मुन्ना का नाम मुन्ना नहीं था। लेकिन वह अपने कागजी नाम प्रसन्न कुमार से कम मुन्ना के नाम से ज्यादा जाने जाते हैं। मुन्ना के मां-बाप ने उन्हें पुकारु नाम मुन्ना दिया था, जो घर-परिवार, हित-नात दोस्त-महिम में चल पड़ा। धीरे-धीरे टोला-मुहल्ला भी उन्हें मुन्ना नाम से पुकारने लगा। उम्र के साथ-साथ वह पहले मुन्ना, फिर मुन्ना बाबू और आगे चलकर मुन्ना मोटिवेशनल हुए। इस प्रकार वह चाहे जो भी बने, मुन्ना हर हाल में रहे।
मुन्ना बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थे। अपनी उत्कट जिज्ञासाओं को लेकर वह तरह-तरह के प्रश्न करते और जबतक संतुष्ट नहीं हो जाते चुप नहीं बैठते। उनकी जिज्ञासाओं से उनके अध्यापक जब आजिज़ आ जाते तो झिड़क देते,’ मुन्ना, तुम हर वक़्त अपना दिमाग़ क्यों चलाते रहते हो?’
‘दिमाग़ में प्रश्न आता है तो पूछते हैं सर।’ मुन्ना मासूमियत से जवाब देते।
‘ऐसा करो, दिमाग़ घर पर रखकर आया करो।’ गुरु जी झुंझलाकर डपट देते।
ऐसी प्रताड़ना के बाद मुन्ना ठसुआ कर रह जाते। एक दिन जब वह अपना रुआंसा चेहरा लिए घर पहुंचे तो उनके पिता उन्हें देखते ही समझ गये कि आज मुन्ना को स्कूल में कुछ ज़्यादा ही डांट पड़ी है। उन्हें अपने पास बिठाकर बड़े प्यार से पूछा,’ क्या हुआ… मुंह काहे फुलाये हो?’
भीतर से बेतरह भरे मुन्ना फट पड़े,’सर से कुछ पूछते हैं तो डांट देते हैं।’
‘ हो सकता है, उस समय उनका ध्यान किसी और काम में लगा हो?’ पिता ने उनका मन बहलाने की कोशिश की।
‘ तो डांटे क्यों… कह देते बाद में पूछना।’ मुन्ना उलटे झन्ना पड़े।
पिता ने उनका मूड भांपकर समझाया,’ डांटना तो गुरु का अधिकार है। हमारे टाइम तो मार भी पड़ती थी।’
‘ जिसको कुछ नहीं आता वो ही डांटता है।’ मुन्ना ने तुनक कर प्रतिवाद किया।
पिता को अपने बेटे की संवेदनशीलता का अहसास था। उन्होंने मुन्ना की नाराज़गी को लक्ष्य कर आश्वस्त किया,’ सुनो, जब किसी से कोई उत्तर न मिले तब मुझसे पूछना। मैं तुम्हें बताऊंगा सब कुछ।’
मुन्ना का मन थिराया। वह मुसकुराते और अपने दिमाग़ को शांत करने के लिए अम्मा के पास जा पहुंचे। अम्मा ने एक भरा गिलास दूध का देते हुए पुचकारा,’ बेटा, दूध पीने से दिमाग़ मज़बूत होता है।’
मुन्ना ने दूध पीते हुए आदतन पूछा ,’अम्मा, दूध गाय देती है तो उसका दिमाग़ क्यों नहीं मजबूत होता?’
अम्मा ने माथा पीट लिया,’ कौन बोला कि उसका दिमाग़ मज़बूत नहीं होता?’
‘गाय, कौन-सा काम दिमाग़ से करती है?’ मुन्ना अम्मा से प्रश्न करते।
‘हमसे क्या पूछते हो? जा के गाय से पूछो, वही बताएगी अपनी बात।’ अम्मा ने जान छुड़ाने की गरज से मुन्ना को फंसा दिया।
मुन्ना दौड़कर घर से बाहर निकलने लगे तो अम्मा ने आवाज़ लगाई,’ अरे… दूध छोड़कर कहां भागे जा रहे हो?’
‘ बथान में गाय से पूछने!’ मुन्ना ने बिना पीछे मुड़े-रुके जवाब दिया।
मुन्ना ऐसे ही थे। वह जिस चीज के पीछे पड़ते उसके मूल तक पहुंचने की हर कोशिश करते। ऐसे ही एक रात जबकि सुबह होने में एक घड़ी बाकी थी, वह हड़बड़ा कर उठ बैठे। उनके मुंह से घुटी घुटी-सी निकली आवाज़ सुनकर उनके पिता भी उठ गये। रात के बावजूद अंधेरा काफ़ी मुलायम हो चुका था, भोर की आहट से आसमान में उजास की रेख झांकने लगी थी। पिता जी ने मुन्ना के डर को लक्ष्य किया,’ मुन्ना, क्या हुआ? काहे डरे हुए हो?’
पिता की आवाज़ सुनकर मुन्ना अपनी चारपाई से उतरे और पिता के पास आकर उनसे लिपट गये। मुन्ना सुबक रहे थे। पिता ने उनकी पीठ थपथपाते हुए पूछा,’क्या बात है? काहे रो रहे हो? कोई सपना देखा क्या?’
मुन्ना ने पिता की ओर देखा, भय और आंसू दोनों उनके चेहरे पर पसरे थे। पिता ने उनका साहस बढ़ाने की गरज से हौसला-अफ़ज़ाई की,’मुन्ना, तुम तो बहादुर लड़का हो…तुम डर कैसे सकते हो?’
‘पिता जी, इतना सारा भेड़िया हमको घेर लिया था कि हम डर गये।’ मुन्ना के भीतर डर उन्हें जकड़े हुए था, पर सुबकना थम गया था।
पिता ने मुन्ना के आंसू से नम हो चुके गाल को अपने गमछे से पोंछा, फिर उनका चेहरा अपनी ओर उठाकर छेड़ा,’ बाहर जाकर देखिए तो भुरूकवा नज़र आ रहा कि नहीं?’
मुन्ना का चेहरा एकदम फक्क पड़ गया। वह डर के मारे पिता से लिपटकर उनकी गर्दन में झूल गये। पिता उन्हें गर्दन में लटकाये हुए बाहर आये। सामने अहाते में ठिठका चांद फ़ीका पड़ गया था… रात अपना बिस्तर समेट रही थी। वह मुन्ना की पीठ थपथपाकर बोले,’ देखो तो कहां भेड़िये हैं? यहां तो गाय, भैंस खड़ी पगुरा रही है।’
मुन्ना ने पिता की हौसला-अफज़ाई से धीरे-धीरे आँखें खोलीं। देखा, सामने बथान में बंधी गाय…भैंस उनकी ओर मुंह उठाये जुगाली कर रही थीं। उन्हें यक़ीन हो गया कि वह सुरक्षित हैं और पिता के साथ रहते उन्हें डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। फिर भी उन्होंने पिता के सामने जिज्ञासा रख दी,
‘सपना में हमको भेड़िया सब क्यों घेर लिया था? लाल-लाल आँख लिए सब इतना ज़ोर-ज़ोर से काहे गुर्रा रहा था?’
