Sunday, May 31, 2026
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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ का व्यग्य-इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं

शादी से पहले की बातचीत और चाय की पत्ती में एक समानता होती है। शुरुआत में दोनों खूब रंग देती हैं खुशबू ऐसी कि पूरा मोहल्ला जान जाए कि कुछ उबल रहा है। फिर धीरे धीरे समय बीतता है और वही चाय की पत्ती बर्तन के कोने में पड़ी सूखी घास जैसी लगने लगती है। हमारे बीच भी यही हुआ। शादी के फेरों के समय जिस इंसान ने सात जन्मों का वादा किया था उसने सात महीने में ही खुद को एक स्क्रीन के भीतर बंद कर लिया। अब वह घर आता है तो सोफे पर लेटकर बस अंगूठा चलाता रहता है। रील्स की वो पंद्रह सेकंड की दुनिया मेरे पूरे जीवन से ज्यादा कीमती हो गई है। उसकी उंगलियां स्क्रीन पर ऐसे फिसलती हैं जैसे कोई जादूगर ताश के पत्ते पलट रहा हो। मैं बगल में बैठी चाय का कप लिए ताकती रहती हूँ पर उसकी नजरें कभी नहीं भटकतीं। ऐसा लगता है कि मैं उस घर का कोई पुराना फर्नीचर हूँ जिस पर धूल जम चुकी है और जिसे हटाने की जहमत भी कोई नहीं उठाना चाहता।

एक दिन मैंने कहा “सुनो मुझे कुछ बात करनी है।“ उसने बिना आंखें ऊपर किए कह दिया “अभी बिजी हूँ यार बाद में देखेंगे” यह “बाद में“ कभी नहीं आता। मर्द जब व्यस्त होने का नाटक करता है तो वह असल में अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा होता है। इस अकेलेपन के सन्नाटे को तोड़ने के लिए मैंने एक नया रास्ता निकाला। मैं अपने ही मोबाइल से अपने ही नंबर पर फोन लगा देती। जब उधर से आवाज आती कि आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है तो मेरे सीने में एक अजीब सा सुकून उतर आता। कम से कम कोई तो कह रहा था कि मैं व्यस्त हूँ। कोई तो था जो मेरी मौजूदगी को दर्ज कर रहा था भले ही वह एक कंप्यूटर की रिकॉर्डेड आवाज ही क्यों न हो। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा वियोग था कि मुझे खुद को यह समझाने के लिए अपने ही नंबर का सहारा लेना पड़ता था कि दुनिया में मेरा भी एक वजूद है।

तभी घर के सामने एक नया युवक रहने आया था। वह मुझसे उम्र में दो साल छोटा था और शायद इसीलिए दुनिया की चालाकियों से थोड़ा दूर था। वह मेरे अकेलेपन को मेरे चेहरे की उदासी से भांप गया था। जब घर का मालिक सोफे पर रील्स स्क्रोल करने में व्यस्त रहता तब वह लड़का मेरी खामोशी को पढ़ रहा था। पति के घर पर न रहने के समय वह कभी नमक के बहाने तो कभी चाय पत्ती के बहाने मेरे घर पर आता था। उसकी आँखों में एक अजीब सी हमदर्दी थी जो मुझे इस मरुस्थल जैसी जिंदगी में ठंडी फुहार जैसी लगती थी। उसने बातों बातों में एक दिन बड़ी सादगी से बताया कि उसकी अभी शादी नहीं हुई है। मुझे लगा कि विधाता ने मेरे इस एकांतवास को समाप्त करने के लिए ही उसे मेरे सामने वाले मकान में भेजा है।

हमारी मुलाकातें जब बढ़ने लगीं तो मेरे भीतर की सूखी नदी में फिर से बाढ़ आने लगी। हर बार जब मैं उसके साथ इस घुटन भरे माहौल से दूर भागने की योजना बनाती तो वह मुस्कुराकर कहता “जल्दबाजी मत करो। कल कुछ प्लान बनाते हैं” मुझे लगता कि वह हमारी सुरक्षा के लिए ऐसा कह रहा है। पुरुष का कल कभी कभी स्त्री की पूरी जिंदगी का इंतजार बन जाता है। वह हर बार कोई न कोई बहाना बना देता और मैं फिर से उसी रील्स वाले सोफे के किनारे आकर बैठ जाती। प्रेम जब किश्तों में मिलने लगे तो उसकी कीमत और बढ़ जाती है। मैं उसके दिए उसी झूठे दिलासे के सहारे अपने दिन काट रही थी और खुद को दिलासा दे रही थी कि एक दिन यह अंधेरा छंटेगा।

एक दिन अचानक उसने खुद सामने से आकर मुझसे कहा “कल हम हमेशा के लिए कहीं दूर चले जाएंगे। सामान बांधकर तैयार रहना” उस दिन मुझे लगा कि मेरी सालों की तपस्या सफल हो गई। मैंने चुपचाप अपनी अलमारी से अपनी पसंदीदा साड़ियां निकालीं और उन्हें सूटकेस में पैक करने लगी। पतिदेव बगल वाले कमरे में मोबाइल पर किसी प्रैंक वीडियो को देखकर ठहाके लगा रहे थे। उनकी हंसी मेरे कानों में किसी नुकीली कील की तरह चुभ रही थी। मुझे तरस आ रहा था उस इंसान पर जिसे यह भी नहीं पता था कि उसकी छत के नीचे से जमीन खिसकने वाली है। मैंने अपनी जिंदगी के सबसे कड़वे सच को एक पोटली में बांधा और उस सुबह का इंतजार करने लगी जो मेरी विदाई की गवाह बनने वाली थी।

जब मैं उसके पास अपना सारा सामान बांधकर पहुंची तब तक वह वहां से जा चुका था। सामने वाले मकान का ताला लटक रहा था और वहां सिर्फ धूल उड़ रही थी। मेरी सांसें जैसे गले में ही अटक गईं और सूटकेस हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया। अगल बगल देखने पर जब कोई नहीं मिला तो मैंने पास के एक दुकानदार से उसके बारे में पूछा। दुकानदार ने जो सच बताया उसने मेरे पैरों के नीचे से जमीन ही गायब कर दी। दुकानदार ने तंबाकू थूकते हुए बड़े सहज भाव से कहा “अरे वो तो शादीशुदा था उसकी पत्नी बेंगलूरु में रहती है और वह सुबह तड़के ही उसे लेने आई थी दोनों पहली बस से निकल गए”

यह सुनते ही मेरे भीतर का सब कुछ बिखर गया। जिस लड़के को मैं अपने अकेलेपन का मसीहा समझ रही थी वह खुद एक छलावे के सिवा कुछ नहीं था। वह तो बस अपने खाली समय को काटने के लिए मेरे घर की चाय पत्ती और नमक का इस्तेमाल कर रहा था। वियोग का इससे वीभत्स रूप और क्या हो सकता था कि जिसे मैंने अपनी मुक्ति का मार्ग समझा उसने मुझे और गहरे कुएं में धकेल दिया था। मैं उस सूने मकान की दहलीज पर बैठकर हंसने लगी क्योंकि रोने के लिए मेरे पास आंसू कम पड़ गए थे। पूरा खेल बस टाइमपास का था चाहे वह रील्स देखना हो या पड़ोस में नमक मांगना।

मैंने कांपते हाथों से अपना सूटकेस उठाया और वापस अपने उसी पुराने घर की तरफ कदम बढ़ा दिए जहां सन्नाटा मेरा इंतजार कर रहा था। मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था और सोफे से अभी भी वही रील्स की आवाजें आ रही थीं। पति ने मेरी तरफ देखा भी नहीं और स्क्रीन देखते हुए ही कहा “अरे आ गई तुम जरा देखना नमक खत्म हो गया है क्या” मैंने बिना कुछ बोले रसोई की तरफ देखा जहां नमक का डिब्बा पहले से ही आधा भरा हुआ था। मुझे समझ आ गया कि इस संसार में हर कोई अपनी अपनी स्क्रीन और अपनी अपनी कहानियों में व्यस्त है और दूसरों की भावनाएं बस मनोरंजन का साधन हैं।

मैंने अपना फोन निकाला और फिर से अपने ही नंबर पर डायल कर दिया  उधर से फिर वही जानी पहचानी आवाज आई कि आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है। मैंने फोन को कान से सटाए रखा और उस व्यस्त टोन के सुकून को महसूस करने लगी। अब मुझे इस बात का पूरा यकीन हो गया था कि इस मतलबी और फरेबी दुनिया में सिर्फ मेरा अपना नंबर ही था जो मेरे एकांत को कभी धोखा नहीं दे सकता था भले ही वह हमेशा व्यस्त रहने का ढोंग ही क्यों न करता हो। प्रेम की इस अंतिम विदाई ने मुझे पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना दिया था।

डॉसुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

व्यंग्यकार, कवि और बाल साहित्य लेखक, व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’  ‘किताबों की अंतिम यात्रा’  ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’  व्यंग्य संग्रह और ‘इधर-उधर के बीच में’ व्यंग्य उपन्यास प्रकाशित। कई पुस्तकोंका संपादन,अनेक पुरस्कारों से सम्मानित।

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