पुस्तक : शब्द साक्षी हैं (लघुकथा संग्रह), लेखक : सतीश राठी
प्रकाशक : सत्य प्रकाशन, दिल्ली – 110053 – मूल्य : 120/- रूपए
हिंदी साहित्य के आकाश में सतीश राठी की सृजनधर्मिता एक दीप्त नक्षत्र की भाँति आलोकित है। श्री राठी की संवेदनशील, सजग और सशक्त लेखनी ने न केवल एक विशिष्ट पहचान अर्जित की है, अपितु समकालीन साहित्य को गहन अर्थवत्ता भी प्रदान की है। इनकी रचनाएँ समय की धड़कनों को सुनती हैं, समाज की विसंगतियों को पहचानती हैं और मानवीय मूल्यों की ऊष्मा को अत्यंत मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त करती हैं। विशेषतः लघुकथा विधा को सतीश राठी ने जिस साधना, सूक्ष्म दृष्टि और शिल्प-संपन्नता के साथ साधा है, वह हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। इनकी लघुकथाएँ केवल कथ्य नहीं, बल्कि समय-साक्षी दस्तावेज़ बनकर पाठकों के अंतर्मन को स्पर्श करती हैं। इनकी रचनाएँ विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित होकर नई पीढ़ी को संवेदनशील दृष्टि दे रही हैं और विभिन्न भाषाओं में अनूदित होकर व्यापक पाठक-समाज तक पहुँच रही हैं। क्षितिज साहित्यिक संस्था के माध्यम से सतीश राठी मार्गदर्शन अनेक नवांकुर रचनाकारों के लिए प्रेरणास्त्रोत रहा है। इन्होंने युवा लेखकों को केवल प्रोत्साहन ही नहीं दिया, बल्कि उनकी सृजनात्मक चेतना को दिशा और संस्कार भी प्रदान किए। इंदौर से लघुकथा के क्षेत्र में उभरती सशक्त उपस्थिति श्री राठी की साहित्य-सेवा का उज्ज्वल परिणाम है।
श्री सतीश राठी का साहित्यिक स्थान आज भारतीय लघुकथा-जगत में अत्यंत प्रतिष्ठित और सम्मानित माना जाता है। यह प्रतिष्ठा उन्हें केवल रचनाओं की संख्या के कारण नहीं, बल्कि उनकी वैचारिक गहराई, सामाजिक प्रतिबद्धता और अभिव्यक्ति की सादगी के कारण प्राप्त हुई है। वे उन साहित्यकारों में हैं जिन्होंने लघुकथा को न तो हल्की विधा समझा और न ही उसे मात्र मनोरंजन का माध्यम बनाया, बल्कि उसे समाज-परिवर्तन की सशक्त साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने का गंभीर प्रयास किया। सतीश राठी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा है। वे अत्यंत सरल, सहज और संप्रेषणीय शब्दावली का प्रयोग करते हैं, किंतु उस सरलता में विचारों की गहनता और संवेदनाओं की तीव्रता समाहित रहती है। उनकी रचनाएँ पढ़ते समय पाठक को भाषा की जटिलता से जूझना नहीं पड़ता, बल्कि वह सीधे कथ्य के मर्म तक पहुँच जाता है। यही कारण है कि उनकी लघुकथाएँ व्यापक पाठक-वर्ग तक सहजता से पहुँचती हैं और दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ती हैं।
श्री सतीश राठी का पहला लघुकथा संग्रह ‘शब्द साक्षी हैं’ वर्ष 2002 में सत्य प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित होकर आया था। यह संग्रह काफी चर्चित रहा था। इस लघुकथा संग्रह की भूमिका डॉ. सतीश दुबे ने लिखी थी। डॉ. सतीश दुबे ने अपनी भूमिका में लिखा था ‘लेखकीय उद्देश्य की तमाम शर्तों के बहुत नजदीक होने के कारण सतीश राठी का नाम श्रेष्ठ लघुकथाकारों के बीच स्वत: दर्ज हो जाता है। लघुकथा के गुणात्मक एवं मात्रात्मक लेखन के साथ विधा के विकास हेतु किये गए प्रयासों की चर्चा जब कभी होगी, तब सतीश राठी नाम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा, यह तय है।’ इस संग्रह में छोटी-बड़ी 80 लघुकथाएँ हैं।
