Monday, June 29, 2026
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लोकप्रियता के बावजूद गंभीर नहीं हो पाया आधुनिक दकनी गद्य  

  • एफ एम सलीस

भारतीय उपमहाद्वीप की भाषायी और साहित्यिक परंपरा में दकनी साहित्य एक विशिष्ट और ऐतिहासिक स्थान रखता है। यह उर्दू और हिंदी भाषा के आरंभिक स्वरूप का प्रतिनिधित्व तो करता ही है, साथ ही उत्तर और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक, भाषायी तथा आध्यात्मिक परंपराओं के अद्भुत समन्वय का भी सशक्त प्रमाण है। यदि इसके भाषाई भूगोल की बात की जाए तो आधुनिक भाषाई मिश्रण के दौर में भी उत्तर में नर्मदा नदी के दक्षिण का दक्कन पठार से लेकर दक्षिण में मैसूर (वर्तमान कर्नाटक) और उत्तरी तमिलनाडु के कुछ भागों तथा पूर्व में तेलंगाना के हैदराबाद व वरंगल तथा आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम से लेकर पश्चिम में बीजापुर, गुलबर्गा, बीदर से होते हुए पुणे और कोंकण के कुछ क्षेत्रों तक फैले इस भाषाई परिवेश ने आज तक अपनी अलग पहचान बनाए रखी है। आधुनिक संदर्भ में यह क्षेत्र मुख्यतः तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के उत्तरी भागों तक फैला हुआ था।

चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच दक्कन की सल्तनतों जैसे गुलबर्गा, बीजापुर, औरंगाबाद, गोलकुंडा और बाद में हैदराबाद में विकसित दकनी साहित्य ने भारतीय भाषाओं के इतिहास में एक ऐसे युग की रचना की, जहाँ स्थानीय बोलियों के साथ -साथ उर्दू, हिंदी, अरबी और फ़ारसी के शब्दों का स्वाभाविक मेल दिखाई देता है। दकनी गद्य साहित्य का प्रारंभ मुख्यतः सूफी संतों के उपदेशों और आध्यात्मिक विचारों के प्रचार-प्रसार से हुआ। उन्होंने जनसामान्य तक अपना संदेश पहुँचाने के लिए ऐसी भाषा को अपनाया जो सरल, सहज और लोकजीवन के निकट थी। यही कारण है कि दकनी गद्य में धार्मिक और नैतिक विचारों के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं, लोक-जीवन, प्रेम, सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक विविधता का भी सजीव चित्रण मिलता है। ख़्वाजा बंदा नवाज़ गेसूदराज, मुल्ला वजही, मुहम्मद कुली कुतुब शाह, गव्वासी, इब्ने निशाती तथा वली दकनी जैसे साहित्यकारों ने इस परंपरा को समृद्ध बनाते हुए आगे चलकर आधुनिक उर्दू और हिंदी गद्य के विकास की आधारभूमि तैयार की।

शाह मीराँजी शम्सुल उश्शाक लिखते हैं –

यो देखत हिंदी बोल
पन मानी है नप तोल
कड़पन सू रस
फल पाके जूँ फन्नस
जैसे मग़्ज़ मीठा लागे
तो क्यूँ मन उस ते भागे

डॉ. कय्यूम सादिक ने लिखा है कि उर्दू-ए-क़दीम के सबसे बड़े गद्यकार वजही की साहित्यिक कृति सबरस में अमीर खुसरो का दोहा भी मिलता है और शाह अली जीवगाम धनी का दोहरा भी। जो अपनी कृति की भाषा ज़बाने हिंदूस्तान बताता है और जो ब्रज भाषा की कहावतों, गीत और दोहरों को बेतुकान नक़ल करता चला जाता है।  …

मेअराजुल आशिक़ैन को दकनी गद्य की पहली रचनाओं में एक माना जाता है। शुरू में यह रचना गेसुदराज़ ख्वाजा बंदानवाज़ की मानी जाती रही, लेकिन कई शोधकर्ताओं ने इसे मख़्दूम शाह हुसैनी की कृति होने का दावा किया और बाद की पुस्तकों में इसी परंपरा को आगे बढ़ाया गया है। यदि हम दकनी में आधुनिक गद्य की बात करें तो अधिकतर विशेषज्ञ इस बात को स्वीकार ही नहीं करते कि आधुनिक युग में दकनी का गद्य भी लिखा गया है। हालाँकि विभिन्न स्तरों पर इसके प्रयास ज़रूर हुए हैं। विशेष रूप से हास्य व्यंग्य और फिल्म पटकथा, संवाद तथा नाटकों में इसका उपयोग ज़रूर हुआ है।

