“चरण- स्पर्श, ताऊजी,” बाहर के बरामदे से बहू की आवाज़ मेरे कमरे तक चली आई।
“जीती रहो, बहू, जीती रहो,” यह आशीर्वाद तो बड़े भाई का था।
मुझ से मिलने वह फिर चले आए क्या?
अभी पंद्रह दिन पहले ही तो मुझे देख कर गए थे।
“यह नई एस.यू.वी. आप की है, ताऊ जी?”बहू ने पूछा।
उसे और पोतों को शिकायत रहती कि बेटे के पास पुरानी मारुति औल्टो क्यों है।
“हां,” बड़े भाई ने कहा, “अपनी है।”
हमारी पैतृक सम्पत्ति के बंटवारे के समय मेरे छोटे भाई और मैं ने अपनी पैतृक ज़मीन पर अपने बड़े भाई के पक्ष में अपने- अपने हिस्से छोड़ दिए थे और बड़े भाई ने सन पैंसठ के उस साल की दरों पर हम दोनों को मुनासिब रकमें भी पकड़ाई थीं लेकिन जहां हमारी रकमें हमारे शहरी मंसूबे निगल ले गईं थीं, बड़े भाई की ज़मीन उन्हें सोना उगल कर देती रही थी। और अब उन के पास अपना ट्यूबवेल था,अपना ट्रैक्टर था, अपना कोल्ड स्टोरेज था और चोखा वैभव था।
“अकेले आ रहें हैं, ताऊ जी?”
पिछली बार बड़े भाई अपनी बेटी के साथ टोऔटो में आए थे। उन की पचासी- छियासी की उम्र देखते हुए उन की बेटियां उन्हें कम ही अकेले आने- जाने देतीं।
“नहीं, मेरा ड्राइवर और मेरा टहुलवा मेरे साथ है।”
“आइए,” बहू उसे मेरे कमरे में ले आई।
“तू तो और भी कमज़ोर हो गया है, रे!” बड़े भाई मेरे बिस्तर पर बैठ गए, “बेटा संतोख इस बीच इधर आया नहीं क्या?”
जिस राष्ट्रीयकृत बैंक में संतोख काम करता है,वह उस की बदली हर तीसरे- चौथे साल इधर- उधर करने में लगा रहता है। डेढ़ साल पहले उस के मुख्यालय ने जब उस की बदली मध्य- प्रदेश के किसी अनजान शहर में की थी तो संतोख ने स्वयं ही अपने मुख्यालय से श्रीनगर की तैनाती के आदेश ले लिए थे। मेरे घबराने पर उस ने अपनी दो दलीलें पेश कर दी थी : एक तो यह, कि हमारे अमृतसर और श्रीनगर के बीच हवाई सेवा की व्यवस्था होने के कारण वह हम से केवल तीन घंटे की दूरी पर रहेगा। दूसरे, श्रीनगर की उस की इस तैनाती के बाद उसे अपनी मनमर्ज़ी की तैनाती मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।
“नहीं,” जवाब बहू ने दिया, “वह अब अगले हफ़्ते आंएगे। बाबूजी की कीमोथैरेपी के लिए।”
पिछले कुछ सालों में मेरी गर्दन की सूजन मेरी बगलों में भी उतर आई थी और वहां गिलटियां- सी पड़ती हुई महसूस हुआ करतीं थीं। फिर रात में मुझे पसीना आने लगा था और बुखार रहने लगा था। फिर इधर छः सात महीने से मुझे जो बुखार चढ़ा और जब कई दिन तक नहीं उतरा तो संतोख मुझे यहीं अमृतसर के फ़ौर्टिस ले गया। वहां डाक्टरों ने मेरी गर्दन की एक गिल्टी का ऊतक बायोप्सी के लिए भेज दिया। साथ ही मेरा सी.टी. स्कैन करने के बाद मेरी बोन- मैरो के लिम्फ़- नोड्ज़ की बायोप्सी भी करवाई। लिम्फ़ो- ग्रैम लिए गए और उन्हें मेरी बीमारी का नाम मिल गया। नौडुलर लिम्फ़ोमा। एक प्रकार का लिम्फ़ैटिक कैंसर।
“तू जल्दी ठीक हो जाएगा, पहलवान,” बड़े भाई ने अपने हाथ की पोटली मेरे सिरहाने धर दी।
लाड़ में वह मुझे पहलवान ही पुकारा करते। हां, हमारे बचपन के दिनों में मेरी पहलवानी गांव भर में मशहूर भी रही।
“गांव से सीधे आ रहे हैं, ताऊजी? या रास्ते में जीजी लोगों के पास रुकने के बाद?”