पिता ने मुन्ना को कंधे से उतारा और उन्हें सीधे खड़ा करते हुए, उनकी आँखों में झांकते हुए समझाया,’ मन में जो तरह-तरह के विकार होते हैं,वो ही सपने में अलग-अलग रूप धरकर डराते हैं…।’
मुन्ना फिर परेशान दिखे… उनके चेहरे पर भय की परछाईं उभर आई थी। पिता ने लक्ष्य किया… उनका साहस बढ़ाने के लिए उपाय सुझाया,’ ऐसे सपनों से छुटकारा पाने के लिए अपने भीतर के डर को ख़त्म करना होता है। डर सब समस्या का जड़ है… जिस दिन डरना छोड़ दोगे… उसी दिन से ये सपने पीछा छोड़ देंगे।’
पिता की इस नसीहत को गांठ बांधते हुए मुन्ना ने मन ही मन संकल्प लिया कि वह अब डरेंगे नहीं… कुछ भी हो जाये, वह अपने डर पर विजय पाकर रहेंगे। यह संकल्प फलीभूत हुआ… वह अपनी इच्छाशक्ति, मेधा और मेहनत से अपने स्कूल में ही नहीं, अपने जिले में भी अव्वल आये। हाईस्कूल की बोर्ड परीक्षा में वह प्रदेश के टॉप टेन में चौथे नंबर पर थे। इंटर साइंस में एडमिशन के लिए पिता उन्हें इलाहाबाद भेजना चाहते थे, लेकिन मुन्ना अपने जिले के इंटर कॉलेज में ही पढ़ना चाहते थे। उनका तर्क यह था कि,’कोई कॉलेज कमाल नहीं करता, कमाल स्टूडेंट करता है… पढ़ना स्टूडेंट को पड़ता है, कॉलेज को नहीं।’
मुन्ना की बातों में दम था। पिता को अपने पुत्र की काबलियत पर विश्वास था, तो अम्मा को इस बात का संतोष था कि उनके मुन्ना अपने गांव-घर के नजदीक रहेंगे और उनका आना-जाना लगा रहेगा। ज़िला इंटर कॉलेज में मुन्ना का एडमिशन होते ही, अचानक उस कॉलेज का मान बढ़ गया। स्थानीय संवाददाताओं ने उनकी फोटो के साथ ख़बर छापी,’ जिस तरह फूल कहीं भी खिले उसकी ख़ुशबू नहीं छुपती है, उसी तरह मेधावी छात्र कहीं भी रहे, अपनी प्रतिभा से वह सब को प्रभावित करता है। इसका ताज़ा उदाहरण हैं प्रसन्न कुमार उर्फ़ मुन्ना बाबू। मुन्ना बाबू ने बड़े शहरों के किसी नामी कॉलेज में एडमिशन लेने के बजाय अपने छोटे से ज़िले के गवर्नमेंट इंटर कॉलेज में पढ़ने को प्राथमिकता दी है। मुन्ना बाबू के एडमिशन लेने के कारण इस इंटर कॉलेज का भाव बढ़ गया है। कॉलेज के प्रिंसिपल सुदामा पाण्डेय गर्व से कहते हैं कि हमारे कॉलेज में अच्छी पढ़ाई होने के चलते मुन्ना बाबू जैसे टॉपर छात्र ने भी यहां एडमिशन लिया है। ऐसे मेधावी छात्र ही कॉलेज का नाम रोशन करते हैं।’
महीने भर तक सब ठीक चला, लेकिन मुन्ना जैसे ही रक्षाबंधन की छुट्टियों में गांव लौटे, अम्मा उन्हें देखकर छछन गई,’क्या हाल बना रखा है? लगता है वहां खाना ठीक से नहीं खाते ? देखो तो,महीना भर में ही सूखकर काँटा हो गये हो!’
पिता भी मुन्ना की सेहत को लेकर अम्मा की चिंता से सहमत हुए। इस समस्या के समाधान के लिए पिता ने आनन-फानन शहर में किराये का घर ले लिया। मुन्ना के खान-पान, देखभाल के लिए अम्मा साथ आ गईं। तय हुआ कि पिता जी गांव-शहर दोनों जगह आते-जाते रहेंगे। इस तरह का इंतज़ाम उनके गांव के कई लोगों ने पहले से ही कर रखा था। इस व्यवस्था का परिणाम यह हुआ कि इंटर फ़ाइनल के साथ ही मुन्ना ने पहले ही अटेम्पट में आईआईटी क्रैक कर लिया। एक बार फिर उनकी मेधा का डंका पूरे शहर में बज गया। अख़बार वालों ने उनसे उनकी सफलता का राज़ पूछा तो उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से उत्तर दिया,’ सफलता का कोई राज़ नहीं होता…बस,लक्ष्य पाने की लगन होनी चाहिए।’
मुन्ना के इस आप्त वचन को उनकी उम्र के लड़कों ने हृदयंगम कर लिया,तो उनके अभिभावकों ने इसकी अनेक व्याख्याएं कीं। उनकी सफलता का श्रेय उनके कॉलेज ने भी लिया। मुन्ना के सम्मान में एक भव्य आयोजन किया गया। प्रिंसिपल सुदामा पाण्डेय ने अपने भाषण में मुन्ना की सफलता को कॉलेज की सफलता बताया, तो कई शिक्षकों ने मुन्ना के लिए भविष्य में अनेक सफलताओं की कामना करते हुए इच्छा व्यक्त की कि वह ऐसे ही अपने कॉलेज का नाम रोशन करते रहेंगे। मुन्ना ने फूल-माला और सम्मान-पत्र के साथ सबके प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा,’ कोई सफलता किसी एक अकेले की नहीं होती… इसमें गुरुजन, दोस्त-साथी और माता-पिता सब का योगदान होता है। मेरी यह सफलता आप सब की भी सफलता है।’
मुन्ना ने अपनी विनम्रता और वाकपटुता से सारी महफ़िल लूट ली थी। देर तक तालियां बजती रहीं… मानो हर कोई अपनी सफलता को सेलिब्रेट कर रहा हो। मुन्ना सबसे विदा लेकर घर पहुंचे तो पिता ने बताया कि यह मकान वह जल्द ही ख़रीद लेंगे। मकान मालिक बेचने को तैयार हो गया है।
मुन्ना ने आश्चर्य जताते हुए पूछा,’अब तो हम दिल्ली चले जायेंगे, फिर मकान ख़रीदने की क्या ज़रूरत पड़ गई?’
‘ ये मकान बहुत लछमिनिया है… सह गया है हम लोग को।’ पिता के बजाय अम्मा ने तपाक से मकान ख़रीदने का कारण बताया।
मुन्ना को मां की बात पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने पिता की ओर सवालिया निगाह से देखा, तो पिता हंस पड़े, ‘मकान मालिक का बेटा बैंगलोर में फ्लैट ख़रीद लिया है… उसे पैसों की ज़रूरत है तो उपधिया जी आनन-फानन बेच रहे हैं। हम बात किये तो वह हमें बेचने को तैयार हो गये हैं। सोचा शहर में एक घर भी हो जायेगा और उपधिया जी की मदद भी हो जायेगी।’
‘पिता जी, इसे आपदा में अवसर निकालना कहते हैं।’ मुन्ना ने पिता की बात हंसकर हवा में उड़ा दी।
मुन्ना जब आईआईटी फ़ाइनल में थे तभी उनका कैंपस सेलेक्शन हो गया। उनकी मेधा का एकबार फिर डंका बजा। उनके जिले के अख़बारों ने छापा-ज़िले के लाल को मिला बाईस लाख का पैकेज। अमेरिकी कंपनी ने दिया शानदार ऑफर।
मुन्ना अबतक मुन्ना बाबू हो चुके थे। उनके आईआईटी में दाख़िले के साथ ही उनका सम्मान बढ़ गया था। अब अम्मा, पिता जी भी उन्हें मुन्ना बाबू ही बुलाते थे। मुन्ना बाबू लगन के पक्के … काम के धुनी थे। इसी लगन और धुन की वजह से वह सालो-साल अमेरिकी कंपनी में सफलता के कई झंडे गाड़ते चले गये। उनकी कंपनी ने उन्हें प्रोमोट कर डिप्टी चीफ़ एक्सक्यूटिव बना दिया था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। अच्छा पैकेज, अच्छा करियर और अच्छा जीवन …गाड़ी, फ्लैट, क्लब मेम्बरशिप सब था उनके पास। और क्या चाहिए था? लेकिन एक सुबह जब मुन्ना बाबू सोकर उठे तो उन्होंने अपने-आप से पूछ लिया,’ मुन्ना बाबू, तुम यहां कर क्या रहे हो? क्या यही लक्ष्य था तुम्हारा? तुमने जो समाज से लिया क्या उसे वापस किया? देना तो दूर तुम समाज से कट चुके हो, कभी सोचा? ये कॉर्पोरेट की दुनिया क्या तुम्हारी अपनी दुनिया है? मुन्ना बाबू, होड़… दौड़ और टारगेट के पीछे भागते हुए तुम कहां छोड़ आये अपने लोगों को? ‘
मुन्ना बाबू ब्रश करते हुए, शेव करते हुए, नाश्ता करते हुए, ऑफिस जाते हुए लगातार इन सवालों से जूझते रहे। वह जितना सोचते स्वयं को उतना धिक्कारते। इस कशमकश से निकलने में उन्हें कई दिन लगे। उन्हें महसूस हुआ कि अपनी दुनिया से कनेक्ट के लिए, इस दुनिया से ब्रेक लेना ज़रूरी है। आख़िरकार एक दिन उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। अपने इस्तीफे की ख़बर देर शाम जब पिता को दी, तो दूसरी ओर फोन पर बड़ी देर तक ख़ामोशी छाई रही। मुन्ना बाबू को आशंका हुई कि पिता कहीं सदमे में तो नहीं चले गये! इस ख़याल के आते ही उन्होंने ज़ोर से आवाज़ लगाई,’ हेलो… हेलो… पिता जी, क्या हुआ… बोल क्यों नहीं रहे?’
‘ मुन्ना बाबू, आप समझदार हैं। अपना अच्छा-बुरा आप बेहतर समझ सकते हैं। आपने इस्तीफ़ा दिया है, तो आगे का भी कुछ सोचा ही होगा।’ पिता ने हमेशा की तरह मुन्ना बाबू के निर्णय को स्वीकार कर लिया था।
आखिर सारे तामझाम छोड़कर मुन्ना बाबू एक दिन अपने शहर लौट आये। शहर को अपने मेधावी मुन्ना बाबू का यह फ़ैसला उनकी मूर्खता लगी। लोगों ने मान लिया कि मुन्ना बाबू ‘स्पॉयल्ड जिनियस’ हैं। लेकिन मुन्ना बाबू की मेधा को कोई पकड़ ले तो फिर वो मुन्ना बाबू कहां? एक संक्षिप्त अंतराल के बाद मुन्ना बाबू ने तय किया कि वह अपने आसपास के युवाओं को सफलता के गुर सिखाएंगे। जो लड़के अपनी असफलता को अपना भाग्य मान निराश हो चुके हैं, उन्हें मोटिवेट करेंगे। वह अपने जैसे अनेक युवा तैयार करेंगे। वह कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिससे समाज में बदलाव आये… जिसे करके उन्हें संतोष मिले। इस विचार ने तब आकार लिया, जब मुहल्ले के कई लड़के उनसे मिलने आने लगे थे। ये लड़के उनसे कई तरह के प्रश्न करते, जिज्ञासाएं करते, समाधान पूछते। ऐसे ही में उन्हें लगा कि वह अगर समाज को कुछ लौटाना चाहते हैं, तो इन युवाओं का मार्गदर्शन ज़रूरी है… इनके भीतर की प्रतिभा को उभारना ज़रूरी है… इन्हें अपना लक्ष्य पाने के लिए प्रेरित करना ज़रूरी है। जब कोई लड़का पूछता कि, ‘मुन्ना बाबू,पढता तो बहुत हूं… लेकिन सफलता नहीं मिलती!’ तो मुन्ना बाबू अपने चश्मे को कुरते से पोंछते हुए समझाते,’देखिए, खूब पढ़ने से सफलता का कोई संबंध नहीं है। क्योंकि पढ़ना तो सभी जानते हैं। लेकिन क्या पढ़ना है, यह बहुत कम लोग जानते हैं। जो यह बात समझ जाता है, वो सफल हो जाता है।’
लड़का चकित हो जाता, गोया सफलता की चाभी हाथ लग गई हो। मुन्ना बाबू आईआईटी क्रेक करने के गुर बताते तो कई लड़के उन्हें घेरकर बैठ जाते। वह उन लड़कों को तरह-तरह के उदाहरणों से प्रोत्साहित करते। कभी वह बताते,’देखो, केरल में एक लड़का कुलीगिरी करते हुए भी स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन का एग्जाम क्रैक कर गया। जानते हो कैसे?’ लड़के उनकी ओर मुंह उठाये उत्सुकता से देख रहे होते, ठीक तभी वह राज़ खोलते,’पैशन। पैशन बहुत ज़रूरी है। सफल होना सभी चाहते हैं…इसके लिए तरह-तरह के उपाय आज़माते हैं, पर सफल नहीं होते…क्यों?’ अपने प्रश्न का ज़वाब वह स्वयं देते,’क्योंकि सफलता की इच्छा तो है, लेकिन इच्छाशक्ति नहीं है। तो सफलता पाने के लिए ख़ुद के अंदर पैशन पैदा करना ज़रूरी होता है।’
ऐसी बातों, ऐसे विचारों और मुन्ना बाबू के चमत्कारिक व्यक्तित्व का असर यह हुआ कि दिनों दिन उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। धीरे-धीरे वह मुन्ना मोटिवेशनल के नाम से जाने जाने लगे। मुन्ना के लिए इस विशेषण का ईजाद किसने किया, ठीक-ठीक बताना संभव नहीं है। लेकिन यह इस क़दर चल पड़ा कि स्वयं मुन्ना बाबू ने भी इसे बिना किसी किन्तु-परन्तु के स्वीकार कर लिया। सोने पर सुहागा यह कि इस साल आधा दर्ज़न लड़कों ने आईआईटी तो नहीं, एनआईटी एग्जाम को क्रेक कर लिया। इसके अलावा पांच बच्चे राज्य के इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश पाने में कामयाब हो गये। इधर रिजल्ट आया और उधर उनके नाम की शोहरत मुहल्ले से निकलकर पूरे शहर में पहुंच गई। देखते-देखते उनके पास लड़के-लड़कियों की भीड़ उमड़ पड़ी। इस भीड़ को देखकर, इनकी आँखों में उम्मीद की मासूमियत देखकर मुन्ना बाबू एक पल को सिहर गये। उन्हें लगा, ये बच्चे उन्हें कोई मसीहा समझने लगे हैं, जो उनके भरोसे हर इम्तहान पास कर जाना चाहते हैं। इस धर्मसंकट से मुन्ना बाबू को उनके पिता ने उबारा,’ हर बच्चे में प्रतिभा होती है, लेकिन मार्गदर्शन के अभाव में वे अपने लक्ष्य पर फोकस नहीं कर पाते हैं। आपको बस यही करना है। ‘
मुन्ना बाबू को एकबारगी याद आया कि कभी यही बात पिता ने उनसे भी कही थी-अपने लक्ष्य पर फोकस करिये! मुन्ना बाबू मन ही मन मुसकुराए और मन ही मन तय किया कि उनके पास आ रहे बच्चों को वह इस तरह मोटिवेट करेंगे कि वे अपने लक्ष्य पर फोकस करने में स्वयं सक्षम हो सकें। मुन्ना बाबू अपने मिशन में जुट गये। उन्हें इस काम में मजा आने लगा था। स्वयं अपनी सार्थकता महसूस होने लगी थी। इसी दौरान उन्होंने अपने मोटिवेशनल लेक्चर्स यूट्यूब पर डालने शुरु कर दिये। इसका इतना ज़बरदस्त असर हुआ कि कुछ ही महीनों में उनके यूट्यूब चैनल के सब्सक्राइबर्स की संख्या लाखों में पहुंच गई। उन्हें ख़ुशी हुई कि उनकी पहल का युवाओं ने दिल खोलकर स्वागत किया है।
एक दिन अचानक वार्ड कमिश्नर का चुनाव लड़ रहे रमन मिश्रा पिता जी के पास आये और उनसे अपना सपोर्ट मांगा। दो चुनावों में असफल रह चुके रमन मिश्रा से पिता ने मुन्ना बाबू को मिलवाया। चाय-वाय के बीच ही मुन्ना बाबू ने रमन मिश्रा से पूछा,’ चाचा, आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि आप हर बार अपना चुनाव क्यों हार जाते हैं?’
‘ ब्राह्मण,राजपूत का वोट तो हमको पूरा मिल जाता है, लेकिन ओबीसी, एससी और मुसलमान का वोट बंट जाता है। अब तक इसी कारण हार होती रही, पर इस बार सब को साधने में लगा हूं।’ रमन मिश्रा ने एक मिनट में अपने चुनाव का पूरा चित्र खींच दिया।
मुन्ना बाबू के होंठों पर मुस्कुराहट उभर आई। पिता जी ने उन्हें टोका,’ हंस क्यों हो रहे हो?’
‘ चाचा जी, जात-वात के पुराने फॉर्मूले पर कब तक चुनाव लड़ियेगा?’ पिता जी को जवाब देने के बजाए मुन्ना बाबू रमन मिश्रा से मुख़ातिब हो गये,’चुनाव जीतने के लिए नया-तौर तरीका अपनाना होगा। जो सब कर रहे हैं, वही आप भी कर रहे हैं तो इसमें नया क्या है?’
‘ नया? चुनाव में नया क्या हो सकता है? सभी इसी तरह चुनाव लड़ते हैं।’ रमन मिश्रा हैरान नज़र आये।
रमन बाबू की हैरानी को झटका देते हुए मुन्ना बाबू ने सलाह दी,’ चाचा, महिलाओं और युवाओं को अपने से जोड़िये… उनकी ज़रूरत के हिसाब से अपने काम की योजना बनाइये और उन तक यह बात प्रभावी ढंग से पहुंचाइये। महिला को कोई पूछता नहीं, उन्हें आप भाव दीजिये। युवक बदलाव के आकांक्षी होते हैं,उन्हें अपनी रणनीति से जोड़िये।’
रमन बाबू तो हतप्रभ-सा मुन्ना बाबू को देखते रहे। उन्हें लगा, सामने बैठे मुन्ना बाबू साक्षात उनकी जीत की गारंटी हैं। सफलता की मास्टर चाभी। उन्होंने स्वयं को संभालते हुए मुन्ना बाबू के पिता जी से अनुरोध किया,’भइया, गोद में बच्चा शहर में ढिंढोरा? मुन्ना बाबू से कहिये कि इस बार ये हमरो नइया पार लगवा दें।’
‘ रमन बाबू, हम मुन्ना बाबू पर कभी अपनी मर्ज़ी नहीं थोपे। जो निर्णय लेना होगा यही लेंगे।’ पिता जी ने दो टूक तटस्थता अख़्तियार कर ली।
रमन मिश्रा ने मुन्ना की ओर बड़ी आस से देखा… उनके चेहरे पर याचना, निरीहता और करुणा के मिले-जुले भाव इतने सघन थे कि मुन्ना बाबू भीतर से दहल गये। उन्होंने विनम्रता से अपनी स्थिति स्पष्ट की,’ चाचा, मैं आइडिया दे सकता हूं, इम्प्लीमेंटेशन तो आपको ही करना होगा।’
‘ मुन्ना बाबू, अपने चाचा की मदद नहीं कर सकते आप? मेरी इज़्ज़त बस आपके हाथ में है। थोड़ा मेरे लिए भी समय निकाल लीजिये… यह उपकार जीवन भर नहीं भूलूंगा।’ अपनी बात पूरी करते करते रमन बाबू ने प्रार्थना की मुद्रा में अपने हाथ जोड़ लिए थे।
मुन्ना बाबू ने पिता जी को देखा, वह तो जैसे स्थितप्रज्ञ थे। रमन मिश्रा की आँखें एकटक मुन्ना बाबू पर टंकी थीं। मुन्ना बाबू ने निर्णायक स्वर में अपनी सहमति देते हुए कहा,’ यह चुनाव आपकी प्रतिष्ठा का प्रश्न है तो मेरी प्लानिंग की परीक्षा है। देखते हैं रिजल्ट क्या रंग लाता है?’
मुन्ना बाबू के इस निर्णय से पिता जी सहमत नहीं दिखे, लेकिन हमेशा की तरह उन्होंने मुन्ना पर अपनी इच्छा नहीं थोपी। रमन मिश्रा के प्रस्थान के बाद उन्होंने अपने मन का खटका अवश्य व्यक्त किया,’राजनीति में बहुत गंदगी है।’
‘पिता जी, इसी सोच ने राजनीति का ये हाल कर रखा है। हाथ पर हाथ रखे रहने से कभी कोई बदलाव नहीं आता।’ मुन्ना बाबू ने पिता के आरोप को निरस्त किया।
‘ जेपी मूवमेंट हुआ तो था… अन्ना हजारे का भी आंदोलन हुआ था… क्या हुआ उसका हश्र?’ पिता ने ताना मारा।
‘ इसलिए बदलाव की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए? कोई कोशिश नहीं करनी चाहिए?’ मुन्ना बाबू के प्रश्न ने पिता को निरुत्तर कर दिया।
मुन्ना बाबू की योजना, रणनीति और सघन प्रचार ने रंग दिखाया। उनसे जुड़े युवक-युवतियों ने भी उनकी योजना को घर-घर तक पहुंचाने में मदद की, जिसका परिणाम हुआ कि रमन मिश्रा चुनाव जीत गये। उन्होंने मुन्ना बाबू के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुआ कहा,’ मुन्ना बाबू, आपका अहसान हम ज़िंदगी भर नहीं भूलेंगे। जब मेरी सेवा की ज़रूरत हो, बेहिचक कहियेगा।’
‘चाचा, हम आपसे एक ही अनुरोध करेंगे, मुझे कभी शर्मिंदा मत होने दीजियेगा।’ मुन्ना बाबू ने दो टूक निवेदन किया।
रमन बाबू ने दोनों हाथों से अपने कानों को हाथ लगाया, फिर मुन्ना बाबू के दोनों हाथों को थामकर आश्वस्त किया ,’मुन्ना बाबू, मेरी ओर से आप बेफ़िक्र रहिये।’
मुन्ना बाबू की चुनावी रणनीति के रमन बाबू तो मुरीद हुए ही, उनके विरोधियों ने भी लोहा माना। रमन बाबू जिस पार्टी से जुड़े थे उसके मुख्यालय में उनका उठना-बैठना था। अपनी जीत के बाद जब वह मुख्यालय पहुंचे तो पार्टी अध्यक्ष से मुन्ना बाबू का ज़िक्र करना नहीं भूले। मुन्ना बाबू की रणनीति, योजना, डाटा एनालिसिस और उनकी मोटिवेशनल एप्रोच की उन्होंने दिल खोलकर तारीफ़ की। तत्काल तो अध्यक्ष जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन जैसे ही रमन बाबू ने विदा मांगी, अध्यक्ष जी ने पूछा,’ यह वही लड़का तो नहीं, जो अमेरिकन कंपनी की नौकरी को लात मारकर चला आया?’
‘जी… जी वही है… वही।’ रमन बाबू ने दांत निपोर दिये।
‘क्या नाम बताया उसका?’
‘जी, मुन्ना। मुन्ना बाबू नाम है उसका। बहुत टैलेंटेड नौजवान है।’ रमन बाबू के भीतर का हुलास उमड़ आया था।
‘ देखिए, हम तो टैलेंट की कद्र करने वाले लोग हैं। किसी दिन मिलवाइये मुन्ना बाबू से।’ अध्यक्ष जी की इच्छा जानकर रमन मिश्रा दोहरे हो आये,’ ज़रूर सर, ज़रूर।’
रमन मिश्रा से अध्यक्ष जी का संदेश पाकर मुन्ना बाबू भड़क गये,’ चाचा, राजनीति मेरा प्रोफेशन नहीं है, हमको काहे घसीट रहे हैं इसमें?’
पास बैठे पिता ने टोका,’ हाथ पर हाथ रखे रहने से कभी कोई बदलाव आता है क्या? राजनीति में बदलाव चाहते हैं तो राजनीति को समझना तो पड़ेगा?’
मुन्ना बाबू पिता जी के तंज को समझ गये। इसे उन्होंने चुनौती की तरह लिया और एक दिन रमन मिश्रा के साथ अध्यक्ष जी से मिलने पार्टी ऑफिस पहुंच गये। बातों-बातों में मुन्ना बाबू के विचारों और राजनीति के बारे में जानकर अध्यक्ष जी बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने तुरंत इच्छा ज़ाहिर की,
‘ क्यों नहीं आप हमारी पार्टी जॉइन कर लेते हैं?’
‘ नहीं… अभी मैं ख़ुद को आज़माना चाहता हूं… अपनी क्षमता को पहचानना चाहता हूं। मुझे पार्टी के दायरे में मत बांधिये।’ मुन्ना बाबू ने बगैर हिचक इनकार कर दिया।
‘ मुन्ना बाबू, आप कॉर्पोरेट वाले लोग हैं न … हर काम प्लानिंग करके करने की आदत होती है, समझ सकता हूं।’ अध्यक्ष जी ने दाना डाला,’ लेकिन पार्टी तो आपकी सेवा लेगी ही। आपके टैलेंट का लाभ तो हमें मिलना चाहिए।’
यह बीच का रास्ता था, मुन्ना बाबू को जमा। उन्होंने पार्टी कार्यालय आना-जाना शुरु कर दिया। अध्यक्ष जी जब उन्हें महत्व देते थे तो बाकी किसकी हिम्मत थी कि कोई उन्हें भाव न देता? अध्यक्ष जी और मुन्ना बाबू की सहमति से पार्टी कार्यालय में उनके लिए एक कमरा अलॉट कर दिया गया। वहां कंप्यूटर, प्रिंटर आदि की व्यवस्था कर दी गई। मुन्ना बाबू ने पार्टी की अंदरूनी, बाहरी संरचना,नेतृत्व का प्रकार और अनुपात,पार्टी का राज्य में प्रभाव, भविष्य की संभावना आदि पर अध्ययन शुरु कर दिया। जैसे-जैसे वह स्थितियों को समझते जा रहे थे, विभिन्न स्तरों पर काम का दायरा बढ़ता जा रहा था। इस ज़रूरत को देखते हुए अध्यक्ष जी ने मुन्ना बाबू को अपनी टीम बनाने के लिए हरी झंडी दे दी। इधर मुन्ना बाबू ने टीम बनाकर काम शुरु किया और उधर राज्य में विधानसभा चुनावों की चर्चा शुरु हो गई। आसन्न चुनावों के मद्दे-नज़र पार्टी कार्यालय में बैठकों का दौर शुरु हो गया। ऐसी ही एक बैठक में मुन्ना बाबू ने रिपोर्ट दी, कि कई क्षेत्रों में पार्टी को लेकर असंतोष है… कई ज़िलों में पार्टी संगठन मज़बूत नहीं है…और एंटी इनकंबेंसी भी एक बड़ा फैक्टर है…।’
अध्यक्ष जी ने बीच में टोका,’ लेकिन सरकार ने तो विकास के काफी काम किये हैं!’
‘ जी, लेकिन एंटी इनकंबेंसी एक स्वभाविक फैक्टर है, जो सत्तारूढ़ पार्टी पर असर डालती है। लोगों की अपेक्षाएं अनेक आयामी होती हैं, जो सब की सब पूरी नहीं होतीं, वह भी असंतोष का कारण बनती हैं।’ मुन्ना बाबू ने अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा,’ इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।’
अध्यक्ष जी के माथे पर बल पड़े। उन्होंने पहलू बदलते हुए सवाल किया,’ माने विकास का जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता? वह इसे किसी खाते में नहीं डालती?’
अध्यक्ष जी की चिंता को गंभीरता से लिया मुन्ना बाबू ने,’ चुनाव किसी एक वज़ह से न जीता जाता है, न हारा जाता है। चुनाव अब पुराने तरीके से नहीं लड़ा जा सकता। अपने विरोधियों को नये नैरेटिव में फंसाइये… अपने पिच पर उन्हें खेलने को मज़बूर करिये। जनता को अपने काम भी गिनाइये और नये मतदाताओं को अपने पाले में लाइए। पहली बार वोट देने वाले युवाओं और महिलाओं पर फोकस कीजिए। मेरा यकीन है कि पार्टी को जीतने से कोई नहीं रोक सकता।’
मुन्ना बाबू ने चुनाव को लेकर जो चित्र खींचा और जो प्रारूप सामने रखा, उससे अध्यक्ष जी चमत्कृत दिखे। उन्होंने अगले ही दिन चुनाव समिति की बैठक बुलाई। बैठक में मुन्ना बाबू के सुझावों पर सहमति जताते हुए चुनाव रणनीति और प्रचार की पूरी ज़िम्मेदारी मुन्ना बाबू को सौंप दी गई। इसी बैठक में मुन्ना बाबू की फ़ीस और उनकी पूरी टीम के लिए बजट को मंज़ूरी दे दी गई। यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी, जिसके लिए मुन्ना बाबू ने दिन-रात एक कर दी। अपनी टीम में उन्होंने आईटी एक्सपर्ट लड़के-लड़कियों को जोड़ा…प्रचार-प्रसार के लिए एक टीम बनाई… डाटा एनालिसिस के लिए कुछ एक्सपर्ट दिल्ली से हायर किये। पार्टी कार्यालय में चुनाव की सनसनी के साथ, नये लड़के-लड़कियों की उपस्थिति ने एक ऐसा रोमांच रच दिया था, कि राजनीति के पुराने दिग्गज हक्का-बक्का रह गये। इस पूरी कवायद में मुख्यमंत्री की दिलचस्पी ने मुन्ना बाबू के क़द को और बढ़ा दिया था।
मुन्ना बाबू ने मुख्यमंत्री से कुछ नये नैरेटिव पर चर्चा की। थोड़ी गंभीर मंथन के बाद मुख्यमंत्री ने फ़िलहाल दो नैरेटिव को मंज़ूरी दे दी, जिसपर चुनाव समिति ने भी मुहर लगा दी। इस चुनाव के लिये पहला नैरेटिव था-युवाओं को टेक्निकल शिक्षा में सरकार सब्सिडी देगी। दूसरा था -प्रदेश की महिलाओं को सोशल सिक्योरिटी की गारंटी।
कुछ-कुछ दिनों बाद ऐसे कई नैरेटिव मुन्ना बाबू ने पार्टी के सामने रखे। पहले दोनों नैरेटिव की कामयाबी से उत्साहित पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने सभी नये नैरेटिव को मंज़ूरी दे दी। प्रचार-प्रसार के नये तरीकों और आक्रामक शैली ने पार्टी के पक्ष में माहौल बना दिया। और अंततः यह चुनाव एक बार फिर पार्टी ने जीत लिया। मुख्यमंत्री पुनः पद पर आसीन हुए। मुन्ना बाबू को जीत का बड़ा कारण माना गया। तमाम पार्टियों की चर्चा के केंद्र में आ गये थे मुन्ना बाबू। कुछ ही महीने बाद दक्षिण भारत के एक राज्य में चुनाव की घोषणा होते ही वहां की सत्तारूढ़ पार्टी ने मुन्ना बाबू से संपर्क किया। मुन्ना बाबू की शर्तें मानकर उन्हें हायर कर लिया गया। मुन्ना बाबू की पुरानी टीम उनके साथ उस राज्य में पहुंची और युद्ध स्तर पर काम शुरु कर दिया। वहां भी कई नैरेटिव गढ़े गये। दक्षिण-उत्तर की राजनीतिक लड़ाई से इतर उन्होंने राज्य के विकास में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने, एक लाख नई नौकारियां देने का वादा, हर महिला के लिए मुफ्त हुनर प्रशिक्षण योजना और इन हुनरमंद महिलाओं को अपना रोजगार शुरु करने के लिए बैंक लोन देने की गारंटी की घोषणा ने राज्य में चुनाव का माहौल बदल दिया।
आख़िरकार वही हुआ… उस राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी फिर चुनाव जीत गई। इस चमत्कार ने मुन्ना बाबू को पूरे देश में लोकप्रियता के चरम पर पहुंचा दिया। सभी उन्हें जीत की गारंटी मानने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर-पूर्व के एक बड़े राज्य में चुनाव की घोषणा होते ही सभी पार्टियों में मुन्ना बाबू को हायर करने की होड़ मच गई। इस बार मुन्ना बाबू वहां की विपक्षी पार्टी के साथ जुड़े। उनकी स्ट्रेटजी, उनका प्रचार और नये-नये नैरेटिव के सामने सत्तारूढ़ पार्टी नहीं टिकी। यहां मुन्ना बाबू ने नये नैरेटिव सेट किये। उत्तर-पूर्व और शेष भारत के बीच सेतु बनाने के लिए उन्होंने केंद्रीय योजनाओं में स्पेशल पैकेज पर ज़ोर और इको फ्रेंडली उद्योगों को लगाने का वादा किया। राज्य के युवाओं को तकनीकी शिक्षा के लिए बैंगलोर, अहमदाबाद, पूना आदि शहरों में भेजने के लिए स्कॉलरशिप, स्थानीय उत्पादों को बाज़ार मुहैया कराने के लिए सरकार की ओर से सहायता देने की घोषणा की गई। मुन्ना बाबू की टीम ने ग्रासरूट स्तर पर सघन अभियान चलाया। एक-एक सीट की एनालिसिस… कमज़ोरियों की पहचान और उनके बरक्स नये समीकरण के साथ घेरेबंदी ने इस राज्य में भी उनकी रणनीति की रणभेरी बजा दी।
एक के बाद एक विजय अभियान के मद्देनज़र मुन्ना बाबू की प्रतिभा, क्षमता और विश्वसनीयता ने उन्हें एक निर्विवाद रणनीतिकार के रूप में स्थापित कर दिया था। वह देश की सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए ज़रूरत बन गये थे। राजधानी स्थित उनके आवास पर राजनीतिक दलों के नेताओं की आमद बढ़ गई थी। वे अपने दल की ओर से उनकी सेवा लेने का ऑफर देते। मुन्ना बाबू सबकी बात सुनते और सोचकर ज़वाब देने का आश्वासन देते। अक्सर उनके मोबाइल पर पार्टियों के अध्यक्ष और आलाकमानो के कॉल आते,’ कॉन्ट्रैक्ट फ़ाइनल कीजिए, मुन्ना बाबू … पैकेज की चिंता मत कीजिए।’
ऐसे गहमा-गहमी भरे दिनों में एक सुबह मुन्ना बाबू के पिता जी राजधानी में उनसे मिलने आ पहुंचे। पिता जी को बगैर पूर्व सूचना आया देख वह चौंके। मन में आशंका-सी उठी,’ सब ठीक तो है? अम्मा कैसी हैं?’
‘ तुम्हारी अम्मा ही भेजी हैं, हालचाल ले आने के लिए।’
पिता जी का स्वर सामान्य था, लेकिन मुन्ना बाबू उसमें छिपे उलाहने को समझ गये,’ वो क्या है कि… एक के बाद एक कई राज्यों में चुनाव के कारण बहुत यात्रा करनी पड़ी…।’
पिता जी सहज दिख रहे थे… लेकिन उनके अंदर जो घुमड़न थी उसे मुन्ना बाबू ने लक्ष्य किया।
‘ मैं स्वयं घर आने का प्लान कर रहा था।’
‘ घर आने के लिए भी प्लान करना पड़ता है?’ पिता जी की आँखें उनके चेहरे पर आ टिकी थीं।
मुन्ना बाबू की आँखें झुक गईं ।
‘ आप लोग ख़ुश नहीं हैं तो छोड़ देता हूं यह सब।’ मुन्ना बाबू ने निरपेक्ष भाव से प्रस्ताव रखा।
‘ आप जानते हैं, हमने अपना निर्णय कभी आप पर नहीं थोपा। लेकिन आप जो निर्णय लेते हैं, उसका मूल्यांकन भी तो आप ही को करना होगा। तमाम राजनीतिक पार्टियों को चुनाव जिताते हुए आपने सोचा, कभी आपकी रणनीति फ़ेल हो गई तो आपका हश्र क्या होगा? ये ही पार्टियां जो सर पर उठाये फिर रही हैं, आपको दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकल फेंकेंगी।’ पिता जी की बातों में बेटे के हित की चिंता थी। मुन्ना बाबू कोई जवाब नहीं दे पाये।
पिता जी उसी शाम लौट गये। उन्हें विदा करते हुए मुन्ना बाबू ने जल्द ही घर आने का वादा किया। उस रात वह बड़ी देर तक बेचैन रहे… पिता जी की बातें कचोटती रहीं… उनकी आँखें बेधती रहीं… अम्मा का तरल चेहरा…आशीर्वाद में उठे हाथ… मन भीगता रहा। वह रात ख़ुद से जूझते गुजरी। अगली सुबह उन्होंने अपने सहयोगी शशांक सिन्हा से पूछा,’ अगर हम ये काम छोड़ दें तो कैसा रहेगा?’
यह अप्रत्याशित प्रश्न था… सुबह-सुबह क्या हुआ मुन्ना बाबू को? शशांक को भौंचक देख मुन्ना बाबू ने टोका,’ शशांक क्या हुआ…तुम इस तरह क्यों देख रहे? भाई, मैं सीरियस हूं।’
‘ रीयली?’ शशांक अभी भी निश्चित नहीं हुआ था।
‘ यस… आ’यम सीरियस।’ मुन्ना बाबू ने दृढ़ स्वर में अपना निर्णय दुहराया।
शशांक एक पल को सन्नाटे में चला गया… मुन्ना बाबू उसकी ओर देखे जा रहे थे मानो उसके उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हों। शशांक ने उत्तर के बजाय प्रश्न किया,’ रातों रात यह ख़याल कैसे आया?’
‘ शशांक, मैंने मल्टी नेशनल कंपनी की जॉब छोड़ी, क्योंकि मुझे लगा यह मेरा लक्ष्य नहीं है। मुझे संतोष नहीं मिल रहा था। नौकरी छोड़ दी। मैं अपने शहर के युवाओं को अपने ज्ञान…अपने अनुभव से मोटिवेट कर रहा था। उनकी कामयाबी देख मुझे संतोष होता कि मैं अपने समाज में कुछ कंट्रीब्यूट कर रहा हूं। लेकिन एक इत्तेफ़ाक़ ने मुझे राजनीति को जानने-समझने का अवसर दिया। इस दौरान मैंने बहुत कुछ सीखा… लेकिन प्रश्न है कि इस राजनीति का हासिल क्या रहा?’
मुन्ना बाबू की आवाज़ में लम्बे सफ़र की थकान थी। एक ख़ालीपन का अहसास तारी था। इस अहसास से उबारने की गरज से शशांक ने कहा,’ मुन्ना बाबू, आपने इस दौरान जो किया, राजनीति में पहले कभी नहीं हुआ। इन पार्टियों की कथित विचारधाराओं में जकड़े रहने की हदबंदी टूटी है। ये अपने पुराने नारों से मुक्त हुई हैं। इन पार्टियों में प्रोफेशनल तौर-तरीकों के प्रति रुझान बढ़ा है।’
मुन्ना बाबू ने शशांक को बीच में रोका,’ शशांक, तुमने गौर किया कि जो तुमने कहा उसका क्या निहितार्थ है? ‘ शशांक को ज़वाब देने का मौका दिये बगैर उन्होंने अपनी बात ज़ारी रखी,’ मतलब साफ है कि विचार की प्रतिबद्धता इन पार्टियों के लिए कोई मायने नहीं रखती। सत्ता पाना एक मात्र उद्देश्य है। गांधीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, अम्बेडकरवाद, वाम-दक्षिण सब इनकी सहूलियतों के कवच हैं। हमारी एंट्री ने इनकी असलियत को उजागर कर दिया… क्या नहीं?’
इस बार फिर शशांक के हैरान हो जाने की बारी थी,’ताज़्जुब… इस तरह तो कभी सोचा नहीं।’
‘ नहीं सोचा तो अब सोचो… इसीलिए तो मैंने तुम्हें बुलाया है।’ मुन्ना बाबू ने शशांक को बुलाने का मक़सद बताया।
‘ तो काम बंद कर देने से क्या हासिल होगा?’ शशांक के स्वर में उलझन थी।
‘काम बंद करने का मतलब। हाथ पर हाथ रखकर बैठना नहीं। बल्कि यह कि क्या कुछ नया नहीं किया जा सकता?’ मुन्ना बाबू ने इरादा जाहिर किया।
‘ मतलब?’ शशांक की उलझन और गहरा गई थी,’ नया… क्या नया?’
‘ शशांक, हमारी स्ट्रेटजी… प्लानिंग… मोटिवेशन से ये पॉलिटिकल पार्टियां सरकार बना रही हैं। लेकिन कहीं कोई बदलाव नहीं आया। फिर हमारी मेहनत का क्या मतलब?’
मुन्ना बाबू के स्वर में अफ़सोस के साथ क्षोभ भी था। शशांक ने महसूस किया कि मुन्ना बाबू किसी गहरी उथल-पुथल से दो-चार हो रहे हैं। कोई राह… कोई दिशा … कोई विकल्प तलाश रहे हों। उनकी इस विचार मुद्रा में कहीं न पहुंच पाने का मलाल स्पष्ट था। उसने उन्हें टोकना उचित न समझा। दोनों के बीच चुप्पी छाई रही। यह सायास थी… एक के पास उत्तर नहीं था, एक उत्तर तलाश रहा था।
‘अगर हम एक राजनीतिक पार्टी बनायें और चुनाव लड़ें, तो क्या हर्ज़ है?’ मुन्ना बाबू की आवाज़ किसी दूर-दराज़ से आती जान पड़ी गोया वह झिझक से भरी हो।
‘मुन्ना बाबू, स्ट्रेटजी प्लानिंग करने और पॉलिटिकल पार्टी चलाने में फ़र्क होता है। यह हमारा काम नहीं है। वी आर नॉट मेड फॉर पॉलिटिक्स।’ शशांक ने वस्तुस्थिति समझायी।
‘ शशांक, हमें चुनाव लड़ाने का… पार्टियों को जिताने का भी हमारे पास कोई अनुभव नहीं था, लेकिन हमने ख़ुद को आज़माया। हम एक नये मिजाज़ और नये अंदाज़ वाली पार्टी बनाकर ख़ुद को आज़मा सकते हैं… बड़े बदलाव की छोटी शुरुआत कर सकते हैं… नहीं?’ उत्साह से भरे मुन्ना बाबू ने जैसे शशांक की हिमायत चाही।
शशांक को मुन्ना बाबू का इरादा समझ में आ गया था। उनकी बेचैनी का अहसास हो रहा था। उनके प्रश्न का उत्तर देने के बजाय उसने सुझाव दिया,’ क्यों न पूरी टीम से राय ली जाए… वे इस बाबत क्या सोचते हैं, जाना जाये ?’
मुन्ना बाबू को शशांक का सुझाव जंचा। उन्होंने सहमति जताते हुए उसी दिन दोपहर बाद अपनी पूरी टीम की मीटिंग बुलाई। टीम के सामने शशांक ने मुन्ना बाबू के प्रस्ताव को रखा। मुन्ना बाबू ने पॉलिटिकल पार्टी बनाने की ज़रूरत, उसका उद्देश्य और स्वरुप पर विस्तार से चर्चा की। सब कुछ स्पष्ट करने के बाद उन्होंने अपनी बात का समापन किया,’ यह पार्टी सिर्फ देश की राजनीति ही नहीं बदलेगी, देश को भी बदलेगी। युवा, महिला, किसान इस पार्टी की चिंता के केंद्र में रहेंगे। सब को समान अवसर और सब की समान साझेदारी पार्टी का उद्देश्य होगा।’
कुछ अशांकओं, कुछ जिज्ञासाओं और कुछ किन्तु-परन्तु के बाद पूरी टीम ने राजनीतिक पार्टी के गठन पर सहमति दे दी। उसी दिन पार्टी का नाम भी फ़ाइनल हो गया-जन हिताय। मुन्ना बाबू के सीने पर पड़ा बोझ जैसे उतर गया हो… उनकी आँखों में कोई सपना मचल उठा था… एक ऐसा सपना, जिसमें मनुष्य की गरिमा प्रतिष्ठित थी। तय हुआ कि ‘जन हिताय जन संपर्क अभियान’ शुरु किया जाय… जनता की बुनियादी समस्याओं का अध्ययन किया जाय, लोगों को जन हिताय के उद्देश्य से परिचित कराया जाये। समय आने पर जन हिताय की राजनीतिक पार्टी के रूप में घोषणा की जायेगी। मुन्ना बाबू की टीम व्यवस्थित थी। मुन्ना बाबू के साथ काम करने वाले युवा नये प्रयोग, नये रोमांच और नये स्वप्न देखने के उत्साह से भरे थे। जन हिताय ने जन संपर्क, अध्ययन,अनुसंधान और डाटा कलेक्शन का काम शुरु कर दिया। सघन अभियान और गहन विचार-विमर्श के बाद अंततः एक दिन जन हिताय को राजनीतिक पार्टी के तौर पर लॉन्च कर दिया गया। इस अवसर पर देश के अनेक क्षेत्रों से लोग उमड़े चले आये। वे जो मुन्ना बाबू के करिश्माती व्यक्तित्व से प्रभावित थे, वे जो जन हिताय के जन संपर्क अभियान के दौरान उसके उद्देश्य से सहमत थे और वे जो जन हिताय में अपने हित की संभावना देख रहे थे। सब मिलाकर ये एक ऐसी जन जुटान थी, जिसने मुन्ना बाबू की टीम को अत्यंत उत्साह और आत्मविश्वास से भर दिया था।
