Saturday, March 14, 2026
होमफीचरप्रमिला वर्मा का लेख - साहिर लुधियानवी: जो गीतों की दुनिया का...

प्रमिला वर्मा का लेख – साहिर लुधियानवी: जो गीतों की दुनिया का इतिहास बन चुके हैं

साहिर और बर्मन: संगीत और शब्दों की वह जुगलबंदी जो वक़्त से आगे चलती थी*
मुंबई की बारिश से भीगी सड़कों पर जब एक शायर खामोश कदमों से चल रहा था, उसके भीतर एक ज्वालामुखी फूटने को तैयार था — शब्दों का, संवेदनाओं का, और एक ऐसे संगीत का, जो अभी जन्म लेने वाला था। वह शायर था…. साहिर लुधियानवी। और कुछ ही महीनों बाद, जब उसकी मुलाकात हुई सचिन देव बर्मन से ….बंगाल की मिट्टी में पले, लोक-संगीत की गहराइयों से उठे एक जादूगर से… तब भारतीय सिनेमा के इतिहास में वह अध्याय शुरू हुआ, जिसे सुनहरी साझेदारी कहना भी कम पड़ता है।
1940 के दशक के अंत और 1950 के दशक की शुरुआत भारतीय फिल्म उद्योग के लिए बदलाव का दौर था। गीत अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं थे, बल्कि सामाजिक टिप्पणियाँ, व्यक्तिगत दर्द और दार्शनिक विचार व्यक्त करने का माध्यम भी बन रहे थे। ऐसे समय में, साहिर लुधियानवी, जो अपनी क्रांतिकारी शायरी और प्रगतिशील विचारों के लिए जाने जाते थे, मुंबई आए। वे पहले से ही साहित्य की दुनिया में एक स्थापित नाम थे।
वहीं दूसरी ओर, सचिन देव बर्मन कलकत्ता (अब कोलकाता) से मुंबई आए थे, जहाँ उन्होंने बंगाली लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत की गहरी समझ विकसित की थी। वे एक ऐसे संगीतकार थे जो धुनों में मिट्टी की सुगंध और गहरी भावनात्मकता ला सकते थे। इन दोनों दिग्गजों की मुलाकात फिल्म उद्योग के माध्यम से हुई। 
एस. डी. बर्मन, जिन्हें एक ऐसे गीतकार की तलाश थी जो उनकी धुनों में गहराई और अर्थ भर सके,  वे साहिर के लेखन से बेहद प्रभावित हुए। साहिर की कविताओं में वह दार्शनिक और विद्रोही स्वर था जो उस समय के सिनेमा की बदलती जरूरतों के अनुकूल था।
एक मशहूर किंवदंती के अनुसार: कई संगीत इतिहासकारों और कुछ पुराने लेखों में यह उल्लेख मिलता है कि एस. डी. बर्मन  ने साहिर लुधियानवी को पहली बार मुंबई के एक मुशायरे में सुना था, जहाँ साहिर  अपनी शायरी सुना रहे थे और श्रोताओं में बर्मन दा भी उपस्थित थे। बर्मन दा को साहिर की शायरी में एक अजीब सी तल्ख़ी, बेचैनी और ताज़गी महसूस हुई जो उस समय के गीतकारों से अलग थी। कहते हैं कि उस शाम के बाद एस डी बर्मन  ने साहिर से मिलने की इच्छा जताई।
लेकिन, इतिहास को गहराई से देखने पर इस मुशायरे की तारीख, स्थान और विवरण स्पष्ट रूप से प्रामाणिक स्रोतों में दर्ज नहीं हैं। यह बात कुछ लोगों की मौखिक यादों और बाद की संस्मरणों पर आधारित है। जैसे कि यतींद्र मिश्रा, राजू भारतन, या नसरीन मुन्नी कबीर की किताबों में संक्षेप में इसका ज़िक्र आता है, लेकिन निश्चित विवरण नहीं।
अधिक प्रामाणिक कथा यह है – गुरु दत्त और देव आनंद की दोस्ती और नवकेतन फ़िल्म्स के गठन के बाद, गुरु दत्त एक नई टीम बनाना चाहते थे। देव आनंद पहले ही साहिर को ‘अफ़सर’ (1950) में लेकर आ चुके थे। ‘बाज़ी’ (1951) में साहिर को गुरु दत्त के सुझाव पर लाया गया। यहीं पहली बार साहिर का एस. डी. बर्मन के साथ औपचारिक रचनात्मक सहयोग शुरू हुआ।
