प्रेम -1
प्रेम एक नदी है तो
जो अपना मार्ग खुद बनाती है
किनारा तोड़ती है पुरानी घाटियों को छोड़ती है
और नवीन हो जाती है
हां प्रेम एक नदी ही तो है
प्रेम एक पर्वत है तो
वह है तो धरातल से ऊंचा
उग आते हैं उसके ऊपर झाड़
बसंत से झरते हैं पात पात और
उठता है धुआं छा जाती है धुंध ,
लगती हैं आग झुलस -जल जाता है
प्रेम का पहाड़
प्रेम एक पठार है
उपजाऊ कीमती खनिज वाला तब
उसे कुरेदने खोदने लगती है दुनिया
और खदान खाइयों गहराई में समाकर
विलीन हो जाता है प्रेम पठार
प्रेम मैदान है तब हर कोई
खेत जोतकर फसल उगाता है
अपने पशुओं की तरह मंसूबे पालता है
दोहन करता है अर्थ का
अर्थात् क्या प्रेम, प्रेम नहीं है?
क्या यह वासनाओं का एक समुच्चय है
जो आकर्षक है मनमोहक है दाहक है विदारक है
सृष्टि का नियामक भी है और संहारक भी है
इस आर्थिक युग में प्रेम अब प्रेम नहीं है
व्यवसाय है लाभ- मुनाफा तक है।
प्रेम
प्रेम -2
प्रेम एक बहुआयामी समुच्चय है
ईश्वर परवरदिगार के लिए प्रार्थना है
माता पिता परिवार की कामना है
पति पत्नी के जीवन का साहचर्य है
बच्चों के संदर्भ में स्नेह है प्रेम
दोस्तों में स्वार्थ है तो कभी कभार निस्वार्थ है
बाजार में व्यापार से है
पुस्तकों में लगाव , शब्दों के अलगाव से है
प्रेम कहां कहां किस किस रूप में
सृष्टि के किन किन आयामों में है
यह अपरिमित अपरिभाषेय है
अर्थात् प्रेम एक बहुआयामी समुच्चय है।
सबके सापेक्ष में कुछ लोग
कुछ लोग ही तय कर रहे हैं बहुत कुछ
इस दुनियां के लिए
कुछ लोगों के कानों में पीतल के टेग लगाए गए हैं (क्योंकि वे प्रगतिशील हैं)
कुछ लोगों ने छाती पर गुदना गुदवा लिए हैं
(क्योंकि वे अपने को परम्परावादी मानते हैं)
कुछ लोग पूछ रहे हो कि भाई तुम किस तरफ़ हो
कुछ लोग बाकी लोगों के लिए रबर सील लिए दौड़ रहे हैं
क्योंकि इस सदी के अंत अंत तक
तय कर देना है कि वे इस तरफ हैं या उस ओर
मानो आदमी सिद्ध करने के खांचे
अब नहीं बचे हैं उन लोगों के पास
जो पहले आदमी ही थे
आज हम तुम बैंकों द्वारा ऋण में दिए गए
रेबड़ के बैल भैंस गाय बकरी और मैमने हैं
आधुनिक बाजार में अपने अपने निशानों से
बिकते चले जाते हैं सभी के सभी
कुछ लोग समूची दुनिया पर
आईएसआई एगमार्क जैसे निशान बनाना चाहते हैं
क्योंकि उन्ही के पास तपती सलाखें हैं
गरम करते रहने की धमन भट्टियां भी हैं
देखो येल्तसिन के पास लाल बटन है और
क्लिन्टन लोकतंत्र की चाबी घुमा रहें हैं
हमारे देश में भी एक ही प्रधानमंत्री है
पर लोग देश का फ़ेडरल स्ट्रेक्चर समझा रहे हैं
दोस्तों ये दुनिया कैसी हो?
उसमें कौन कौन हों और कौन कौन नहीं?
समाज कैसे चले?
औरतें कैसी हो? उनके नाखून कितने बढ़े?
और कैसे रंगें जाएं?
कुछ लोग ही तय कर देना चाहते हैं
इन कुछ लोगों के सब कुछ ही तय कर देने से
बाकी सब, कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं
इसलिए कुछ लोगों के पास कारखाने हैं
जिसमें बनाए जा रहे हैं
स्टाम्प पेड,रबर मोहर और टैग
चड्डी, हाफ फुलपेंट पायजामा टोपी से लेकर लाल नीले हरे केसरिया कुर्ते तक
सिलने सिलवाने, पहनने या दूसरों को पहनाने
या फिर सब कुछ को उतार फैकने का
सिलसिला चल निकला है
बिल्लों को फटी कमीज़ पर चिपकाएं रखने
छोटे छोटे सपनों को खूंटी पर टांगें रखने
या मुंह ढांपकर सोते रहने से
आदमी और दुनिया दोनों बदल रही है
लोगों जरा सोचो, और मालूम करो कि
हिस्से में आए चिंदी चिंदी नोट
बच्चों का गला फाड़ रहे नारे और
देश की छाती में छेद करते वोट
बुढ्ढो के खांसते खंखारते रहने से क्यों झड़ रहें हैं
दुनिया के पास बहुत कुछ है पर
हमारे पास पा सकने लायक कुछ भी नहीं
क्योंकि कुछ ही लोग हैं
जो सभी कुछ तय कर चुके हैं।
अब कहाँ दिन आएंगे अच्छे
सपन सारे हर लिए हैं अब,अब कहाँ दिन आएंगे अच्छे
चुक गई हैं खोखली सी हो गई हैं अर्थतंत्रो की शिराएं
इस सदी मे लोक आजादी के परवान चढ़ती है ‘दिशाएँ’
नमन चढ़ते, सिर झुकाते गीत गाते पैरवी करते रहें है
सब सितारे ‘पर’ लिए हैं पर ,अब कहाँ दिन गाँएंगे सच्चे
सपन सारे हर लिए हैं अब कहाँ दिन आएंगे अच्छे
गरीबी और न्याय की असमानताएं सालती हैं हम सभी को
कुछ आवाजें बदलने को भी उठेंगी गुमराह होती इस सदी को
छला जाएगा नमन और आचमन प्रण प्राण व्याकुलता जमीं को
सब्र सारे ‘कर’लिए हैं काँपते से अब कहाँ दिन आएंगे अच्छे
सपन सारे हर लिए हैं अब, अब कहाँ दिन आएंगे अच्छे
अब न वैसी हैं हवाएँ नदियाँ पर्वत और सागर न बचा है जल
घाटियों मैदान उपवन और तड़ागो पर गिरी हैं बिजलियाँ
अब न मौसम आ रहें हैं उन बहारों के कि उड़ती तितलियां
अब दरकते खेत सूने हैं बड़ी बाखर खले घर सबके सब ही
वह कुएँ के पाट पनिहारिन ,नहीं हैं गीत गायन हर समय के
घरो घर दीवार तंगहाली की ऊँची खड़ी होकर कह रही हैं
प्यार था कितना जो आपस मे नहीं है शेष सब कुछ सह रही है
कहाँ वैसी हैं फिजाएं न रहे मौसम ,अब कहाँ दिन आएँगें अच्छे
नोट—दिशाएँ= दसों तरफ । पर=पंख । कर=हाथ ।बाखर=पालतू पशुओं को बाँधने का स्थान। खले=खलिहान
- कमलेश कुमार दीवान

हमारी रचनाएं प्रकाशित करने के लिए संपादक जी, पुरवाई पत्रिका की साहित्यिक टीम को साधुवाद सादर आभार