जन हिताय पार्टी के अस्तित्व में आते ही तमाम राजनीतिक पार्टियों के होश उड़ गये। वो राजनीतिक पार्टियां जो मुन्ना बाबू की काबलियत की मुरीद थीं, जो उनकी रणनीति और योजनाओं की क़ायल थीं, उनमें एक साथ बौखलाहट और नाराज़गी ने उबाल मारना शुरु कर दिया। उनके अंदर इस नई पार्टी को लेकर रणनीतिक तैयारी आरम्भ हो गई। अंततः ये राजनीतिक पार्टियां इस नतीज़े पर पहुंचीं कि मुन्ना बाबू की पार्टी का मुकाबला आसान नहीं होगा। ये भय इस क़दर बढ़ा कि तमाम राजनीतिक पार्टियों ने जन हिताय पार्टी और मुन्ना बाबू के ख़िलाफ़ आक्रामक रवैया अपनाना शुरु कर दिया। वह पार्टी जिससे रमन मिश्रा जुड़े थे और जिसे एंटी इनकंम्बेसी के बावज़ूद जिताने में मुन्ना बाबू का बड़ा हाथ था, उसने सबसे पहले हमला बोला,’ बड़े-बड़े बह गये गधा पूछे कितना पानी? इस पार्टी की असलियत जल्द ही सामने आ जायेगी। तेल देखिए और तेल की धार देखिए।’
एक विपक्षी पार्टी ने आरोप लगाया,’ यह सत्तारुढ़ पार्टी की बी टीम है। इसे कॉर्पोरेट कंपनियों की फंडिंग और कुछ चुने हुए बिजिनेसमैन का संरक्षण प्राप्त है। यह पार्टी गरीबों का नहीं उद्योगपतियों का भला करेगी।’
एक वामपंथी पार्टी ने तंज कसा,’ बिना किसी विचारधारा की यह एक दिशाहीन पार्टी है। इसके पीछे वो बुर्जुआ ताकतें हैं, जो गरीबों, किसानों, मज़दूरों की विरोधी हैं। यह अराजकता को बढ़ावा देने वालों का संगठित गिरोह है।’
दक्षिण भारत के एक वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता ने आरोप लगाया,’ यह पार्टी उत्तर भारतीयों का एक और तमाशा है। हम इसे दक्षिण भारत में घुसने नहीं देंगे।’
मुन्ना बाबू सारे आरोप, सारे व्यंग्य, सारे उलाहने सुनते रहे और मन ही मन मुसकुराते रहे। वह जानते थे कि उनके विरोध की एकमात्र वजह है, उनका ख़ौफ़। इन पार्टियों को पता है कि मुन्ना बाबू उनकी कमज़ोरियों से वाक़िफ़ हैं और वे अपनी चुनावी रणनीति में उनकी इन्हीं कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाएंगे। उनकी पार्टी लगातार जनता के बीच काम कर रही थी और लोगों में यह विश्वास पैदा करने में कामयाब हो रही थी कि ‘जन हिताय पार्टी’ जनता के हित में, जनता के साथ मिलकर जनता के आदेश से काम करने वाली पार्टी है। इस जन उत्साह को देखकर एक दिन शशांक ने मुन्ना बाबू का ध्यान आकृष्ट किया,’ मुन्ना बाबू, जन हिताय पार्टी से लोगों की उम्मीदें बहुत बढ़ गई है।’
‘शशांक, यह उम्मीद ही है, जो हर बदलाव की बुनियाद होती है। इसका मतलब है कि लोग बाकी दलों से निराश हो चुके हैं। लोगों को जन हिताय पार्टी में उम्मीद दिख रही है। हमें इस उम्मीद को जगाये रहना है।’
‘ लेकिन उन आरोपों का क्या जो तमाम पार्टियां जन हिताय पर लगा रही हैं?’ शशांक ने सवाल किया।
‘ इसका अर्थ यह है कि हमारा निशाना सही जगह पर लगा है। वे हमारी उपस्थिति से बौखला रहे हैं। उन्हें हमारी शक्ति का एहसास है। हम उनके आरोपों का ज़वाब देने में अपनी शक्ति नष्ट नहीं करेंगे।’ मुन्ना बाबू ने दो टूक निर्णय सुनाया।
यह भी एक रणनीति थी। मुन्ना बाबू ने अपनी टीम को स्पष्ट कर दिया था,’ हमें उनकी चाल में नहीं फंसना है, बल्कि हमें उनको अपनी पिच पर खेलने को मज़बूर करना है।’
यही हुआ… चुनावों की घोषणा होते ही मुन्ना बाबू ने अपनी पहली पिच तैयार की,’ये थकी देह, थके दिमागों वाली पार्टियां युवा देश की अपेक्षायें पूरी करने के काबिल नहीं हैं। देश को नयी सोच, नई राजनीति वाली ऐसी पार्टी चाहिए जो देश के करोड़ों युवाओं को साथ लेकर चले, जो युवा सपनों को ऊंची उड़ान दे सके।’
सभी पार्टियां इस चाल में उलझ गईं… उन्हें अपने बूढ़े नेतृत्व… धर्म… जाति और क्षेत्रीयता के पुराने एजेंडे और परिवारवाद की जकड़न का जवाब देना कठिन हो रहा था। इन पार्टियों की कुल जमा पूंजी सरेआम लुट जाने का ख़तरा आसन्न था। वे बौखला कर मुन्ना बाबू पर हमलावार हो गये,
‘ मुन्ना बाबू विदेशी फंडिंग लेकर देश के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं। उनकी पार्टी के पास इतना पैसा कहां से आया इसकी जांच होनी चाहिए।’
एक राष्ट्रवादी पार्टी भारतीयता की दुहाई देते हुए हमलावार हुई,’ यह राजनीतिक पार्टी नहीं कुछ नौजवान लड़के-लड़कियों की मौज-मस्ती का अड्डा है। ये लोग हमारे समाज के लिए बड़ा ख़तरा हैं। ऐसे लोग हमारी महान सभ्यता और संस्कृति को ख़त्म कर देंगे।’
जन हिताय पार्टी पर हमले हर दिन बढ़ते जा रहे थे। मुन्ना बाबू या उनकी टीम की ओर से कोई ज़वाब न दिये जाने के कारण सारी पार्टियों का हौसला बढ़ता जा रहा था। ये पार्टियां अब मुन्ना बाबू के विरुद्ध निजी हमले पर उतर आई थीं,’ मुन्ना बाबू अमरीकी कंपनी से अपने नक्कारेपन के कारण निकल दिये गये थे। जो एक कंपनी का न हुआ, वह देश-समाज का क्या होगा?’
‘ जन हिताय पार्टी में काम करनेवाली कई लड़कियों ने मुन्ना बाबू पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। जान से मार दिये जाने की धमकी के कारण ये लड़कियां मुंह खोलने से डरती हैं।’
मुन्ना बाबू अबतक सारे आरोपों पर चुप्पी साधे रहे, लेकिन चरित्र पर हुए हमले और पार्टी से जुड़ी लड़कियों पर इस घटिया आरोप ने उनके धैर्य के बांध को एक झटके में तोड़ दिया। उन्होंने पार्टी की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई और बिना किसी भूमिका के सीधे पूछा,’ पार्टी की किसी महिला सदस्य को मुझसे या पार्टी के किसी भी पुरुष साथी से कोई शिकायत हो तो खुलकर बताइये। हम हर नागरिक के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। अगर पार्टी में ही किसी महिला साथी का सम्मान सुरक्षित नहीं तो हमारी इस लड़ाई का कोई मतलब नहीं। महिला साथी बेहिचक अपनी बात सबके सामने रखें।’
सभी एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। सभी को पता था कि विरोधी पार्टियों द्वारा जो घटिया आरोप लगाया गया है, मुन्ना बाबू उसी को लेकर आहत हैं। एक तेज़ लहर आक्रोश की उठी और सभी ने समवेत स्वर में अपना विरोध दर्ज कराया,’ यह हमारे विरोधियों की साज़िश है…वे हमारा मनोबल तोडना चाहते हैं। हम एक हैं और एक रहेंगे। हम उनके आरोपों के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर कर जवाब देंगे।’
मुन्ना बाबू सभी साथियों की एकजुटता देखकर, उनके भीतर उमड़ रही प्रतिकार की भावना देखकर गर्व से भर गये। उन्होंने दूने उत्साह से एलान किया,’ उनके ख़िलाफ़ लड़ाई हमें और सघन करनी होगी। ‘
अगले ही दिन जन हिताय पार्टी ने ज़िलों से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिरोध मार्च निकाला। उनके हाथों में प्लेकार्ड थे – अपनी बहू-बेटियों को बदनाम करना बंद करो! इस मार्च का असर यह हुआ कि जनता में जन हिताय पार्टी की लोकप्रियता और बढ़ गई, इसमें आरोप लगाने वाली पार्टियों के ख़िलाफ़ नाराज़गी भी शामिल थी। जन हिताय पार्टी के प्रति स्त्रियों और युवाओं का बढ़ता रुझान जहां मुन्ना बाबू के स्वप्न को साकार होने का संकेत दे रहा था, वहीं विरोधियों को पांव के नीचे की ज़मीन खिसकती दिखने लगी थी। जैसे-जैसे मतदान के दिन क़रीब आ रहे थे, सभी पार्टियों का घमासान तेज़ होता जा रहा था। हमले बढ़ रहे थे। एक-दूसरे को घेरने में तरह-तरह की रणनीतियां सामने आ रही थीं। चुनाव प्रचार चरम पर था। सभी ने सारी शक्ति झोंक रखी थी। अल्ल-सुबह से देर रात सघन चुनाव अभियान में जुटे नेताओं की नींद हराम हो चुकी थी।
