1. दुख
परायों के दिये दुखों की
आवाज होती है
अपनों के दिये दुख
बेआवाज ही रहते हैं।
काश! दुख आंधी तूफान होते
आते और चले जाते।
काश! दुख बाढ़ या सूखा होते।
दुख
जो न दिखते हैं
न दिखाने का कोई अर्थ होता है।
जंगल की आग की तरह
कैंसर की तरह
सब राख़ में परिणित कर देते हैं।
बेआवाज दुख
घुटे घुटे दुख
जिन्हें न परिचित- पड़ोसी देते हैं
न गुंडे- बदमाश
न व्यवस्था- अव्यवस्था
न सामाजिक सरकारी नीतियाँ
न मूल्यवत्ता या अवमूल्यन।
दुख
जो घुलते नहीं
पालथी मार बैठ जाते हैं
मन के इस कोने से उस कोने तक।
दुख
जो निर्णय की शक्ति छीन लेते हैं
पीस देते हैं कतरा- कतरा
जिनकी अंधेरी, बीहड़, यातनामय कारावास का
कोई रास्ता
रोशनी में नहीं खुलता।
2. द्रोपदी
पट्टी अहंकार की बांध जहां
बैठा दुर्योधन शिला प्रासाद,
अंधे का बेटा अंधा हो
फिसलेगा ही विपरीत पाद।
देखो द्वापर में क्या घटा
यह सत्य समझ न आया क्यों,
अहंकार, स्वेच्छा, निरंकुशता
के अस्त्रों ने फुसलाया क्यों?
वह द्यूत क्रीड़ा, मामा शकुनि
ज्यों जीत गया, त्यों भूल गया,
मदमस्त हस्ति सा डोल गया
भाई- भार्या का अपमान किया।
महासभा में केश पकड़
ले आया दुशासन क्रूर,
दुर्योधन ने हुंकार भरी
करो चीरहरण, था मदचूर।
कृष्णा, यज्ञसेनी, पांचाली
द्रुपद- सुता, कुरुवंश की रानी,
ससुर, पितामह, देवर, पतियों
बीच छली गई वह पटरानी।
दुर्गा, चण्डी, काली, ज्वाला
अंधे पहचान नहीं पाए,
महाभारत तो होता ही है
अपमान सीमाएं लांघ जाए।
मत छेड़ो अग्निगर्भा को
हो जाएगा सब तहस- नहस,
जब- जब द्वापर को भूलोगे
महाभारत लेंगे पुनर्जन्म।
3. यह सैर सातवें अम्बर की
यह सैर सातवें अम्बर की
तुम डोर मेरी थामे रखना,
मैं झूमूंगी इतराऊंगी
तुम मांझे को संयमित रखना।
मैं कमसिन, सुंदर, प्रेमपगी
और बड़े खिलाड़ी राहों में,
है दूर देश का लक्ष्य मेरा
पर मेरी ख़ोज- खबर रखना।
कट गिरने का अंदेशा बहुत
मिल गले, गिरा देते हैं वो,
पर पवन का उड़नखटोला ले
ऊंचाइयों का है रस चखना।
यह खेल तुम्हारा मेरा है
मांझे के करतब, चतुर ढंग,
ऊंचाइयों को छूते छूते
मदमस्त नृत्य मेरा दिखना।
गिरना अपरिचित स्थलों पर
भय, वेदना, संत्रास दे ,
मिटने का भय सनातन है
उठने में बाधा कब बनता।
4. मेरी उम्र
मेरी उम्र सिर्फ उतनी है
जितनी
तुम्हारे साथ बिताई थी
तब
जब तुम आज़ाद थे
शहजादा सलीम थे
मजनू फरिहाद थे
राँझा महिवाल थे
पुरुषीय अहं से
परिवार समाज से
बड़े बड़े झूठों से
बिलकुल अनजान थे।
मेरी उम्र सिर्फ उतनी है
जितनी
मैंने
तुम्हारे हरम में आने से पहले
मनाई थी
कॉलेज कैंटीन में
कॉफी के धुयेँ में
लेट नाइट चैटिंग में
बहसें- तकरार थे
समस्या- समाधान थे
मेरे और तेरे के
झंझट न झाड़ थे।
मेरी उम्र सिर्फ उतनी है
जितनी में
मान- सम्मान था
निर्णय की क्षमता थी
नेह- विश्वास था
साँचे में ढलने की
शर्तें प्रतिमान न था
जा जा कर लौटते थे
मैंने नहीं खींचा था
आते- बतियाते थे
सचमुच में चाहते थे।
मेरी उम्र सिर्फ उतनी है
जितनी अनामिका की अंगूठी से
सिंदूरबाजी से
मंगलसूत्र की धारणा से पहले
घूंट- घूंट पी थी।
व्यक्ति से वस्तु बनने
तुम्हारी अचल संपति में ढलने
गुस्से रतजगों आंसुओं में धुलने
विरोधाभासों में जीने
व्यक्तिवाचक से शून्यवाचक हो जाने से पहले
स्वप्न लोक में जी थी।
तब
एक सहलाता अकेलापन था
मीठी वेदना थी
प्रेम का भ्रम था
पाने की चाह थी
पहचाना अपरिचय था
वज्र विश्वास था
सुखद प्रतीक्षा थी
भविष्य का सूर्य था
क्यों तोड़ दिये सारे सपने
नींद सहित तुमने।
5. आज फिर
आज फिर
एसिड अटैक से
कुरूप हो गई एक रूपा।
आज फिर
एक बदबूदार देह मिली
वीराने में
नाम था खुशबू।
आज फिर
जंगल में कुत्ते कौवे
झिंझोड़ रहे
एक शाश्वता को।
आज फिर
प्रशिक्षित कर रहा मोबाइल
अबोध शिशुओं को हिंसक झड़पें।
आज फिर
पुलिस गश्त के बावजूद
दरवाजे से उठ गई गाड़ी।
आज फिर
वेंटिलेटर पर चढ़ा मृत शरीर
भारी बिल के लिए।
आज फिर
चौराहे पर पुलिस वाला
कर रहा यातायात नियंत्रण
बनने को कुबेर।
आज फिर
सिर्फ फाइलों में लहलहा गए
विकास के मुद्दे।
आज फिर
लाखों की आमदनी वाले
पार्टी को दे रहे
करोड़ों का चंदा।
- डॉ. मधु संधु
सर्जक, आलोचक और कोशकार, गुरु नानक देव विश्व विद्यालय के हिन्दी विभाग की पूर्व प्रो. एवं अध्यक्ष। इक्कीस पुस्तकें प्रकाशित।
पता-13, प्रीत विहार, पो. आ.- आर. एस. मिल, सिमरन हॉस्पिटल के निकट, ज़ी. टी. रोड, अमृतसर 143105, पंजाब
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