उनकी पहली महत्वपूर्ण फिल्म ‘नौजवान’ (1951) थी, जिसमें साहिर के लिखे गीत ‘ठंडी हवाएँ लहरा के आएँ’ ने तुरंत लोगों का ध्यान खींचा। लता मंगेशकर की आवाज़ में यह गीत एक नई सुबह का एहसास लेकर आया। 
इस फिल्म के तुरंत बाद, ‘बाज़ी’ (1951) ने इस जोड़ी को सिनेमा के आसमान पर चमकता सितारा बना दिया। इस फिल्म के गाने, खासकर ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले’ और ‘जाए तो जाएँ कहाँ’ ने उनकी साझेदारी की नींव रखी।
1950 का दशक मानो साहिर और बर्मन दा की साझेदारी का महोत्सव था। ‘जाल’ (1952), ‘टैक्सी ड्राइवर’ (1954), ‘मुनीमजी’ (1955), ‘फंटूश’ (1956) और फिर ‘देवदास’ (1955) — हर फिल्म में बर्मन दा की धुनें साहिर के शब्दों को एक नई जिंदगी देती रहीं।
बर्मन दा के संगीत में बंगाल की लोक-धुनों और भारतीय शास्त्रीय संगीत का अद्भुत मिश्रण होता था, जो श्रोताओं को एक अनूठी लय में बाँध लेता था। वहीं, साहिर के बोल सिर्फ शब्दों का समूह नहीं थे, बल्कि वे कविताएँ थीं जो सामाजिक चेतना, मानवीय भावनाओं और दार्शनिक विचारों से ओत-प्रोत थीं। ‘टैक्सी ड्राइवर’ में ‘जायें तो जायें कहाँ’ हो या ‘देवदास’ में ‘मितवा लागे रे’ … हर गीत में इंसानी मन की उलझनों और भावनाओं के उस दौर के दर्शकों ने खुद के भीतर महसूस किया। उनकी जुगलबंदी ने गीतों को न केवल कर्णप्रिय बनाया, बल्कि उन्हें एक कालातीत पहचान भी दी।
हालांकि, हर संगति में सुर का विरोधाभास छिपा होता है। साहिर और बर्मन दा के बीच यह विरोध एक कलात्मक संघर्ष का रूप ले चुका था। यह टकराव उनके सिद्धांतों पर आधारित था:

बर्मन दा का दृष्टिकोण: एस. डी. बर्मन का मानना था कि गाने की धुन प्राथमिक होती है। वे धुन पहले बनाते थे, जो गाने का मूड और लय तय करती थी। उनका मानना था कि गीतकार को उस धुन के अनुसार शब्द गढ़ने चाहिए, ताकि गीत दर्शकों के लिए सुलभ और आकर्षक बने। उन्हें लगता था कि फिल्म के संदर्भ में, धुन ही गाने को लोकप्रिय बनाती है।

साहिर एक कवि थे और अपनी कलम के आत्मसम्मान से कोई समझौता नहीं करते थे। वे मानते थे कि धुन को शब्दों की भावना के अनुसार आकार लेना चाहिए। उनके लिए, शब्द गाने की आत्मा थे और धुन को उन शब्दों के अर्थ और भावना के साथ बढ़ाना चाहिए, न कि उन्हें सीमित करना चाहिए। वे चाहते थे कि उनकी कविता को उसके मूल रूप और गहराई के साथ प्रस्तुत किया जाए।
इसी विवाद ने जन्म लिया ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले’ जैसे गीत में। साहिर ने इसे एक गंभीर ग़ज़ल की तरह रचा था, लेकिन बर्मन दा ने उसे एक कैबरे सॉन्ग का लिबास पहना दिया। साहिर को यह रूपांतरण खल गया। उन्हें लगा कि उनकी कविता की गहराई खो गई, कि बर्मन दा ने शायरी को ‘सिचुएशन’ के हवाले कर दिया, जबकि उनके लिए शब्द ही सबसे महत्वपूर्ण थे। साहिर को यह भी महसूस होता था कि फिल्म उद्योग गीतकारों को संगीतकारों की तुलना में कम महत्व देता है, जो उन्हें अनुचित लगता था।
1957 में गुरु दत्त की कालजयी फिल्म ‘प्यासा’ आई। यह फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा में शोषण, प्रेम, तिरस्कार और संवेदना की सबसे सशक्त प्रस्तुति मानी जाती है। इस फिल्म में साहिर के लिखे गीत बर्मन दा की धुनों में ढले और इतिहास बन गए। ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’… यह नज़्म साहिर के भीतर के विद्रोही, समाज के पाखंड से क्षुब्ध कवि की आवाज़ थी। इस गीत को बर्मन दा ने अद्भुत गहराई से रचा, और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ ने उसे अमर कर दिया।
लेकिन इसी फिल्म के दौरान उनके बीच दूरियाँ और बढ़ गईं। साहिर को शिकायत थी कि उनकी मूल कविताओं को परिवर्तित किया जा रहा है और उनके साहित्यिक महत्व को नजरअंदाज किया जा रहा है। बर्मन दा के अनुसार, फिल्मी गीत में कविता नहीं, स्थिति और प्रवाह का महत्व होता है। यह कलात्मक टकराव आखिरकार एक गहरी दरार बन गया। ‘प्यासा’ की सफलता के बाद भी, साहिर को लगा कि उनके योगदान को वह पहचान नहीं मिली जिसके वे हकदार थे, जबकि सचिन देव बर्मन को अधिक श्रेय दिया गया।
‘प्यासा’ के बाद साहिर और बर्मन दा की जोड़ी लगभग टूट गई। साहिर ने गुरु दत्त की अगली फिल्म ‘कागज के फूल’ (1959) के लिए गीत नहीं लिखे, और उसके बाद उन्होंने बर्मन दा के साथ दोबारा काम नहीं किया। आगे चलकर बर्मन दा ने मजरूह सुल्तानपुरी और शैलेंद्र जैसे गीतकारों के साथ कई सफल जुगलबंदियाँ कीं, वहीं साहिर ने खय्याम, रवि, रोशन, और फिर नौशाद जैसे संगीतकारों के साथ नई और यादगार साझेदारियाँ रचीं।
लेकिन जो बात साहिर और बर्मन दा के शुरुआती मेल में थी, वह कहीं और नहीं दोहराई जा सकीं। उनकी साझेदारी ने भारतीय सिनेमा को ऐसे गीत दिए जो आज भी प्रासंगिक और भावनात्मक रूप से शक्तिशाली हैं।
बाद के वर्षों में साहिर ने एक साक्षात्कार में कहा था  “मैंने शब्दों को गीत में आत्मा की तरह रखा। अगर कोई उन्हें सतही बनाता है, तो वह मेरी कविता का अपमान करता है।”
बर्मन दा ने कभी सार्वजनिक रूप से इस बारे में कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके बेटे राहुल देव बर्मन (पंचम दा) ने एक बार बताया कि, “बाबा साहिर की कविता को बहुत मानते थे, लेकिन उन्हें लगता था कि वह सिनेमा की ज़रूरतों को भूल जाते हैं।”
साहिर और बर्मन दा का संबंध वैसा था जैसे दो महान कलाकार एक ही कैनवस पर अपनी-अपनी कला से चित्र रच रहे हों। कभी साथ, कभी विपरीत दिशा में। उनके टकराव ने एक तरह की महानता को जन्म दिया, और उनकी जुदाई ने उस युग को विराम दिया।
आज जब हम ‘जाने वो कैसे लोग थे’ (प्यासा), ‘हम आपकी आँखों में’ (प्यासा), या ‘मिली खुशी की दुनिया’ (प्यासा) जैसे गीत सुनते हैं, तो हमें केवल संगीत नहीं मिलता बल्कि वह  समय की संवेदना, एक पीड़ा, एक जटिल रिश्ता, और दो आत्माओं का संघर्ष भी सुनाई देता है। कला में पूर्णता शायद इसी द्वंद्व से जन्म लेती है।
साहिर और बर्मन की साझेदारी उसका सबसे सुंदर प्रमाण है। उनके गीत आज भी बजते हैं, पर उनके बीच कहीं एक ख़ामोशी भी चलती है । साहिर की कलम की और बर्मन दा के सुरों की ख़ामोशी, जो इस बात की गवाह है कि दो महान आत्माएँ साथ चल सकती हैं, लेकिन अंततः उन्हें अपनी राह अकेले ही तय करनी होती है।