बड़े भाई की तीनों बेटियां चंडीगढ़ में ब्याही थीं।
“गांव से,” बड़े भाई ने कहा।
“इतनी ज़्यादा दूरी आप ने एक बारी के सफ़र में तय कर ली, ताऊजी?”
हमारे अमृतसर से अबोहर ज़िले में स्थित उन का गांव पांच सौ किलोमीटर से ऊपर तो था ही।
“यह सफ़र भी कोई सफ़र है ? सुबह चार बजे मोटर में बैठो। रास्ते भर खाते- पीते रहो और ग्यारह बजे तक अपने पहलवान के पास पहुंच भी लो….”
“आप के लिए चाय बना कर लाती हूं,” बहू बोली।
“नहीं, अभी कुछ नहीं। मेरे साथ वह लड़का आया है न! ड्राइवर के साथ। मेरा खाना-पीना भी देख लेगा। तुम फ़िक्र न करो।”
बहू के खुश्क व आलसी स्वभाव से सभी परिचित हैं।
“वह लड़का?” बहू ने हैरानी जतलाई, “आप का खाना वह बनाएगा?”
“हां, मेरे सभी काम वही देखता है….”
“हमारे बाबूजी के लिए भी कोई ऐसा ही टहुलवा ला दीजिए न!”
“हमारे पहलवान को टहल का अभाव है क्या?” बड़े भाई हंस पड़े, “इस के पास जान छिड़कने वाला अपना संतोख है। दो- दो जवान पोते हैं। और फिर तुम्हारे जैसी सयानी बहू है….”
बड़े भाई जानते नहीं संतोख की अनुपस्थिति में मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में किसी की दिलचस्पी नहीं रहती। मैं कोई बात कहता हूं , कोई फ़रमाइश सामने रखता हूं, किसी याद को ताज़ा करना चाहता हूं, या कोई सलाह देना चाहता हूं, मुझ से बात करने को घर में कोई तैयार नहीं रहता है। टहल तो दूसरी बात है।
“चाय मैं बना ही लाऊं,” अपनी बेआरामी को छुपाने की जल्दी में बहू रसोई की ओर बढ़ ली।
“पहले पानी पिऊंगा,” बड़े भाई बोले।
“अभी लाई,” बहू ने कहा।
“तुझे आपरेशन कराना है,पहलवान,” बड़े भाई मेरे पास खिसक आए।
बचपन से ही बीमार रहने वाले बड़े भाई अब कैसी भी बीमारी के इलाज से नहीं घबराते। बचपन के समय उन के हलक और पेट के बीच की मांसपेशी उन के खाने को हलक में ही अटका रहने देती। आगे पेट में न पहुंचा पाती। और कई बार तो उन के मुंह का खाना- पीना वापस भी लौट आया करता। उन का पहला आपरेशन हमारे बाबा ने उन की इसी अवरोधिनी मांसपेशी को दुरुस्त करवाने के लिए करवाया था। महज़ दस साल की उन की उम्र में। फिर तो हर्निया का, एपैन्डिकस का, घुटनों की गठिया का, दोनों आंखों के मोतियाबिंद इत्यादि….का। सभी के आपरेशन वह करवा चुके थे।
“नहीं,” मैं ने कहा, “डाक्टर कहते हैं, आपरेशन इलैक्टिव है। मतलब दूूसरे इलाज से मेरे ठीक होने की गुंजाइश अभी बाकी है….”
“लीजिए, ताऊजी, पानी लीजिए,” बहू पानी के गिलास के साथ अंदर चली आई।
बड़े भाई के लगातार बीमार रहने की वजह से हमारे बाबा ने उन्हें आगे पढ़ाया न था और उन की पढ़ाई न के बराबर रही थी। जब कि बाबा ने पचास और साठ के उन दशकों के दौरान हमारी दोनों बहनों को उन्हें बी.ए. करवाने के बाद ही ब्याहा था और छोटे को वकालत करवाई थी और मुझे एंजीनियरिंग।
“बाबूजी क्या आपरेशन करवाएंगे?” बहू बोली, “यह तो दवा भी अब जा कर खाने लगेंगे। जब इन की सेहत इस बिगाड़ पर जा पहुंची है…..”
यह सच था। दवा खाने से मैं बहुत कतराया करता। सिर में, घुटनों में, पैरों में कितना भी दर्द क्यों न हो, मैं अपनी बहादुरी उस का इलाज टाल जाने ही में मानता रहा था।
“मैं कहूंगा तो मेरा पहलवान आपरेशन ज़रूर करवाएगा। हमें इस की अभी बहुत लंबी उम्र चाहिए….”
अपने पांच भाई- बहनों में अब हमीं दो बचे थे। छोटा सब से पहले परलोक सिधारा था। कुल जमा चौंंसठ साल की आयु में। दिल के दौरे से। फिर बड़ी बहन गईं थीं। जाने से पहले पचहत्तर साल की अपनी उम्र में। सीढ़ियों से ऐसी फिसलीं कि फिर चलने- फिरने को तरसते हुए मरीं। और तीसरे नंबर की बहन पारगामी हुईं थीं। अभी दो साल पहले। सत्तर साल की उम्र में।
“न!” मेरी रुलाई छूटने लगी।
अब मेरी हर सांस संतोख की ज़िंदगी के लिए दुआ मांगती थी। श्रीनगर वह मेरी मर्ज़ी के खिलाफ़ गया था। अपनी जान- जोखों हथेली पर ले कर।
“बाबूजी की कीमोथैरेपी और रेडियो थैरेपी कराई ही जा रही है। उन से भला उन्हें आराम क्यों नहीं मिल सकता? सभी कहते हैं, इन्हें आपरेशन कराना नहीं चाहिए। जान को खतरा रहता है….”
बहू की अनावश्यक नकार ने मेरी रुलाई रोक दी।
“आप की चाय,” बड़े भाई का टहुलवा हमारे पास आ पहुंचा।
“यह संतू है,” बड़े भाई ने उसे मुझ से मिलवाया, “हमारे रुलदू का पोता….”
“पैरी पौना, बाबूजी,” संतू मेरे पैर छूने लगा।
“पैर न छूना,” मैं ने प्रतिवाद किया।
चरण- स्पर्श की इस परंपरा से मुझे सख्त परहेज़ है। और अपनी बहू और पोतों को भी मैं ने आज तक अपने पैर नहीं छूने दिए हैं।
“हमारे दादा हमें आप के बहुत किस्से सुनाते हैं,” संतू हंसा, “हमें मालूम था आप हमें अपने पैर न छूनें देंगे….”
रुलदू मेरे पहले कारोबार में मेरा पहला कर्मचारी था और दूसरे कारोबार में मेरा अकेला कर्मचारी।
“कैसा है रुलदू?” मैं ने संतू से पूछा।
“अभी भी खूब ज़ोर वाले हैं,” संतू ने कहा, “तेल का कोल्हू घुमा लेते हैं । फाल कंधे पर लाद लेते हैं….”
“मेरे साथ उस ने बहुत काम किया था,” मैं ने कहा।
( 2 )
रुलदू का हमारे गांव व परिवार से पुराना संबंध रहा था और साबुन बनाने का अपना कारोबार मैं ने रुलदू के साथ शुरू किया था। सन पैंसठ में मिली अपनी रकम के बूते के बल पर। रकम मिलते ही मैं ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी और अमृतसर की रहीम बख्श रोड पर बना साबुन का एक पुराना कारखाना खरीद लिया था। बतौर कैमिकल एन्जीनियर अपने प्रयोग करने हेतु।
न्यू सोप फ़ाउंडरी।
सब से पहले मैं ने एक सौ पच्चीस टन की एक बड़ी बौएलर केतली खरीदी। नया क्रच्चर खरीदा। नया फ़ोल्डर खरीदा।नया कटर खरीदा।और अपने साबुन को काग़ज़ में लपेटने वाली मशीन खरीदी।
केतली में अब पशुसवा के साथ कास्टिक पोटाश उबाला जाने लगा। फिर उस साबुन को एक जैसी बराबरी देने के लिए क्रच्चर के ज़रिए रोल किया जाता और उस के सूखने पर उसे प्लौडर के कोल्हू में खपचियों की शक्ल में उतार लिया जाता। कटर उन खपचियों को बट्टियों में काट देता और मेरा साबुन कागज़ चढ़वाने के बाद बाज़ार भेज दिया जाता।
सन साठ-पैंसठ के उन दिनों में सिन्थैटिक पाउडर की बजाए लोग- बाग साबुन की बट्टी ज़्यादा इस्तेमाल करते थे। बल्कि बट्टी ही नहीं, बाज़ार में साबुन की खुरचन भी बिक जाया करती। जिसे कम आमदनी वाले लोग उसे घर में उबाल कर अपने कपड़े धोने के काम में लाया करते।
शुरू के नौ- दस साल मेरा वह साबुन खूब बिका भी। किंतु सन पचहत्तर तक पहुंचते- पहुंचते बाज़ार में आ पहुंचे नए डिटर्जेंटों की नई बानगी ने मेरे साबुन की बिक्री को करीब- करीब खत्म कर दिया।
कारखाना बेच कर सन छियत्तर में फिर मैं ने पेंट्स की एक दुकान खोल ली। कर्मचारियों में सिर्फ़ रुलदू को अपने साथ रख सका। साबुन के अपने कारखाने के बाकी सभी कर्मचारियों को जवाब देना अनिवार्य रहा। दुकानदारी में मुझे ज़्यादा कामयाबी तो नहीं मिली। लेकिन हां, संतोख की पढ़ाई के उन दिनों में मैं ने उसे अपनी तरफ़ से रुपए- पैसे की कमी कभी महसूस नहीं होने दी।
इसी बीच अपनी पत्नी के देहांत हो जाने के कारण मेरा मन अपनी दुकानदारी से उखड़ लिया। जब तक संतोख की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और अपने बैंक में वह अच्छी नौकरी भी पा चुका था।
फिर संतोख ही के कहने पर मैं ने अपना वह दूसरा कारोबार भी आगे बेच दिया और रुलदू को बड़े भाई के पास भेज कर खुद यहीं घर पर अपने दिन काटने लगा।
( 3 )
“आप से मिलने दादा आना भी चाहते थे,” संतू ने कहा, “लेकिन इन बड़े बाबूजी ने उन्हें रोक दिया। बोले, अगली बार लेकर जांएगे। इस बार यहां सामान पहुंचाना है….”
“कैसा सामान?” बहू चौकन्नी हो ली।
“हमारे बड़े बाबूजी गांव से गाय का घी, चावल, दालें और दलिया लाए हैं….”
“मुझे मालूम है हमारे पहलवान को दलिया और खिचड़ी खूब पसंद है,” बड़े भाई बोले।
“लेकिन, बहू ने कहा, “अब तो बाबूजी इन चीज़ों को मुंह तक नहीं लगाते।
अपनी पत्नी के सिधारने के बाद से मैं ने घर में दलिए और खिचड़ी की शक्ल तक न देखी थी। हल्के भोजन के नाम पर बहू मुझे डबल रोटी के एक स्लाइस के साथ किसी भी उबल रही दाल का पानी पेश कर दिया करती।
“अब खाएगा। मेरा पहलवान मेरे साथ सब खाएगा। खिचड़ी भी खाएगा और दलिया भी खाएगा। यह संतू दोनों चीज़ बहुत बढ़िया बनाता है….”
“दलिया तो हमारे दादा खुद पिसवा कर लाए रहे। बहुत बहुत महीन। वह जानते रहे उन के अपने बाबूजी के लिए पिसवाया जा रहा है….”
“दलिया तो आप अभी बना लाओ, संतू,” बड़े भाई ने उसे आदेश दिया।
“जी,” संतू ने कहा।
“संतू से सब सामान तुम देख- समझ लो,बहू। बल्कि उसे भी अपनी रसोई दिखा-समझा दो….”
“जी,ताऊजी,” बहू का तेवर कुछ नर्म पड़ गया।
“तेरे आपरेशन के लिए यह एक लाख लाया हूं,” बड़े भाई मेरे और पास खिसक आए और अपनी पोटली खोलने लगे।
भाईयों के लिए उन का दिल बेजोड़ संप्रीति से भरा रहा है। सुधारवादी स्वभाव वाले हमारे छोटे भाई ने अपने कुछ मित्रों के साथ पेहोवा शहर में एक सहकारी फ़ार्म पर सन पैंसठ में मिली अपनी रकम लगाई थी और रकम लगाने के कुछ साल बाद जब उस के उन मित्रों के साथ गंभीर मतभेद खड़े हो गए थे और उस की जान पर बन आई थी तो उस समय इन्हींं बड़े भाई ही ने छोटे को पनाह दी थी। अबोहर की एक चीनी मिल के बीस प्रतिशत शेयर खरीद कर। ताकि छोटे को उस की वकालत के बूते पर वहां एक नियुक्ति उपलब्ध कराई जा सके। और अपनी ज़िंदगी के आखिरी दस साल छोटे ने उस चीनी मिल के कानून अधिकारी के रूप में गुज़ारे थे।
“न!” उन की पोटली पर मैं ने अपना हाथ टिका दिया,”मत खोलिए इसे….”
“मैं सब पता कर के आया हूं,” बड़े भाई बोले, “तेरा आपरेशन होना बहुत ज़रूरी है। वरना तेरी गिलटियां तेरे पूरे शरीर में फैल जाएगीं और तेरे फेफड़े और तेरी तिल्ली को काम करने से रोक देंगी….”
“नहीं, अभी नहीं,” मैं ने कहा।
“क्यों?”
“संतोख पहले श्रीनगर से लौट आए। उस की बदली पहले इधर हो जाए….”
“क्या मतलब?”
“मेरे मन में एक भरम है,” मैं फूट पड़ा, “एक वहम….”
“कैसा भरम?”
“जब तक मेरी जान खतरे में है, संतोख के साथ उधर कोई हादसा नहीं हो सकता….”
“तू भी अजीब सोचता है, पहलवान। अब क्या मालूम उस की बदली इधर जल्दी हो पाए,न हो पाए….”
“नहीं,” मै ने कहा, “बदली तो उसकी जल्दी हो ही जाएगी। मेरी बीमारी उस की बदली की मज़बूत वजह है….”
“इस पोटली में क्या है,ताऊ जी?” कमरे में दाखिल होते ही बहू को वह पोटली दिखाई दे गई।
“अपने पहलवान के लिए बादाम लाया था….”
“आप जैसे भाई अब देखने को कहां मिलते हैं?” बहू बोली।
“देखने को अभी भी बहुत कुछ मिलता है, बहू,” बड़े भाई ने अपनी पोटली अपने अंक में समेट ली, “लेकिन निगाह में उसे उतारने के लिए नमीली नहीं, खुली आंखें चाहिएं….”
दिल के भीतर तक छू गई कहानी आपदधर्म पढ़ते- पढ़ते कई बार आँखों में नमी उतर आई। अपने तो वहीं है जो आपद में काम आएँ।सच्चे रिश्तों की यही पहचान है। मानवीय संवेदनाओं को दर्शाती बहुत सुंदर कहानी। बधाई दीपक शर्मा जी।