Wednesday, April 8, 2026
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सुषमा चौहान ‘किरन’ की कलम से – मौन विद्रोह की समकालीन सशक्त कथाएँ: एक जिद यह भी

एक जिद यह भी – (कहानी संग्रह); लेखक: प्रगति गुप्ता; प्रकाशक – ग्रंथ अकादमी (प्रभात प्रकाशन); मूल्य – ₹300/- मात्र
प्रगति गुप्ता के सद्य प्रकाशित कथा-संग्रह “एक जिद यह भी” की कहानियों को पढ़कर मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि शायद कहीं कुछ छूट गया है, इन्हें पुनः पढ़ना होगा। जब अनुभूतियाँ गहरी हों तो महसूस किए हुए अनुभवों से निकलना इतना सरल नहीं होता। जब कहानियों के पात्रों के संग-संग उनके संवाद और घटनाक्रम पाठक-मन में बार-बार उमड़-घुमड़ करने लगें, तब लेखक का सृजन-कर्म सार्थक हो जाता है।
ग्रंथ अकादमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस कथा-संग्रह में कुल बारह कहानियाँ हैं। प्रगति गुप्ता ने अपना यह संग्रह पति डॉ. राजकुमार गुप्ता को समर्पित किया है। समर्पण की पंक्तियाँ बताती हैं कि यदि पति का सहयोग मिले  तो महिला घर-परिवार के साथ-साथ अपनी रुचियों में भी एक मुक़ाम हासिल कर सकती है। लेखिका भूमिका में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखती हैं –
“यात्राएँ जीवन के साहित्यिक क्षेत्र से जुड़ी हों या अन्य किसी क्षेत्र से, उन्हें तय करने की शर्त है अनवरत चलते रहना। जिस दिन हम स्वयं का आध्यात्मिक, मानसिक या शारीरिक रूप से परिष्कार करना त्याग देते हैं या गतिमान रहना छोड़ देते हैं, उसी दिन यात्रा में अल्पविराम के साथ विराम लगने आरंभ हो जाते हैं।”
प्रगति के अनुभवों का दायरा बहुत विशाल है, इसीलिए उनकी कहानियों के कैनवस भी व्यापक हैं। सभी कहानियाँ हमें अपने आस-पास से उठी हुई प्रतीत होती हैं और हमारे समक्ष अनेक प्रश्न छोड़ती हैं। आज समाज और परिवार में नित नए बदलाव आ रहे हैं। रूढ़ियाँ और परंपराएँ टूट रही हैं। बाढ़ जिस तरह सब कुछ अपने साथ बहाकर ले जाती है, उसी तरह इस समय के संधि-काल में अच्छा और बुरा सब कुछ अस्त-व्यस्त हो रहा है। समाज एक नई, अनजान दिशा की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में प्रगति गुप्ता की कहानियाँ समाज के विभिन्न पक्षों को आईने की तरह सामने रख देती हैं। वे हमें सचेत करते हुए मूल्यों के साथ जीने का संकेत भी देती हैं।
क्या आज पुरुष का वर्चस्व टूट रहा है? क्या वाक़ई अपनी पीढ़ी-गत संस्कारों को छोड़ना इतना कठिन होता है? हम जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, उसके परिणामों से हम परिचित हैं? जब तक इन प्रश्नों के जवाब मिलते हैं तब तक समय बहुत आगे निकल जाता है। प्रगति गुप्ता की अधिकांश कहानियों में नारी का दर्द और मौन विद्रोह है, पर कहीं पुरुष और थर्ड जेंडर की मौन पीड़ा भी टीस-सी उठती है। यथा- “राजनीति” कहानी की मृणाल हो अथवा “पहिया” की सुलोचना नारी की अस्मिता और स्वाभिमान से जुड़ी हैं, तो “बिछड़े सभी बारी-बारी” कहानी के वृद्ध नायक अपने स्वाभिमान के लिए कोई समझौता नहीं करना चाहते। वे कहते हैं-
“तेरे पापा ने बहुत कोशिश की, मैं साथ चला चलूँ, मगर जब मेरे पास अपना घर था तो अपनी बहू के पिता के यहाँ जाकर क्यों रहता? मेरे बेटे ने मेरे ही स्वाभिमान को तोड़ा था। मेरी तो पीड़ा बस यही है कि उसे अपने पिता की इज्ज़त का ख्याल क्यों नहीं आया?”
यह परदेस मोह की कहानी प्रतीत होती है, परंतु इसके मूल में वृद्ध पिता की अथाह पीड़ा भी है। हवेली में अकेले रहने वाले दादाजी बेटे के विदेश जाने से दुखी होते हैं, और जब पोती लौटकर आती है तो उसे हवेली अर्थात “बरगद”- सौंप देते हैं, जहाँ परिवार से बिछड़े या अपमानित किए गए वृद्ध लोग रहते हैं। सबको जाना है, पर जाने से पहले सम्मानित जीवन जीकर विदा होना है। व्यक्ति के स्वाभिमान से जुड़ी इस कहानी का हर पात्र बहुत कुछ अबूझा-सा कहता है। 
“एक ज़िद यह भी” एक सशक्त कहानी है। परिवार में बेटे-बेटियों के बीच खाने, पहनने और पढ़ने सभी में भेद होता है तो विद्रोह पनपता है। बेटे पढ़ाई में अच्छे हों या न हों, उनके हज़ार गुनाह माफ; बेटी को ज़्यादा पढ़ने का भी हक़ नहीं। यहीं से नायिका ऐश्वर्या के व्यवहार में ज़िद का समावेश होता है और वह अपनी माँ से कहती है –
“पढ़ी-लिखी होने के बावजूद आप इतनी बे-आवाज़ क्यों हैं, माँ?”
वह परिवार की सारी बेड़ियों को तोड़कर बाहर पढ़ने जाती है, क्योंकि उसके सामने लक्ष्य है, भाइयों से अधिक पढ़कर आत्मनिर्भर बनना। इसलिए वह तमाम संघर्षों को पार करती हुई “बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया” की परीक्षा भी पास करती है। यह सब करना उसकी ज़िद थी। पर हाईकोर्ट में एडवोकेट श्रीकांत के साथ काम करते हुए उसे अपने बॉस से प्रेम हो जाता है। यहाँ लेखिका ने श्रीकांत के चरित्र को बहुत ऊँचा दिखाया है, जो कम शब्दों में समझाकर उसकी ज़िद को नई दिशा देता है। हालाँकि प्रेम को ज़िद से नहीं पाया जा सकता; पहली पराजय पीड़ादायक होती है। यहाँ भी एक ज़िद है।
आजकल “राजनीति” सिर्फ़ संसद तक सीमित नहीं रही, उसने घरों में भी घुसपैठ कर ली है। पारिवारिक रिश्तों में भी लोग एक-दूसरे के साथ साज़िशें करते हैं। तब हमेशा शांत रहने वाली मृणाल चौकन्नी हो जाती है। बेटे और पति के बदले-बदले रुख़ देखकर वह इस राजनीति पर अपना अस्त्र चलाती है, तो सबको साँप सूँघ जाता है। लेखिका ने इस कहानी को बहुत शालीनता और खूबसूरती से विस्तार दिया है।
कहानी “शह और मात” अलग कलेवर की सशक्त कहानी है। कुरूप पुरुष को सुंदर और गोरी पत्नी मिल जाती है। पहली ही रात जब वह पत्नी को छूने लगता है तो पत्नी के गोरे बदन पर अपना काला हाथ देखकर उसे स्वयं से वितृष्णा हो जाती है और कुंठा जन्म लेती है। कुंठित व्यक्ति अमर्यादित व्यवहार करता है। श्रीधर अपनी पत्नी पर मानसिक और शारीरिक अत्याचार करता है, चतुर चालें चलकर पत्नी सुरेखा को चुप करा देता है। परंतु जब वह मृत्यु-शय्या पर अस्पताल में होता है, तब सुरेखा उसकी सेवा में रात-दिन लगी रहती है। तब उसे अपनी गलतियों का एहसास होता है। वह बहुत कुछ कहना चाहता है, पश्चाताप करना चाहता है, किंतु सुरेखा तब भी खामोश रहती है। उसका अंतिम वाक्य सुरेखा को सोचने पर मजबूर कर देता है, किसकी शह हुई और किसकी मात?
“है यह कैसी डगर” कहानी में लेखिका ने समाज के ढकोसलों की बखिया उधेड़ते हुए नायिका देवी के मुख से कहलवाया है- “माँ-बाबूजी को लगता है कि मेरा कन्यादान ही उन्हें स्वर्ग की सीढ़ी चढ़ाएगा।”
आगे वह कहती है- “जब माँ-बाप ही बेटियों की पढ़ाई में अड़चन बनें तो बेटियाँ कितना लड़ें?”
नायिका देवी मध्यम वर्गीय परिवार के देव से प्रेम करती है, पर माता-पिता संपन्न घर देखकर उसका विवाह कर देते हैं और अपने कर्तव्य से फ़ारिग हो जाते हैं। बेटी जी रही है या मर गई, उन्हें कोई मतलब नहीं। पति और परिवार द्वारा उस पर चरित्रहीनता और पागलपन के निराधार आरोप लगाकर उसे घर से निकाल दिया जाता है। यहीं से देवी के संघर्ष की कहानी आगे बढ़ती है। पढ़ी-लिखी महिला संघर्ष करती है, टूटती नहीं। अपनी काँटों भरी डगर पर चलकर वह मंज़िल तक पहुँचती है।
“उसका आना” बहुत मार्मिक कहानी है। कोई बच्चा हमारे घर में किस रूप में जन्म लेता है, क्यों जन्म लेता है- यह सब पूर्व-निर्धारित होता है। मस्तिष्क पक्षाघात से पीड़ित बच्ची वेदिका का जन्म माँ कस्तूरी के जीवन को पूरी तरह बदल देता है। वह चौबीसों घंटे बेटी की सेवा में लगी रहती है। पति विवेक उसकी स्थिति को समझकर पूर्ण सहयोग करते हैं। जीवन की नई राहें खुलती हैं और “चैरिटेबल स्पास्टिक चिल्ड्रन होम” की स्थापना होती है। वेदिका का आना कस्तूरी का प्रारब्ध था। उसके जाने के बाद कस्तूरी के सामने नई राहें खुलती हैं, जिनकी उसने और विवेक ने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
“च्यों”- नया शब्द, अलग शीर्षक। यह ब्रज भाषा का शब्द है। कहानी की नायिका को यही भाषा आती है और लेखिका की इस भाषा पर पकड़ ने कहानी को अत्यंत प्रभावशाली बना दिया है। नायिका इमरती अनपढ़ है। उसका बाल-विवाह हुआ है। उसे बचपन से ही नाचने का शौक़ है, नाच उसके खून में बसा है। छोटी-सी बच्ची गाँव के किसी विवाह में घंटों नाचती रहती है, उसे अपना होश नहीं रहता। पति केशव को उसका नाचना अच्छा नहीं लगता और वह सबके सामने उसे बहुत मारता है। यह अपमान वह जीवन भर नहीं भूल पाती। उसके मन में हथौड़े-सा प्रश्न उठता रहता है, च्यों?
शहर आकर वर्षों बाद उसे उसी हवेली में काम मिलता है जहाँ केशव बिजली का काम करता है। हवेली की मालकिन रोली उसके भोलेपन पर रीझ जाती हैं। यहीं से लेखिका कहानी में सार्थक मोड़ लाती है और एक सशक्त कहानी बनती है।
“पहिया” कहानी में जीवन का पहिया निरंतर घूमता रहता है- आज जो करोगे, वही कल लौटकर आएगा। नौकरी करने वाला पति पढ़ी-लिखी पत्नी को कुछ नहीं समझता। स्वाभिमानी पत्नी एक-दो बार समझाने का प्रयास करती है, पर पुरुष का दंभ उसे चुप करा देता है। वह माँ भी है। नौकरी के बाद दोस्तों के साथ समय बिताना पहले बेटे दीपांकर को भी अच्छा नहीं लगता, पर बड़ा होकर वह भी पिता के पदचिह्नों पर चलने लगता है। जहाँ ज़िम्मेदारी नहीं, बस मौज है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर पिता को अपनी गलतियों का एहसास होता है, परंतु पत्नी सुलक्षणा तो पहले ही विदा हो चुकी होती है। अब वह बेटे को सन्मार्ग पर लाना चाहता है। नारी स्वाभिमान की उत्कृष्ट कहानी है “पहिया”।
“जो सोचा वो कब हुआ”, हम सबके जीवन में हमारा सोचा कब होता है? माता-पिता अपने बच्चों के लिए पूरा जीवन होम कर देते हैं, और वही बच्चे जब माता-पिता के त्याग और श्रम को नकारते हुए कहते हैं- “आपने किया ही क्या है?”
