Sunday, March 8, 2026
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दीपक शर्मा की कहानी – चकरी गिरह

“आप को प्रिंसीपल साहिबा ने याद किया है,मैडम,” कस्बापुर के राजकीय  महिला डिग्री कालेज का एक चपरासी रमा के भाषण- कक्ष के दरवाज़े से बोला।
                “कल मिलेंगे,”  रमा ने अपनी छात्राओं को छितरा दिया और चपरासी के संग हो ली।
                “आप के साहब आए हैं, मैडम,” चपरासी ने दांत निपोरे।
                “तुम्हें कैसे मालूम?” एक सिहरन ने रमा को अपनी मूठ में ले लिया।
                “बोल रहे थे, मिसेज़ रमा दीक्षित मेरी वाइफ़ हैं,” चपरासी हंसा।
                “और क्या बोले?” सशंक हो कर रमा ने पूछा।नाटकीयता और नोक- झोंक रमेश के व्यवहार का हिस्सा थीं।
                “और जो बोले अंग्रेज़ी में बोले,” चपरासी फिर हंसा, “शायद कोई चुटकला भी। जिसे सुन कर प्रिंसीपल साहिबा भक्क से हंस भी पड़ीं….”
                अजनबियों पर असर डालने के लिए रमेश अक्सर चुटकलों का सहारा ले लिया करता।
                “कुक्कू कैसा है?”रमेश एक आतुर  पिता का चेहरा लगाए था।
                 नीली बारीक धारियों वाले गर्म सूट के साथ रमेश ने लाल गोलाकार खाकों वाली काली टाई पहन रखी थी और उसी टाई के सेट का वैसा ही रुमाल उस के कोट की ऊपर वाली जेब से बाहर झांक रहा था।
                “कुक्कू ठीक है,” अपने चेहरे पर रमा एक मुस्कराहट ले आई, “मगर आप कैसे आए?”
                 “लखनऊ तक हवाई जहाज़ से। और लखनऊ से अपने एक बैच- मेट की कार से….”
                  कस्बापुर रमेश पहली बार आया था। यहां अपनी यह नौकरी रमा ने पिछले माह और एक दिन पहले ही शुरू की थी। एक नवंबर को। पिछले वर्ष मिली कुक्कू के जन्म पर मिली अपनी मैटर्निटी लीव जब उस ने बढ़ावाई थी तो राज्य सरकार ने उस की बदली इधर कस्बापुर में कर दी थी।
                  “हम आप की कमी महसूस करेंगे, मिसेज़ दीक्षित,” प्रिंसीपल मुस्कराई, “अभी कल ही तो मेरे दफ़्तर ने आप की पहली तनख्वाह आप के खाते में जमा करवाई थी….”
                  “मगर मैं कहां जा रही हूं?” रमा ने हैरानी जतलाई। 
                  “मिस्टर दीक्षित उधर मुंबई से आप का त्यागपत्र टाइप करवा कर लाए हैं,” प्रिंसीपल की मुस्कान वृहत हो ली।
                  रमा जानती थी, उस की छुट्टी के दौरान इन्हीं प्रिंसीपल की बहू उस की लीव वेकेंसी के अंतर्गत उस का ‘इतिहास’ विषय वहां पढ़ाती रही थी और अब रमा का त्यागपत्र उन की बहू को वहीं इसी कालेज में स्थायी पद दिलाने का अच्छा अवसर प्रदान कर सकता था।
                  “हर अच्छा समय एक दिन समाप्त होता ही है,” रमेश ने प्रिंसीपल की दिशा में अपनी एक आंख मिचकाई।
                  “मिस्टर दीक्षित सोचते हैं आप के बेटे को वहां मुम्बई में रहना चाहिए। इधर कस्बापुर में नहीं,” प्रिंसीपल के चेहरे की चमक असामान्य थी, “और मैं भी सोचती हूं दुनिया में सब से बड़ा सुख गृहस्थ होने ही में है।”
                  “इस त्यागपत्र पर तुम अपने हस्ताक्षर कर दो,” रमेश ने एक कागज़ उस की ओर बढ़ा दिया।
                 रमा ने काग़ज़ पर नज़र दौड़ाई। उस की तरफ़ से एक त्यागपत्र था। इस नौकरी से हमेशा छुट्टी पाने का।
                “मैं अभी सोचना चाहती हूं,” प्रिंसीपल के सामने वह कोई नाटक नहीं चाहती थी और उस ने वह टाइपड कागज़ मोड़ कर अपने पर्स में रख लिया।
               “तुम्हें ज़रूर मुम्बई चले जाना चाहिए,” प्रिंसीपल ने रमेश की ओर देखा।
               “कुक्कू और मैं अभी यहीं रहेंगे,” रमा ने अपना स्वर कड़ा कर लिया, “कम- अज़- कम दिसंबर की छुट्टियां शुरू होने तक।”
                प्रिंसीपल के चेहरे की चमक लुप्त हो गई। 
               “काश, कोई तो ऐसा होता जो इसे अच्छी सीख दिए होता…,” रमेश ने अपनी झल्लाहट प्रकट करने के लिए अपना सिर दोनों हाथों से ढांप लिया।
                “अपनी ससुराल में किसी को ढूंढिए,” प्रिंसीपल ने अपने होंठ सिकोड़े।
                “नो चांस,” रमेश ने अपने कंधे उचकाए, “मेरी ससुराल के नाम पर मेरे पास केवल एक विधवा सास है, जिन की नौकरी ने उन्हें अपने मायके से भी दूर कर रखा है और अपनी ससुराल से भी….”
                “मैं आप से बाद में मिलती हूं,” निर्णायक भाव से रमा प्रिंसीपल के दफ़्तर के दरवाज़े की ओर बढ़ ली।
                 रमेश के मांगे की सरकारी कार कालेज के गेेट पर खड़ी थी।
                  रमा को रमेश के साथ आते देख कर ड्राइवर ने उसे पहले सलाम ठोंका और फिर उस के लिए गाड़ी का दरवाज़ा खोला।
                  वह गाड़ी में बैठ ली। बेआराम उस  चुप्पी के साथ, जो वह रमेश और अपने बीच झगड़ा टालने के वास्ते ओढ़ लिया करती। 
                  “किधर जांएगे,साहब?” ड्राइवर ने गाड़ी संभाली।
                  “गाड़ी पीछे मोड़नी पड़ेगी,”रमा ने कहा, “कुक्कू का क्रैच दायीं तरफ़ पड़ेगा।” 
                 “देखें,तुम्हारी पासबुक देखें,” शीघ्र ही रमेश ने अपना संचालन प्रारंभ कर दिया।
                 “लीजिए,”  रमा अपनी चेकबुक अपने पर्स में ही रखा करती।
                 “दस हज़ार?” बीच की एक प्रविष्टि देख कर रमेश को बिजली छू गई, “ एक साथ?  किसे दिया?”
                 “कुक्कू की प्रैम खरीदी थी। उसे क्रैच में दाखिल करवाना था।और फिर थोड़ा – बहुत अपने कमरे के लिए खरीदना था।”
                 “तुम अपने को इधर कुछ ज़्यादा ही भाव नहीं दे रही क्या?” रमेश की भौंहों ने उस का माथा सिकोड़ दिया, “कुक्कू के लिए आया भी, क्रैच भी और प्रैम भी?”
                “वह आया कोई आया नहीं।यहीं के चौकीदार की बेटी है। यही कोई पंद्रह- सत्तरह साल की।उस के भरोसे कुक्कू को वहां होस्टल में नहीं छोड़ा जा सकता था….”
                “और वह क्रैच वाली?”
                “वह प्रोफ़ैशनल है। बच्चों को अपनी ज़िम्मेदारी पर अपने पास रखती है और उन की सुरक्षा की पूरी गारंटी देती है….”
