पहाड़ की पीठ पर जब पौ फूटी तो मिनी को लगा अंधेरा शायद छंटने को है। कच्ची, कुहलायी सी धूप किसी कमसिन सी चहलकदमी करती देवदार की फुनगियों को चूमने लगी तो मिनी को अहसास हुआ है कि अब उसे बिस्तर छोड़ देना चाहिए।
नरम, मुलायम मद्धिम सी किरणें मिनी के स्याह कमरे के रोशनदान से शहतीर का आकार ग्रहण करती हुई फर्श पर यूं बिछ गयी मानो वह अपने खोये हुए बजूद को तलाश कर रही हो। धूप ने जल्द ही घर, आंगन, पेड़, पौधों, नदी हर ज़र्रे को अपनी आगोश में ले लिया।
फर्श पर रखी अंगीठी के कोयले पूरी तरह राख हो चुके थे। उसे लगा हल्के से बुखार ने उसे जकड़ लिया है। देर रात तक करवटें बदलने के बाद शायद तीन या चार बजे उसकी आंख लगी होगी। रात भर वह फटे पुराने कपड़ों को जोड़-जोड़ कर सी हुई खिंद से अपनी देह को ढकने का प्रयास करती रही थी। कई जगहों से टूटूे बाण की चारपाई पर तलाई के स्थान पर दो खंदोलू बिछे थे। मनु ने बताया था कि पहाड़ो में पुराने वक्त में बाज़ारी गद्दों, लिआफ, कबल, दरी आदि खरीदने का रिवाज़ नहीं था। यूं भी वे गुरबत के दिन थे। मनु की दादी और फिर अमा ने गूदड़ों से ऐसे खंदोलू तैयार किये थे। ऐसे बेहिसाब खिंद-खंदोलू घर में काठ के पुराने बक्सों में भरे पड़े थे जिन्हें चूहों के आक्रूमण ने गूदड़ो में बदल दिया था। लेकिन अमा उन्हें चाहकर भी घर के पुराने सामान का हिस्सा बनाए हुए थी। मानों वह कूड़ा-कबाड़ बेशकीमती धरोहर हो! उन्हें सीने से चिपटाए रखना जरूरी हो!
मिनी गहरे अवसाद में थी। एक तो उसके लिये वे मुश्किलों भरे दिन थे। बदन से वह निढाल सी हो चुकी थी। पांच-सात दिन का वह वक्त सचमुच बेहद कष्टप्रद था। उससे भी ज्यादा तकलीफदेह या उसकी सासू मां और पति का अप्रत्याशित व्यवहार जिसकी कल्पना शासद उसने स्वपन में भी नहीं की थी।
मनु से परिणय सूत्र में बंधने का निर्णय मिनी ने क्यों लिया था? इस पर वह शिद्दत से मन्थन कर रही थी। ये मनु तो बेहद आज़ाद य़ाल इंसान है। बिन्दास। बैलौस। आकर्षक व्यक्तित्व। बुद्धिजीवी। पहली ही मुलाकात में हर किसी को अपना बना लेने में माहिर। उसका समूचा व्यक्तित्व मिनी के लिये ढेर सारे गुणों की खान था। कच्चे धागे की तरह खिंची चली गयी थी उसकी तरफ। यह एक अंतरजातीय विवाह था। शुरूआत में दोनों के ही अभिभावक राज़ी नहीं थे। कोर्ट मैरिज के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
शादी को छह महीने बीत चुके थे। मनु की मां ने हथियार डाल दिये थे। मां चाहती थी बेटा बहु को घर लाए। उसका आदर सत्कार होगा। बेटी की ही तरह उसे ससुराल में प्यार मिलेगा। उसे सिर आंाों पर बिठाकर रखेंगे। आखिर बेटे की खुशी में ही तो मां की खुशियां हैं।
शुरू में मिनी पति के घर जाने के लिये राजी नहीं थी। असुरक्षा की भावना उसे जकड़े हुए थी। उस पर निहायत पिछड़े, अनपढ़, गंवार लोग। अंधविश्वासों में आकण्ठ डूबा समाज।
‘मिनी। यार कुछ दिनों की तो बात है। हफता, दस दिन या एक महीना। आखिर उनके प्रति भी तो हमारा कोई फजऱ् है कि नहीं? ताउम्र तो उनसे दूर नहीं रह सकते हम लोग। फिर हम कौन सा हमेशा के लिये वहां रहने जा रहे हैं।
‘ठीक है। पर ना मालूम क्यों मैं किसी अनहोनी को लेकर आशंकित हूं। खुदा जाने वो मुझे किस निगाह से देखेंगे? व्यवहार कैसे होगा? मनु कहीं मैं असहज न हो जाऊं ….
‘कम आन डार्लिंग। कैसी बातें करती हो। कितनी ही बार हमें बुला चुके हैं ….. तुहे देखने मिलने के लिये व्याकुल हैं। अमा मेरी बहन सब हमारा बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं …. अमा तो तुहे देखने के लिये पागल हुए जा रही है।
पहले ही दिन मिनी की ससुराल में उमीद से कहीं ज्यादा आवभगत हुई। बेटे के साथ बहू को देखकर सासू मां, ननद फूले नहीं समा रहे थे। मानों बरसो पुरानी मुराद पूरी हुई हो ….
सब कुछ कितना सहज, सामान्य सा था।
ससुराल पहुंचते माहवारी शुरू हो गयी। आकस्मिक शारीरिक दुर्बलता ने मिनी को असहज सा कर दिया था। कुछ घण्टों की खुशियां काफूर हो गयी थीं। यह एक स्वाभिक प्रक्रिया थी जिसकी पीड़ा से उसे दीगर औरतों की तरह से गुजरना ही था।
‘अमा जी वो वाशिंग मशीन कहा है? मेले कपड़े धोने हैं।
‘बहू। ये मुई मशीन तो खराब पड़ी है। स्टोर में। रिपेयर होणी है उसकी। कौण ले जाए उसे ढोकर शहर। गांव में मुआ कोई मैकेनिक भी तो नहीं है जो मशीन ठीक कर दे। सब शहर को ही भागते हैं। गांव से तो हर किसी को एलर्जी है। हां बहू ऐसा कर उसी मशीन में डाल दे। मैं धो दूंगी तेरे कपड़े। नौऊ का पाणी-खुड्ड के साथ ही तो बहता है। वहीं धेाते है सब कपड़े।
‘नहीं अमा जी। ये कपड़े तो मैं खुद ही धोऊंगी। गंदे कपड़े आपसे धुलाकर मैं पाप का भागीदार नहीं बनना चाहती ….
‘पाप। अरे बेटी। बहू के कपड़े धोना कोई पाप है क्या? फिर तू कल शाम ही तो पहुंची है। लबे स$फर के बाद…. तुझे आराम की तो स़त जरूरत है।
‘अमा जी। आप समझ क्यों नहीं रही। ये गंदे कपड़े हैं। सुथण, कमीज, अंडरगारमेन्ट…. सब में खून के धब्बे लगे हैं। चलते वक्त मैं पैड रखना भूल गयी थी। सोचा यहां मिल ही जाएंगे …. पर यहां में तो कोई दुकान भी नहीं है …. उन्हें भेजती हूं शहर …. कुछ और सामान भी मंगवाना है।
‘अरे। तुझे डेट आई है और तूणे बताया नहीं। ये तो अनर्थ हो गया …. मनु से भी नहीं बताया तूणे। उसे तो पता है यहां के रस्मो रिवाज़।
‘कैसे रिवाज़ अमा जी….?
‘हे भगवान। क्या करूं? मैं तो किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रही। गांव में किसी को पता चल गया …. तो आस पड़ोस दूर पार सब जीणा हराम कर देंगे …. हाय राम देवता को क्या मुहं दिखाऊंगी?
‘मां जी। पीरीडयस ही तो हैं। हर औरत को आते हैं। आपको भी तो ….
‘बहू। पहाड़ों में औरत को ऐसे ब$खत में बिल्कुल अकेले रहणा पड़ता है। दूसरे कमरे में। उस कमरे में किसी को भी आणे जाणे की मनाही होती है। ये सात दिन का टैम सारे घर पर भारी होता है ….
मनु भी कमरे से उठकर बरामदे में आ गया। ‘अमा ये क्या बहस हो रही है सुबह सवेरे?
‘तू तो जाणता है हमारे हरयाण के रीति रिवाज, बंदिशें।
‘क्या हुआ ?
‘बहू को डेट आयी हुई है और वो तेरे साथ ही सो गयी कमरे में ‘हे भगवान। अब क्या होगा?
अमा ये मिनी पढ़ी-लिखी है। पंजाबी बैकराऊंड है इसकी। अंबरसर दी कुड़ी। मेरे साथ नोयडा में कपनी में नौकरी कर रही है। सॉटवेयर इंजीनियर। अपणे गांव, समाज के तौर तरीक ना सिखा इसको।
‘$खबरदार जो तूणे टोका टाकी की मेरे से। पता नहीं तुझे देवता रूठ गया तो सारे घर को बेडिय़ों में जकड़ लेगा…. ‘तू या तेरी घरवाली गांव से बाहर हैं? हम जिस बरादरी में रहते हैं, उठते हैं, बैठते हैं, सांस लेते हैं इसके कायदे कानूनों को मानणा पड़ता है कि नहीं। इतना भोला क्यूं बण रहा तू।
‘अमा इसीलिये मैं मिनी को यहां नहीं लाना चाहता था। राई को पहाड़ बना दिया है तुमने।
सास पर बहू या उसके बेटे की दलीलों का कोई असर नहीं था। वो प्राण दे सकती है पर देव परपरा का उल्लंघन उसे कतई बर्दाश्त नहीं है। माहवारी ने समूचे घर को अशुद्ध कर दिया था। अब सारे घर को गोबर, गाय के गून्तर से शुद्ध करना होगा। फिर घर में गंगाजल छिड़का जायेगा। पूजा पाठ होगा। मन्दिर में जाकर महादेव से क्षमा याचना करनी पड़ेगी। और ना जाने क्या-क्या पाखण्ड, आडबरों की सलीबों को सदियों से कंधों पर ढो रहा है ये पहाड़ ….
जो औरत एक दिन पहले बहू के घर आने से फूले नहीं समा रही थी, बहू के घर आने से अभिभूत थी, वो माहवारी की भनक लगते ही खलनायिका के रौद्र किरदार में ढल चुकी थी। हिन्दी फिल्मों की ललिता पवार की रूह शायद उसमें प्रवेश कर चुकी थी। वो किसी भी कीमत पर मिनी को बेटे के साथ कमरे में बैठने, बतियाने या सोते हुए नहीं देख सकती थी। उसकी अशुद्धता शत्रु बन चुकी थी।
मिनी को इस बात ने परेशान किया था कि अत्याधुनिक होने का संवाग रचाने वाले उसके पति ने भी ऐसे नाज़ुक वक्त में अपनी मां का ही साथ दिया था। मनु ऐसे पाखण्ड को ध्वस्त करे जहां बेजुबान देवताओं ने समाज को रूढिय़ों में जकड़े रखा है। मगर वह तो बेहद दब्बू, डरपोक और मां की गोद में बिछ जाने के लिये आतुर दिखा।
‘मिनी प्लीज ट्राई टू अंडरस्टैंड। चन्द रोज़ की ही तो बात है। अलग कमरे में सो जाओगी तो क्या फर्क पड़ेगा। शादी से पहले क्या तुम मायके में अपनी मां की गोद में सोती थी? अकेला ही तो रहा होगा तुहारा कमरा। कभी-कभी हम चाहकर भी लोक परपराओं, लोक मान्यताओं के $िखलाफ अपना विरोध दजऱ् नहीं कर पाते। सोसाइटी के दस्तूर को निभाना लाज़मी हो जाता है …. मां का दिल रख लोगी तो पहाड़ नहीं टूट जाएगा। प्लीज़ ट्राई टू बीयर विद मी।
चुप्पी, सन्नाटे की महीन सी दीवार पसर गयी थी दोनों के दरयान। मिनी के भीतर कोलाहल मचा हुआ था। असमंजस, अनिश्चितता। मायके लौटती है तो संभव है मनु का साथ हमेशा के लिये खो बैठे! जिस प्रेम की बगिया को उसने महज छह महीने पहले सजाया था, उसके फूल हमेशा के लिये कहीं मुर्झा न जाएं? कहीं मनु उससे दूरियां न बना बैठे? वह बैचेन थी। आक्रोश को नियन्त्रित नहीं कर पा रही थी, ‘अन्धविश्वासों, पाखण्डों, खोखली मान्यताओं को लोक परपराओं से जोडऩा तुहे शोभा नहीं देता। लोकरीत हमारी धरोहरे हैं उनका इस बकवास विश्वास से क्या लेना देना? ऐसे वक्त में जब तुहें अपनी मां के ‘मैंटल ब्लाक को ध्वस्त करना चाहिए, तुम उसके साथ खड़े होकर अनचाहे पाप का भागीदार बन रहे हो। हमारी शादी को कुछ महीने ही बीते हैं। हमें एक-दूसरे का साथ चाहिए। ऐसे वक्त में जब मैं मुश्किल दौर से गुजर रही हूं, मुझे तुहारी ईमोशनल स्पोर्ट की जरूरत है और तुम छोटे से मुद्दे पर मेरा साथ देने से चूक रहे हो।
मिनी को चिन्ता खाये जा रही थीं। भीतर ही भीतर। धुन की तरह। एक छोटी सी बात जो कतई मुद्दा नहीं था, अमा के लिये उसके मायावी विराट रूप ने मिनी की खुशियों पर ग्रहण लगा दिया था।
वह समझ नहीं पा रहा था उसे क्या करना चाहिए? क्या वह दो विपरीत सांस्कृतिक धाराओं का टकराव था? उसे अपने कलचर, सयता, आवोहवा के बाहर मानसिक रूप से पिछड़े समाज के लड़के का हाथ थामने की क्या जरूरत थी? उसके भीतर ज्वालामुखी धधक रहा था। सरासर नाइन्साफी है। जुल्म है। दु:ख, तकलीफ में तो मनु, उसका मां, ननद को उसका बेहतर, अतिरिक्त याल रखना चाहिए। भावनात्मक रूप से। हो उलटा रहा है। अमानवीय यातना।
वह बरामदे में देवदार के तने को काटकर बनाए गये गोल बैठकू पर किसी निर्जीव शहतीर की तरह पसर गयी।
सर्द हवाएं थीं कि थमने का नाम नहीं ले रही थीं। उसने देसी खड्डी पर बुने पटटू को अपनी देह के इर्द-गिर्द लपेट लिया। आसपास कुछ आवाज़े थीं जिन्हें वह तन्मय होकर सुनना चाहती थी। पक्षियों की चहचाहट सुनहरी धूप के दरयान निस्तब्धता को तोड़ रही थी। सामने स्लेट की छत का एक पुराना मिटटी का कच्चा मकान था। दो कमरे। खुड्ड। भेड़, बकरियों, गाय, भैंस की मींगंणों, गोबर और गून्तर से सरावोर। उसकी गंध को वह रात भर छटोबरू में भी महसूस करती रही थी। बकरियों के मिमियाने, गाय के रंभाने की आवज़ें, तो दूर कहीं कुत्तों के भौंकने के स्वर। छटोबरू के साथ ही बहने वाली नदी की कलकल। घराट की घर्र….घर्र….
‘कैसी हो भाभी? नींद तो अच्छी आई होगी।
ननद के हाथ में चाय व नाश्ते की ट्रे देखकर मिनी ने जबरन मुस्कराने का प्रयास किया।
‘बैठो दीदी।
‘दीदी नहीं। ननद हूं।
‘तो क्या पुकारू तुझे?
‘प्रेमू। प्रेमवती।
प्रेमू ने टे्र दूर से ही आंगन में रख दी। मानो मिनी किसी संक्रमण रोग से ग्रस्त हो। या फिर करोना की गिर$फत में हो। उसे याद है वह भयावह दौर जब अपने बेगाने हो चुके थे। घर, अस्पताल या फिर मरघट में अपनों को विदा होते हुए देखना कितना ह्दयविदारक मंजर था। बेशुमार, बिबों, तस्वीरों को याद कर मिनी सिहर उठती है। वह तो पूर्ण रूप से स्वस्थ है। माहवारी तो कोई रोग नहीं है। मगर उसे तो एक बीमार की तरह ट्रीट किया जा रहा है। तीमारदार हैं कि उससे दूर रहकर ही संवाद बनाने की नाकाम सी कोशिश कर रहे हैं।
‘प्रेमू। कुछ देर तो बैठ। अकेलापन $खलता है री मुझे।
प्रेमू ने बरामदे में रखी एक बेंत की कुर्सी को झाड़ कर साफ किया और उस पर बैठ गयी। दोनों के दरयान कोई दस फीट का फासला रहा होगा।
‘ननद जी। नजदीक आ जाओ। मुझे करोना नहीं है भाई। भली चंगी हूं।
‘नहीं भाभी। आपके पास नहीं बैठ सकती।
‘क्यों? अछूत हूं क्या?
‘ठीक कहा तुमने भाभी। मुश्किल दिनों में ये समाज हमें अछूत ही समझता है। हमारी बोली में छूत कहते हैं। अशुद्ध। अपवित्र। ये दिन हम पर पहाड़ बन कर टूटते हैं। डेटस के दौरान मुझे भी इसी छटोबरू में सोना पड़ता है। मां भी यहीं सोती थी। जवानी में। सभी मर्यादा में बंधे हैं। ये सब खोखले नियम औरतों के लिये बने हैं। पुरूषों के लिये कोई बंदिश नहीं है। खुले सांड की तरह घूमते रहते हैं, यहा वहां। पहाड़ में औरतों को ही खपना पड़ता है। हर काम में। चूल्हे चौके में। खेत खलिहान में। कोलहू के बैल की तरह। हर वक्त जुती रहती है काम में। दिन-रात भर खपने के बाद भी हम अशुद्ध हैं। मासिक धर्म के दौरान हमारे हाथ से कोई पानी तक नहीं पी सकता। हमें अगर किसी मर्द ने छू लिया तो शायद उसे भूत चिमड़ जायेगा ….
‘लगता है तुहारी ओर मेरी कहानी में कोई $खास फर्क नहीं है।
‘ठीक कहती हो भाभी। यह कष्ट तो दो चार दिन का ही है। शहर जाकर सब भूल जाओगी।
‘नहीं। शायद कभी नहीं
‘अच्छा यह बहस कभी खत्म नहीं होगी। चलती हूूं। वो कालेज के लिये तैयार होना है मुझे। और हां ये बर्तन तुम खुद ही धोना। नदी का पानी साफ है। वहीं। अपने कपड़े भी। रोज़ बदलने पड़ेंगे और धोने भी पड़ेंगे।
मिनी प्रेमू को लौटते हुए देखती रही। बादलो ने सूरज को अपनी ओट में ले लिया था। काफी देर बरामदे, आंगन में टहलने के बाद वह नाले के करीब गयी।
मिनी ने पहले अपने जूठे बर्तन धोए। फिर साबुन से मलमल कर खून सने कपड़े। लौटकर पुन: छटोबरू में बंद हो गयी। सोचा अंगीठी को बरामदे में रखकर पुन: लकडिय़ों को सुलगाया जाए। बरना उस सीलन भरे कमरे में सर्दी से भिडऩा नामुमकिन सा था। उस पर $िखंद के साथ पुराने कंबल। जो कई सालों से धोये नहीं गये थे। उनसे उठने वानी दुर्गन्ध से मिनी के भीतर झुंझलाहट भर गयी थी।
मनु की पांच मिस्ड काल। ममी-पापा, भइया के कई फोन। अनदेखा कर चुकी थी, सबको। क्या बात करे? किससे अपना दु:ाड़ा रोये। मनु शायद उसके लिये फिक्रमन्द होगा। सासू मां भी। उसे न मालूम क्यों सासू मां पर दयाभाव उमड़ पड़ा। पचास साल से वह भी तो उन्हीं अंधविश्वासों में पल बढ़कर बड़ी हुई है। सारे डर उसे भी तो विरासत में मिले होंगे। भला कैसे मुक्त हो सकती है उनसे वो?
मिनी को लगा ममी, भैय्या, पापा से बात कर लेनी चाहिए।
‘ममा। मैं ठीक हूं। यहां का मौसम बेहद खुशगवार है। सर्दी तो बहुत है लेकिन मैं मजे में हूं मनू, अमाजी, ननद सब मेरा अच्छे से य़ाल रख रहे हैं। आज तो दूसरा ही दिन है। कल से घूमने फिरने जायेंगे हम दोनों।
किसी तरह मिनी ने खुद को ज़ब्त किया। रूलाई फूट पड़ी। ममी से फोन पर सहज दिखने के नाटक में वह सौ फीसदी कामयाब रही थी।
दोपहर में सासू मां आई। खाना लेकर। कांसे की बड़ी सी थाली में दाल और सब्जी की दो कटोरियां। पूृणे में लिपटी मक्की की दो रोटियां।
‘बहू। ओ बहू। बेटे दरवाजा खोलना।
मिनी कोई वीडियो देख रही थी। मोबाइल पर। उसने सास को सुन कर भी अनसुना सा कर दिया। वो उसकी कोई भी बात सुनने को राजी नहीं थी। शायद अकेलेपन को उसने अपना हमसफर बना लिया है। एकालाप में निमगन। खुद से बातें करो। खुद ही सब कुछ कहो। खुद को ही सुनो।….
‘खाना रखा है। ले लेणा। थाली। और हां सुणू। वो लकड़ी के स्टोव में पानी गर्म है। नहा लेणा। कपड़े भी धो लेणा। बर्तन भी।
मिनी ने ननद और सास के हर निर्देश का सौ फीसदी अनुपालन किया। थक गयी तो पुन: कंबल और खिंद ओढ़ कर चारपाई पर लेट गयी।
फिर खालीपन। शून्यता। वक्त कैसे काटा जाए। कब होगी इस कैद से मुक्ति? हर वक्त बुलबुल की तरह चहकने, फुदकने, परवाज़ भरने वाली मिनी के मानों पर कतर दिये गये हों। कोठरी पिंजरा ही तो था। कमरे की दीवारों का पलस्तर जगह-जगह से उखड़ा हुआ था। कई सालों से उसकी रंगाई या पुताई नहीं हुई थी। दीवारों के कोनों पर जाले पूरी ताकत से अपनी उपस्थिति बनाए हुए थे। उनकी झाड़ पोंछ का तो सवाल ही नहीं था। सास या उसकी बेटी प्रेमू कभी उस कमरे में सोई होगी, उसे यकीन नहीं हो रहा था। खुद के लिये दोनों ने जरूर कोई बेहतर जुगाड़ किया होगा। कमरे की दीवारों पर शिव पार्वती, राधा कृष्ण, गणेश, विष्णु, लक्ष्मी से लेकर अनेक देवी-देवताओं के फटे पुराने कैलेण्डर चस्पां थे। उनकी तारीखें इतिहास में $गर्क हो चुकी थीं। $खुद को साबित करने के प्रयास में वे पूरी ताकत से दीवारों पर मौजूद थे। उन्हें दीवारों से हटाने या उनके स्थान पर ईश्वर के विविध अवतारों को नये रंग रूप में प्रस्तुत करने का नायाब सा य़ाल उस घर में अपनी जड़े तलाश रहा था।
पहाड़ के उस इलाके में ऐसे कमरे को छटोबरू कहा जाता था। यानी काम चलाऊ छोटा सा कमरा। कभी कभार इस्तेमाल किए जाने वाली कोठरी। इसका ना$काबिले बर्दाश्त इस्तेमाल नयी नवेली बहू के लिये होगा, इसका इल्म शायद किसी को भी नहीं था। यूं यह एक ऐसा विरोधाभास था जिसे ध्वस्त करने का कोई भी सूत्र मिनी के भी पास नहीं था।
दस बाई दस के उस छटोबरू में एक और अहम चीज़ थी। लकड़ी का एक बड़ा सा बक्सा जिसे स्थानीय भाषा में कोठड़ कहा जाता था। किसी वक्त इसमें गहनों से लेकर हर प्रकार का कीमती सामान रखा जाता था। चूडिय़ां। नये सूट। सुहागिन का सामान। अंग्रेजों या राजा महाराजा के जमाने की अशरफियां। क्या-क्या नहीं। अमाजी ने ना मालूम क्या सोचकर ओबरी से इसे निकाल कर छटोबरू के हवाले कर दिया था। वक्त के साथ-साथ सासू मां की प्राथमिकताएं बदल गयीं थीं। यूं यह काठ का बक्सा मनु की दादी की विरासत का आखरी चिन्ह था। उसमें खंदोलू और पुराने कपड़े भरे पड़े थे। पहाड़ों में ऐसी मान्यता थी कि पुराने व$खत में कोठड़ को तोड़कर उसे उम्रदराज बुजुर्ग की चिता के साथ जला दिया जाता था। लेकिन प्रेमू की मां ने ऐसा नहीं किया था। हो सकता है यह रिवाज़ भी कोरी बकवास हो…. यूं पहाड़ों में ऐसे रहस्यमयी काठ के बड़े-बड़े बक्से शायद हर घर में मौजूद थे…. ऐसी तमाम बेसिर पैर की बेहूदा सी जानकारियों से मनु ने गांव आने से पहले ही मिनी की स्मृति को भर दिया था? छटोबरू में रखा वो बक्सा पहली ही रात स्वपन में विशालकाय, विकराल सा रूप धारण कर उसे डराने लगा था। खुदा जाने मोटे से जंग खाये ताले में बन्द वह कोठड़ अपने गर्भ में कितने ही राज़ छिपाये होगा? छटोबरू का समूचा बिब किसी हॉरर फिल्म सा मिनी का पीछा करता रहा था रात भर। छटोबरू मिनी के ज़हन में कुछ यूं तरह अपनी छाप छोड़ चुका था मानों वह कोई ऐतिहासिक धरोहर हो या फिर वह किसी अदृश्य जादुई शक्ति से लबरेज़ था या फिर किसी गूरू या चेले ने उस कमरे को कील दिया था।
मिनी को भय सता रहा था कहीं माहवारी के पांच या सात दिनों बाद भी छटोबरू उसका स्थायी निवास ना बन जाए। कोई दैवीय शक्ति उसके भीतर ना प्रवेश कर जाए। कहीं वह अपनी सुध-बुध न खो बैठे? अनाम, अदृश्य, अव्यक्त सा डर उसके भीतर डेरा जमाने लगा था। खुदा जाने कब उसका चेतन या अवचेतन जड़ में बदल जाए और वह मानवीय देह से किसी निर्जीव वस्तु में तब्दील हो जाए?
