Sunday, May 31, 2026
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भारतीय लोकतंत्र को लोक केंद्रित होने की आवश्यकता – डॉ. शैलेश शुक्ला

भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। यह लोकतंत्र करोड़ों नागरिकों की आशाओं, संघर्षों और अधिकारों पर आधारित है। संविधान ने भारत को एक ऐसे गणराज्य के रूप में परिकल्पित किया था जहाँ शासन की प्रत्येक व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य जनता का कल्याण हो। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल चुनाव कराना या सरकारें बनाना नहीं होता, बल्कि ऐसा शासन स्थापित करना होता है जिसमें आम नागरिक की गरिमा, सुरक्षा, सुविधा और जीवन स्तर सर्वोच्च प्राथमिकता बने। लेकिन आज का कठोर यथार्थ यह प्रश्न खड़ा कर रहा है कि क्या भारतीय लोकतंत्र वास्तव में लोक केंद्रित रह गया है, या वह धीरे-धीरे सत्ता केंद्रित, व्यवस्था केंद्रित और विशेषाधिकार केंद्रित होता जा रहा है। देश का सामान्य नागरिक दिन-प्रतिदिन आर्थिक दबाव, महँगाई, बेरोजगारी और असुरक्षा से जूझ रहा है, जबकि दूसरी ओर सत्ता और सरकारी तंत्र का खर्च लगातार बढ़ता दिखाई देता है। यही वह सबसे बड़ा विरोधाभास है जो आज भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ा है।

भारत का आम आदमी कर देता है, बिजली बिल देता है, ईंधन पर भारी कर चुकाता है, वस्तुओं और सेवाओं पर कर देता है, फिर भी उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएँ, सम्मानजनक आवास और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता। दूसरी ओर सरकारी मशीनरी का खर्च लगातार बढ़ता जाता है। बड़े-बड़े सरकारी भवन, आलीशान कार्यालय, महँगी गाड़ियाँ, सुरक्षा व्यवस्था, सरकारी सुविधाएँ, राजनीतिक प्रचार और प्रशासनिक खर्चों पर भारी धनराशि खर्च होती रहती है। लोकतंत्र में जनता मालिक मानी जाती है, लेकिन व्यवहार में कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि जनता केवल कर देने वाली भीड़ बनकर रह गई है, जबकि व्यवस्था का एक विशेष वर्ग सुविधाओं और संसाधनों का सबसे बड़ा लाभ प्राप्त कर रहा है।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शासन की प्राथमिकताएँ धीरे धीरे आम नागरिक की बुनियादी जरूरतों से दूर होती दिखाई दे रही हैं। देश का विशाल मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। सरकारी विद्यालयों की स्थिति अनेक स्थानों पर चिंताजनक बनी हुई है। लाखों परिवार मजबूरी में महँगे निजी विद्यालयों की ओर जाते हैं और अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर देते हैं। उच्च शिक्षा भी लगातार महँगी होती जा रही है। अनेक युवा डिग्रियाँ तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन रोजगार योग्य कौशल और अवसरों के अभाव में बेरोजगारी का सामना करते हैं। यदि लोकतंत्र वास्तव में लोक केंद्रित होता, तो शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य हर नागरिक को गुणवत्तापूर्ण और व्यावहारिक शिक्षा उपलब्ध कराना होता, न कि शिक्षा को आर्थिक बोझ बना देना।

स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति भी इसी प्रकार गंभीर है। भारत में लाखों परिवार आज भी बीमारी के कारण आर्थिक संकट में पहुँच जाते हैं। सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी, डॉक्टरों की अपर्याप्त संख्या और सुविधाओं की असमानता आम समस्या है। दूसरी ओर निजी अस्पतालों का खर्च सामान्य नागरिक की पहुँच से बाहर होता जा रहा है। कई बार परिवारों को इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ता है, जमीन बेचनी पड़ती है या जीवनभर की बचत समाप्त करनी पड़ती है। यह स्थिति किसी भी लोक केंद्रित लोकतंत्र के लिए चिंताजनक होनी चाहिए। एक ऐसे देश में जहाँ करोड़ों लोग सीमित आय पर जीवन जी रहे हों, वहाँ स्वास्थ्य सेवा विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी अधिकार होनी चाहिए।

आवास का संकट भी भारत के बड़े सामाजिक प्रश्नों में शामिल है। महानगरों में घर खरीदना सामान्य मध्यम वर्ग के लिए लगभग असंभव होता जा रहा है। किराए लगातार बढ़ रहे हैं। लाखों लोग झुग्गियों और असुरक्षित परिस्थितियों में जीवन जीने को मजबूर हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी सुरक्षित और सम्मानजनक आवास की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। लोकतंत्र का अर्थ केवल स्मार्ट शहरों का निर्माण नहीं होता, बल्कि ऐसा समाज बनाना होता है जहाँ हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिले। यदि करोड़ों लोग जीवनभर घर के लिए संघर्ष करते रहें, तो विकास के बड़े दावे अधूरे प्रतीत होते हैं।

ऊर्जा और परिवहन भी आज आम नागरिक के लिए भारी आर्थिक बोझ बनते जा रहे हैं। बिजली, रसोई गैस और ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे आम आदमी के जीवन को प्रभावित करती हैं। सार्वजनिक परिवहन अनेक क्षेत्रों में पर्याप्त और सस्ता नहीं है, जिसके कारण लोगों को निजी साधनों पर निर्भर होना पड़ता है। इससे आर्थिक बोझ और बढ़ता है। यदि सरकारें वास्तव में जनता केंद्रित सोच अपनाएँ, तो सबसे पहले इन बुनियादी सेवाओं को आम नागरिक की पहुँच में लाने पर ध्यान दिया जाएगा। लोकतंत्र में विकास का वास्तविक अर्थ यही है कि नागरिकों का जीवन सरल, सुरक्षित और सम्मानजनक बने।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि आम आदमी लगातार आर्थिक दबाव में जीवन जी रहा है। मध्यम वर्ग अपनी आय का बड़ा हिस्सा कर, शिक्षा, स्वास्थ्य, किराया, ईंधन और रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च कर देता है। बचत करना कठिन होता जा रहा है। बेरोजगारी और अस्थायी रोजगार की समस्या ने युवाओं की असुरक्षा और बढ़ा दी है। दूसरी ओर राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र में सुविधाओं का विस्तार लगातार जारी है। अनेक जनप्रतिनिधियों और उच्च अधिकारियों को मिलने वाली सुविधाएँ, भत्ते, सरकारी आवास और सुरक्षा व्यवस्थाएँ उस आम नागरिक की वास्तविकता से बहुत दूर दिखाई देती हैं जो प्रतिदिन जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहा है।

भारतीय लोकतंत्र को यदि वास्तव में मजबूत बनाना है, तो शासन की पूरी सोच में परिवर्तन आवश्यक है। लोकतंत्र को सत्ता केंद्रित नहीं, लोक केंद्रित बनाना होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रशासनिक व्यवस्था समाप्त कर दी जाए, बल्कि यह कि सरकारी खर्चों और प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन किया जाए। क्या वास्तव में इतनी विशाल सरकारी मशीनरी आवश्यक है? क्या सरकारी संसाधनों का अधिक बड़ा हिस्सा सीधे जनता की भलाई पर खर्च नहीं किया जा सकता? क्या नेताओं और अधिकारियों के विशेषाधिकारों में कमी लाकर शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवाओं में अधिक निवेश नहीं किया जा सकता? ये प्रश्न आज गंभीर राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनने चाहिए।

