Wednesday, April 15, 2026
होमकवितासुनीता खोखा की कविता - सच मुल्तवी नहीं होता

सुनीता खोखा की कविता – सच मुल्तवी नहीं होता

सुनते हैं कि..
ये वक्त
बोलने का नहीं है,
कहने का भी नहीं है,
सुनने का भी नहीं है।
सच कहना,
इस वक्त मुहैया नहीं है
किसी सूरत।
जो सुनाई देता है,
वो सच कहाँ है?
गोया
सच मुल्तवी नहीं होता,
काल की छाती पर
शिलालेख में
दर्ज हो जाना
सच की नियति है
अलबत्ता
खामोशी की हर भाषा में,
हर छंद में,
हर लिपि में,
सच लिखा जाता रहेगा,
झलकता रहेगा।
सच
झलकता रहेगा
कभी किसी रंग में,
कभी किसी संग में,
किसी आँसू में,
कभी जख्म में,
किसी रस्म में
कभी गीत में,
कभी किसी गाथा में,
कभी किसी कथा में
कभी व्यथा में
कभी किसी चीख में
कभी चीत्कार में
कभी किसी प्रहार में
कभी किसी प्रतिकार में
सच के लिये
बहाया गया लहू
जाया नहीं जाता
रौशनाई बन जाता है।
समय के
सीने से इसके
लिखे
लेख नहीं मिट पाते ।
सुलगते हैं
वो दाग
चिंगारी बन
हर दौर की राख में ।
चिंगारी को ,
हवा मिलते ही
लग जाती है आग
इसलिए
फर्क क्या पड़ता है
कोई बोलता है या
खामोशी से
सच पर
कायम रहता है
RELATED ARTICLES

1 टिप्पणी

  1. प्रिय सुनीता जी सच मुल्तवी नहीं होता
    एक यथार्थ सत्य कविता की सत्य कभी मुल्तवी नहीं होगा हर हाल में हर काल में ,सत्य मिटाया नहीं जा सकेगा, साधुवाद

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest