1. यथा क्या था…
क्या था….
क्या था?
जो ग़ुमाँ था!
क्या बचा हुआ,
कोई अरमाँ था।
शायद ज़िंदगी का
कोई अफ़साना
नहीं! नहीं?!
फ़साना शेष था।
तबस्सुम था
तसव्वुर था
बस तस्वीर की
तदबीर शेष थी।
ज़िंदगी की राह में
उसकी बाँह में
एक अधूरी चाह
शेष थी।
उसकी बाँह में
ज़िंदगी और प्यार
की चाह शेष थी।
2. ‘ स्व-धन’
पहले सुना जाना
औ माना था,
बेटियाँ ‘पराया धन’
होती हैं।
पर लगता है कि
वो स्वप्न था,
या कि कोई
दकियानूसी जतन था।
ग्लोकल से ग्लोबल
होते,
बदलते संस्कार में ,
अब तो वे ही
‘ स्व-धन’होती हैं।
बेटों से बढ़कर
घर का सहन होती हैं।
आज के जग में
रिश्तों का बदला
समीकरण होती हैं।
हुआ करते होंगे
बेटे कभी ‘स्व-धन ‘
अब तो संगिनी का
‘ स्त्री- धन’ होते हैं।
आपा- धापी के इस
जीवन में ,
अब तो बरगद से
युगल ही आपस का
‘स्व-धन’ होते हैं।
- सूर्यकांत शर्मा