ऐसे तमाम नामुराद यालों, दु:स्वपन को वह दूसरे ही पल झटक कर सहज होने का प्रयास करती। उसे लगता वह पूर्ण रूप से सामान्य अवस्था में है। शायद ऐसे नकारात्मक विचार उस समूचे माहौल की जकडऩ की उपज थे जिनका शिकंजा ज़हनी तौर पर मिनी के इर्द-गिर्द कसता जा रहा था।
रात का खाना मनु छोड़ गया था। दरवाज़े के बाहर। अपराध बोध से जकड़ा हुआ। उसमें इतना साहस भी शेष न था कि मिनी से प्यार की दो-चार बातें कर उसका मन बहला दे। मिनी को अकेलापन बेहद खल रहा था। वो चाहती थी कि मनु उसके किवाड़ पर दस्तक देता। उसे बाहों में भर लेता। मिनी के आंसू छलक आते और मनु के कंधे को भिगो जाते। उसके होठों, गालों, माथे, आंाों पर वह चुबनों की झड़ी लगा देता। उसका मन हलका हो जाता। ऐसा होता। वैसा होता…. कल्पना लोक की उड़ान….लेकिन वो तो जब कमरे के बाहर खाने की थाली दहलीज़ पर रखने आया होगा तो सासू मां की दो जोड़ी आंखें उसका पीछा कर रही होंगी। अगर वो छटोबरू में पत्नी के साथ बैठ गया तो वह अवश्य ही ‘छूत का शिकार होकर रहेगा ….?
आज तीसरा दिन था। नाश्ता लेकर पुन: प्रेमू आई थी।
‘आ प्रेमू। बैठ।
‘हां, भाभी। आज तो मेरे पास वक्त है ….ये बताओ तुम कैसी हो? अब डिप्रैशन तो नहीं है?
‘क्यों तू तो हर वक्त ज़ल्दबाजी का शिकार बनी रहती है। आज….
‘आज इतवार है। छुट्टी का दिन। हां भाभी आज एक और बड़ी खबर है।
‘खबर….?
‘हां वो आज गांव में महादेव का देवरथ आ रहा है। मेरी सहेली के घर। उसके मां-बाप ने मन्नत मांगी थी कि अगर मेरी फ्रेन्ड को कोई अच्छा घर यानी वर मिल जाए तो वो देवता को अपने यहां निमन्त्रण देंगे। उसके मां-बाप कई सालों से उसके लिये रिशता ढूंढ रहे थे। किसी ने वहम डाल दिया था कि वो मंगलीक है। बार-बार उसके पेरेन्टस देवता के दरबार में गुहार लगाते रहे। कई साल बाद गूर ने उनके प्रश्न का हल कर बताया था कि मेरी सहेली मंगलीक नहीं है। ज्योतिषी ने उसकी पतरी देखकर वहम डाल दिया था। बस ज्यंू ही देवता खुश हुए, समाधान मिल गया! लड़का भी हैंडसम है। पूरा हीरो लगता है।
‘अच्छा तो देवता के प्रति खूब आस्था है तुम लोगों की।
‘क्यों नहीं। यहां तो हर गांव का अपना-अपना कुल देवता या कुल देवी है। सुख-दु:ख के साथी। लोग आपस में लड़ झगड़ कर एक दूसरे का खून क्यों न बहा दें, देवता के नाम पर सब इक_े हो जाते हैं। सब वैर भाव मिट जाते हैं।
‘तो क्या-क्या होगा देवता के वहां?
‘सारा गांव इकट्ठा होगा। लोग देवरथ के सामने नतमस्तक होंगे। चढ़ावा चढ़ाएंगे। गूर से प्रश्न पूछेंगे। उसे खेल आयेगी। फिर वो संगलों से खुद को पीटेेगा। महादेव की तरफ से ये गूर महाराज ही सबके प्रश्नों का उत्तर देंगे। धाम होगी।
‘धाम?
‘हां, प्रति भोज कोई एक हजार लोग खाना खायेंगे।
‘अरे। इतना बड़ा प्रीतिभोज?
‘जिस घर ने देवता को न्योता दिया है, ये उसी की जिमेदारी है। कम से कम एक लाख का खर्च तो पक्का समझो।
‘अरे वाह खूब। प्रेमू वहां तो मैं भी चलूंगी। मिनी की मासूमियत की वह इंतहा थी।
कुछ पल के लिये प्रेमू ने चुप्पी साध ली।
‘भाभी तुम नहीं जा सकती वहां। डेटस जब पूरी तरह खत्म होंगी और तुहे गोमूत्र, गंगाजल से शुद्ध किया जाएगा, विधि विधान से तभी तुम जलसे में शामिल हो सकती हो…. आज तो तीसरा ही दिन है। चार दिन और ये कष्ट झेलना पड़ेगा।
मिनी ने व़मुश्किल चाय के घूंट हलक में उतारे। पराठे के छोटे-छोटे निवाले वेमन से मुंह में डालकर उन्हें चबाती रही। जबरन एक-एक कौर को। गले से उतारना उसके लिये असह्य हो रहा था।
‘प्रेमू ये बताओ क्या कभी किसी ने इस इलाके में ऐसे वाहियात सुपरस्टीशन के $िखलाफ आवाज़ उठाई है? तुझे नहीं लगता हम औरतों का यह कितना बड़ा मैंटल टार्चर है? मोस्ट इन्हूयमन, हॉरिबल। आई जस्ट कॉन्ट विदस्टैण्ड इट।
‘हां क्यों नहीं। दस-बारह साल पहले यहां एक डीसी थे। खूब प्रोग्रैसिव थे। पंचायतों, स्कूलों और कई जगहों पर जागरूकता अभियान के ज़रिए उन्होंने ऐसे अन्धविश्वासों के $िखलाफ लोगों को जगाने की कोशिश् की। लेकिन तुम तो खूब पढ़ी लिखी हो। अवसर बदलाव लाने वाले लोगों को गंवार, पिछड़ी और घोर अंधविश्वासी भीड़ का सामना करना पड़ता है। डीसी के $िखलाफ ही ऐसे ज़ाहिल लोगों ने मोर्चा खोल दिया। गो बैक…. के नारे लग गये थे उनके विरूद्ध।
‘ओह गॉड। आई जस्ट कांट विलीव दिस।
‘भाभी यकीन तो करना ही पड़ेगा। देश का हाल देख लो। अक्सर समझदार, पढ़े-लिखे लोग भी भीड़ का हिस्सा बनने के लिये मजबूर हो जाते हैं। लाचार और बेबस हो जाते हैं। हमारे ही गांव में अगर कोई देवताओं ने विरूद्ध अनाप-शनाप बोलेगा तो उसका सर्वनाश होगा, ऐसा सब मानते हैं। लेकिन मैं यह सब नहीं मानती। ये गूर, कारदार, देअलू ऐसे लोग देवता के नाम पर हम सबको ठग रहे हैं? क्या कोई बुद्धीमान या तर्क को मानने वाला व्यक्ति यह स्वीकार करेगा कि प्रश्न पूछने पर देवता उसका उत्तर देगा? क्या पीतल, सोने-चांदी के ये निर्जीव, बेज़ुवान मुखौटे हमारी पीड़ा को समझ सकते हैं? हां, एक बदलाव मुझे नजर आता है। वह भी उन गांवों में जहां लोग काफी हद तक पढ़-लिख चुके हैं और पुरानी बातों का विरोध जताने लगे हैं। कई साल पहले तो पीरियडस के दौरान लड़कियों या शादीशुदा औरतों को खुड्ड में ही सोना पड़ता था। पशुओं के साथ। नीचे गाय, भैंस, बकरियां, भेड़ें और ऊपर की मंजिल में घास-फूस और देवदार की नुकीली पत्तियों की पुआल बनाकर। सच पूछो तो ये खुड्ड यातना शिविर थे। वह सब घोर अत्याचार से कम नहीं था। लेकिन अब छोटे से कमरे या छटोबरू में ऐसे मुश्किल वक्त के लिये बन्दोबस्त किया जाता है। मुझे लगता है खूब पिछड़े, अनपढ़, गऱीब घरों में तो शायद अब भी औरतों को पशुओं के साथ ही सोने को मजबूर किया जाता है। भाभी जब-जब मैनें अपने कालेज में इस विषय पर लैक्चर दिये तो सब चुप्पी साध लेते थे। सांप संूघ जाता था उन्हें। मेरा साथ देने को कोई तैयार नहीं होता था।
‘हां एक बात और सुणों भाभी।
प्रेमू ने इधर-उधर देखा। कोई उसे देख या सुण तो नहीं रहा! स्वर धीमा कर बोली, ‘जो ये कारदार, गूर-देवता के रखवाले हम औरतों को ‘छूत मानते हैं न सब ढोंगी हैं साले। छोटी जात के जन को तो अपणे मन्दिर की देहरी पर पांव नहीं रखणे देते। फटकार, दुत्कार कर भगा देते हैं। ये तो खुद ही छुआछूत के पुजारी हैं। ये वजन्तरी जो देवता के आगे पीछे ढोल-नगाड़ों और दूसरे बाजों के साथ चलते हैं न कास्ट को बिलोगं करते हैं। पर ये लोग न तो देवरथ के आगे सिर झुका सकते हैं नाही इन्हें देवता के मन्दिर में प्रवेश का हुक्म है…. हां अमा को ना बताणा मेरी ये बातें…. घर से निकाल देगी मुझे…. देवता के $िखला$फ ज़बान खोलने वाले को तो ये माफिया कभी कभार नदी के हवाले कर छोड़ता है…. ढूढऩे से लाश तक नहीं मिलती ऐसे बगावतियों की! हे भगवान मैं उतावलेपन में ये क्या अनाप-शनाप बोल गयी….माफ करना महादेव….
‘यार पे्रमू तुझे तो पॉलिटिक्स में शामिल हो जाना चाहिए। डिबेटस में तो तू सबको पछाड़ देती होगी।
‘हां। कोशिश करती हूं। मालूम नहीं मेरा क्या होगा। मुझे भी चूल्हे चौके, गाय, भैंस, गोबर गून्तर में ही सडऩा होगा या फिर मैं भी तुहारी तरह मल्टी नैशनल कपनी में कोई बड़ा स्टेटस हासिल कर पाऊंगी।
‘तुम में मुझे एक क्रांतिकारी के बीज अंकुरित होते दिखाई दे रहे हैं। लेकिन ऐसी बाते अपनी मां, भाई या किसी और से मत कर बैठना। कहीं तुझे ही देश निकाला न दे डालें। देव समाज वाले लोग?
‘भाभी। तुहारी हालत देखकर मुझसे नहीं रहा गया। सोचा आज तुहारे सामने अपना मन खोल ही दूं।
इसी बीच सासू मां की ककर्श आवाज़ ने उस $खुशनुमा से माहौल में खलल पैदा की।
‘तू एक घंटे से वहीं बैठी है। खोल बकरियों। चराणे ले जा जंगल में। और हां, खुड्ड में गोबर भी साफ कर देणा।
‘अच्छा भाभी। चलती हूं।
प्रेमू लौट गयी तो मिनी पुन: सोच में घिर गयी। घर और आसपास का समूचा वातावरण अवसाद को और गाढ़ा कर रहा था। उसे लगा भीतर और बाहर सब टूट रहा है। उसके मनोबल की दीवारें दरक रही है। एक-एक पल सदियों में तब्दील हो चुका है! घुटन से वह कैसे मुक्त होगी? ऐसा न हो कि वह कहीं कमजोर पड़ जाए। और आत्महत्या का रास्ता अ़ितयार कर लें?
समस्त घटनाक्रम, नाकारात्मक माहौल में उसकी ननद प्रेमू एकमात्र उमीद की किरण थी। लेकिन वह भी उसका सबल नहीं बन पा रही थी। वह बकरियोंं की रस्सी खोल रही थी कि मिनी ने उसे आवाज़ दी।
‘प्रेमू। एक मिनट के लिये आना। मेरे पास। जरूरी काम है।
‘कहो भाभी ….
‘वो मेरा लाल बैग तेरे, भइया के कमरे में रखा है। उसमें मेरा कुछ जरूरी सामान है। कपड़े बगैरह। उसे मुझे पकड़ा जाना।
मिनी को लगा पहला दिन तो उसने किसी तरह काट लिया था छटोबरू में उसे निर्णय लेना ही होगा। वह अपनी स्वतन्त्र सोच, अस्मिता को यूं तिलांजलि नहीं दे सकती। चक्रव्यूह, जाल से मुक्त होना ही होगा। आज उसने कड़ा फैसला नहीं लिया तो ताउम्र इस ज़हरबुझे से माहौल कर $गुलाम बनी रहेगी।
मिनी ने रात को उस टैक्सी वाले को फोन कर दिया था जो दोनों को बस स्टैंड से गांव छोडऩे आया था। न मालूम क्या सोचकर मिनी ने उसका फोन नबर अपने मोबाइल में फीड कर लिया था।
सोनू भइया। मेरे मायके में मेरा रिश्तेदार सीरियस है। डेथ बेड पर है। उसकी हालत नाज़ुक बनी हुई है। तुम सुबह चार बजे घर के नीचे सड़क पर पहुंच जाना और मुझे बस स्टैण्ड छोड़ देना। वोल्वो पकड़कर चण्डीगढ़ पहुंचना है। समझो एमरजैन्सी है।
मिनी लौट रही है इस बारे उसने सास, पति, ननद किसी को भी भनक नहीं लगने दी। टैक्सी वाले का व्हाटसैप पर मैसेज आया तो वह चुपके से छटोबरू से निकलकर नदी के किनारे-किनारे मोबाइल टार्च के सहारे सड़क के उस छोर पर पहुंची जहां टैक्सी उसकी प्रतिक्षा कर रही थी। ड्राइवर ने आश्चर्य जताया, ‘क्यों। मनु भैय्या नहीं आए?
नहीं उनसे रात बात हो गयी थी। उन्हें डिस्टर्ब करना ठीक नहीं है। मैने कई साल दुनिया भर में अकेले ट्रैवल किया है। मैं इन बातों की आदी हूं। पुलिस ऑफिसर की बेटी हूं न। ऐसे क्षणों में टैक्सी वाले पर अपने पापा का रौव $गालिव करना उसे सही लगा।
टैक्सी की पिछली सीट पर धड़ाम से बैठकर मिनी ने बैग को गोद में रखा और राहत की गहरी सांस ली। उसे लगा वह मानों हिटलर के उस गैसचैबर से मुक्त हुई हो जहां यहूदियों को बेहद दर्दनाक यातनाएं देकर मौत के घाट उतारा गया था।
दो घंटे के सफर के बाद जब टैक्सी से शहर में प्रवेश किया तो छह बज रहे थे।
मिनी ने देखा पहाड़ की पीठ पर सूरज की चमक दस्तक देने लगी थी और लबी रात का अंधेरा आहिस्ता-आहिस्ता छंटने लगा था।