जतिन और यामिनी दोनों नौकरी करते हैं। एकमात्र बेटे को पहले क्रीच में रखते हैं और जब वह नौवीं कक्षा में आता है, तब घर में एक अच्छी आया रखते हैं। रविवार को अधिकांश समय बेटे चिराग़ के साथ बिताना चाहते हैं, लेकिन चिराग़ उनके साथ समय नहीं बिताना चाहता। असमय जतिन की मृत्यु यामिनी को तोड़ देती है। उस पर चिराग़ का हर रात शराब पीकर आना उसके लिए चिंता का विषय बन जाता है। हारकर यामिनी कठोर निर्णय लेती है और अंततः अपनी खुशियाँ ढूँढ़ लेती है।
“इसको क्या कहेंगे” कहानी समाज से प्रश्न करती है कि आज भी परिवार में लड़कियों की स्थिति कितनी दयनीय है। डॉक्टर चाहता है कि उसकी पेशेंट ठीक हो जाए। उसे उम्मीद है कि कहानी की पात्र किशोरी ठीक हो जाएगी, पर लड़की के पिता और दादी को कौन समझाए? अनपढ़ और ज़िद्दी दादी-पिता के आगे डॉक्टर की एक नहीं चलती। उनकी मानसिकता से वह विवश और आहत हो जाता है। यह कहानी पाठक के मन को झकझोर देती है।
“क्या सही क्या ग़लत” थर्ड जेंडर की पीड़ा को व्यक्त करती सशक्त कहानी है। हमारे न्यायालय ने पुरुष के साथ पुरुष और स्त्री के साथ स्त्री के रहने की अनुमति दी है। समाज ने लिव-इन रिलेशनशिप को भी स्वीकार कर लिया है, पर यदि किसी घर में नपुंसक बच्चा जन्म ले ले, तो उसे घर के लोग ही स्वीकार नहीं करते। उसे गंदगी की तरह बाहर फेंक दिया जाता है। एक बार भी यह नहीं सोचते कि दुनिया दरिंदों से भरी पड़ी है। कितने दुराचार कम उम्र में सहने पड़ते हैं, पढ़कर रूह काँप जाती है। कोई इन्हें बचाना भी चाहे, तो लोग उसे भी ख़त्म करने पर उतारू हो जाते हैं। वे भी ईश्वर की कृति हैं, पर एक कमी के कारण उन्हें इंसान नहीं समझा जाता, यह कैसी विडंबना है!
“नित नए खेल” कहानी आज के व्यक्ति की चतुरता की कथा है। ग्रामीण परिवेश से शहर में पढ़ने आया बालक पढ़ाई के साथ-साथ चालाकी भी सीख लेता है और अपने माता-पिता, ग्रामीण भोली पत्नी, सबको मूर्ख बनाता है। हर एक के साथ नित नई चालें चलता है। आज की कुटिल मानसिकताओं से जुड़ी यह कहानी पाठक को चैतन्य करती है और किसी पर भरोसा करने से पहले सचेत करती है।
कुल मिलाकर संग्रह की सभी कहानियों के विषय, विचार और भाव-पक्ष अत्यंत सशक्त और परिपक्व हैं। कहीं-कहीं कहानियों के गहन संवाद पुनः पढ़े जाने को विवश करते हैं। ये कहानियाँ न केवल पठनीय हैं, बल्कि चिंतन और मंथन के लिए भी प्रेरित करती हैं। जब कहानियाँ सचित्र चलती हुई प्रतीत होती हैं, तब पाठक उनसे जुड़े बिना नहीं रह पाता। मेरी ओर से प्रगति गुप्ता को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।
सुषमा चौहान ‘किरन’
जोधपुर
(माननीय राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. कलाम द्वारा, शिक्षक सम्मान से सम्मानित)


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