Sunday, May 31, 2026
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डॉ विद्या सिंह  का लेख-हमारी जीवन-शैली 

जीवन निरंतर चलता रहता है, रुक जाने पर उसे मृत्यु की संज्ञा दी जाती है। जीवन और मृत्यु संसार का नियम है; किसी की मृत्यु से दुनिया रुकती नहीं। रुकनी भी नहीं चाहिए। हमारे लाख सिर पटकने पर भी जाने वाला आता नहीं है अतः धैर्य पूर्वक दुख का सामना करना चाहिए।  जाने वाला अपनी समस्त अच्छाइयों, बुराइयों के साथ हमारे जीवन से ही नहीं, संसार से विदा ले लेता है। हम पश्चाताप करने लगते हैं यदि मालूम होता उसका जीवन इतना छोटा था तो हम उसे महत्व देते ,उसे खुश रखने की कोशिश करते किंतु शेष लोगों के साथ हमारे आचरण में कोई परिवर्तन नहीं आता। आखिर सबको एक दिन जाना है, न जाने कब किसे जाना है, इसकी जानकारी हमें नहीं है।सही मायने में उस व्यक्ति का जीवन सफल है जिसके जाने पर सभी के मुंह पर आए ‘अच्छा इंसान था’ और यह तभी हो सकता है यदि हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठें। अपने सुख-दुख में दूसरों को शामिल करें तथा दूसरों के सुख- दुख में हम शरीक हों। अपनी खुशियां, अपना सुख हमारे लिए इतना महत्वपूर्ण होता है कि औरों की तकलीफ़ बांटने की कोशिश भी नहीं करते।

आजकल भौतिक सुख सुविधाओं ने लोगों को एक दूसरे से अलग कर दिया है। सभी अधिक से अधिक सुख के साधन एकत्र कर लेना चाहते हैं, औरों से उनको कोई मतलब ही नहीं होता। एक समय था, जब इंसान दूसरों की सहायता  लिए बिना जीवनयापन नहीं कर सकता था अतः उसके लिए सामाजिकता महत्वपूर्ण थी। वह दस लोगों से मेलजोल बनाकर रखता था। एक छप्पर उठाने के लिए भी उसे कई हाथों की जरूरत पड़ती थी। जैसे- जैसे हमारे जीवन में मशीनों ने प्रवेश किया है दूसरों पर हमारी निर्भरता कम होती गई है और हम अपने में केंद्रित होते गए हैं। इसकी अति पाश्चात्य जीवन शैली में देखी जा सकती है। अपने सुख में खलल न हो अतः बच्चों को मांएं आरंभ से ही अलग सुलाने लगती हैं । बूढ़े जीवन पर्यंत अलग रहते हैं।  बुढ़ापे में न बच्चे उन्हें अपने साथ रखना चाहते हैं, न वे स्वयं उनके साथ रहना चाहते हैं। अमेरिका में वृद्धों को वृद्धावस्था पेंशन के नाम पर अच्छा-खासा पैसा मिलता है तथा उनके रहने के लिए सुविधा पूर्ण अपार्टमेंट्स बने हैं ,वहां वे अपनी उम्र के लोगों के साथ प्रसन्नता पूर्वक रहते हैं। उनके भीतर शांति है अथवा नहीं यह तो वही जानें! वस्तुतः प्रसन्न दिखना और भीतर से प्रसन्न होना दो अलग बातें हैं। जब तक हम भीतर से प्रसन्न नहीं होते, हमारे जीवन में शांति नहीं होती।

अपनी प्रसन्नता के लिए हमें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि हम यह तलाशें कि क्या करने से हमें प्रसन्नता मिलती है? कई काम ऐसे होते हैं जिनमें हमारा मन बिल्कुल नहीं लगता फिर भी हमें वह करना पड़ता है और कुछ काम ऐसे होते हैं, जिनमें घंटों बीत जाता है, हमें समय का ध्यान ही नहीं रहता। समान स्थिति में जीवनयापन करते हुए भी कभी-कभी जीवन बड़ा नीरस लगने लगता है।

किसी परिचित के अचानक अवसान पर हमारे सामने यह सत्य उद्घाटित हो जाता है कि जीवन का कोई भरोसा नहीं है, अतः हम ऐसे जिएं कि अंतिम  बुलावा आने पर हम प्रसन्नता पूर्वक जाने के लिए तत्पर हो जाएं। यह तत्परता तभी आएगी, जब हम अपनी जिम्मेदारियों के सभी कार्य पूरे कर लें।‌एक आदत हमें अवश्य छोड़ देनी चाहिए ‘फिर कर लेंगे, जल्दी क्या है?’ जल्दी है; जिस दिन हम यह समझ जाएंगे, हमारे जीवन में एक क्रम आ जाएगा। अपना जीवन हमें नीरस नहीं लगेगा। जीवन नीरस तब लगता है जब हमारे सामने जीने का कोई उद्देश्य नहीं होता। हम अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित करें, उसे तत्परता से पूर्ण करें, फिर पाएंगे कि हमारे मन में स्फूर्ति का संचार हो रहा है। जो काम हम बोझ समझ कर निबटाते थे, उसमें आनंद आने लगा है। उद्देश्य हमेशा बहुत बड़ा ही नहीं होता। अपने जीवन को व्यवस्थित रूप देना भी हमारा उद्देश्य हो सकता है। समाज में भूमिका विहीन कोई नहीं होता। हर किसी की अपनी- अपनी जिम्मेदारी होती है अतः अपनी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभाना हमारे जीवन का उद्देश्य हो सकता है। निराशा, आलस्य आदि नकारात्मक भावनाएं हमारे ऊपर जब हावी होती हैं, तब हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाते। जीवन में एक सत्य का पालन अवश्य करना चाहिए। जिन चीजों पर हमारा वश नहीं है, उसके लिए स्वयं को कोसने के बजाय, जो कुछ हमारे पास है, उसके लिए हम क्या कर सकते हैं, यह सोचना चाहिए। मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है अहंकार।मन में कभी यह अभिमान नहीं पालना चाहिए कि मैं बहुत योग्य हूं, दूसरे मेरे सामने कुछ भी नहीं हैं। यदि हम स्वयं को कर्ता मानेंगे तो हमारे अनुकूल परिणाम हमें प्रसन्न करेंगे और प्रतिकूल परिणाम दुख देंगे किंतु यदि हम सहज भाव से, कर्तव्य भाव से कार्य करते रहेंगे तो हमारे भीतर यह अभिमान नहीं होगा कि मैंने यह काम किया और तब हर परिणाम को स्वीकार करने के लिए हम प्रस्तुत होंगे।

डॉ विद्या सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष,  हिंदी एमकेपी पीजी कॉलेज, देहरादून।

विद्या सिंह
विद्या सिंह
कविता, कहानी, समीक्षा स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।'चंद्रिका बाबू की गुमटी' कहानी संग्रह तथा नरेश मेहता का साहित्य एक अनुशीलन समीक्षात्मक पुस्तक प्रकाशित। विभिन्न संकलन में सहयोगी लेखन। पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष एमकेपी कॉलेज देहरादून।
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