1 – दर्द को रह जाने दो
कभी उजड़े नहीं तो क्या आबाद हो?
कभी कैद में न थे तो क्या आज़ाद हो?
यह दर्द है तो तुम हो
ग़र यह नहीं तो क्या जिंदा हो?
इसीलिये इस दर्द को रह जाने दो
कभी अफ़सोस की टीस बन
कभी बेबसी की खीज
कभी आकस्मिक हंसी बन
कभी अबाध आंसू
सहसा ही दिख जाने दो
रोकना मत इसे, ना टोकना ही
उफ़न कर बह जाने दो
इस दर्द को रह जाने दो
दोस्तों संग संलाप में
या एकाकी सन्ताप में
इसकी बातें उठ जाने दो
बहलाना मत इसे, न मनाना ही
अपनी मर्ज़ी की कर जाने दो
यह घाव बिलखने दो
अंगार बन इसे सुलगने दो
सहलाना मत इसे, न उकसाना ही
इसे फुर्सत से भर जाने दो
इस दर्द को रह जाने दो
यादों में बसने दो इसे
सांप बन कभी डसने दो
ख़्वाबों से गुज़रने दो इसे
पन्नों पर उतर आने दो
बिसराना मत इसे, ना खोजना ही
कुतरे हुए नाखूनों से झाँकती
आदत सी बन जाने दो
खुशी संग दरवाज़े पर दिखायी दे कभी
इसे भी अंदर आने दो
दुतकारना मत इसे, न दुलारना ही
चुप चाप बैठे तो ठीक
वरना कुछ देर इसे भी ढोल बजाने दो
इस दर्द को रह जाने दो
क्योंकि – कभी उजड़े नहीं तो क्या आबाद हो?
कभी कैद में ना थे तो क्या आज़ाद हो?
यह दर्द है तो तुम हो
ग़र यह नहीं तो क्या जिंदा हो?
2 – प्रवाह
सदियाँ नदियाँ
दोनों में कल कल
यह प्रवाह –
गति भी है, अनुमति भी
बहने की, बहते देने की
‘गो विथ द फ्लो’
‘लिव इन द मोमेंट’
की परतों में सिमटी
गंतव्य की मौन चाह
यह प्रवाह –
निरुद्देश भी है, निर्देश भी
निष्क्रियता में नियंत्रण का
संताप की छाँव तापता
पराजय का घाव ढापता
अभिजय की अपेक्षा में
यह प्रवाह –
प्रयास भी है, अभ्यास भी
उत्तीर्ण होने का, नवीन होने का
जहाँ पथ–पथिक पर्याय हुए
दिग से दिगंत तक
की खोज में
यह प्रवाह –
स्वाधीन भी है, आधीन भी
अपनी नीयत का, अपनी नियति का
पूर्णता की आस थामे
प्रसव से प्रयाण तक
एक दीर्घ श्वास–सा
यह प्रवाह –
समर्पण भी है, प्रतिरोध भी
उपयुक्त होने का, उन्मुक्त होने का
– अंतरीपा ठाकुर मुखर्जी, लंदन
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