कहानी संग्रह -`पुनर्नवा` सम्पादन – डॉ गीता शर्मा
प्रकाशक -श्वेतवर्ण प्रकाशन ,नोइडा, मूल्य –399 रु
साहित्य के अनेक विमर्श में से विकलांग विमर्श भी अपना स्थान बना चुका है। अक्सर ऐसा साहित्य लिखा गया है कि विकलांग व्यक्ति भी अपने जीवन की कटु सच्चाई के सामने सीना तानकर अपने जीवन के अन्धकार की अतल गहराईयों में से जीवन के प्रकाश को ढूँढ़कर अपना जीवन सार्थक करे।
वैसे तो नवोदित लेखक साहित्य की दुनियां में कदम रखते ही रहते हैं लेकिन वो अपवाद होते हैं, आते ही अपनी अलग पहचान बनाते हैं। ये अपने आरम्भिक कहानी संग्रह में अपना साहित्य का ज्ञान ,कलात्मकता ,सुदृढ़ वैचारिक पृष्ठभूमि व परिपक्वता लेकर कदम रखते हैं। उन्हीं में से एक हैं इंदौर की अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका डॉ. गीता शर्मा। जिनके विकलांग विमर्श पर आधारित कहानी संग्रह `मुड़ के देखो मुझे` को मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिल चुका है। उन्होंने इस विषय पर दो कहानी संग्रह सम्पादित किये। `कुकनुस `के बाद विकलांग विमर्श पर उनका दूसरा सम्पादित कहानी संग्रह `पुनर्नवा `प्रकाशित हुआ है जिसके प्रबुद्ध अनुग्रह व सम्पादकीय पढ़ना भी एक अनुभव है।गीता किसी भी इंसान को उसकी शारीरिक कमी के कारण अंधा ,लंगड़ा ,लूला ,काना, टिंगू ,पागल ,मंदबुद्धि पुकारना उसका अपमान व तिरस्कार समझतीं हैं ।
जिस कार्य को सम्यक ललित जी, संस्थापक -गद्य कोष कविता कोष, विकलांगता अधिकार कार्यकर्ता, लेखक और तकनीकी विशेषज्ञ समर्पित हैं, उसी कार्य को गीता जी ने अपने शब्दों से रेखांकित किया है।ललित जी ने ब्लर्ब या प्रस्तावना में लिखा भी है कि इनके विकलांग विमर्श के साहित्य के कारण मेरे मुहिम को बल मिलता है।
ऐसे अलग तरह से सक्षम लोगों को कहीं सुनी ये पंक्तियाँ भेंट कर रहीं हूँ —
`मत कर यकीन हाथों की लकीरों पर
क्या उनकी किस्मत नहीं होती
जिनके हाथ नहीं होते ? `
गीता जी ने लिखा है विकलाँगता विमर्श भी संताप की कोख से जन्मी नवजात सन्तति है। हर काल में किसी न किसी लेखक की नज़र समाज की किसी न किसी समस्या पर जाती ही है.अपनी ही बात करुं सन 1970 में मैंने अपने आगरा कॉलेज पत्रिका में एक कहानी लिखी थी `कैक्टस प्यासे नहीं रहो `जो एक व्हील चेयर पर चलने वाली विकलाँग लड़की पर थी। मुझे लगता है साहित्य में अब कुछ वर्षों से इस विमर्श के तहत सुनियोजित अध्ययन का माहौल तैयार हुआ है।
संग्रह का आरम्भ होता है नासिरा शर्मा की बहुत सशक्त कहानी`आया बसंत सखी` से। साम्प्रयादिकता चाहे वह सुन्नी शिया की ही हो जब टकराती है तो प्रतिदन दस्तकारी करके रोटी कमाने वालों पर क्या बीतती है कहने की ज़रुरत नहीं है यदि उस घर में ऐसी सलमा हो जिसके दोनों पैर बेकार हैं। वह चप्पल हाथ में पहनकर घर से बाहर घिसटती सी निकलती है।सलमा की अम्मा सोचे बैठी है कि बेटी व अपनी दस्तकारी से कमाये पैसे जोड़कर सलमा का ऑपरेशन करवाएगी। इस कहानी में नासिरा जी ने शियाओं की संस्कृति व त्यौहार का बारीकी से वर्णन कर दिखाने की कोशिश की है कि इनके रस्मो रिवाज़ हिन्दुओं से कितने मिलते जुलते हैं। कहानी के अंत में सच ही लगता है जब सारी तकलीफें झेलने के बाद भी अपाहिज सलमा आशा भरी आँखों से कह उठती है, बसंत तो आएगा और आकर रहेगा अम्मा!
मुझे संतोष श्रीवास्तव की `गूंगी `की छोटी लड़की याद आ गई जिसने हवेली की अपनी मालकिन को मालिक की प्रताड़ना के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की बात की सलाह मालकिन की हथेली पर लिखकर दी।
दिव्या माथुर जी ने `अपूर्व दिशा` में विकलांग पति पत्नी का आपसी प्रेम ,आपसी समझ भरा रिश्ता व व्यवहार एक नई दुनियां का निर्माण कर लेता है।ये कहानी अपने दिलचस्प व आत्मीय संवादों के कारण बहुत दिलचस्प है। आखिर उन्हें भगवान बहुत बड़ा पुरस्कार दे देता है।
भगवान की अपनी फ़ितरत है कि वह किसको क्या दे दे। कितना मुश्किल होगा एक सीनियर डॉक्टर को पता लगे कि उसकी बेटी ने जिस बेटी को जन्म दिया है वह मांस के लोथड़े की तरह जीएगी। उसके जन्म लेते ही बेटी की सास ,उसका पति उनके घर आकर रिश्ता तोड़ जाते हैं। सारी भावनाओं,सारी मर्मान्तक तकलीफों ,बेटी की हताशा पर मलहम रखकर किस तरह जिजीविषा की बूँद उछलती है [`सहसा एक बूँद उछली`- उर्मिला शिरीष]. वह नन्ही बच्ची चाहे मांस का लोथड़ा ही है लेकिन उसमें भी तो कहीं गहरे दिल में जीवन धड़कता है,खुशी पाने की आशायें भी पल्ल्वित होतीं हैं तो रास्ते तो ढूढ़ने ही होंगे उसे खुश रखने के।
कुछ बच्चे जन्म से विकलांग नहीं होते ,मेधावी होते हैं . उनके माता पिता उन्हें लेकर बड़े बड़े सपने देखेंगे ही लेकिन अकस्मात कोई दुर्घटना उन्हें विकलांग कर जाती है जैसे कि इस कहानी का सिद्धार्थ है जो रात में नाना के घर छत पर सोता , नींद में चलता छत से गिर जाता है। एक अपाफिज बच्चे के साथ माता पिता तिल तिल मरते हैं गोविन्द उपाध्याय की एक संवेदनशील पिता की कहानी `हे वत्स !तुम्हारा जाना`उन्हें चैन कब आता है ?कहने की ज़रुरत नहीं हैं। विवाहित जीवन में` रंगों का पटाक्षेप `जब हो जाता है जब वंदना शुक्ल की नायिका का बेटा सोम के पैर मुड़ने लगते हैं,वह किसी रेयर विकलांगता का शिकार हो जाता है। अलका सरावगी की कहानी `दूसरी कहानी`में नायिका का बेटा सुदर्शन भी बाद में विकलांग हो गया है। इन दोनों में माँ के तमाम बेटे के इर्द गिर्द घूमने वाली नज़र आतीं हैं,जो बहुत स्वभाविक है।
मधु कांकरिया `नामर्द`में भी सोनू के अच्छे ख़ासे बल सोनू के विकलांग होते जाते शरीर को रचने में सफ़ल रहीं हैं। बाप ने पैसे के बूते शादी कर दी भी तो क्या पत्नी भाग जानी ही थी।सोनू जीवन की जद्दोजेहद,समय समय मिलते तानों से क्या कर बैठता है ,ये अंत बताता है।
मधु जी ने कहानी में कुछ जग प्रसिद्ध नाम गिनाये हैं जैसे गूंगी, बहरी और अंधी हेलन किलर , अंधे लुइस ब्रेल ,लार्ड बायरन व सर वार्टर लंगड़े थे। सूरदास ,मिल्टन और होमर अंधे थे। मैं गुजरात में देखे दो नाम बता रहीं हूँ। एक हैं जगदीश चंद्र सी पटेल जो बचपन में पोलियोग्रस्त हो गए थे। वे पोलियोग्रस्त नरेंद्र शाह द्वारा संन 1972 में स्थापित `सोसायटी फ़ॉर द फ़िज़िकली हैंडीकैप्ड `को सचिव की तरह सम्भाल रहे थे क्योंकि नरेंद्र जी यू एस चले गए थे।इनका कार्य देखकर बड़ौदा म्युनिस्पल कॉर्पोरेशन ने बहुत बड़ी ज़मीन दे दी थी। जहां पर विकलांगों के खेल कूद ,सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन किये जाते थे। एक फिजियोथिरेपी केंद्र की स्थापना की थी।