लगता है, इस बार भी मनमोहन प्रसाद और बिराज मेहता ही रिपोर्टिंग के लिए जाएँगे। इस तरह की वारदातों में मनमोहन प्रसाद और बिराज मेहता की रिपोर्टिंग का अनुभव रिपोर्टिंग की कीमत बढ़ा देती है। प्रायः वे दोनों साथ जाते हैं।
आए दिन आनेवाली इस तरह की ख़बरों को कहानी की शक्ल देना उन्हें खूब आता है, खूब भाता है।
साथ में सनम सिंह को भी भेजा जाएगा। सबने कहा,
“इस बार सनम के हुनर लगन तथा शिक्षा की भी परख हो जाएगी।”
बड़े बाप के बेटे सनम सिंह ने अपने शौक के कारण मास काॅम में दाखिला लिया था और बिजनेस से दूरी बना ली थी।
उस गाँव के माथे पर पिछले कुछ साल से पहले कई सामूहिक नरसंहारों का दाग विद्यमान था। आए दिन रात या दिन के उजाले में भी वे सब जंगल के अँधेरे से निकल गाँव की मासूम छाती पर छा जाते। और उज्जवल धरा को लाल रंग से रंगकर गायब हो जाते…गधों के सिर से सींग जैसे।
फिर लाख सिर धुनते रहो, पकड़ में नहीं आते।
जंगल-जंगल भटकने पर पुलिस कभी खुद लाशों का ढेर बन लौटा करती। कभी धोखे से, कभी सहज रूप से पुलिस जीप, वैन को वन में बुला सुरंग में बम लगा उड़ा दिया जाता। वे इतने क्रूर और हिम्मती हो चुके थे कि आए दिन पुलिस के हताहत होने की खबरें लोगों में दहशत भर रही थीं।
“जब ये लोग ही सुरक्षित नहीं, आम आदमी कैसे भयमुक्त रहे।”
सब दबी ज़ुबान से कहते थे।
खुलकर उन निशाचरों के नाम लेने, उनके बारे में बोलने से सब बचते थे। सबको लगता था, उनकी चर्चा करने पर वे बाद में भी सबक सिखा सकते हैं। गाँववालों की तो शामत… आए दिन।
दबी जुबान से डर बोलता,
“मत पंगा ले। देखले नय, भुनेसर के छः ईंच छोटा कर देल गेलइ।”
“हाँ! मुखबिरी करेवालन के भी खैर नहीं।”
पंचायत बिठाकर खुद फैसले सुनाकर दोषियों का गला काट दिया जाता। कभी कुछ और सजा देते वे लोग। एक समांतर सरकार चल रही थी। उनके अपने नियम-कानून। गाँवों पर भी थोपते रहते। बहुत कोशिश, बहुत जानें कुर्बान कर देने पर भी वे बस में नहीं आ रहे थे।
फिर उठी उनके सफाई की लहर। समूल नाश की तैयारी। गहरा संकल्प।
कुछ और बलिदान…कुछ और नाकामी। लेकिन आजकल सुरक्षा एजेंसियों, पुलिस की मुस्तैदी तथा सरकार के लुभावने वादों के बल पर उनको समर्पण कराने के बाद बेहतर जीवन मुहैया कराने के कारण वारदातें कम हो रही थीं।
जंगल स्वच्छ हो रहा था। सब आस की डोंगी पर सवार! इधर ऐसी खबरों, खतरों से गाँवों को निज़ात मिल गई है, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता पर काफी बदलाव आया है। लोगबाग कह उठते,
“अब नक्सलवाद खत्म हो जाएगा।”
ऐसे में यह समाचार आठवें आश्चर्य की तरह।
इस साल की यह पहली घटना। फिर से अचानक उस ‘बढ़ना’ गाँव की ओर जाती कोलतारपुती सड़क गाड़ियों की आवाजाही और लोगों के शोर से भर उठी थी। आगे जाकर पगडंडियाँ भी शोर से बचने का नाकाम प्रयास करती नजर आईं।
सनम सिंह ने पगडंडी पर बढ़ते हुए पलटकर बिराज मेहता से कहा,
“सर! कल रात में पुलिसकर्मी पहुँच गए हैं।”
“साँप मर जाने पर लकीर पीटने से क्या होगा।”
“सही कहा मनमोहन जी। अभी पूरी तरह निश्चिंत होने का समय नहीं आया था।”
मनमोहन सिंह वरिष्ठ पत्रकार। कई एक्सक्लुसिव स्टोरी उनके नाम। नाम की जगमगाहट में इजाफा करता हुआ। उन्होंने ने कहा,
“पुलिस चौकी बनाकर, दस-पंद्रह सिपाहियों को बिठा देने से क्या होगा? न ढंग का हथियार, न ढंग की गोली-बारूद, न ही अच्छा वैन।”
“हाँ सर, सब कामचलाऊ।”
थोड़ा हाँफते हुए सनम सिंह बीच में आ गया।
पक्की सड़क के बाद दूर खेतों के बीच की उबड़-खाबड़ पगडंडी पर पैदल चलना उनके लिए आसान नहीं था। गाहे-बगाहे पैदल चलनेवाले सनम सिंह को इस कंकरीली, टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर पैदल चलना भारी लग रहा था। बीच-बीच में खेतों में भी उतरना पड़ रहा था। आगे-आगे पुलिस का जत्था।
पगडंडियाँ जो पीले, हरे, नीचे, लाल, सफेद पोशाकधारी ग्रामीण लोगों के द्वारा रौंदी जाती रही थीं, आज वर्दीधारियों के रंग से सराबोर थीं।
“खेतों के बाद धोड़ा छिछला जंगल, फिर नाला, तब बढ़ना गाँव आएगा। नाले को डूबकर पार करना पड़ेगा सनम।”
ठिंगने कद के बड़े पत्रकार बिराज मेहता ने बताया।
“का जी, अभी ही थक गए?”
उसने सनम को हाँफते देखकर पूछा।
“नहीं सर! थकेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे।”
पतले-दुबले, ऊर्जा से भरे सनम ने तेजी से कहा मनमोहन सिंह मुस्कुरा उठे।
“हाँ, वही तो। वीर तुम बढ़े चलो।”
हँसी आ गई दोनों को। सनम के होठों तक नहीं पहुँची।
तीनों तेज कदमों से आगे बढ़ते गए। नाले में बालू से भरी बोरियाँ डालकर, रास्ता बनाया गया था। वे लोग भी बोरियों पर पाँव धरकर पार हुए।
बहुत देर की चुप्पी न सनम सिंह को बर्दाश्त हुई, न बिराज को। जुगाली करने में हर्ज भी क्या था।
“उनसे एक बात पूछनी चाहिए सर।”
“क्या?” बिराज उत्सुक।
“इन्हें निर्दोष लोगों को मारकर क्या मिलता है।”
“शक्ति-प्रदर्शन।”
मनमोहन तपाक से बोल पड़े।
“अपनी शक्ति दिखाने का यह तरीका ठीक है सर? केवल जेन्टस को मारते, बात समझ में आती। लेडिज, बच्चे, बूढ़े की हत्या कर क्या बहादुरी दिखाते हैं सब?”
थोड़ी तल्ख़ी सनम के स्वर में। वह दोनों का मुँहलगा था।
“पहले उच्च-नीच जाति के नाम पर दबंग लोग नरसंहार को अंजाम देते रहते थे। कितने सालों तक उनके अत्याचारों को सहता रहा समाज।”
“ठीक कहते हो सनम!”
“हाँ! और अब ये लोग…।”
पहले बिराज फिर मनमोहन ने हामी भरी।
“नफरत और हिंसा कभी खत्म नहीं होगी सर, अब तो ऐसा ही लगता है।”
सनम का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था।
गाँव का सन्नाटा पास आ गया। सब चुपचाप पगडंडी पर दूरियाँ नापने लगे। आज ही रिपोर्ट तैयार कर भेजनी थी। सबके पाँवों में तेजी आ गई। उन पगडंडियों पर बढ़ते अनगिनत पैरों में वह तेजी देखी जा सकती थी।
सभी जानने, समझने, देखने को उत्सुक थे कि आखिर हुआ क्या? कैसे?