                 “बस्स फ़ीस ही तो लेती है।  तिस पर ज़ोर देती है। बच्चे को प्रैम में लाओ। कितने की मिली?”
                  “छः हज़ार की….”
                  “मां तुम्हारी विधवा रही सो उस की फ़िज़ूलखर्ची चल गई मगर तुम्हारा पति तो अभी मौजूद है। तुम्हारे लिए तो उस की मर्ज़ी जानना ज़रूरी है….”
                  गुस्से में रमेश अक्सर भूल जाता रमा की मां उधर कानपुर की आई.आई.टी.में उस की गुरू रह चुकी थीं जहां से एम.एस.सी के दूसरे वर्ष तक पहुंचते- पहुंचते वह भारतीय राजस्व सेवा में निकल लिया था। और रमा के संग विवाह का प्रस्ताव रमेश ही की ओर से आया था, रमा की मां की ओर से नहीं।
               “आए एम सौरी,” रमा ने अपना स्वर तिगुना विनीत कर लिया, “असल में कुक्कू के लिए रखी गई उस लड़की से वह उठाए नहीं बन रहा था। तो मैं ने सोचा, प्रैम सही रहेगी। आगे से ऐसा कभी नहीं होगा….”
                “कुक्कू उधर पालने में सो रहा है,” क्रैच की स्वामिनी ने उन दोनों को स्वागती मुस्कान दी।
                अपने ग्राहक- गण के साथ वह अतिरिक्त शिष्टता दिखाया करती और उन के बच्चों के साथ अतिरिक्त ऊष्मा।
                “कुक्कू कब सोया,जमना?” कुक्कू के पास जमना बैठी थी। चौकीदार की बेटी। एक रखवाले की भांति।
                 “सवा ग्यारह पर,” जमना ने सामने लगी दीवार- घड़ी देखी, “अभी पंद्रह मिनट ही हुए हैं।”
                “कुक्कू! कुक्कू! कुक्कू !” रमेश कुक्कू पर झुक लिया।
                 “इसे जगाइए नहीं,”रमा ने टोका।                                          नींद             “नींद के बीच जगांएगे तो रोने लगेगा,” जमना ने जोड़ा। 
                 “कुक्कू,” रमेश ने सीटी बजाई। उसे सीटी बजानी खूब अच्छी आती थी, “देखो, कुक्कू,  तुम्हारे पापा आए हैं…..”
                 कुक्कू ने अपनी आंखें खोलीं और टुुकर- टुकर रमेश की ओर देखने लगा।
                अपनी सीटी में रमेश वही धुन ले आया, जिस का समस्वरित गीत उधर मुम्बई में कुुक्कू को वह अक्सर सुनाया करता।
                कुक्कू ने कलकला कर रमेश की ओर अपनी बाहें फैला दीं।
                “अपने बियाड़ को तो बच्चा भी पहचान लेता है,” क्रैच की स्वामिनी हंसने लगी।
                 “इस की प्रैम लाओ,” रमेश ने जमना को आदेश दिया।
                 प्रैम में कुक्कू को बिठला कर रमेश गाड़ी पर जा पहुंचा।
                “लो, यह बच्चा- गाड़ी उधर गाड़ी की डिक्की में रखो,” रमेश ने कुक्कू को अपनी बाहों में ले लिया और गाड़ी के अंदर जा बैठा।
                “किधर जांएगे,साहब?” ड्राइवर ने पूछा।
                 “वापस उसी कालेज,”  रमा गाड़ी में बैठ ली, “मगर अब गाड़ी तुम कालेज के गेट पर मत रोकना।कालेज के पिछवाड़े ले जाना। मेरा होस्टल उधर है।”
                 “आओ, जमना,” रमा ने जमना को पुकारा, “इधर मेरे पास आओ। पिछली सीट पर।”
                 “तुम्हारा नाम बढ़िया है,जमना,” जैसे ही गाड़ी स्टार्ट हुई, रमेश ने जमना से कहा।
                 “जी….,”जमना शरमा गई। 
                 “अच्छा बताओ, तुम कहां तक पढ़ी हो?”
                 “जी, पांच दर्जा तक…..”
                 “जानती हो, किस महीने में अट्ठाइस दिन होते हैं?”
                 “फ़रवरी में,” जमना उत्सुुक हो आई। 
                  “मूर्खा,”रमेश ठठाया, “अट्ठाइस दिन तो सभी महीनों में होते हैं…..”
                  जमना झेंप गई। 
                  होस्टल के अंदर गाड़ी के प्रवेश पाते ही रमेश ने ड्राइवर से कहा, “प्रैम अभी डिक्की ही में रहेगी, बेटे के साथ अभी बाहर घूमने जांएगे….”
                 “जी,” ड्राइवर ने उत्तर दिया।
                  रमा के होस्टल में रसोई सब से पहले पड़ती थी, फिर वार्डन का कमरा और फिर दो और अध्यापिकाओं के कमरों को छोड़ कर तीसरा कमरा रमा का था।
                  “आप ज़रूर मिस्टर दीक्षित हैं,” उन्हें देखते ही वार्डन अपने कमरे से बाहर निकल कर उन के साथ हो ली। 
                 “जी,” रमेश ने वार्डन को एक प्रशस्त मुस्कान दी।
                  “यह सरला जी हैं,” रमा ने वार्डन के प्रति तनिक चाव न दिखाया।
                  बातूनिया व घरघुसनी वह वार्डन हर किसी के विवाहित जीवन में अतिरिक्त दिलचस्पी दिखलाया करती। उस की अपनी शादी एक साल के अंदर ही टूट गई थी, किंतु अपने तलाक के पांंच साल बाद भी उस ने अपने पुनर्विवाह की अपनी योजना को लोप न होने दी था। 
                “मैं यहां के होस्टल की वार्डन हूं,” वह रमा के कमरे की ओर बढ़ आई। 
                “आप का नाम गिनीज़ बुक में भेजना होगा,” उन स्त्रियों के प्रति रमेश अतिरिक्त सदयता अवश्य प्रदर्शित करता, जिन्हें रमा नापसंद किया करती, “मुझे यकीन है दुनिया की सब से कम- उम्र वार्डन आप हैं….”
                “मुझे बनाइए मत,” वार्डन रमेश पर रीझ गई,  “आप बताइए, आप यहां कैसे आए?”
                “कुक्कू को लेने आया हूं,” रमेश हंसा।
                 “अच्छा! बहुत अच्छा!!” वार्डन रमा की ओर देख कर हंस पड़ी। 
                 “आइए,”  रमा ने अपने कमरे का ताला खोला, “अंदर कमरे में बैठते हैं।”
                 “आप भी आइए,”  रमेश ने वार्डन को निमंत्रण दिया।
                  एकांत में रमा का सामना करना रमेश को  मुश्किल लगता।रमा के प्रति जिस सौहार्द अथवा  मित्र- भाव का वह एक समूह के सामने प्रदर्शित कर सकता,वह एकांत में काफ़ी न रहता।
                 “ओह!” कमरा खुलते ही पहले रमेश अंदर गया, “ए रूम! ए रूम ओव वनज़ ओन ( कमरा! अपना निजी कमरा….!!)”
                 “रमा मैैडम ने अपना यह कमरा खूब सजा रखा है,” वार्डन बोली, “खिड़कियों में पर्दे टंगे हैं और चारपाइयों पर बढ़िया चादर बिछी हैं….”
                 अपने कमरे में रमा ने दो मेज़ें और एक कुर्सी भी डलवा रखी थीं।एक मेज़  पर कुक्कू के दूध और उस के अपने नाश्ते का सामान जमा था और दूसरी पर उस के उस के पढ़ने का।
                 “ये पर्दे और ये बिस्तर मुझे मां ने दिए हैं,” रमा ने रमेश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहा।
                “खूब!” रमेश ने अपनी भौंहें ऊपर कीं, “बहुत खूब !! इस कमरे में मैं कहीं नहीं हूं….इस कमरे के पर्दे, इस कमरे के खिड़की- दरवाज़े, इस कमरे के कुर्सी- मेज़,इस कमरे के बिस्तर मुझे नहीं जानते…..यह एक स्त्री का कमरा है….ए रूम औव हर ओन…..( उस का अपना निजी कमरा….)”
                “मैं चाय बना रही हूं,” बिजली की केतली का प्लग रमा ने स्विच बोर्ड में लगा दिया।
                “इधर देखिए,” रमा ने रमेश की ओर देखा, “यहां मेरे साथ आते समय मां ने मुझे आर्मी कैंटीन से भी यह ढेर- सा सामान भी दिलवा दिया था।यह केतली, यह टोस्टर, यह जूसर- मिक्सचर,  ये चाय की टवाइनिंगज़, यह कॉफ़ी,  यह मिल्क स्प्रे, यह पैस्चराइज़ड चीज़….”
                चीन के संग हुई भारत की एक झड़प के दौरान ‘मिसिंग’ करार कर दिए गए रमा के पिता फ़ौज में कप्तान रहे थे और अब भी उस की मां अपनी ज़रूरत के कई सामान फ़ौज की कैंटीन से कम दामों पर खरीदा करतीं।
               “खूब!” रमेश ने अपनी भौंहैं फिर अपने माथे पर चढ़ां लीं, “बहुत खूब!! इस कमरे से उन्हों ने तुम्हें दोबारा ब्याह दिया…..”
               “अपने ब्याह पर आप को बस यही कुछ मिला क्या?” वार्डन ने रमेश को कंधे पर चढ़ाने की चेष्टा की।
                “बताइए आप,” रमा ने रमेश को  चुनौती दी, “बताइए। आप को शादी पर क्या मिला और क्या नहीं मिला?”
                “रमा मैैडम से आप की शादी आप के सर्विस में आने से पहले हुई क्या?” वार्डन रमेश की ओर मुड़ ली।
                “आप को क्या लगता है?” अपने मन का गवाक्ष खोलना रमेश के लिए असंभव रहा।
                केेवल यह वार्डन ही नहीं, वह किसी और को भी अब नहीं बताना चाहता था चार साल पहले जब वह रमा की मां के आई.आई.टी. वाले फ़्लैट में जा खड़ा हुआ था,रमा उस समय कानपुर के सरकारी स्नातक कालेज में पढ़ाना शुरू कर चुकी थी।
                नहीं बताना चाहता था, रमेेश ने वहां उस की मां से कहा था,’मैम, अगले सप्ताह मुझे अपनी राजस्व सेवा के अन्तर्गत अपने नाम अलौट हुए सरकारी मकान का कब्ज़ा लेना है। लेकिन उस मकान में मैं रमा के साथ प्रवेश करना चाहता हूं, अकेले नहीं।’
               नहीं बताना चाहता था,वह रमा की मां का विश्वासपात्र व मनपसंद छात्र रहा था और जानता रहा था उस के नाम अलौट हुए जिस मकान के लिए जिन सुचारू प्रावधानों की ज़रूरत उसे रही थी, वह रमा की मां के एफ़.डीज़. से खरीदे जा सकते थे।
               नहीं बताना चाहता था,उसी दिन
के चौथे दिन कानपुर के एक मंदिर में उन की शादी सम्पन्न हो गई थी।
               नहीं बताना चाहता था वर पक्ष की ओर से केवल रमेश के विधुर पिता आए थे जो एक सरकारी मिल में लेबर सुपरवाइज़र थे।
                 “आप के सर्विस में आने से पहले ही हुई होगी,” वार्डन हंसी, “वरना हम ने तो सुन रखा है आप अफ़सर लोग शादी में आध- पौन करोड़ के नीचे बात नहीं करते….”
                 “कैसा आध- पौन करोड़?”
                 “हमें तो विश्वास ही नहीं होता आप जैसे देवपुरुष आज के कलियुग में संभव हैं….”
                  “मैडम की किताबें भी देख ली जाएं,” अचकचा कर रमेश रमा के पढ़ने वाली मेज़ की ओर बढ़ लिया।
                  “एक मिनट,” रमा ने मेज़ पर रखी अपनी डायरी झपट ली।
                  “क्या है इस में?” रमेश के माथे पर नई त्यौरी आ बैठी, “द होल ट्रूथ? (पूरा सच)? रैविलेशन्ज़? ( रहस्योदघाटन) ? औंद्रे मौलोरो ने एक जगह कहा है न, हमारा वास्तविक सत्व वह है जो हम दूसरों से छिपाते हैं!”
                  “मैं वौशरूम से हो कर अभी आती हूं,”रमा ने कहा और जमना को आवाज़ दी, “तुम कुक्कू का जांघिया बदलो….”
                 कुक्कू का वह सिंथेटिक जांघिया उतारना ज़रूरी था। जिसे वह उसे केवल बाहर ले जाते समय पहनाती थी।
                 डायरी के कुछ और पन्ने फाड़ने अभी बाकी थे, जब रमा को रमेश वाली गाड़ी के दरवाज़े खुलने और बंद होने की आवाज़ आई…..
                 एक बार….
                 दो बार….
                 तीन बार….
                 चार बार….
                 अपनी गाड़ी की झाड़- पोंछ ड्राइवर यहां कर रहा था क्या?
                लेकिन नहीं।
                एकाएक गाड़ी स्टार्ट हुई और चल पड़ी। 
                रमा की उत्सुकता बाहर खुलने वाले वौशरूम के दूसरे दरवाज़े से उसे बाहर ले आई। 
                उस के कमरे के बाहर जमना हंस रही थी।
                “क्या हुआ?” उस ने जमना से पूछा।
                 “आप के साहब आप का सारा सामान गाड़ी में ले कर चले गए हैं….”
                 “कुुक्कू कहां है?” हकबकाई रमा कमरे के अंदर चली आई। 
                  कुक्कू वहां नहीं था।
                 दोनों मेज़ और दोनों चारपाइयां खाली थीं।
                 खिड़कियों के पर्दे भी नदारद थे।
                 रमा आलमारी की तरफ़ बढ़ ली। उसके पर्स समेत उस में धरीं सभी चीज़ें भी गायब थीं।
                 चुपचाप वह अपनी कुर्सी पर बैठ गई। और अपनी मां का मोबाइल मिलाने लगी।
                 “ रमा मैडम, मेरे ख्याल से तो आप को एफ़.आई,आर.दर्ज करानी चाहिए,”  वार्डन और प्रिंसीपल उस के कमरे में आन घुसीं थीं, “उस डाकू के खिलाफ़ तो मैं भी गवाही दूंगी….”
                “बोलो, रमा,” प्रिंसीपल ने पूछा, “तुम क्या चाहती हो? पुलिस बुलाऊं क्या?”
                “नहीं मै’म,” रमा ने उत्तर दिया, “यह सब उन्हों ने मुझे अपने साथ मुम्बई ले जाने के लिए किया है….”
                 “लेकिन  रमा मैडम,”  वार्डन ने आपत्ति जताई ,”यह कौन तरीका हुआ?”
                 “यह रमा का निजी मामला है,”  प्रिंसीपल ने अपने कंधे झटकाए , “उस के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह लगाने का अधिकार हमारे पास नहीं….”
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दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
हिंसाभास, दुर्ग-भेद, रण-मार्ग, आपद-धर्म, रथ-क्षोभ, तल-घर, परख-काल, उत्तर-जीवी, घोड़ा एक पैर, बवंडर, दूसरे दौर में, लचीले फीते, आतिशी शीशा, चाबुक सवार, अनचीता, ऊँची बोली, बाँकी, स्पर्श रेखाएँ आदि कहानी-संग्रह प्रकाशित. संपर्क - [email protected]
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