तुषार की कॉलोनी के मुख्य गेट पर एक अधमरा सा कुत्ता कोने में पड़ा था। कुत्ते की पीठ पर मक्खियाँ भिनभिना रही थी। उसके कान स्थिर पड़े थे और पूँछ एकदम सुन्न, उसमें कोई हरकत नहीं थी। आने जाने वालों को लग रहा था वह मर चुका है। किसी ने उसकी और नहीं देखा।
तुषार दसवीं कक्षा में पढ़ता है और इसी कॉलोनी में रहता है। वह रोजाना इसी समय स्कूल से वापस आता है इसलिए गेट पर गार्ड और प्रतिदिन इस समय वहाँ से आने जाने वाले कुछ लोग उसे पहचानते हैं। स्कूल बस से उतरते ही उसकी नजर उस कुत्ते पर पड़ी। उसे माँ की सीख याद आई। माँ ने कहा था- कुत्तों से दूर रहना… आजकल कॉलोनी में इनकी संख्या बढ़ती जा रही है… इनसे बचकर निकल करो। तब भी उसके पाँव उस घायल कुत्ते के पास आकर रुक गए। उसकी साँस चल रही थी। तुषार ने अपनी पानी की बोतल का बचा हुआ पानी उसके मुँह पर छिड़क दिया। उसकी जीभ ने कुछ बूँदों को अंदर ले लिया। शायद उसे पानी की आवश्यकता थी।
उसकी गंभीर हालत ने तुषार को विचलित कर दिया। मनुष्यों की तरह वह चीख नहीं पा रहा था। कराहते हुए भी थक गया था। उसे बहुत दर्द हो रहा होगा। यह दर्द कहाँ था, उसे नहीं पता। तुषार ने आसपास के लोगों से उसे उठाने में मदद करने को कहा। कुछ देर बाद गार्ड और एक व्यक्ति उसकी मदद के लिए आगे आए। तुषार सोच रहा था- हमारे बीच में अभी भी संवेदना जीवित है। जीवों के प्रति करुणा और दया अभी साँस ले रही है। वे उस कुत्ते को रिक्शा में डालकर पास के डॉग क्लीनिक में ले गए। डॉक्टर ने उसकी गंभीर हालत को देखते हुए उसका इलाज करना शुरू कर दिया। उन्होंने तुषार को भरोसा दिलाया कि वह ठीक हो जाएगा, अब वह घर जाए।
उसे वहाँ छोड़कर तुषार घर वापस आ गया। घर आकर तुषार ने माँ को सारी कहानी सुना दी। उसकी माँ खुश हुए और उसने उसे इस नेक काम के लिए बड़ी सी चॉकलेट दी और शाबाशी के लिए उसकी पीठ थपथपाई। तुषार ने माँ से पूछा- “माँ आप तो कुत्तों से बचने के लिए कहती रहती थी, फिर आज आपमें यह बदलाव कैसे हुआ?”
“मैंने उनसे बचने के लिए कहा था, उन्हें बचाने के लिए मना नहीं किया था। वे भी हमारी तरह ही जीव हैं, सांस लेते हैं, खाना खाते हैं, उन्हें भी पीड़ा हो सकती है, उनकी सहायता हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा?” माँ ने उत्तर दिया।
माँ ने तुषार को वास्तविक स्थिति से अवगत कराते हुए समझाया- “हमारा समाज बहुत आधुनिक हो गया है। हमारे पास अपने स्वयं के संबंधों के लिए समय नहीं होता। लेकिन हम अपने वैभव का प्रदर्शन करने के लिए विभिन्न नस्लों के कुत्तों का पालन-पोषण करते हैं। यह सही है कि हम जीव का ध्यान रखते हैं, उसे परिवार का सदस्य मानते हैं, लेकिन जब यही सदस्य दूसरों के लिए आक्रामक हो जाता है, उन्हें घायल कर देता है, तब हम बेचारे बनकर खड़े हो जाते हैं।”
“आप कहना क्या चाहती हैं माँ?” तुषार ने फिर प्रश्न किया।
“मैं केवल तुम्हें यह समझाना चाहती हूँ कि ईश्वर ने प्रत्येक जीव का जीवन उसके अनुरूप वातावरण में तय किया है। अगर हम जबरदस्ती उनसे खिलवाड़ करेंगे तो परिणाम भयंकर ही होंगे। पशु-पक्षी सबका जीवन प्रकृति के अनुसार है। हमें उन्हें अपने मनोरंजन का साधन नहीं समझना चाहिए। उन्हें स्वतंत्र रहने दें। मनुष्यता उन्हें बाँधने में नहीं है अपितु आवश्यकता पड़ने पर उनकी मदद करने में है। जैसे तुमने उस कुत्ते की मदद की।” माँ ने तुषार के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा।
कुछ दिनों बाद तुषार ने फिर उस कुत्ते को गेट के पास देखा। वह गार्ड के पास बैठा था। तुषार के पास आते ही वह उसके पैरों को सुँघने लगा। अपनी दुम हिलाने लगा। अपना मुँह ऊंचा करके तुषार को देखने लगा। जैसे उसे उस दिन के लिए धन्यवाद कह रहा हो। तुषार ने अपना हाथ उसकी पीठ पर रखा और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगा। उसके स्पर्श से वह उसके पैरों में ही बैठ गया। जैसे कह रहा हो, कुछ देर और बैठो, तुमने मुझे जीवनदान दिया है, मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ…।
आज उसे स्वस्थ देखकर तुषार बहुत प्रसन्न हुआ। गार्ड भैया ने बताया- यह कुछ दिन बाद ही यहाँ लौट आया था। ऐसा लगता था जैसे तुम्हें खोज रहा हो। हम भी इसके साथ घुलमिल गए हैं। यह भी हमारे साथ कॉलोनी की चौकीदारी करता है। इधर-उधर घूमता है फिर यही लौट आता है। हमने इसका नाम “टोही” रख दिया है। हमने इसे बाँधा नहीं है। इसने स्वयं यह स्थान चुना है।
तुषार टोही की कृतज्ञता पर मुग्ध हो रहा था। उस दिन की उसकी मदद को वह भूल गया था, परंतु यह नहीं भूला था।
अपने इस सुखद अनुभव को वह माँ को बताने के लिए व्याकुल हो उठा और घर की ओर दौड़ पड़ा। टोही उसे देखता रहा और प्रसन्नता में दुम हिलाता रहा, जैसे उसने उसका मन पढ़ लिया हो।
डॉ अंजु वेद
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