Sunday, May 3, 2026
होमसाहित्यिक हलचलकथाकार विनिता बक्शी के उपन्यास 'बिंदु का दायरा' पर पुस्तक-परिचर्चा

कथाकार विनिता बक्शी के उपन्यास ‘बिंदु का दायरा’ पर पुस्तक-परिचर्चा

कस्तूरी द्वारा आयोजित साहित्यिक श्रृंखला “किताबें बोलती हैं: सौ लेखक, सौ रचना” के अंतर्गत 1 मई 2026 को साहित्य अकादमी सभागार, नई दिल्ली में कथाकार विनिता बक्शी के उपन्यास “बिंदु का दायरा” पर पुस्तक-परिचर्चा का आयोजन किया गया।

विनिता बक्शी एक जानी-मानी समाजशास्त्री, नीति विशेषज्ञ, लेखिका और मोटिवेशनल स्पीकर हैं। वे आम्ब्रा फाउंडेशन की संस्थापिका हैं, जो महिलाओं के सशक्तिकरण, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक विकास पर कार्य करता है। उन्होंने गत वर्ष संसद टीवी के शो “दिल से दिल तक की बात” के होस्ट के रूप में अपने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जीवन की शुरुआत की। लेखन की दुनिया में भी विनीता का महत्वपूर्ण योगदान है, और वे अपने लेखन तथा मार्गदर्शन के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए समर्पित हैं।

पुस्तक परिचर्चा के क्रम में वक्ता के रूप में सर्वप्रथम कथाकार अंजू वेद जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह उपन्यास गाँव की पृष्ठभूमि पर आधारित एक सच्ची घटना का लघु रूप है, जिसे विनिता जी ने साक्षी भाव से लिखा है। इसमें जाति, ऊँच-नीच और गरीबी-अमीरी के बीच सबसे प्रमुख रूप से प्रेम तथा बिंदु और उसकी माँ के संघर्ष को चित्रित किया गया है। उनकी भाषा-शैली अत्यंत संवेदनशील है—मानो पीड़ा स्वयं शब्द बनकर बोल रही हो। साथ ही, उन्होंने आधुनिक संवेदनहीनता पर प्रश्न उठाया है, जहाँ लोग अपराध देखते हुए भी उसे रोकने का प्रयास नहीं करते।

वक्ता के रूप में कथाकार वंदना यादव जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि उन्होंने इस उपन्यास की गणितीय विवेचना करनी चाही। बिंदु का जो दायरा है, उसका कोई निश्चित आकार या क्षेत्रफल नहीं होता। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद जब आप अपने आसपास की परिस्थितियों, बच्चियों और पुरुषों को देखते हैं, तो लगता है कि बिंदु का कोई सीमित दायरा नहीं है—वह असीमित है। आगे वे कहती हैं कि विनिता जी की भाषा-शैली अत्यंत क्लासिक और समकालीन लेखन से भिन्न है। अपने ग्रामीण अनुभव के आधार पर वे कहती हैं कि उपन्यास के उदाहरण अत्यंत जीवंत हैं। यह कृति पढ़ने योग्य है और इस पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार होना चाहिए, विशेषकर उन सामाजिक समस्याओं पर—जैसे झारखंड-बिहार से बच्चियों को काम के लिए लाना और उनका शोषण—जिन पर गंभीर चर्चा आवश्यक है।

वक्ता के रूप में कवि, कथाकार एवं शिक्षाविद् हर्षबाला शर्मा जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि हम क्रांति और पितृसत्ता की बातें करते हैं, बदलाव की बात करते हैं, पर हमारे दायरे लगातार सिमट रहे हैं—और यह “बिंदु” हम सभी हैं। वे प्रश्न उठाती हैं कि ये दायरे हमें सुरक्षित रखते हैं या बाँधते हैं। उनका मानना है कि पितृसत्ता स्त्री और पुरुष दोनों में विद्यमान है। विनिता जी के संदर्भ में वे कहती हैं कि उन्होंने स्त्री पक्ष का एक छोटा-सा “पीपल का पेड़” रोपा है, जो आगे बढ़ने की संभावनाओं का प्रतीक है। वे यह भी रेखांकित करती हैं कि स्त्री को नियंत्रित करने का एक प्रमुख साधन यौन शोषण है, और समाज का यह रूप बाहरी चमक के बावजूद भीतर से खोखला है। आगे वे कहती हैं कि जब स्त्री अपने दायरे से बाहर निकलती है, तो उसे सत्ता से टकराना पड़ता है—फिर भी प्रयास आवश्यक है। उपन्यास इसी संघर्ष को सरल, सशक्त भाषा में प्रस्तुत करता है।

मुख्य अतिथि के रूप में मीडिया विश्लेषक एवं शिक्षाविद् वर्तिका नंदा जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि विनिता जी में सृजन की गहरी आकांक्षा है, जिसे उन्होंने बिंदु जैसे पात्र के माध्यम से व्यक्त किया है—एक ऐसी लड़की जो समाज से जुड़ी है और पाठकों को झकझोरती है। बिंदु के भीतर की तड़प केवल गरीबों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर वर्ग में पाई जाती है, पर अनेक परिस्थितियों में वह दबकर रह जाती है। वे बताती हैं कि उपन्यास में पुलिस और समाज दोनों ही तटस्थ दर्शक के रूप में चित्रित हैं, जो सब देखते हैं, पर हस्तक्षेप नहीं करते। उनके अनुसार, किताबें स्वयं क्रांति नहीं लातीं, बल्कि भीतर की चेतना को जगाती हैं—और यह उपन्यास उसी चिंगारी को प्रज्वलित करने का प्रयास करता है।

रचनाकार विनिता बक्शी जी ने अपने वक्तव्य में सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा, “बिंदु का दायरा” केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि एक अनुभव और आंतरिक यात्रा है, जो धीरे-धीरे उनके भीतर आकार लेती रही। वे कहती हैं कि छोटी-छोटी अनुभूतियाँ ही एक दिन कथा का रूप ले लेती हैं—इसी प्रकार एक साधारण-सी घटना ने इस कृति को जन्म दिया। उनके अनुसार, बिंदु केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक संवेदना है—हम सबके भीतर का वह हिस्सा, जो अपने दायरे को पहचानने और उस पर प्रश्न करने की कोशिश करता है। लेखन की सबसे बड़ी चुनौती यही रही कि संवेदनाओं की गहराई बनी रहे और साथ ही सामाजिक यथार्थ को ईमानदारी से प्रस्तुत किया जा सके।

अध्यक्षीय उद्बोधन में आलोचक रेखा सेठी जी ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह परिचर्चा अत्यंत आत्मीय रही। उनके अनुसार, विनिता जी के पात्र आदर्श या पूर्णतः श्वेत-श्याम नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की तरह अच्छाई और बुराई के मिश्रण से बने हैं। वे मानती हैं कि उपन्यास धीमी गति से आगे बढ़ते हुए सीमाओं को तोड़ने और नई संभावनाएँ जगाने का कार्य करता है। यह बिना उपदेश दिए, सहज ढंग से पाठकों में बेचैनी और विचार उत्पन्न करता है—और यही इसकी सार्थकता है।

इस अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार, आलोचक, संपादक, वक्ता और विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन साहित्य एवं कला अध्येता विशाल पाण्डेय जी ने किया।

RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest