रिश्ताई मुक्तक
1.
उनके साथ ईश्वर की कृपाएँ होती हैं
ज़िंदगी की सब हसीन, फ़ज़ाएँ होती है
उन्हें ज़िंदगी में, कुछ नहीं चाहिए मौला
उनके पास सब है जिनकी माँएँ होती हैं
2.
रिश्ते की ऊँचाई, अपनेपन के नीचे की खाई से है
संबन्ध में हृदय की फिसलन, जम गयी काई से है
सगे-संबन्धियों से संबन्ध भी, रुपये-पैसे जैसे हैं
आमने-सामने मुँहपुराई, नहीं तो पाई- पाई से है
3.
रहस्य इंतज़ार में खड़ा है, पर्दा-पर्दा खोलने को
एक चुप्पी सौ पर भारी, सुंदर बोल बोलने को
एक परवाह बतलाती आपका कितना ख़्याल है
वरना कोई मापदंड नहीं है रिश्ता टटोलने को
4.
ज़िंदगी इक इम्तिहाँ है इम्तिहाँ से डर कैसा
अँधेरा रौशनी दे तो उजालों का शहर कैसा
माँ की ममतामयी बातें सब याद करते हैं
बाप की छत्रछाया से बेघर हो तो घर कैसा
5.
झूठ-मूट के दिखावे से, ठाठबाट नहीं बढ़ती
दिखावटी बोल बोलने से औक़ात नहीं बढ़ती
आप रिश्ते को गहराईयों में पिरोना चाहते हैं
सामंजस्य की बात करें तो बात नहीं बढ़ती
6.
शक के साथ, भरोसे की, सगाई तो होने दे
जफ़ा को, ऐतमाद की, लुगाई तो होने
तेरे अहम् से किसी जज़्बात को ठेस न लगे
ऐसे आत्मविश्वास की, कमाई तो हो
7.
लुप्त होती संस्कृति की तहरीर बचा लें
फूल चढ़ती सभ्यता की तस्वीर बचा लें
परंपराओं के ऊपर छत जोड़ने से पहले
हिलती नींव और ढलती शहतीर बचा लें
8.
झूठे हसरतों की चाह कौन करता है
‘माँ’ नहीं तो, परवाह कौन करता
अक़ीदत, रिश्ते- नाते तुलने लगे हैं
रिश्तों का सही निर्वाह कौन करता है
9.
माँ घर के चुल्हे में जब आँच
ज़हरीली धुएँ से जब साँसें भर जाती थीं
तब तैयार होता घर के मिल्लत की रोटी
जिसे देह जलाकर वो तवे में पकाती थीं
10.
बिना ताप झेले, पानी उबल कर बादल नहीं होता
बिना परिश्रम ऊँच-नीच तल,
परिवार के आमद-ख़र्च में रुपये-
बड़ों के प्यार से बढ़ कर कोई आँचल नहीं होता
11.
बाहरी रिश्ते सही बाँधने से घर-सा लगता है
रिश्तों में अंदर का तनाव ज़हर सा लगता है
मुँहपुराई वाले शब्दों का मैं- बुरा नहीं मानता
पर लादी गई संवेदना से हमें डर
12.
पल्लू पकड़ कर माँ के संग शरारत नहीं करता
बचपन में किये उत्पात की वकालत नहीं करता
मैं ख़ुद को झूठ कहता हूँ मैं मन से बड़ा बनकर
अपने भीतर की संवेदना से बग़ावत नहीं करता
13.
महकने वाले परस्पर रिश्तों का, गुलमर्ग बड़ा रखना
ख़िज़ाँ पक्ष में आये या बहार, तुम संसर्ग बड़ा रखना
वाजिब नहीं होता बाग़ों में केवल चिड़ियों का तराना
दिन चढ़े भी तो, ढलती शाम का उत्सर्ग बड़ा रखना
14.
चिकनी-चुपड़ी बातों में, गहराई नहीं होती
दुर्व्यवहार के गुण्डों की, सुनवाई नहीं होती
विश्वास का पवित्र वस्त्र, छेद-छेद तो न कर
तार-तार रिश्तों की, कभी तुरपाई नहीं होती
15
सोचा अपने मन-आँगन में एक लगाएँ माँ का पेड़
वात्सल्य से घर भर जाए, फूले सारे जहाँ का पेड़
मन का पेड़ भारी होता, जग के अक्षावट के ऊपर
उस छाँव में शीतलता है, बाक़ी यहाँ-वहाँ का पेड़