‘बेकग्राउण्ड’ लघुकथा बुद्धिमानी और आत्मविश्वास की प्रभावशीलता को दर्शाती है। चूहे की सूझ-बूझ और मानसिक चातुर्य बिल्ली की ताकत पर भारी पड़ते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि संकट में धैर्य और विवेक सबसे बड़े हथियार हैं। ‘खुली किताब’ लघुकथा वैवाहिक संबंधों में छिपे दोहरे मानदंडों पर तीखा और प्रभावी प्रहार करती है। पति की तथाकथित ‘खुली किताब’ दरअसल आत्मप्रशंसा है, जबकि पत्नी का एक प्रश्न उसकी सोच की संकीर्णता को उजागर कर देता है। संक्षेप में, लघुकथा संतुलन, संवेदनशीलता और समानता का सशक्त संदेश देती है। ‘रिश्ते’ लघुकथा आर्थिक तंगी के बहाने रिश्तों में आती स्वार्थपरता और संवेदनहीनता पर सटीक चोट करती है। दाल की महँगाई के संदर्भ में रिश्तों की सस्ती होती कीमत को उजागर करते हुए लघुकथा मार्मिक और विचारोत्तेजक बन जाती है। ‘जन्मदिन’ लघुकथा सामाजिक विषमता और वर्गभेद पर बेहद तीखा व्यंग्य करती है। जहाँ एक ओर इंसानी बच्चे का जन्मदिन अभाव में दबा है, वहीं अमीर घर की कुतिया के पिल्ले का जश्न धूमधाम से मनाया जा रहा है। संक्षेप में, यह लघुकथा मानवीय संवेदनाओं के गिरते मूल्य और असमानता की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है।
‘स्नेह-परिवर्तन’ लघुकथा रिश्तों में समय और परिस्थितियों के साथ आने वाले भावनात्मक परिवर्तन को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। बचपन का निष्कलुष स्नेह, स्वार्थ और दिखावे के दबाव में फीका पड़ता दिखाई देता है। यह लघुकथा संवेदनाओं के क्षरण और रिश्तों की बदलती प्राथमिकताओं पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। ‘विवादग्रस्त’ लघुकथा दांपत्य जीवन की छोटी-छोटी तकरारों और उनमें छिपे गहरे स्नेह को सहज ढंग से उभारती है। मौन, देखभाल और अंततः साथ बैठकर भोजन करना – ये सब रिश्ते की ऊष्मा को दर्शाते हैं। यह लघुकथा यह संकेत देती है कि प्रेम के सामने विवाद तुच्छ हो जाते हैं और रिश्तों की असली ताकत आपसी समझ में निहित होती है। ‘जरुरत’ लघुकथा मानवीय जरूरतों के मूल स्वरूप को सरल लेकिन प्रभावी ढंग से उजागर करती है। प्रारंभ में भौतिक इच्छाएँ प्रमुख लगती हैं, पर अंततः भावनात्मक और दांपत्य स्नेह ही सबसे बड़ी जरूरत बनकर सामने आता है। लघुकथा यह संदेश देती है कि वास्तविक संतोष बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि अपनेपन और प्रेम में निहित है। ‘आदमी दर आदमी’ लघुकथा स्त्री की विवशता और पुरुष के स्वार्थी, दमनकारी व्यवहार पर तीखा प्रहार करती है। संवाद और स्थिति के माध्यम से संबंधों में असमानता, संवेदनहीनता और शोषण की कठोर सच्चाई सामने आती है। अंत का प्रश्न ‘क्या सभी आदमी एक समान होते हैं?’ पूरी कथा को गहरी विचारोत्तेजना और करुणा से भर देता है।
‘दाँये-बाँये’ लघुकथा अत्यंत संक्षेप में प्रभावी व्यंग्य प्रस्तुत करती है। इसमें अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बीच सत्ता-संरक्षण की विडंबना को चतुराई से उजागर किया गया है। साधारण संवाद के माध्यम से सामाजिक असमानता पर तीखा कटाक्ष किया गया है, जो इसकी सबसे बड़ी सफलता है। ‘भिखमंगे’ लघुकथा बहुत कम शब्दों में एक गहरी विडंबना प्रस्तुत करती है। इसमें दान देने की प्रक्रिया और उससे उपजी अव्यवस्था को प्रतीकात्मक रूप से दिखाया गया है, जहाँ सहायता का प्रयास ही हिंसक छीना-झपटी में बदल जाता है। अंत में दानकर्ता स्वयं भिखमंगा जैसा दिखने लगता है, जो