साहिर का जीवन जितना सार्वजनिक था, उतना ही निजी भी… एक गहरी कशमकश से भरा हुआ, जहाँ शब्द तो थे, मगर अक्सर जवाब नहीं। उनका प्रेम भी एक कविता ही था…. जो अधूरा ही सही लेकिन सुंदर रहा। अमृता प्रीतम के साथ उनका संबंध कुछ ऐसा ही था, अघोषित सा मगर नकारा नहीं जा सकने वाला। वे एक-दूसरे के साये में साँस लेते रहे, मगर कभी एक छत के नीचे नहीं आए। 
अमृता ने जब रेडियो पर साहिर की आवाज़ सुनी थी, तो कुछ भीतर हिल गया था — और जब वे पहली बार मिले, तो जैसे दो अधूरी कविताएं एक पूर्ण गीत बनाना चाहती थीं, मगर नहीं बना सकीं। साहिर के जाने के बाद अमृता ने बार-बार लिखा कि उनके ऐश-ट्रे में जली सिगरेटें अब भी वहाँ हैं, और जब वह काग़ज़ पर कुछ लिखती हैं, तो उनके पीछे साहिर की साँसें गूंजती हैं।
यह प्रेम, जिसमें न कोई वादा था, न नाम ….केवल मौन संवाद था । दरअसल साहिर के गीतों में बार-बार लौटता है। “चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों…” कोई साधारण विरह नहीं, बल्कि वह पीड़ा है जहाँ प्रेम अपने सबसे प्रामाणिक रूप में मौजूद होता है …. बिना किसी अधिकार, बिना किसी समर्पण की घोषणा के।
साहिर की विचारधारा भी उनकी कविता जितनी स्पष्ट और प्रखर थी। वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े, और वामपंथी विचारधारा के प्रबल समर्थक रहे। मगर उनका वाम-पंथ किसी नारेबाज़ी का नाम नहीं था। यह उनके भीतर की सामाजिक संवेदना से उपजा था। वे उस वर्ग-भेद से पीड़ित थे जो भारत की सड़कों, गलियों और दिलों में बराबरी को लगातार खारिज करता है। जब उन्होंने लिखा  “जिन्हें नाज़ है हिंद पर, वो कहाँ हैं?” …. तो यह केवल एक सवाल नहीं था, यह उस व्यवस्था के खिलाफ़ उठती हुई वह सिसकी थी जिसे अक्सर गीतों में जगह नहीं मिलती। उन्होंने सिनेमा को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि इसे जनजागरण का मंच बनाया।
उनके गीतों में बार-बार स्त्रियों की वेदना, उनकी अस्मिता और स्वतंत्रता की बात उठती है। “औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया” …. इस एक पंक्ति ने हिन्दी सिनेमा में औरत की छवि को देखने के तरीके को झकझोर कर रख दिया। साहिर के लिए प्रेम कोई लिजलिजी भावना नहीं था, बल्कि एक ऐसा संवाद था जिसमें दोनों को बराबरी हासिल हो। वे स्त्री को मूक साधिका नहीं, बल्कि एक जीवित सत्ता मानते थे, और यही वजह थी कि उनकी कविता में स्त्री को वह सम्मान मिला जो अक्सर फ़िल्मी गीतों में अनुपस्थित रहता है।
उनकी उर्दू भाषा पर गहरी पकड़ ने उन्हें गीतों में एक अनूठा लय और अर्थ देने की शक्ति दी। साहिर के शब्दों में उर्दू की वह मिठास थी जो कानों में रस घोलती थी, मगर उनमें फ़ारसी की वह तल्ख़ी भी थी जो दिल में चुभ जाती थी। उन्होंने उर्दू को नाजुक बनाने की बजाय उसे मजबूत बनाया… एक ऐसे औज़ार की तरह जिससे वे समाज की जड़ों तक पहुंच सके। वे जटिल शब्दों के मोह में नहीं बंधे, बल्कि सरल शब्दों से जटिल भावनाओं को कह देने की कला उन्हें बखूबी आती थी। यही वजह थी कि वे साहित्यिक उर्दू के प्रतिनिधि भी रहे और जनसामान्य के दिलों के भी।
साहिर के गीतों की एक और खासियत थी… उनका फिल्म से रिश्ता महज़ गीतकार का नहीं था, बल्कि वे पूरी कथा को महसूस करते थे। उन्हें केवल भावनात्मक रंग नहीं देना था, उन्हें सामाजिक रंग भी देना था। इसलिए जब वे धूल का फूल में लिखते हैं — “तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा…” …. तो वे महज़ पात्र के भविष्य की बात नहीं कर रहे थे, वे उस पूरे देश के लिए एक सपना बुन रहे थे, जो मज़हब की दीवारों से ऊपर उठकर इंसानियत को देखना चाहता था। 