दूसरे थे नेत्रहीन मनुभाई एस पटेल व घनश्याम भाई जिन्होंने `स्कूल फॉर ब्लाइंड `से निकले नेत्रहीनों में सिर्फ इन दो ने उच्चशिक्षा प्राप्त की थी। इन्होंने भी सं 1972 में ही `ब्लाइंड वेफैयर कॉंसिल`की स्थापना करके नेत्रहीनों के लिए सहारा बने। इनसे भी वर्षों पूर्व राजपीपला के दो नेत्रहीन भाई भी नेत्रहीनों के लिए कुछ न कुछ करते रहे थे। मुम्बई की ब्रेल प्रेस से एक पत्रिका प्रकशित करते थे। जगदीश भाई व मनु भाई की एन जी ओ व उनके कार्यों का विस्तार देखकर मैं कितनी विस्मित हुई थी बता नहीं सकती। ये मैंने इसीलिये लिखा है जो इस कहानी संग्रह की सम्पादिका कहना चाहतीं हैं कि चाहें तो विकलांग भी अपने जीवन को उपयोगी बना सकते हैं।
`पहिये`कहानी में बहुत संवेदनशीलता से हंसा दीप एक ने एक घर में रहने वाले दो जीवन एक गतिशील ,एक व्हील चेयर पर चलने वाला की तुलना की है। ग़नीमत ये है कि कैमिला का पति हैनरी एक दुर्लभ पति है। जब भी किसी विकलाँग व्यक्ति के विषय में सोचो तो यही ख़्याल आता है कि यदि वह अकेला रह जाए तो क्या होगा? कैमिला बहुत अधिक भाग्यशाली है। कैसे ?यही कहानी की ख़ूबसूरती है।
तेजिंदर शर्मा जी की दिलचस्प कहानी `गोद उतराई`एक नए विषय को लेकर सामने आती है कि यदि गोद लिया बच्चा बीमार निकल जाए तो? उनकी बेटी एक भाई को पाकर बहुत ख़ुश रहने लगी है। इस कहानी के अंत के विषय में पाठक अपनी अपनी राय बना सकते हैं कि इंसानियत कहती है कि बच्चा एजेंसी को वापिस नहीं करना चाहिए या उसे वापिस कर देना चाहिए क्योंकि ज़िंदगी भर के लिए परेशनी क्यों मोल ली जाए। मेरे ख़्याल से बीमार होना एक अलग बात है, विकलांग होना अलग बात है। इसलिए ये कहानी सशक्त होते हुए भी इस संग्रह की थीम के अनुरुप नहीं थी। हालांकि डॉ गीता शर्मा जी मानती हैं कि चूंकि वह बच्चा जेनेटिक बीमारी से ग्रसित होने के कारण असामान्य था और किसी भी तरह से असामान्य बच्चे को परिवार और समाज में स्वीकृति सहज नहीं मिलती है, इसीलिए उसे विकलांग मानकर परिवार भावनाओं को परे धकेलकर बच्चे को वापस करना चाहते हैं। वस्तुतः यह कृत्य हमारे समाज में विकलांगता के प्रति सोच का ही परिणाम है।
ये बहुत बड़ा व कटु सत्य है कि विकलांग व्यक्ति से सबसे पहले उससे निकटतम रिश्ते ही ऊबते हैं। ऐसे ही स्थिति है एक पिता की हरि भटनागर जी की चर्चित कहानी `कुर्सी ,मेज़ तख़्त टाट –`में व सुषमा मुनींद्र की `बड़ा मूड में .की जिसमें ऐसा पिता खलील सामान जैसा निर्जीव बनकर रह गया है। जो ख़लील ज़माने से मार खाकर हमेश अपने गुस्से में अपने बेटे जमाल को क्रूरता से पीट डालता था । समय ने जब उसे अपाहिज कर दिया तो वही बेटा ,जो घर से भाग गया था पिघल उठा और घर लौटकर उसकी देखभाल करने लगता है लेकिन जब उसके जीवन में एक लड़की आती है तो ?यहीं कहानी कटु यथार्थ से टकराती है।
सुषमा मुनींद्र जी कहानी की सशक्त हस्ताक्षर सहज व प्रामाणिक वातावरण की चितेरी हैं। उनके `बड़ा मूड `की मानसिक कमी उसे तीनों भाइयों से कैरियर में पिछड़ा ही रखती है जबकि उसके किसी बंगले में काम करने से घर चलता है।तीनों भाई जब पैरों पर खड़े हो जातें हैं तो वह जिस बंगले में चाकरी कर रहा है ,वह अपनी मालकिन को बताता है कि मेरे भाइयों को बुरा लगता है कि मैं चपरासीगिरी करता हूँ। वह नौकरी छोड़ता इस स्वप्न से पुलकित है कि वे तीनों कमायेंगे और मैं बैठकर खाऊंगा लेकिन ?
अनिता रश्मि की कहानी `बंद दरवाज़े के पार `बहुत सहजता से संदेश देती है कि किसी भी विकलांग को दुनियां से छिपाकर रखने की क्या आवश्यकता है ?ये उस पर भी उसकी छोटी छोटी खुशियां छीनकर बहुत बड़ा अत्याचार है। जीवन की तभी सुंदरता है जब हम अपने जीवन के ,अपने से जुड़े सच को पूरे मन से निडर होकर स्वीकारने का दुःसाहस करते हैं .
`ध्रुव तारा कभी अस्त नहीं होता `बहुत ख़ूबसूरती से दो दृष्टि बाध्य स्त्रियों की दिलचस्प कहानी राजेश्वर वशिष्ट ने बुनी है। जो शीर्षक को ही पंचलाइन बनाकर समाप्त होती है। अच्छा ख़ासा इंसान हो या विकलांग दोनों के लिए ही ये सन्देश है कि जिजीविषा कभी नहीं मरनी चाहिए। एक कॉन्सलर से पांच वर्ष से अंधी हुई एक पचास वर्षीय स्त्री फ़ोन पर सलाह देने के लिए सम्पर्क करती है। तब दो कहानियां समानांतर चलतीं हैं। एक कॉन्सलर की जमान्ध बहिन की और एक उस स्त्री की। दोनों ही उलझी हुईं हैं ,एक तुलना भी है जन्मांध व अचानक एक्सीडेंट में अंधी हुई स्त्री की थी
राजेश्वर जी की नायिका सरिता एक्सीडेंट में अंधी हो जाती है। `कटी हुई औरत`की .नायिका के ट्रेन एक्सीडेंट से ये हाथ कट गए थे।मैं अक्सर इस सुंदर लड़की को बड़ौदा की रेलवे कॉलोनी में सफ़ेद साड़ी से अपने दोनों कटे हुए हाथों को ढके अपने दो भाइयों के बीच फांसी मोटर सायकिल पर जाते हुए देखती थी। मैं जब उसी बस्ती में एक सर्वे करने गई तो उसके घर पर बड़ा मंदिर देखकर ,उस पर देवी आने की बात,उसके संगीत के जूनून भरे शौक ,शहर की प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार पाने की बात,उसे स्कॉलशिप के प्रस्ताव मिलने की बात जानकर मेरी कलम लिख गई `कटी हुई औरत `कहानी। कहना न होगा उसकी विकलांगता को किस तरह घर वालों ने अधमता से धोखाधड़ी के व्यवसाय में बदल दिया था।
`वारका बीच पर डॉल्फ़िन`की दो नौकरीशुदा लड़कियां दिल्ली के एक कमरे में साझा किराया करके रहतीं हैं।बैंक अधिकारी माया व्हील चेयर पर चलते हुए भी बहुत आत्मविश्वास से भरी हुई है.ये लोगों से बहुत जल्दी घुल मिल जाती है ,ब्यॉय फ़्रेंड्स भी बदलती रहती है जबकि शेफ़ाली अपने में सिमटी हुई रहती है,सुयश से अलग हो जाने के कारण । एक विकलाँग हो या सक्षम सच्चे प्यार को पाना एक मृग मरीचिका या डॉल्फ़िन ही तो है जिसे देखने दोनों मित्र गोवा के बहुत से प्रसिद्ध बीच पर भटक रहीं हैं जैसे किसी का मन ये विश्वास लिए –`प्रेम पर मेरा भी हक़ है `प्रेम के लिए भटकता है।और जब डॉल्फ़िन दिखाई भी देती है तो वह वारका बीच पर मृत मिलती है,यही इस कहानी की कलात्मकता है .हर सुख के साथ दुःख की सौगात पाने वाले हम सबके लिए डॉ . निधि अग्रवाल एक बोल्ड लाइन लिख जातीं हैं,सम्भव है कहीं हम किसी शैतान को ईश्वर मानकर पूज हों।
किसी थीम पर कहानी संग्रह सम्पादन आसान नहीं होता। ये कौशल गीता जी में है ,ये उनके दोनों सम्पादित कहनी संग्रह ने प्रमाणित कर दिया है। जीवन से जुड़े सत्यों की सीमाएं अबाध हैं जितना भी शोध करो ,कुछ न कुछ नया सामने आता जाता है। गीता जी को शुभकामनाएं ऐसे ही वे विकलांग विमर्श को आगे बढ़ाती जाएंगी।
- समीक्षक -नीलम कुलश्रेष्ठ
