1. तुम जब आये जीवन में
तुम आये मेरे जीवन में
जैसे सूखे खेत पर
सावन की पहली फुहार उतरती है।
मन जो बरसों से
बंजर पड़ी धरती था,
उसमें तुम्हारी बातों ने
धान की नन्ही बालियों-सी
हरियाली उगा दी।
तुम्हारी हँसी
कुएँ से खींचे गए
ठंडे मीठे पानी जैसी लगती है,
जिसे पीकर
दिनभर की थकान
अपने आप उतर जाती है।
जब तुम आँगन में आते हो
तो लगता है
तुलसी चौरे पर रखा दीया
थोड़ा और उजाला देने लगा है।
तुम्हारी आँखें
गाँव की उस पगडंडी जैसी हैं
जहाँ चलते हुए
मन कहीं भटकता नहीं,
सीधा अपने घर पहुँच जाता है।
मैंने कई शहर देखे,
ऊँची-ऊँची बातें सुनीं,
पर प्रेम का असली मतलब
तुमसे मिलकर समझ आया
कि प्रेम
दरअसल चूल्हे की आँच जैसा होता है,
धीमा मगर उम्रभर
गरमाहट देता रहता है।
तुम्हारा साथ रहना
वैसे ही है
जैसे रातभर जागकर
खेत की रखवाली करता
एक भरोसेमंद दीया।
2. तुम्हारा साथ
तुम्हारा नाम
मैं जब भी मन में लेती हूँ,
लगता है
जैसे दूर कहीं
बैलगाड़ी की घंटियाँ बज उठी हों।
तुम्हारी याद
भोर की उस हवा जैसी है
जो गेहूँ की बालियों को छूकर
धीरे-धीरे पूरे गाँव में फैल जाती है।
तुमसे मिलने के बाद
मन का सूना बरामदा
फिर से बस गया है।
अब शामें उदास नहीं होतीं,
वे चरनी से लौटती गायों की तरह
शांत और अपनापन भरी लगती हैं।
तुम्हारी बातें
मिट्टी के घड़े के पानी जैसी हैं
सादी, ठंडी
और मन को तृप्त कर देने वाली।
जब तुम पास बैठते हो
तो लगता है
जैसे पीपल के पेड़ तले
थका मुसाफ़िर
कुछ देर चैन से सुस्ता रहा हो।
मैं जानती हूँ
प्रेम बड़े-बड़े शब्दों में नहीं बसता,
वह तो छिपा रहता है
रोटी सेंकते हाथों में,
साथ बैठकर खाए गए गुड़ में,
और बिना कहे
एक-दूसरे का दुःख समझ लेने में।
तुम्हारा साथ
मेरे लिए
गाँव की उस पुरानी मेड़ जैसा है
जो हर बरसात में टूटती तो है,
पर फिर भी
खेतों को बिखरने नहीं देती।
3. तुम्हें देखकर
तुम्हें चाहना
मेरे लिए वैसा है
जैसे भोर से पहले
चिड़ियों का धीरे-धीरे बोलना,
जब पूरा गाँव अभी नींद में होता है
और आसमान उजाला होने की राह देख रहा होता है।
तुम जब खेतों की मेड़ से होकर आते हो,
कंधे पर गमछा डाले,
तो लगता है
जैसे थका हुआ दिन
अपने हिस्से की शांति लेकर लौट आया हो।
तुम्हारी बातें
मिट्टी के चूल्हे पर
धीमी आँच में पकती दाल जैसी हैं साधारण,
पर मन को देर तक तृप्त रखने वाली।
तुम्हारा साथ
उस चरवाहे की बाँसुरी जैसा है
जिसकी धुन
दूर तक फैले सुनसान में भी
अपनापन भर देती है।
जब तुम हँसते हो
तो लगता है
जैसे अमराई में
अचानक कोयल बोल उठी हो,
और मन की सूनी डाली पर
एक साथ कई मौसम उतर आए हों।
मैंने कई बार
तुमसे अपने प्रेम को छिपाना चाहा,
पर यह हर बार
वैसे ही बाहर आ गया
जैसे पनघट से लौटती लड़की के घड़े से
थोड़ा-सा पानी छलक ही जाता है।
तुम्हें देखना
मेरे लिए
रात में दूर जलते उस लालटेन जैसा है
जिसे देखकर मुसाफ़िर समझ जाता है
कि कहीं न कहीं
उसके लिए भी एक घर है।
तुम्हारे हाथों की मेहनत,
माथे का पसीना,
और छोटी-छोटी बातों में छिपी तुम्हारी चिंता
मन को वैसा भरोसा देती है
जैसे किसान को
पहली बारिश के बाद
भीगी मिट्टी की खुशबू देती है।
अगर कभी
जीवन की राह ऊबड़-खाबड़ हो जाए,
तो तुम
मेरे साथ उसी तरह चलना
जैसे दो बैल
अलग-अलग होते हुए भी
एक ही हल को संभाले चलते हैं।
क्योंकि तुम्हारे साथ
मैंने जाना है
कि प्रेम
सिर्फ़ बड़े वादों में नहीं होता,
वह तो छिपा रहता है
थाली में बचाकर रखी आख़िरी रोटी में,
थके चेहरे पर आई छोटी मुस्कान में,
और उस प्रतीक्षा में
जो हर साँझ
तुम्हारे घर लौटने तक बनी रहती है।
- 1. तुम जब आये जीवन में
तुम आये मेरे जीवन में
जैसे सूखे खेत पर
सावन की पहली फुहार उतरती है।मन जो बरसों से
बंजर पड़ी धरती था,
उसमें तुम्हारी बातों ने
धान की नन्ही बालियों-सी
हरियाली उगा दी।तुम्हारी हँसी
कुएँ से खींचे गए
ठंडे मीठे पानी जैसी लगती है,
जिसे पीकर
दिनभर की थकान
अपने आप उतर जाती है।जब तुम आँगन में आते हो
तो लगता है
तुलसी चौरे पर रखा दीया
थोड़ा और उजाला देने लगा है।तुम्हारी आँखें
गाँव की उस पगडंडी जैसी हैं
जहाँ चलते हुए
मन कहीं भटकता नहीं,
सीधा अपने घर पहुँच जाता है।मैंने कई शहर देखे,
ऊँची-ऊँची बातें सुनीं,
पर प्रेम का असली मतलब
तुमसे मिलकर समझ आयाकि प्रेम
दरअसल चूल्हे की आँच जैसा होता है,
धीमा मगर उम्रभर
गरमाहट देता रहता है।तुम्हारा साथ रहना
वैसे ही है
जैसे रातभर जागकर
खेत की रखवाली करता
एक भरोसेमंद दीया।2. तुम्हारा साथ
तुम्हारा नाम
मैं जब भी मन में लेती हूँ,
लगता है
जैसे दूर कहीं
बैलगाड़ी की घंटियाँ बज उठी हों।तुम्हारी याद
भोर की उस हवा जैसी है
जो गेहूँ की बालियों को छूकर
धीरे-धीरे पूरे गाँव में फैल जाती है।तुमसे मिलने के बाद
मन का सूना बरामदा
फिर से बस गया है।अब शामें उदास नहीं होतीं,
वे चरनी से लौटती गायों की तरह
शांत और अपनापन भरी लगती हैं।तुम्हारी बातें
मिट्टी के घड़े के पानी जैसी हैं
सादी, ठंडी
और मन को तृप्त कर देने वाली।जब तुम पास बैठते हो
तो लगता है
जैसे पीपल के पेड़ तले
थका मुसाफ़िर
कुछ देर चैन से सुस्ता रहा हो।मैं जानती हूँ
प्रेम बड़े-बड़े शब्दों में नहीं बसता,
वह तो छिपा रहता है
रोटी सेंकते हाथों में,
साथ बैठकर खाए गए गुड़ में,
और बिना कहे
एक-दूसरे का दुःख समझ लेने में।तुम्हारा साथ
मेरे लिए
गाँव की उस पुरानी मेड़ जैसा है
जो हर बरसात में टूटती तो है,
पर फिर भी
खेतों को बिखरने नहीं देती।3. तुम्हें देखकर
तुम्हें चाहना
मेरे लिए वैसा है
जैसे भोर से पहले
चिड़ियों का धीरे-धीरे बोलना,
जब पूरा गाँव अभी नींद में होता है
और आसमान उजाला होने की राह देख रहा होता है।तुम जब खेतों की मेड़ से होकर आते हो,
कंधे पर गमछा डाले,
तो लगता है
जैसे थका हुआ दिन
अपने हिस्से की शांति लेकर लौट आया हो।तुम्हारी बातें
मिट्टी के चूल्हे पर
धीमी आँच में पकती दाल जैसी हैं साधारण,
पर मन को देर तक तृप्त रखने वाली।तुम्हारा साथ
उस चरवाहे की बाँसुरी जैसा है
जिसकी धुन
दूर तक फैले सुनसान में भी
अपनापन भर देती है।जब तुम हँसते हो
तो लगता है
जैसे अमराई में
अचानक कोयल बोल उठी हो,
और मन की सूनी डाली पर
एक साथ कई मौसम उतर आए हों।मैंने कई बार
तुमसे अपने प्रेम को छिपाना चाहा,
पर यह हर बार
वैसे ही बाहर आ गया
जैसे पनघट से लौटती लड़की के घड़े से
थोड़ा-सा पानी छलक ही जाता है।तुम्हें देखना
मेरे लिए
रात में दूर जलते उस लालटेन जैसा है
जिसे देखकर मुसाफ़िर समझ जाता है
कि कहीं न कहीं
उसके लिए भी एक घर है।तुम्हारे हाथों की मेहनत,
माथे का पसीना,
और छोटी-छोटी बातों में छिपी तुम्हारी चिंता
मन को वैसा भरोसा देती है
जैसे किसान को
पहली बारिश के बाद
भीगी मिट्टी की खुशबू देती है।अगर कभी
जीवन की राह ऊबड़-खाबड़ हो जाए,
तो तुम
मेरे साथ उसी तरह चलना
जैसे दो बैल
अलग-अलग होते हुए भी
एक ही हल को संभाले चलते हैं।क्योंकि तुम्हारे साथ
मैंने जाना है
कि प्रेम
सिर्फ़ बड़े वादों में नहीं होता,
वह तो छिपा रहता है
थाली में बचाकर रखी आख़िरी रोटी में,
थके चेहरे पर आई छोटी मुस्कान में,
और उस प्रतीक्षा में
जो हर साँझ
तुम्हारे घर लौटने तक बनी रहती है।बबिता कुमावत (सहायक प्रोफेसर)
सहायक प्रोफेसर, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नीमकाथाना, सीकर(राजस्थान), साहित्य रत्न पत्रिका में सहसंपादक
प्रोफेसर बबिता की कविताएँ (काव्य संग्रह) प्रकाशित
ई मेल- [email protected]
मोबाईल नंबर -9928291605(सहायक प्रोफेसर)
सहायक प्रोफेसर, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नीमकाथाना, सीकर(राजस्थान), साहित्य रत्न पत्रिका में सहसंपादक
प्रोफेसर बबिता की कविताएँ (काव्य संग्रह) प्रकाशित
ई मेल- [email protected]
मोबाईल नंबर -9928291605

तीनों कविताएँ प्रभावशाली हैं
तीनों कविताओं का प्रेम विशेष बिंबों से सज्जित
बहुत ही सुंदर ढंग से प्रेम को परिभाषित करती हैं।
कोमलगात कविताएँ शांत भाव और प्रभाव से आकर्षित करती हैं।
बहुत बहुत धन्यवाद अनीता जी