प्रमिला वर्मा का लेख – साहिर लुधियानवी: जो गीतों की दुनिया का इतिहास बन चुके हैं
साहिर और बर्मन: संगीत और शब्दों की वह जुगलबंदी जो वक़्त से आगे चलती थी*
एक मशहूर किंवदंती के अनुसार: कई संगीत इतिहासकारों और कुछ पुराने लेखों में यह उल्लेख मिलता है कि एस. डी. बर्मन ने साहिर लुधियानवी को पहली बार मुंबई के एक मुशायरे में सुना था, जहाँ साहिर अपनी शायरी सुना रहे थे और श्रोताओं में बर्मन दा भी उपस्थित थे। बर्मन दा को साहिर की शायरी में एक अजीब सी तल्ख़ी, बेचैनी और ताज़गी महसूस हुई जो उस समय के गीतकारों से अलग थी। कहते हैं कि उस शाम के बाद एस डी बर्मन ने साहिर से मिलने की इच्छा जताई।
अधिक प्रामाणिक कथा यह है – गुरु दत्त और देव आनंद की दोस्ती और नवकेतन फ़िल्म्स के गठन के बाद, गुरु दत्त एक नई टीम बनाना चाहते थे। देव आनंद पहले ही साहिर को ‘अफ़सर’ (1950) में लेकर आ चुके थे। ‘बाज़ी’ (1951) में साहिर को गुरु दत्त के सुझाव पर लाया गया। यहीं पहली बार साहिर का एस. डी. बर्मन के साथ औपचारिक रचनात्मक सहयोग शुरू हुआ।
बर्मन दा के संगीत में बंगाल की लोक-धुनों और भारतीय शास्त्रीय संगीत का अद्भुत मिश्रण होता था, जो श्रोताओं को एक अनूठी लय में बाँध लेता था। वहीं, साहिर के बोल सिर्फ शब्दों का समूह नहीं थे, बल्कि वे कविताएँ थीं जो सामाजिक चेतना, मानवीय भावनाओं और दार्शनिक विचारों से ओत-प्रोत थीं। ‘टैक्सी ड्राइवर’ में ‘जायें तो जायें कहाँ’ हो या ‘देवदास’ में ‘मितवा लागे रे’ … हर गीत में इंसानी मन की उलझनों और भावनाओं के उस दौर के दर्शकों ने खुद के भीतर महसूस किया। उनकी जुगलबंदी ने गीतों को न केवल कर्णप्रिय बनाया, बल्कि उन्हें एक कालातीत पहचान भी दी।
बाद के वर्षों में साहिर ने एक साक्षात्कार में कहा था “मैंने शब्दों को गीत में आत्मा की तरह रखा। अगर कोई उन्हें सतही बनाता है, तो वह मेरी कविता का अपमान करता है।”
प्रमिला वर्मा
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प्रमिला वर्मा का आलेख ‘ साहिर लुधियानवी: जो गीतों की दुनिया का इतिहास बन चुके हैं ‘ में साहिर लुधियानवी के गीतों को जानने का अवसर देता है। फिल्म और साहित्य ऊपर से लगता है कि ये एक है पर ऐसा है नहीं है। फिल्म को बनाते समय यह ध्यान रखना पड़ता है कि दर्शकों को उसकी कहानी और गीत आसानी से समझ में आ जाए। वहां गंभीरता नहीं चलती है। मुख्यधारा के साहित्य में गहराई होती है। वे गीत हों या कहानी लेखक के लिए शब्द आत्मा होते हैं।
सबसे बड़ी बात फिल्म के लिए साहित्यकार को धुन का गुलाम होना पड़ता है। धुन के अनुसार शब्द फिट करने पड़ते हैं। अगर साहित्यकार ने कोई शब्द बहुत जानदार प्रयोग किया है और वह धुन में नहीं आ पा रहा है तो उसे हटाना ही पड़ेगा। मौलिक साहित्यकार से यह कम ही बर्दाश्त होता है। साहिर लुधियानवी उन्हीं में से एक है।
धुन के कारण उनके गीतों की आत्मा से छेड़छाड़ करना साहित्यकार के लिए मृत्यु के समान है। फिल्मी गीतों के रचनाकार अलग ही होते हैं। उनके लिए साहित्य नहीं पैसे महत्वपूर्ण होते हैं। संगीतकार जैसे चाहे उन शब्दों को तोड़ता मरोड़ता रहे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है।
साहिर लुधियानवी एक सच्चे साहित्य साधक थे, उनके गीत आत्मा की आवाज थे। उस आवाज से खिलवाड़ होना वे सहन न कर सके।
आपने इस लेख में साहिर लुधियानवी पर काफी जानकारी इकट्ठी करके लिखा है जिससे यह लेख प्रामाणिक बन गया है। बहुत-बहुत बधाई आपको।
प्रमिला जी!
अपने साहिर लुधियानवी जी के लिये बहुत परिश्रम से यह लेख लिखा होगा। पढ़ने के बाद यह महसूस हुआ! वे हमारे प्रिय गीतकार हैं।
आपके ही शब्दों में हम अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं, कि वास्तव में उनके शब्द जब पर्दे पर उतरते थे, तो केवल अभिनेता के होंठ नहीं हिलते थे बल्कि दर्शकों के भीतर कुछ काँपता था, कुछ ठहरता था, कुछ जागता था। और यही एक सच्चे कवि की पहचान होती है कि वह समय की सीमाओं को पार कर, पीढ़ियों के दिल में घर कर ले।
साहिर लुधियानवी का सिनेमा से रिश्ता किसी व्यक्ति का नहीं ,वह एक परंपरा बन चुका है। एक ऐसी परंपरा, जो यह याद दिलाती है कि फ़िल्में सिर्फ दृश्य नहीं होतीं, वे विचार होती हैं। और जब किसी साहिर की कलम उन विचारों को शब्द देती है, तो वह दृश्य इतिहास बन जाते हैं और इतिहास, स्मृति में अमर हो जाता है।”
अमृता प्रीतम और साहिर का प्रेम भी वास्तव में एक पवित्र प्रेम था।
आपको बधाई इस बेहतरीन लेख के लिये।
बहुत मेहनत करके लिखा गया आलेख। साहिर लुधियानवी साहब एक अज़ीमों शान शहंशाह हैं।
एक मुकम्मल शायर जिसने अपनी -माँ सरदार बेगम, से इबादत की सी मुहब्बत की।
लेखिका ने फिल्मी गानों और लोगों का उल्लेख किया है और ये सभी किस्से कहीं कहीं पढ़े गए हैं पर उन्हें एक तारतम्य से रोचक रूप में पेश किया गया है।लेखिका को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।
तिस पर भी अमृता प्रीतम यानी अमृत कौर जैसी व्यवहारिक और मौका शनास साहित्यकार का साहिर लुधियानवी सरीखे महान शायर से रिश्ते का naraative बस गढ़ दिया गया है जो सच्चाई से कोसों दूर है। जानना चाय काफी पीना ,फिल्म लाइन में मिलना और चापलूसी करके सच को बरगलाना एक आम फ़हम तरीका रहा है।यही अमृत कौर और इमरोज़,,,हां ये वही इमरोज़ हैं जो सरदार प्रीतम सिंह और अमृत कौर के वैवाहिक जीवन में वो यानी पहले प्रशंसक फिर प्रशंसक मुंडू और फिर
वो की भूमिका में रहे।
इमरोज़ को मुंबई फिल्म में काम मिलना और अमृता का एक साल उसके साथ चले जाना और फिर एक साल के बाद बलवंत गार्गी के घर पर सरदार प्रीतम सिंह का उसे फिर घर ले जाना,!!!!!!
आप सोच रहे होंगे ये क्या है?????
आप जीवित पद्म श्री और साहित्य अकादमी की पुरस्कार विजेता 91वें वर्षीय साहित्यकार मैडम अजीत कौर जी द्वारा संस्मरणों की पुस्तक हरी चींटियाँ सपना देखती हैं को पढ़ें तो सभी के भरम दूर होंगे।
आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी के मार्गदर्शन में इसी पुस्तक की समीक्षा इसी पत्रिका में प्रकाशित हुई है।पुस्तक के तीन संस्मरण अमृत कौर,संत सरदार प्रीतम सिंह और इमरोज पर हैं जो मानव प्रकृति की सच के आईने में खरी खरी पड़ताल करते हैं जो सरदार प्रीतम सिंह का पत्नी को टीबी बीमारी से बचाना,पत्नी की खुशी हेतु इमरोज को घर में रखना,अपनी पैतृक संपति में हिस्सा लेकर अमृत कौर को सौंपना,घर परिवार की प्रताड़ना सहना और चुपचाप गुरुद्वारे की सेवा करते हुए अमृत कौर को सही राह पर लाने की कोशिश में देवलोक गमन,उधर अमृत कौर का adultry की मूर्त बनना पति के पैसों से दिल्ली के पोश इलाके में इमरोज के साथ रहना और अपनी मौत तक ऐश करना,इमरोज का नौकर की मानिंद रहना और चले जाना।
पुस्तक पढ़ के देखें,,,,कम से कम टिप्पणी करने वाले ,लेखिका और पत्रिका समूह को तो जरूर पढ़नी चाहिए।