अजीब सी गंध फ़ैलने लगी थी घर में मनहूसियत की, जाने कैसी ।
लेकिन उनकी मौत के बाद वैसी दुर्गंध घर में नहीं थी, माँ…माँ ने जैसे दुःख से नहीं बल्कि शांति की चुप्पी ओढ़ ली थी।
आज क्यों इस लड़के को देखकर पिता की याद आ रही है।
यूँ वो स्नेही रहे हर पिता की तरह, किंतु माँ के साथ उनके संबंध कभी सहज नहीं रहे,
माँ के लाख समझाने बुझाने के बाद भी वासना की उस गंध ने उन्हें नहीं छोड़ा। जैसे एक मल के ढेर के पास हज़ार अगरबत्ती लगा देने के बाद भी दुर्गंध नहीं जाती वैसे ही माँ की सात्विकता ने उन पर कोई असर नहीं किया।
और परिवार में दुर्गंध के वो घेरे बढ़ते गए।
उस दुर्गंध का मैँ इतना अभ्यस्त हो गया हूँ कि किसी अंजान स्त्री, किसी अंजान पुरुष की उपस्थिति मात्र से मुझे पता चल जाता है कि इनमें वह दुर्गंध समाई है,
मैं इसलिए बहुत से लोगों से जुड़ नहीं पाता।
एक आवाज आई, “ए छोरा, चाल घर जाने को टेम हो गयो है”,
कालबेलिया नृत्य करने वाले समूह की सबसे वरिष्ठ स्त्री जो प्रोढ़ हो चली थी, पुकारती हुई उनकी तरफ आई |
उसने तेज इत्र लगा रहा था… लेकिन वह तेज इत्र मेरे नथुने फड़काने की साथ ही दिमाग की नसों को झनझना गया, फिर एकबार, फिर वही दुर्गंध पिता तो हैं नहीं…
फिर मैं जैसे ही पलटा, अपने पीछे उस स्त्री को खड़े पाया,
एकदम से चार कदम पीछे हो गया…
वह स्त्री भी क्षण भर को चौँकी पिता की शकल पाई थी मैंने…
रेत का बवंडर उठने लगा था… लगा कोई तूफान आने वाला है… या वह तो बहुत पहले आ कर गुजर गया।
पिता केवल यहीं अपनी दुर्गंध नहीं छोड़ गए थे…
वे तो जब जब जहाँ जहाँ गए अपनी देह दुर्गंध साथ ले गए और उसे रोप आये थे किसी अंजान धरती में…मुझे हर बार ऐसा लगता,
तो क्या ऐसे कई और विषैले पौधे होगें…
उस बच्चे की तरफ एक वितृष्णा से देखा…
जबान में कड़वाहट घुल गई…
वह औरत उस लड़के को धकेलते हुए ले जा रही थी, “अच्छा बाबूजी कल फिर आजो”, कहता वह घिसटता चला जा रहा था |,
अचानक जैसे सब थम गया, मैंने अपनी आँख मली, गौर से दोनों के चेहरे देखे, कहीं कोई छाया नहीं थी पिता की, क्या हो जाता है मुझे जब किसी बच्चे को, सस्ता तेज इतर लगाए खूबसूरत औरत को देखता हूँ, और कभी पिता उस जगह आये हों तो मुझे लगता यहाँ भी…
रात बड़ी बैचेनी में गुजरी, रह रह कर दुर्गंध के घेरे मुझे घेर लेते, पूरे कमरे में लेवेंडर् रूम फ्रेशनेर को छिड़क दिया, खुद भी नहा लिया महँगे परफ्यूम में, लेकिन बदबू थी कि जाने का नाम नहीं ले रही थी।
मैंने माँ से कई बार जानने की कोशिश की लेकिन माँ ने कहा समय आने पर सब बता दूँगी |
अब तो मैंने पूछना भी बंद कर दिया था |
कमरे में आकर सबसे पहले मैंने अपने दोस्त को फोन लगाया, “कि फिर से वही दौरा पड़ने को है,