और जब सिनेमा धीरे-धीरे लोकप्रियता की मांग में ‘आइटम सॉन्ग’ और सतही मनोरंजन की ओर झुकने लगा, तब साहिर थोड़े पीछे हटते गए। उन्हें मालूम था कि उनके लिए शब्द केवल धुन का सहारा नहीं, बल्कि आत्मा का विस्तार हैं। उन्होंने कभी समझौता नहीं किया । न भाषा में, न भाव में, न विचार में। इसलिए शायद उनके गीत कभी भी ‘पुराने’ नहीं होते । वे आज भी उस पीढ़ी को रुला सकते हैं जो उन्हें नहीं जानती, और उन्हें भी शर्मिंदा कर सकते हैं जो समाज की विसंगतियों से मुंह फेरकर जीना चाहते हैं।
साहिर लुधियानवी की फ़िल्मी यात्रा वह यात्रा थी जिसमें एक कवि ने फ़िल्मों को साहित्य की ऊँचाई दी … मगर चुपचाप, बिना किसी तामझाम के। उनके शब्द जब पर्दे पर उतरते थे, तो केवल अभिनेता के होंठ नहीं हिलते थे बल्कि दर्शकों के भीतर कुछ काँपता था, कुछ ठहरता था, कुछ जागता था। और यही एक सच्चे कवि की पहचान होती है  कि वह समय की सीमाओं को पार कर, पीढ़ियों के दिल में घर कर ले।
साहिर लुधियानवी का सिनेमा से रिश्ता अब किसी व्यक्ति का नहीं रहा  वह एक परंपरा बन चुका है। एक ऐसी परंपरा, जो यह याद दिलाती है कि फ़िल्में सिर्फ दृश्य नहीं होतीं, वे विचार होती हैं। और जब किसी साहिर की कलम उन विचारों को शब्द देती है, तो वह दृश्य इतिहास बन जाते हैं  और इतिहास, स्मृति में अमर हो जाता है।
प्रमिला वर्मा
मोबाइल – +91 73918 66481
Email – [email protected]
RELATED ARTICLES

3 टिप्पणी

  1. प्रमिला वर्मा का आलेख ‘ साहिर लुधियानवी: जो गीतों की दुनिया का इतिहास बन चुके हैं ‘ में साहिर लुधियानवी के गीतों को जानने का अवसर देता है। फिल्म और साहित्य ऊपर से लगता है कि ये एक है पर ऐसा है नहीं है। फिल्म को बनाते समय यह ध्यान रखना पड़ता है कि दर्शकों को उसकी कहानी और गीत आसानी से समझ में आ जाए। वहां गंभीरता नहीं चलती है। मुख्यधारा के साहित्य में गहराई होती है। वे गीत हों या कहानी लेखक के लिए शब्द आत्मा होते हैं।
    सबसे बड़ी बात फिल्म के लिए साहित्यकार को धुन का गुलाम होना पड़ता है। धुन के अनुसार शब्द फिट करने पड़ते हैं। अगर साहित्यकार ने कोई शब्द बहुत जानदार प्रयोग किया है और वह धुन में नहीं आ पा रहा है तो उसे हटाना ही पड़ेगा। मौलिक साहित्यकार से यह कम ही बर्दाश्त होता है। साहिर लुधियानवी उन्हीं में से एक है।
    धुन के कारण उनके गीतों की आत्मा से छेड़छाड़ करना साहित्यकार के लिए मृत्यु के समान है। फिल्मी गीतों के रचनाकार अलग ही होते हैं। उनके लिए साहित्य नहीं पैसे महत्वपूर्ण होते हैं। संगीतकार जैसे चाहे उन शब्दों को तोड़ता मरोड़ता रहे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है।
    साहिर लुधियानवी एक सच्चे साहित्य साधक थे, उनके गीत आत्मा की आवाज थे। उस आवाज से खिलवाड़ होना वे सहन न कर सके।
    आपने इस लेख में साहिर लुधियानवी पर काफी जानकारी इकट्ठी करके लिखा है जिससे यह लेख प्रामाणिक बन गया है। बहुत-बहुत बधाई आपको।

  2. प्रमिला जी!
    अपने साहिर लुधियानवी जी के लिये बहुत परिश्रम से यह लेख लिखा होगा। पढ़ने के बाद यह महसूस हुआ! वे हमारे प्रिय गीतकार हैं।
    आपके ही शब्दों में हम अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं, कि वास्तव में उनके शब्द जब पर्दे पर उतरते थे, तो केवल अभिनेता के होंठ नहीं हिलते थे बल्कि दर्शकों के भीतर कुछ काँपता था, कुछ ठहरता था, कुछ जागता था। और यही एक सच्चे कवि की पहचान होती है कि वह समय की सीमाओं को पार कर, पीढ़ियों के दिल में घर कर ले।
    साहिर लुधियानवी का सिनेमा से रिश्ता किसी व्यक्ति का नहीं ,वह एक परंपरा बन चुका है। एक ऐसी परंपरा, जो यह याद दिलाती है कि फ़िल्में सिर्फ दृश्य नहीं होतीं, वे विचार होती हैं। और जब किसी साहिर की कलम उन विचारों को शब्द देती है, तो वह दृश्य इतिहास बन जाते हैं और इतिहास, स्मृति में अमर हो जाता है।”
    अमृता प्रीतम और साहिर का प्रेम भी वास्तव में एक पवित्र प्रेम था।
    आपको बधाई इस बेहतरीन लेख के लिये।

  3. बहुत मेहनत करके लिखा गया आलेख। साहिर लुधियानवी साहब एक अज़ीमों शान शहंशाह हैं।
    एक मुकम्मल शायर जिसने अपनी -माँ सरदार बेगम, से इबादत की सी मुहब्बत की।
    लेखिका ने फिल्मी गानों और लोगों का उल्लेख किया है और ये सभी किस्से कहीं कहीं पढ़े गए हैं पर उन्हें एक तारतम्य से रोचक रूप में पेश किया गया है।लेखिका को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।
    तिस पर भी अमृता प्रीतम यानी अमृत कौर जैसी व्यवहारिक और मौका शनास साहित्यकार का साहिर लुधियानवी सरीखे महान शायर से रिश्ते का naraative बस गढ़ दिया गया है जो सच्चाई से कोसों दूर है। जानना चाय काफी पीना ,फिल्म लाइन में मिलना और चापलूसी करके सच को बरगलाना एक आम फ़हम तरीका रहा है।यही अमृत कौर और इमरोज़,,,हां ये वही इमरोज़ हैं जो सरदार प्रीतम सिंह और अमृत कौर के वैवाहिक जीवन में वो यानी पहले प्रशंसक फिर प्रशंसक मुंडू और फिर
    वो की भूमिका में रहे।
    इमरोज़ को मुंबई फिल्म में काम मिलना और अमृता का एक साल उसके साथ चले जाना और फिर एक साल के बाद बलवंत गार्गी के घर पर सरदार प्रीतम सिंह का उसे फिर घर ले जाना,!!!!!!
    आप सोच रहे होंगे ये क्या है?????
    आप जीवित पद्म श्री और साहित्य अकादमी की पुरस्कार विजेता 91वें वर्षीय साहित्यकार मैडम अजीत कौर जी द्वारा संस्मरणों की पुस्तक हरी चींटियाँ सपना देखती हैं को पढ़ें तो सभी के भरम दूर होंगे।
    आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी के मार्गदर्शन में इसी पुस्तक की समीक्षा इसी पत्रिका में प्रकाशित हुई है।पुस्तक के तीन संस्मरण अमृत कौर,संत सरदार प्रीतम सिंह और इमरोज पर हैं जो मानव प्रकृति की सच के आईने में खरी खरी पड़ताल करते हैं जो सरदार प्रीतम सिंह का पत्नी को टीबी बीमारी से बचाना,पत्नी की खुशी हेतु इमरोज को घर में रखना,अपनी पैतृक संपति में हिस्सा लेकर अमृत कौर को सौंपना,घर परिवार की प्रताड़ना सहना और चुपचाप गुरुद्वारे की सेवा करते हुए अमृत कौर को सही राह पर लाने की कोशिश में देवलोक गमन,उधर अमृत कौर का adultry की मूर्त बनना पति के पैसों से दिल्ली के पोश इलाके में इमरोज के साथ रहना और अपनी मौत तक ऐश करना,इमरोज का नौकर की मानिंद रहना और चले जाना।
    पुस्तक पढ़ के देखें,,,,कम से कम टिप्पणी करने वाले ,लेखिका और पत्रिका समूह को तो जरूर पढ़नी चाहिए।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest