1
घर जिनके शीशे के वे पत्थर रखते हैं
हम तो घर में दिल औ दिल में घर रखते हैं।
तुम जिससे मारा करते हो सब लोगों को
हम आदर से उसपर अपना सर रखते हैं।
डर है जिनको के उड़ ना जाये चुपके से
वो पिंजर में भी पंछी बेपर रखते हैं।
इस युग में होनी को थोड़ा पहचाने जो
वो थोड़ी हिम्मत तो थोड़ा डर रखते हैं।
सम्भाले रखने को बस में चंचल मन को
हरदम ही वे संयम का पिंजर रखते हैं।
सपने सुंदर क्या देखेंगी आँखें उनकी
सोचों की जो धरती ही बंजर रखते हैं।
2
पुरानी बोतल में नई शराब बनके रहिये
सदा कांटो के बीच भी गुलाब बनके रहिये।
सफ़े जब होने को लगे तमाम जो बंद अगर
ज़रूरी है हरदम खुली किताब बनके रहिये।
लगी जब हो सारी दुकान खोजने में दुनिया
सवालों के सारे नए जवाब बनके रहिये।
हज़ारों मिलकर भी न पा सके मुकाम अगर
सितारों के तो बीच माहताब बनके रहिये।
सिकंदर सारे मात खा गए जहाँ में एक दिन
सभी का होता जो वही हिसाब बनके रहिये।
3
तू ऐसे भी तो ना उखड़ा कर
कुछ ना भी हो तो झगड़ा कर।
रिश्ते कितने ठंडे हैं अब तो
पत्थर पर लकड़ी तू रगड़ा कर।
घोंसले से हरदम झांके क्या
पर उग आये हैं तो उड़ा कर।
लोहे के तन में बादल सा मन
उसपे दिल भी थोड़ा तगड़ा कर।
धुँआ उठे फिर थोड़ी चिंगारी
मुर्दों की बस्ती से गुजरा कर।

अमरेन्द्र जी!
हम गजल के बारे में ज्यादा समझ नहीं रखते हैं। गजल का हर शेर एक भाव लेकर चलता है। संवेदनाओं को जगाने के लिए वही भाव क्रियाशील होते हैं।
कुछ शेर जो बहुत अच्छे लगे-
घर जिनके शीशे के वे पत्थर रखते हैं
हम तो घर में दिल औ दिल में घर रखते हैं।
सम्भाले रखने को बस में चंचल मन को
हरदम ही वे संयम का पिंजर रखते हैं।
2
पुरानी बोतल में नई शराब बनके रहिये
सदा कांटो के बीच भी गुलाब बनके रहिये।
हज़ारों मिलकर भी न पा सके मुकाम अगर
सितारों के तो बीच माहताब बनके रहिये।
3
घोंसले से हरदम झांके क्या
पर उग आये हैं तो उड़ा कर।
धुँआ उठे फिर थोड़ी चिंगारी
मुर्दों की बस्ती से गुजरा कर।
बधाई आपको।