धूप में तीखापन आने लगा था। तीखी-मीठी बातों, अटकलों के बीच इसी तीखी धूप में वे अंततः पहुँच गए उस जगह, जहाँ लाशें पड़ीं थीं। लाइन से। किसी को छूना मना था।
आवश्यक कार्यवाही के बाद पुलिसकर्मी अन्य लाशों को उठाकर एक पंक्ति में रख ही रहे थे।
कुछ शव चौपाल के पास भी रखी हुईं थीं। नंगी-अधनंगी लाशों को कफन से ढँकने का जिम्मा पुलिस ने ले ली थी। झोपड़ियों, कच्चे-पक्के मकानों से चादर, धोती, साड़ी लाकर कफन ओढ़ा रहे थे।
बेजान ज़ज़्बातों के साथ घर के लोग शून्य में निहार रहे थे। लगातार रुदन के बाद पसरी ख़ामोशी। ख़ामोशी से पुलिस भी ड्यूटी निभा रहे थे। उन्हें हर हाल में तटस्थ रहना था। वे तटस्थ नजर आ भी रहे। भीतर से कितने रहते हैं, समझ में नहीं आता।
“क्या यह सच्ची तटस्थता है? इनका मन विचलित नहीं होता होगा?”
वह पूछना चाहता है, चुप रह जाता है। मन को समझाता है, ‘कैसे रह सकते हैं। आखिर वर्दीवाले भी आदमी ही हैं।’
कभी-कभी रुदन, विलाप चरम पर जा पहुँचता। सारा गाँव हिल जाता। कभी मातमी, मरघटी सन्नाटा!
कोई घर ऐसा नहीं बचा था, जिसका कोई मरा न हो। सनम, बिराज दोनों अपने काम में लग चुके थे।
बिराज तस्वीरें खींचे जा रहे थे, सनम टेप रिकाॅर्डर और कलम सँभाल चुका था।
“हे भगवाऽऽऽन !”
एक चीत्कार हवा में तैर उठी। एक सत्तर-बहत्तर साल की वृद्बा माथे पर दोहत्थड़ मारते हुए रो पड़ी थी। परिवार में सात सदस्य थे। अब केवल वह बची थी। उम्र की अशक्त मार से आक्रांत!
साथ ही कई फटी आवाजें, चीखें हवा में घुली थीं। दबी सुबकियाँ भी फिर से उभर आईं।
सब एक साथ उधर दौड़ पड़े। कैमरे चमक उठे। माइक कसमसाई। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और भी बेताब! बेताबी, बदहवासी का आलम उनमें ज्यादा। वे माइक और कैमरे सहित दौड़-भाग में व्यस्त।
सनम सिंह से इतने शवों और रक्तरंजित धरती का बोझ नहीं उठाया जा रहा था।
“बाप रे! मुझसे नहीं देखा जाएगा।”
वह माँ की कटी उँगलियों बहते खून तक को नहीं देख पाता था।
झिड़का बिराज मेहता ने,
“हिस्स! कैसे रिपोर्टर हो तुम? इससे ज्यादा मौतें देखने को मिलेंगी, क्या करोगे?”
मनमोहन प्रसाद को भी सनम की कमजोरी नागवार ग़ुजरी।
कहा,
“माना, तुम पहली बार आए हो, इसका मतलब यह थोड़े न…।”
उनकी बात अधूरी रह गई। गाँव के दक्षिण से एक शोर सा उठा
“आ गए… आ गए। मंत्री जी आ गए।”
मंत्री जी भी इस अर्द्बविकसित गाँव की पगडंडी पर लपकते हुए आ रहे थे। साथ में सुरक्षा के लिए पुलिस। पीछे उनके पिछलग्गू। भीड़ से आवाज आई,
“अरे, चमचों के बिना इनका काम चलेगा! इनमें से साठेक तो इनके च…।”
अधूरा बोलकर ही वह आवाज चुप। भीड़ से कोई बोला तो, “हाँ !…..हाँ !!” की ध्वनि एक ओर से उठी। किसी ने तल्ख़ी से कहा,
“पहले कोई इंतजाम करेंगे नहीं। बाद में भीड़ बढ़ाते रहेंगे। जैसे मरने का ही इंतजार करते रहते हैं।”
उनके पास पहुँचते ही भीड़ उग्र। चीखी,
“कहाँ थे एतना दिन?… कहाँ थे?”
मंत्री जी नीम तले जगे चौपाल पर एक किनारे से चढ़ गए।
“भाइयों-बहनों! इस दुख की बेला में हम आपके साथ हैं। मरनेवालों के लिए हमारे दिल में बहुत हमदर्दी है।”
उन्होंने नजरों को भीड़ पर दौड़ाया।
“हम किसी को नहीं छोड़ेंगे।”
सनम, बिराज और मनमोहन अन्य मीडियाकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की कर बीच में जगह बनाने में सफल हो गए थे। सबने एक्सक्लूसिव कवरेज के लिए जान की बाजी लगा दी थी। चैनलवाले और भी बेचैन नज़र आ रहे थे। सबके भीतर अपने को पहला चैनल घोषित करने की हड़बड़ी थी।
इन तीनों को भी संपादक को प्रसन्न करना था। बिराज लगातार फोटो खींचे जा रहे थे। मंत्री जी की एक-एक बात पर फोकस कैमरा, माइक।
“आप…आप सब चिंता न करें। हम मुआवजा देंगे एक-एक परिवार को पचास-पचास हजार। पिछली सरकार ने सिर्फ पच्चीस-पच्चीस हजार दिया था। हम पचास-पच…”
तभी एक पत्थर सनसनाता आया, उनकी ललाट पर लगा। उनकी बात पूरी नहीं होने दी गई। ललाट से खून निकल पड़ा। सुरक्षाकर्मियों ने तत्काल उन्हें सुरक्षा घेरे में ले लिया। चमचे दौड़े। लेकिन उन सबको पुलिस ने एक तरफ रोक दिया। भीड़ को बेदर्दी से पीछे ढकेला गया।
बेहद बेबस ग्रामीण अब बेहद क्रुद्ध नजर आ रहे थे। लाशों की राजनीति ने उन्हें भड़का दिया था।
चारों ओर चिल्ल-पों मच गई।
मंत्री जी को घेरकर चौपाल से उनके सुरक्षाकर्मियों ने सुरक्षित उतार लिया था। पुलिस भी मदद कर रही थी। कोई बोला,
“पिछली बार वोट माँगने के समय आए थे मंत्री जी।”
“सच! वे आए थे बहुत सारे लुभावने वादों की पोटली थामकर। उसे दीन-हीन ग्रामीणों को थमाया था। बीच में आना जरूरी नहीं समझा।”
पत्रकारों के बीच भी बातें पसर गईं।
“आज वे इनके दिलों को छू नहीं पाए हैं।”
“लंबे-लंबे भाषणों को उन सब ने पिछली सरकार के समय भी सुना था, जब बगल के गाँव में बीस शव बिखरे पड़े थे।
उन्होंने उस वक्त भी भाषण को नकार दिया था।”
बिराज बोले। उधर ग्रामीण,
“सरकार का हो या विपख का, नहीं चाहिए भासन! भासन से पेट नहीं भरता। जिंदगी नहीं बचता है साब।”
अभी गाँववाले हिंसक हो उठे। मंत्री जी को बाहर निकालने नहीं दे रहे थे। पुलिस भीड़ से जूझ रही थी। उग्र भीड़ को संभालना आसान न था। पुलिसवाले भी जान हथेली पर लेकर व्यवस्था में व्यस्त। सदा की तरह। कोई-कोई तो पुलिसवालों की काॅलर पकड़ झूल गया।
“नहीं ले जाने देंगे।…नहीं ले जाने देंगे।”
“कल कहाँ थे आप सब, वे जब हमें भून रहे थे? उन सबको हमको सौंपिए।”
पता नहीं कैसे उन डरपोक ग्रामीणों में हिम्मत आ गईं थी।
“चले जाइए…चले जाइए आपलोग…हमको किसी की जरूरत नहीं है।…हम खुद अपना रच्छा कर लेंगे। बस! इनको ले जाने नय देंगे।”
सब पुलिस के घेरे को तोड़ आगे मंत्री जी के पास बढ़ने को उद्मत।
सनम को बहुत पहले पढ़ी बिल्ली की कथा याद आ गई। वह दूर भागती है खतरे से. लेकिन पास आते ही जुझारु हो जाती है।
यह सीन खबरनवीसियों को भरपूर आकर्षित कर रहा था। सब सक्रिय रहते हुए भी और सक्रिय हो उठे। इधर-उधर भागते, हाँफ्ते
उन्माद में किसी ने एक पत्थर भागते मंत्री की ओर चला दिया। अब सबने रोड़े-पत्थर उठाकर चलाना शुरू कर दिया।
जब तक कोई कुछ समझे, पुलिस लाठी भाँजते-भाँजते गोलियाँ चलाने लगी। भीड़ तितर-बितर होने लगी। कुछ जिद में डटे रहे। कुछ धराशायी।
थोड़ी देर में शवों की नई खेप तैयार थी।
बिराज के कैमरे का फ्लैश लगातार चमक रहा था। कभी पेड़ के पीछे से, कभी झोपड़ियों के टूटे दरवाजे के पीछे से, कभी खाट के पास छुपकर। अन्य फोटोग्राफरों का भी कैमरा बोल रहा था। वीडियो बनानेवाले और भी उतावले। तमाशबीनों का मोबाइल भी अपना धर्म निबाह रहा था।
किसी तरह मंत्री जी को पुलिस के घेरे में उनकी गाड़ी तक सुरक्षित पहुँचाया गया। गाड़ियाँ वापस लौट गईं, तब पुलिसवालों की साँस में साँस आई। पुलिसवाले अपनी बंदूकों से भीड़ को रोके हुए थे। आस-पास के गाँवों से भी लोग जुट आए थे। इधर लाशें पड़ीं थीं और ग्रामीणों का विलाप! पूरा वातावरण अज़ब से दुख में डूब गया।
“चलो, मंत्री जी को कुछ नहीं हुआ।”
एक पुलिसकर्मी जान की खैर मना रहा था।”
“हाँ जी! हमारी भी क्या मज़बूरी है! पब्लिक गोलियाँ खाती रहे, इन्हें एक ढेले से भी बचाना है। थू है हमारी नौकरी पर।”
उसने सच मैं थूक दिया। इंसानियत बाकी थी उसमें।
दूसरावाला ज्यादा सेंसेटिव था।
थोड़ी देर में नई खेप को उठाकर पुलिसवाले चौपाल पर रखने की तैयारी करने लगे। लाशों की भीड़ मुँह चिढ़ाने लगी। कुछ लोग विरोध में उठ खड़े हुए। कोई-कोई पुलिस का काॅलर पकड़ झूल गए फिर से।
“नहीं ले जाने देंगे। हम अपनी झोपड़ी में इसी के साथ जल मरेंगे।”
“हाँ !… हाँ ! लहास ले जाने से पहले हमको मोराय दो।”
एक वृद्ध पुत्र की छलनी छाती को घेरे हुए बेहोश हो गया।
एक की मेहरारू चीखने लगी,
“तुम सब जाव, उसको बचाव। हम का हैं? कीड़ा-मकोड़ा ना? बोलो, हैं ना?…खाली कीड़ा-मकोड़ा?”
बहुत कठिनाई से उन सबको समझा-बुझाकर पाँच घंटे बाद लाशें उठाई गईं। चौपाल पर रख कफन उढ़ाया गया।
सनम सिंह, मनमोहन प्रसाद ने पूरी घटना का आँखों देखा हाल लिखा। मनभावन शीर्षक के साथ रिपोर्ट तैयार की। बिराज मेहता फोटो के साथ तैयार था। रिपोर्ट के साथ फोटो लगा ऑफिस में भेज दिया। एक्सक्लूसिव रिपोर्ट।
चैनलवाले बाइट पर बाइट ले रहे थे,
“कितनी रात को आए थे?”
“आपके बेटा-बेटी को मार डाला। आपको कैसा लग रहा है?”
“मतलब आप अभी क्या फील कर रहे हैं?”
“आगे आप सब क्या करेंगे?…गाँव छोड़ देंगे?”
“पिता, माँ, पत्नी की मौत…?”
“आप जगे थे या सोए?”
“आपको क्या चाहिए?”
“मंत्री जी ने मुआवजे की बात की। वह कम है?”
“कितने मिलने चाहिए?”
“वे तो चले गए। अब?”
“आपको बहुत तकलीफ हो रही है?”
ऐसे-वैसे कुछ वाहियात से प्रश्न!
उनकी निगाहें पुलिस की खामियाँ भी तलाशने में व्यस्त थी। थकावट से भरी पुलिस को साँस लेने की फुरसत नहीं। इस पर किसी का ध्यान भी नहीं था।
“बिराज! अब यहाँ से वापस चलना चाहिए। अब यहाँ क्या रखा है”
मनमोहन सिंह ने उनकी अंत्येष्टि के बाद कहा, रायता समेटते हुए कहा।
“हाँ! चलिए। बस, दस आदमी जिंदा बचे हैं। अब क्या फोटो लूँ? जरूरी स्नैप्स ले ही लिये।”
बिराज भी राजी थे।
सनम चुप नहीं रह सका,
“चार दिन इन मासूमों की मौत का जैसे जश्न मनता रहा। विभिन्न पार्टियों के नेता, उनके भाषण, प्रेसवाले ! और न जाने कितने मंत्रियों का आवागमन लगा ही रहा।”
उसने गहरी साँस ली। सनम आगे भी बोलता रहा,
“लगता है, आज उत्सव खत्म हो गया।”
उसकी उसाँस में नमी सी कुछ।
“आदमी की जिंदगी कितनी सस्ती है न दादा?… बस! चंद रुपयों में तौल दी गई…कफन हैं ये मुआवजे।”
“अरे! यह तो भावुक होने लगा मनमोहन जी। कैसे टिकेगा? लेने -देनेवाले दोनों खुश। फिर हमें क्या लेना-देना सनम।”
“सनम! प्रेसवालों को भावुकता शोभा नहीं देती। मोटी खाल का बनना पड़ता है।”
“तटस्थ रहना सीखो। बस, खबरें इकट्ठा करो, तस्वीरें सहेजो और अपना कैरियर चमकाओ।”
दोनों बारी-बारी समझाने लगे।
“मैं ऐसा नहीं कर सकता। यह क्या कि हमारे सामने कोई दम तोड़ रहा है और हम उसको बचाने की कोशिश करने से पहले स्नैप ले रहे हैं! रपट लिख रहे हैं।”
जोर से कहता हुआ सनम गाँव की खूनी पगडंडी पर आगे बढ़ गया।
वे दोनों भी पीछे चले।
थोड़ी दूर आते ही सनम ने खेत की मेड़ से लगे इमली पेड़ के पीछे लाल छींटदार फ्राॅक देखी। सनम उधर चलने लगा, झपटते हुए।
पास आते ही पाया, उस फ्राॅक के अंदर एक लाश थी। एक मासूम बच्ची की विकृत लाश! बच्ची ने भागते हुए यहाँ आकर दम तोड़ा हो शायद।
“लगता है, पुलिसवाले इसे देख नहीं पाए।”
कहते हुए बिराज पुनः कैमरा सँभालने लगा। मनमोहन कुछ नोट करने लगा।
सनम की बेहद उदास निगाहें इधर-उधर घूमीं।
एकाएक वह दौड़ पड़ा। भगदड़ में सामने खेत में किसी पार्टी के द्वारा लाया गया तिरंगा गिर गया था। वह उसे उठा लाया और बच्ची की खून सनी लाश पर डाल दिया ।
मनमोहन और बिराज भौंचक थे।
बिराज ने तत्काल फिर से कैमरे को फोकस करना शुरू कर दिया। धड़ाधड़ तस्वीरें ली जाने लगीं। एक नया मसाला सामने। सनम का एफर्ट अखबार की लोकप्रियता में चार चाँद लगा सकता था।
दोनों के आग्रह पर सनम ने साफ इंकार कर दिया,
“नहीं! मैं लाश को कफन ओढ़ाते हुए पोज नहीं दे सकता। मुझसे आठ चाँद लगाने की उम्मीद न पालें।”
- अनिता रश्मि

संवेदनहीन-बहुत सुंदर कहानी।
संवेदनहीन-आज के माहौल का चित्रण करती बहुत सुंदर कहानी।
वास्तव में ईश्वर की अनुपम कृति में सबसे बड़ा गुण तो लुप्त है,फिर काहे का इंसान..!
प्रभावपूर्ण कहानी।
बहुत अच्छी कहानी
प्रिय अनिता
तुम्हारी कहानी पढ़ी ।
कहानी पढ़कर शीर्षक की सार्थकता का अहसास हुआ। वास्तव में संवेदनहीनता शिद्दत से महसूस हुई।
कहानी में नक्सलियों की क्रूर हिंसक प्रवृत्ति, नेताओं का दिखावा, रिपोर्टर सनमसिंह की संवेदनशीलता केन्द्रीय भाव में है।
जाहिर है यह कहानी, न जाने इस तरह की कितनी ही सच्ची घटनाओं का प्रतिरूप है।
नक्सलियों की हिंसक प्रवृत्ति व क्रूरता से कौन है जो वाकिफ नहीं।
उनके लिये सब एक से हैं। क्या राजा क्या रंक!
छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सलियों ने खून-खराबा करके कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा
उदय मुदलियार सहित शायद 28कॉन्ग्रेसी सदस्य और 10 पुलिस कर्मियों को बेरहमी से भूँज दिया था।हम तब रायपुर में ही थे। बहुत दर्दनाक हादसा था वह। हादसा या राजनीति !यह भगवान जाने।
नक्सलवाद और नक्सली एक बड़ा संकट है।
गरीब जनता भी त्रस्त है।
कहानी का दर्द बेकसूर, निर्दोष और गरीब ग्रामवासी हैं। क्योंकि नक्सली बूढ़े, बच्चे,व महिलाओं को भी नहीं छोड़ते।जैसा कि यह सब कहानी में तुमने भी लिखा है।
कहानी यह भी कहती हैं कि अब सकारात्मक प्रयास सरकार के माध्यम से हो रहे हैं। आजादी बलिदान माँगती है पर कितना????
कहानी में सारी संवेदनाएँ ग्राम वासियों के प्रति हैं। पढ़ते हुए पता चलता है कि गाँव तक पहुँचना कितना कठिन था।विकास का *व* तो बहुत दूर काँग्रेस का या कमल का क तक वहाँ नहीं पहुँच पाया। विकास का व तो बहुत दूर है।
दर्द की इंतेहा विवेक खो देती है।जिसका घर बर्बाद होता है उस की पीड़ा वही जानता हो। मृत व्यक्ति सांत्वना से जीवित नहीं हो सकता।
जान की कीमत 50’000 की क्या किसी भी कीमत की सहायता राशि से नहीं की जा सकती।समस्या का निदान जरूरी है।
आश्वासनों से काम नहीं होते।
गाँव वालों का गुस्सा जायज था। फिर नेताजी के चक्कर में पुलिस वालों ने भी वही सब किया जो नक्सलियों ने किया था।
फिर दोनों में फर्क ही क्या रहा?
मीडिया को अपनी रिपोर्ट तैयार करनी होती है। अपने चैनल को आगे देखना होता है। उनकी संवेदनाएँ ऐसी स्थितियों में शून्य हो जाती है।
तकलीफ तभी होती जब चोट स्वयं को लगती है। वो कहावत है न-
*जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई।*
और फिर ऊल-जलूल प्रश्न-
“आपके बेटा बेटी को मार डाला आपको कैसा लगा रहा है? मतलब क्या फील कर रहे हैं?”
“आगे क्या विचार है?”
हद है भई स्वार्थ सिद्धि की।इनसे ज्यादा संवेदनहीन और कोई नहीं हो सकता।
जब वह लोग सनम से कहते हैं-
सनम !प्रेस वालों को भावुकता शोभा नहीं देती ।मोटी खाल का बनना पड़ता है। तटस्थ रहना सीखो। बस खबरें इकट्ठा करो। तस्वीरें सहेजो और अपना करियर चमकाओ।”
सनम जवाब देता है,” मैं ऐसा नहीं कर सकता। यह क्या कि हमारे सामने कोई दम तोड़ रहा है और हम उसको बचाने की कोशिश करने से पहले स्नैप ले रहे हैं।”
इस कहानी में अगर कोई एक इंसान नजर आया तो वह केवल और केवल सनम था।
लौटते हुए जब उसे खून से लतपथ एक मासूम बच्ची की लाश दिखती है ।
उसे आसपास किसी पार्टी के द्वारा लाया गया तिरंगा दिखता है और उस तिरंगे को उठाकर वह उस बच्ची पर डाल देता है।
मनमोहन और विराज के आग्रह पर वह साफ मना कर देता है-
*नहीं! मैं लाश को ।कफ़न उठाते हुए पोज नहीं दे सकता। मुझसे आठ चाँद लगाने की उम्मीद न पालें।*
बेहद करुण कहानी जो नक्सलियों की क्रूरता तो दिखाती है पर नेताओं का स्वार्थ और और बेवकूफ नेताओं को बचाने में पुलिस की क्रूरता।मीडिया की संवेदन हीनता पर दृष्टि डालती है।
सनम का रिपोर्टर होने के बाद भी सकारात्मक पक्ष एक सुकून देता है और संदेश भी देता है की इंसानियत सबसे पहले है।
एक बेहतरीन कहानी के लिए तुम्हें बधाई ।
बेहद मार्मिक कटु सत्य को उजागर करती । सत्ता और प्रेस, ही नहीं सारा तंत्र ही संवेदना हों हो चुका है । मनुष्यता के लिए कहां कोई स्थान बचा है
यह कहानी काफी पुरानी है…संभवतः अस्सी के दशक की
तब से अब तक संवेदनहीनता कम नहीं हुई है।
बस थोड़ा सा संशोधन किया है