सामाजिक असमानता और मानवीय विफलता पर तीखा व्यंग्य है। ‘मिलावट’ लघुकथा मिलावट और नैतिक पतन पर तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करती है। सेठ स्वयं हर वस्तु में मिलावट करवाता है, लेकिन चाय में मिलावट का अनुभव होते ही उसका आक्रोश सामने आ जाता है। अंत में रामू की मुस्कुराहट इस दोहरे चरित्र, दूसरों के साथ छल करने और अपने साथ होते ही उसे अस्वीकार करने को प्रभावी ढंग से उजागर करती है। ‘सूअर’ लघुकथा अत्यंत प्रभावशाली ढंग से मानवीय संवेदनहीनता और विरोधाभास को उजागर करती है। भूखे बच्चे को भोजन देने से इनकार और उसी समय घर की झूठन को कचरे में डाल देना, समाज में व्याप्त असमान संवेदना और असंगत मूल्य-व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य है। अंत का प्रतीकात्मक ‘सूअर’ दृश्य इस विडंबना को और अधिक कठोर बना देता है।
‘गेंद’ लघुकथा एक तीखा सामाजिक व्यंग्य है, जो समाज में व्याप्त वर्ग-भेद को उजागर करता है। इसमें ‘गंदी नाली में गेंद गिरना’ केवल एक सामान्य घटना नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन जाता है, उस स्थिति का जहाँ जोखिम, अपमान और गंदगी का काम किसी गरीब वर्ग के हिस्से में डाल दिया जाता है। सेठ का बच्चा और चौकीदार का बच्चा, यहाँ दो सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधि हैं। ‘मजबूरी’ लघुकथा में पुलिस-तंत्र की उस प्रवृत्ति को उजागर किया गया है, जहाँ मानवीय संवेदना से अधिक व्यवस्था का कठोर और कभी-कभी अवसरवादी पक्ष सामने आ जाता है।
‘अंजाम’, ‘अंतर’, ‘आक्रोश’, ‘आग्रह’, ‘डाका’, ‘फ़ितरत’, ‘बीज का असर’, ‘आता और जिस्म’, ‘अजनबी चेहरा’, ‘लोकतंत्र’, ‘यात्रा युद्ध’ जैसी लघुकथाएँ लंबे अंतराल तक जेहन में प्रभाव छोड़ती हैं।
सतीश राठी की लघुकथाएँ समकालीन हिंदी साहित्य में मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ की सूक्ष्म, किंतु सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी रचनाओं का आधार मानव-मन की वे गहन अनुभूतियाँ हैं, जो प्रायः अदृश्य रहकर भी जीवन की आंतरिक धारा को संचालित करती हैं। सरल, सहज और अलंकरण-विहीन भाषा में रचित ये लघुकथाएँ कथ्य की तीव्रता और भाव-सघनता के कारण गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। प्रत्येक कथा पाठक को केवल घटनाओं से परिचित नहीं कराती, बल्कि उसे आत्ममंथन और सामाजिक यथार्थ के पुनर्पाठ के लिए प्रेरित करती है। इन रचनाओं में पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा, नैतिक द्वंद्व, मूल्य-विचलन, करुणा और विडंबना का मार्मिक चित्रण मिलता है। लेखक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मानवीय व्यवहार की जटिलताओं को उकेरते हैं, जिससे पाठक सहज ही कथा के भीतर प्रवेश कर स्वयं को उससे संबद्ध अनुभव करता है। सतीश राठी की दृष्टि यथार्थवादी होते हुए भी आशा से विमुख नहीं है; वे सामाजिक विसंगतियों के बीच सुधार और संवेदना की संभावना को निरंतर उजागर करते हैं। उनकी लघुकथाएँ व्यंग्य, करुणा और मौन प्रतिरोध के माध्यम से समय की विसंगतियों पर प्रभावी प्रहार करती हैं। समग्रतः, यह ‘शब्द साक्षी हैं’ संग्रह कथ्य, भाषा और संवेदना के संतुलन से युक्त होकर समकालीन हिंदी लघुकथा-साहित्य में एक उल्लेखनीय और स्थायी योगदान के रूप में स्थापित होता है।

दीपक गिरकर- समीक्षक
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