लोक केंद्रित लोकतंत्र में सरकारी पद सेवा का माध्यम होते हैं, विशेषाधिकार का नहीं। जनता के पैसे का उपयोग सबसे पहले जनता के जीवन स्तर को सुधारने के लिए होना चाहिए। यदि सरकारी तंत्र जनता से कटने लगे और केवल सत्ता संरचना की सुरक्षा और विस्तार में व्यस्त हो जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे अपनी आत्मा खोने लगता है। लोकतंत्र की शक्ति बड़े भाषणों, विशाल भवनों या प्रचार अभियानों में नहीं, बल्कि इस बात में होती है कि सबसे कमजोर नागरिक को कितना सम्मान और सुरक्षा प्राप्त है।

आज भारत को ऐसी आर्थिक और सामाजिक नीतियों की आवश्यकता है जो सीधे आम आदमी के जीवन को राहत दें। गुणवत्तापूर्ण सरकारी विद्यालय और विश्वविद्यालय मजबूत किए जाएँ। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को इतना सक्षम बनाया जाए कि गरीब और मध्यम वर्ग को निजी अस्पतालों के भारी खर्च पर निर्भर न रहना पड़े। सस्ती आवास योजनाओं को वास्तव में प्रभावी बनाया जाए। सार्वजनिक परिवहन को सुविधाजनक और किफायती बनाया जाए। ऊर्जा क्षेत्र में ऐसी नीतियाँ अपनाई जाएँ जिससे बिजली और ईंधन आम नागरिक की पहुँच में रहें। यह सब तभी संभव होगा जब सरकारें प्रचार आधारित विकास के बजाय मानव केंद्रित विकास को प्राथमिकता दें।

भारतीय लोकतंत्र के सामने आज सबसे बड़ी नैतिक चुनौती यही है कि विकास का लाभ किसे मिल रहा है। यदि विकास केवल आँकड़ों, बड़े परियोजनाओं और आर्थिक सूचकांकों तक सीमित रह जाए, लेकिन आम नागरिक का जीवन संघर्षपूर्ण बना रहे, तो लोकतंत्र का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। जनता केवल चुनावों के समय याद किए जाने के लिए नहीं होती। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च होती है। इसलिए शासन की हर नीति का पहला प्रश्न यह होना चाहिए कि उसका लाभ सामान्य नागरिक को कितना मिलेगा।

यह समय भारतीय लोकतंत्र को उसकी मूल आत्मा की ओर लौटाने का है। संविधान निर्माताओं ने ऐसे भारत की कल्पना की थी जहाँ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रत्येक नागरिक तक पहुँचे। लेकिन यदि जनता लगातार आर्थिक संकट, असमानता और असुरक्षा में जीवन जीती रहे, जबकि सत्ता और व्यवस्था का खर्च बढ़ता जाए, तो लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर होने लगता है। इसलिए आज आवश्यकता केवल नीतिगत सुधारों की नहीं, बल्कि शासन की मानसिकता बदलने की है। लोकतंत्र को वास्तव में लोक केंद्रित बनाना होगा, जहाँ सरकारी मशीनरी जनता पर बोझ न बने, बल्कि जनता के जीवन को सरल और सम्मानजनक बनाने का माध्यम बने।

भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब देश का सामान्य नागरिक यह महसूस करेगा कि सरकार वास्तव में उसके लिए काम कर रही है। जब शिक्षा बोझ नहीं, अवसर बनेगी। जब स्वास्थ्य सेवा भय नहीं, सुरक्षा का माध्यम बनेगी। जब आवास सपना नहीं, अधिकार बनेगा। जब परिवहन और ऊर्जा सुविधाएँ विलासिता नहीं, सामान्य उपलब्धता का हिस्सा होंगी। और जब जनता का पैसा सबसे पहले जनता के जीवन को बेहतर बनाने में खर्च होगा। यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही भारत के भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।

  • डॉ. शैलेश शुक्ला 
    वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह
    आशियाना, लखनऊ – 226012, उत्तर प्रदेश
    मो.Mob.: 9312053330, 8759411563

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