इसी अनथक भाग-दौड़ और अपने स्वप्न का पीछा करते हुए मुन्ना बाबू जब देर रात घर लौटते तो उन्हें अनेक सवाल घेर लेते… वे लोग जिनके लिए वह कल तक बेहद प्रिय थे… जिनके लिए अति विश्वसनीय थे, जिनकी आँखों के तारा थे, जिनकी डूबती राजनीति के खेवनहार थे, आज उन्हीं के लिए दुश्मन हो गये थे! उन्हीं की आँखों की किरकिरी बन गये थे? आज भी इसी मनःस्थिति में सोचते-सोचते उन्हें लगा, वह अर्जुन की तरह उस चक्रव्यूह में घिर गये हैं, जिसमें हर योद्धा उनका जाना-पहचाना है। हर महारथी उनका श्रेष्ठ है। हर धनुर्धर परखा हुआ है।
अचानक नींद, जाग और स्वप्न की इस कशमकश के बीच, मुन्ना बाबू को घुप्प अंधेरे में लाल अंगारे-सी दहकती दो आँखें उन्हें घूरती नज़र आईं। जबतक कुछ समझ पाते एक-एक कर ऐसी कई लाल आँखें उनकी ओर बढ़ने लगीं। दहकते शोलों का एक झुंड सधी चाल से उनकी ओर बढ़ता चला आ रहा था। देखते-देखते वह शोलों के बीच घिर गये थे। ये हिंस्र भेड़िये थे। उनकी भयावह आंखों में मौत के अंगारे लपलपा रहे थे। आसमान की ओर मुंह उठाकर दिल दहला देने वाली उनकी गुर्राहट में फाड़ खाने की आतुरता थी। मुन्ना बाबू पसीने-पसीने हो आये थे। अपने बचाव में वह लगातार पीछे खिसकते जा रहे थे। इस नीरव रात के बीचोबीच खूंखार भेड़ियों का यह हमला इतना अप्रत्याशित था कि उनके होशो-हवास गुम गये थे। उन्हें साफ नज़र आ रहा था कि ये भेड़िये किसी भी क्षण झपट्टा मारकर उन पर टूट पड़ेंगे। उनकी आक्रामकता इतनी आतंक-कारी थी, कि ज़िंदगी की आख़िरी हद पर खड़े वह सीधे अपनी मौत से मुक़ाबिल थे। यह वह क्षण था, जब अपनी जान बचाने की अंतिम कोशिश में उन्होंने पूरी शक्ति के साथ उस अंधेरे में छलांग लगा दी, जिसके पार उम्मीद की कोई किरन नहीं थी।
भेड़ियों को कतई उम्मीद नहीं थी कि उनके बीच घिरे मुन्ना बाबू उन्हें चकमा देने में कामयाब हो जायेंगे। क्रोध में उन्मत्त भेड़ियों ने कहीं ज़्यादा ज़ोर-ज़ोर से गुर्राना शुरु कर दिया। उनकी गुर्राहट में हिंसक चीख़ थी। शिकार के पकड़ से बाहर निकल जाने का आहत अहंकार था। वे अगले ही क्षण अंधेरे में भागते मुन्ना बाबू के पीछे दौड़ पड़े। मुन्ना बाबू जान हथेली पर रखकर भाग रहे थे। उन्हें अपने पीछे आती भेड़ियों की आवाज़ें तेज़ और तेज़ भागने को मजबूर कर रही थीं। वे भाग रहे थे, भेड़िये पीछा कर रहे थे।
यह ज़िंदगी और मौत के बीच बाहर की जंग थी, जिसे लड़ते हुए मुन्ना बाबू पस्त हो आये थे। उन्हें लग रहा था कि वह किसी भी क्षण औंधे मुंह गिरेंगे और उनके प्राण पखेरू इस देह से निकल जायेंगे। निराशा के इस चरम क्षण में उन्होंने ख़ुद को संभाला। अंतिम बार इस जीवन का खुली आँखों से नज़ारा करने के लिए मुड़ कर पीछे देखा। आश्चर्य कि वहां दूर-दूर तक न भेड़िये थे, न भेड़ियों की लाल दहकती वे आँखें थीं, जिनका ख़ौफ़ अभी भी दिलो-दिमाग़ को अपनी गिरफ्त में लिए हुए था। सामने एक बड़ा-सा दर्पण था। बिल्कुल आदम-क़द।
घुप्प अंधेरे के बावजूद उस दर्पण में कोई परछाईं डोलती नज़र आ रही थी। मुन्ना बाबू ने आतंक,आश्चर्य और औत्सुक्य से दर्पण को देखा। वह धुंधली परछाईं धीरे-धीरे दर्पण में आकार लेने लगी थी। अबतक अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हो चुकी उनकी आंखों के सामने दर्पण में हू-ब-हू उनकी परछाईं थी। हतप्रभ से वह एक-एक क़दम दबे पांव दर्पण के क़रीब आये। हठात वह परछाईं भेड़िये के आकार में तब्दील होती दिखी। वह भेड़िया दर्पण के बीचोबीच आसमान की ओर सर उठाये गुर्राने की तैयारी में था।
आज की राजनीति पर करारा तंज करती सुंदर कहानी।
शुक्रिया रत्नाकर जी.
अवधेश प्रीत की कहानी ‘मुन्ना मोटिवेशनल’ एक लंबी कहानी है। कहानी का पात्र मुन्ना बचपन से ही जीनियस है। और यह प्रतिभा उसके साथ ताउम्र बनी रहती है। वह अपने जीवन में कभी फेल नहीं होता है। मोटिवेशनल तो ऐसा कि जहां हाथ रख दे वहीं सफलता। मिट्टी में हाथ लगा दे तो सोना बन जाए।
कहानी का प्रवाह ऐसा है कि एक बार पढ़ना शुरू हो जाए तो पाठक अंत तक ही पढ़ता चला जाता है। मुन्ना जिज्ञासु तो है ही, उसका पिता भी बहुत समझदार है। लेखक राजनीति और विदेशी कंपनियों का जानकार हैं। हर चीज को कहानी में इस तरह से पिरोया गया है कि कोई भी चीज बोझिल नहीं लगती है। वैसे मुझे लग रहा था कि कहानी रमन बाबू को चुनाव जितवाने के बाद खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन कहानी लगातार आगे बढ़ती जा रही थी। दक्षिण भारत के चुनावी जीत में भी खत्म की जा सकती थी।
इसके बाद कहानी भारतीय राजनीति के जीवित मोटिवेशनल का एहसास कराने लगती है। यहां से पाठक हल्का होने लगता है। लेकिन कहानी की भाषा शैली और बुनावट ऐसी है कि पाठक उसे छोड़ नहीं सकता है।
अवधेश प्रीत जी आपकी यह कहानी बहुत जानदार है। बहुत दिनों बाद इतनी अच्छी कहानी पढ़ी है। बहुत-बहुत बधाई आपको
इतनी विस्तृत और गहन टिप्पणी के लिए आपका आभार. कहानी के तमाम पक्षो को आपने जिस तरह डिकोड किया है, वह मेरे लिए उत्साहवर्द्धक है. बहुत बहुत शुक्रिया लखनलाल पाल साहब. कहानी को वक़्त देने के लिए साधुवाद.
अवधेश जी!
आपकी कहानी पढ़ी।
ऐसा लगा कि काफी लंबी हो गई है। उसे छोटा किया जा सकता था ।काफी दोहराव है।
कहानी को पढ़कर एक बात समझ में आई।
कम उम्र में बच्चों की नादानी अगर किसी प्रकार की जिज्ञासा से प्रश्न पूछती है। तो उस समय बच्चों को बहुत समझदारी के साथ जवाब देना चाहिये।
टालने की कोशिश बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिये।
प्रश्न पूछना बच्चों की जिज्ञासु प्रवृत्ति का द्योतक है और वह उम्र ऐसी रहती है कि जो कुछ समझाया जाता है बच्चों के दिमाग में छप जाता है।
कथानक की पृष्ठभूमि राजनीति से जुड़ी हुई है, और कहानी इस बात की गवाही देती है कि अपने हित की दृष्टि से किसी अन्य को को गिराने के लिए किस हद तक नीचता पर उतरा जा सकता है।
मुन्ना मोटिवेशनल को अंत में खुद में खुद को तलाश करना पड़ता है। वह स्वयं से डर नहीं लगता है
पुरवाई का आभार।
नीलिमा करैया जी, कहानी पढ़ी, अपनी राय दी, यह एक लेखक का हासिल है. आपके सुझाव सर आँखों पर.कहानी के आकार और दोहराव को कम कैसे कर सकता हूं, सोचूंगा. कहानी को वक़्त देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.