वह अगली ही फ्लाईट से मम्मी को लेकर रवाना हो जाएगा, इससे पहले कि मैं फिर उस बवंडर में घिरूँ, अब अपने को बचाने की आदत हो गई है |
वही अटैक था, खुशबुओं के बीच घिर जाता हूँ और नीम बेहोशी, फिर दवाई का लंबा डोज और फिर कई महीनों तक कोई खुशबू समझ नहीं आती । मेरा जीवन गंधहीन हो जाता है |
रात को रिसेप्शन पर फोन कर कह दिया था कि “दोस्त और माँ आ रहे हैं अगर मैं दरवाजा न खोल सकूँ तो मास्टर की से उन्हें भीतर आने दें”, दवाई का एक डोज़ लेकर मैं बिस्तर पर लेट गया, सबकुछ घूमने लगा, आगे क्या होगा उसकी मुझे अब खबर नही रहने वाली थी |
माँ मेरे मन को समझती थी, कहाँ अटका हुआ है सिरा, कहाँ कस गई है गांठ, उन्हें पता है, क्योंकि वो भी उसी दुर्गन्ध से जूझ रहीं थीं, जिसे मैंने महसूस किया था ।
बेटे का फोन सुन डॉक्टर दोस्त अनघ को बुला लिया था, माँ ने |
“क्या करना होगा”, माँ ने पूछा
“आंटी मैंने पहले ही कहा था, कथारसिस थ्योरी इस्तेमाल करनी होगी, गहरे जमें हुए गंध के झटके को, दूसरे झटके से ही ठीक किया जा सकता है,
बता दीजिए सच, शायद उसको तकलीफ देने वाले लोगों की तकलीफ और उनकी खबर से वह ठीक हो जाए”,
“क्या तुम्हें यकीन है, वह ठीक हो जाएगा”, माँ ने पूछा |
“होना ही चाहिए, इसके अलावा हमारे पास और कोई चारा नहीं, ठीक नहीं भी हुआ तो हालत और बिगड़ने वाली नहीं, कम से कम यह दौरे ठीक होंगें, जब वह हर गंध महसूस करना भूल जाता है” डॉक्टर की सलाह थी |
नीम बेहोशी में वो हिस्सा याद आया मुझे जो खुशनुमा था |
फिर विशाखा की गंध ने कुछ खुशबू बिखेरी थी मेरी ज़िंदगी में, वो समय मेरा सबसे सुंदर समय था, मैंने तो प्रेम ही किया था, लेकिन उसे और क्या चाहिए था, हल्के हल्के उड़े उड़े से वो कुछ साल, लेकिन ..
एक दिन उसके पास से भी वैसी ही दुर्गन्ध आई थी मुझे, मैं छिटक कर दूर हो गया था, तो क्या वह भी किसी और के साथ थी, मैं उससे कैसे पूछता, अनमना हो गया, दूर रहने लगा उससे मैं उसके पास से आती दुर्गन्ध को बर्दाश्त नहीं कर पाता था, रूम फ्रेशनर, डीईओ, परफ्यूम की बॉटल की बॉटल खाली कर देने के बाद भी वह दुर्गन्ध दूर नहीं होती थी ।
“अब तुम मेरे साथ रहना नहीं चाहते” का आरोप लगाकर वह चली गईं, सारे नंबर, सब कुछ डीलीट करके, पता भी नहीं कहाँ, लेकिन मेरा अवचेतन जानता था वह किसी और के साथ थी,
वह किसी और के साथ रहना चाहती थी, मेरे होते हुए भी उसको किसी और से लगाव हो गया था, जबकि मैंने उसके बाद किसी को देखा ही नहीं, उसकी खुशबू में सारी दुर्गंध खतम हो गई थी,
प्रेम की खुशबू के आगे कौन सी दुर्गंध ठहरती भला,
लेकिन अब उसकी याद के साथ ही दुर्गन्ध का बवंडर उठता है, मैं कैसे उसे भुलाऊँ, सुगंध और दुर्गन्ध दोनों का मिलना होता है उसकी याद, क्या उसे दुर्गन्ध नहीं आती, जिसके पास वो गई है,
वह कल तक किसी और के साथ था,
कल किसी और के साथ होगा,
वह भी किसी और के साथ चली जाएगी,
यह अदला बदली कब तक चलती रहेगी,
वो किसकी तलाश में है,
ये तलाश है या भटकाव,
मेरे भीतर भयानक हलचल थी,
मुझे याद आया, डुडलिंग की आदत थी विशाखा को, रास्ता ढूंढो पहेली भी पसंद थी,
डूडलिंग में कुछ अजीब नक्शे बनाती थी, जहाँ कोई अंत नहीं सब गोल मोल और रास्ता ढूंढो पहेली में कभी रास्ते ढूंढ नहीं पाती थी, खीज जाती थी, उसकी पसंद में अक्सर उलझाव वाली डिजाइन होती थी, गहने हो या कुछ और, उलझी हुई डिजाईन उसे पसंद आती थी, क्या उसके भीतर बहुत उलझाव था,
लेकिन सुलझाए कौन और कैसे,
जाने क्या खोजते हैं लोग, भटक जाते है, फिर बढ़ने लगते हैं दुर्गंध के घेरे,
और कैसे इन सारी गंधों को मैनेज करते हैं या कि उनकी ग्रंथियों ने महसूस करना छोड़ दिया है,
हर थोड़े दिन में बदलती गंध के साथ कैसे कोई जी सकता है,
कभी मेरी गंध उसे याद आती होगी,
नहीं, नहीं आती होगी, यह बीमारी तो मुझे ही है,
सबको थोड़ी ना होती है,
कुछ लोग हर दुर्गंध को सुगंध की तरह जी लेते हैं,
किसी सुगंध और दुर्गन्ध का महसूस होना लगता है छूट गया,
नहीं तो इतनी दुर्गंधों के बीच कैसे रह लेते हैं लोग,
कभी अपने आप से दुर्गंध नहीं आती,
हलचल अब बेहोशी में बदल रही थी और मैं कुछ बुदबुदा रहा था |
सुबह दोस्त और माँ को बुझती आँख से देख मैं मुस्कुराया, मतलब रात इन्ही ख्यालों में गुजर गई थी |
तीन दिन, हाँ तीन दिन इंजेक्शन और दवाई लेने के बाद मुक्त हुआ मैं उस दुर्गंध के घेरे से,
सुबह की चाय बालकनी में बैठ कर पी रहे थे हम, माँ बेटे |
माँ से पूछा मैंने “पापा के पास से दुर्गन्ध नहीं आई आपको उसकी”
“तुम्हारे पापा को भी तुम्हारी बीमारी थी, एक बार गलती हुई तो उस दुर्गन्ध से पीछा नहीं छुड़ा पाए, फिर मेरे पास आने में कतराते थे, मेरी सात्विक गंध उन्हें परेशान कर देती थी”
तुम्हें लगता था वो अय्याश थे, वैसा नहीं था, एक भूल की सजा उन्होंने खुद को दी थी,
होता है ना तुमने भी देखा होगा महसूस किया होगा, अच्छाई के सामने बुराई सदा असहज रहती है, निश्चल के सामने छल और कुटिलता सदा असहज रहतें हैं, इसलिए दौरों पर ही रहने लगे थे” माँ संभल संभल कर बोल रही थी |
मैंने कहा “छोड़ सकती थीं तुम उनको, जैसे विशाखा ने मुझे छोड़ दिया”
माँ ठंडी सांस भरकर बोलीं “हम लोग कुछ अधिक बंधे हुए थे, तुम लोग कुछ ज्यादा खुले हुए हो,”सुख में दोनों नहीं, अधिक बंधन भी दुर्गन्ध पैदा करते हैं, अधिक खुला पन भी,
क्या खुलेपन मन मर्जी की तलाश में पा लिया वो जो पाना चाहते थे,
इतना भी मत खुलो कि वापसी के सारे दरवाजे बंद हो जाएं”,
“तो क्या बंधन में पा लिया था आपने”, मैंने पूछा \
“इतना भी मत बंधो कि कोई खुला दरवाजा न देख सको,
…. लेकिन हर खुला दरवाजा मुक्ति या स्वतंत्रता नहीं होता, हो सकता है वह किसी दूसरे बंधन की शुरुआत हो”, माँ ने धीरे से जवाब दिया ।
“फिर इंसान क्या करे, कहाँ जाए,” मैंने सिर पीछे कुर्सी पर टिका लिया
“तुम किस्मत वाले हो जो तुम्हारी इंद्रियाँ दुर्गंध महसूस कर पा रही हैं, अब दुर्गंध को सुगंध बनाकर पेश किया जाता है” वे उसी तरह बाहर देखते हुए बोलीं |
“आपने उस दुर्गंध से पीछा कैसे छुड़ाया”, मैंने पूछा
“अपने भीतर के अत्तार को जगा कर” धीरे से मुस्कुराई माँ,
“वो लड़का आया था, जो इतर बेच रहा था ना, एक इतर की शीशी दे गया है, मैंने उससे बड़ी देर बात की,वह इसी इतर की बात कर रहा था,बड़ा कुशल इतरफ़रोश है”,
फिर अचानक से जैसे कोई झटका देने के लिए उन्होंने मुझे कहा
“विशाखा ने आत्महत्या कर ली”,
“क्या, कब,कैसे , मैंने झटके से कुर्सी से उठते हुए कहा, शीशी में से एक गोली निकाल कर माँ ने मेरे मुँह में डाल दी”, आगे बोलीं,
“जिस खुशबू की तलाश मेँ उसने भीतर की सुगंध के स्त्रोत बंद कर दिए थे, वह बाहर मिलना ही नहीं थी, तुम्हें पता है अपने अंतिम समय में वह हर चीज को सूँघती थी, किसी अंजानी महक के लिए, उसे अपने आप से बदबू आने लगी थी, दिन में दस बार नहाती थी, अलग अलग तरह की खुशबू वाले साबुन और इतर से, लेकिन और ज्यादा परेशान होने लगी थी, फिर एक दिन खुशबू भरे बाथरूम में मृत पाई गई”|
“मेरी चेतना शून्य होने लगी थी, तो क्या विशाखा अब इस दुनिया में नहीं है, मुझे नहीं पता कि मुझे उसकी मौत से खुशी हो रही थी या दु:ख, लेकिन यह समझ गया था कि वह समझ चुकी थी वह गलत थी, लेकिन देर से समझी”, माँ मेरी आँखों में देखते हुए बोलती रहीं
“नहीं, तुम्हें बताया नहीं, लेकिन आज जरूरी समझती हूँ, बताना, क्या पता तुम्हारी उलझन इस खबर से ठीक हो सके, तुम्हारे पिता ने भी आत्महत्या ही की थी एक तरह से, हम सबसे बहुत प्रेम करते थे लेकिन अपनी गिल्ट में सबसे दूर कर लिया अपने आपको, धीरे धीरे घुलते रहे”, फिर माँ ने आँख पोंछते हुए कहा, “कुछ दुर्गंध कभी पीछा नहीं छोड़ती” |
दरवाजे की तरफ देखा तो अनघ खड़ा था, भीतर आते हुए बोल
“माँ शायद अब इसे गंध महसूस होने लगे, मैंने आपसे कहा था इसे बता दीजिए सब, लेकिन आपके संकोच ने, काफी वक्त ले लिया,
चलो देर आयद दुरुस्त आयद”,
मैं धीरे धीरे नींद के आगोश में जा चुका था |
अगली सुबह उठा तो काफी हल्का महसूस कर रहा था |
“माँ देखो नीचे यह फूल थे, मुझे इसकी खुशबू पसंद आई”अनघ मेरा डॉक्टर दोस्त कुछ फूल चुन लाया था कहीं से |
“इस रेगिस्तान में फूल”, मैं उनींदी हँसी हँसा |
“हाँ क्यों नहीं, जब रेगिस्तान में फूल खिल सकता है, तो कुछ भी हो सकता है,
लो, दवाई तो लेते रहनी होगी, लेकिन कभी कभी इन सुगंधों को भी ट्राय करते रहना” वह बोला |
हाथ में लिया तो कुछ देर तक कोई गंध नहीं थी, मैंने तेज तेज़ सांस लेना शुरू किया, “मैं नहीं चाहता था कि मैं दुर्गंधों के घेरे में मारा जाऊँ, मैं विशाखा की सौंधी महक को याद रखना चाहता हूँ,” मैंने कहा । “क्योंकि उसने ही मुझे प्रेम की सुगंध से परिचित करवाया था, तो क्या हुआ जो बाद में वह नहीं थी मेरे साथ, मैं और माँ एक ही स्तर पर थे, हमनें तो प्यार किया था ना, माँ ने भी, प्रेम के आगे किसी और दुर्गंध को अब मैं नहीं रहने दूंगा, हम उस प्रेम की सुगंध को याद रखेंगे,
काश हम हमारे भीतर की सुगंध को पहले जगा पाते,
काश यह बात माँ पिताजी को और मैं विशाखा को समझा पाते, काश…क्यों उसके जाने के बाद…”
अनघ मेरे सामने बैठते हुए बोला,“अपने आप को दोष मत दो, उस समय तुम उसे नहीं समझा सकते थे,कोई नहीं समझा सकता किसी को…अपने भीतर की दुर्गंध खुद ही दूर करनी होती है”
एक तेज सांस ली मैंने,
फिर धीरे से एक महक ने मेरे भीतर प्रवेश किया, लगा जैसे दिमाग के कोने कोने में फैली दुर्गंध को उसने रिप्लेस करना शुरू कर दिया है, मैंने अंजुरी भरकर बालकनी से बाहर की तरफ देखा |
वह लड़का और उसकी माँ “इतर ले लो, मेहंदी इतर, बच्चे की मुस्कान का इतर ले लो बाबूजी, सुहानी शाम की गंध ले लो, महकती रात रानी की गंध ले लो बाबूजी, चहकती सुबह की गंध, ओस का इतर ले लो बाबूजी”,आवाज़ लगा रहे थे लोगों को |
मैंने ध्यान से मुसकुराते हुए दोनों चेहरों को देखा, किसी की छाया नहीं थी वहाँ, वे खाँटी राजस्थानी चेहरे थे,
मेरे भीतर का अत्तार जाग जाएगा शायद, और शायद जमी हुई दुर्गंध के घेरे मिटने लगें अब | शायद अब वो घेरे मुझे कभी नहीं घेरेंगें |
मैंने मुसकुराते हुए माँ को देखा, माँ की मुस्कान का इतर मैं महसूस कर पा रहा था |
वो कुशल इत्रफ़रोश मुझे इतर बेच गया था, उसके इतर से शायद ज़िन्दगी फिर से महकने लगे….
आदरणीय गरिमा जी!
आपकी कहानी पढ़ी । संपादकीय बढ़ाते हुए जिस पीड़ा का अनुभव हुआ था एक बार पुनः उसी पीड़ा से घिरा हुआ महसूस किया स्वयं को। कहानी को पढ़ते हुए एक अजीब सी बेचैनी हुई।
कहानी को पढ़कर लगा कि आपसे जानने की कोशिश करें कि क्या यह कथानक किसी सत्य घटना पर आधारित है? क्या जिन-जिन खुशबुओं का इसमें जिक्र है जिन्हें हम भाव समझते हैं वह कल्पना नहीं है।
ऐसा लगा कि कहानी को पढ़ते हुए हम खुद भी खुशबुओं के घेरे में उलझ गए। पर अंत भला तो सब भला!
कहानी के लिये शुक्रिया आपका।