हास्य व्यंग्य गद्य के कुछ नमूने

तंजो मिजाह(हास्य व्यंग्य) की पत्रिका शुगूफा में अफसर आरमूरी की दकनी हास्य आलेख की श्रृंखला प्रकाशित हुई थी। एक लेख है ‘इलैक्शन पो इलेक्शन’, (पो का उपयोग पर के लिए किया जाता है) उसके कुछ उद्धरण पेश हैं-

सुब्बो सुब्बो टहल को घऱ में घुसने को था कि एक आवज़ अइ, आदाब। पलट को देखा तो वोइच  सूरताँ, पांच बरस पहले नज़र आएसो थीं। ये मौसमी मुखड़े हर पांच बरसाँ में एक बार नज़र आतैं। मैं पूछा क्या फिरको इलैक्शन आरैं। बोले, शाल में लपेट को नक्को मारो। आपके पुराने भोयाँ, खिदमत गुज़ाराँ हाजिर हैं। वोटाँ की भीख मांगने दरवाज़े पो खड़े को हैं। मुराद लेको जाने की आस में झोली फैलाको हैं। मैं मुक्के के नाद खामोश। दरवाज़ा बंद करको अंदर घुस गया। चिल्ला को बोले कल फिरको अइंगे।

एक और उद्धरण राजनीतिज्ञों पर व्यंग्य से जुड़ा है-

क्या अलीफाँ, बेफाँ पढ़को है कि अल्लाह मालूम। लोगाँ बरसा बरस पढ़को सड़खाँ नापते फिररैं। नौकरयाँ को दर-दर के ठोकराँ खारैं। यां तलक कि बाल बच्चे, माँ-बाप, रिश्तेदाराँ, दोस्ताँ कु छोड़को लक़ दक़ सहराओं की रेती फाँकते हुए, कित्ते की तिप्पलां पड़को, मुसीबताँ झेल को, अपने आप कु मारको, अपना पेट काट को, अपने कुंबों कु पालरैं। छोटी मोटी नौकरी करने ले छोड़ो, बड़ी बड़ी तन्ख्वा वाले मुलक से बाहर बीस बीस-साल रह को इत्ता नइं कमारैं, जित्ता कि ये सड़ी सूरताँ एक खेप में हाथ माररैं।

हौलेंडी नक्कोरेगावी जिनेवा मे लेख में अफसर आरमोरी लिखते हैं-

हैदराबाद और सिकंदराबाद के बीच में है सो हुसैन सागर पहले से भौत अच्छा होको है। पनकि अबबी भौत कुछ करना बाक़ी है। खाली थोडे झाड़ाँ लगा लेको, पुतले खड़े कर लेको, हरियाली पेरलेको, बाराह बैंचा डाल लेको तिरगा तिरगी रामागुडगी बोले नाद एक निकलिस रोड बना लेको, एक फव्वारा छोड़को, थोड़ी चमनबंदी कर लेको, भौत बड़ा तीर मारे नाद खुशी से नाचरैं। असल काम सफाई का है। अतराफ के पूरे बस्त्यों के मोरयाँ, बड़े फैक्टरयाँ और कूड़ा करकट के घूड़ां, कचरे के बड़े बड़े रासाँ, ये सब तोप्पे बरसात में तैरते हुए नज़र आतैं।

अफसर आरमोरी का एक और लेख है, दुनिया नीले सोने पो लड़को मरींगी। इस लेख में पानी की स्वच्छता, बचत और पीने के पानी के महत्व को रेखांकित करते हुए वे लिखते हैं-

लोगा आसमानों पो छल्लांगाँ लगारैं, हौर गंदे पानी में खुशी खुशी डुबकियाँ लगारैं। अब भी दुनिया पीरै सो पानी में से आधा जरासीम और कीड़ों से भरको है। 250 मिलियन लोगाँ सालाना ऐसा पानी पीको बीमार होतैं हौर उसमें 5 से मिलियन बेचारे मौत की गोद में सो जातैं। ये डरने वाली बात है कि नैं। आय वो कल हम। उसपो एक चुटकुला याद आयाय। एक जने की पहले रोज मुरग़ी का था सो एक बच्चा मरको गया। दूसरे दिन मुरग़ी मरको गइ। तीसरे दिन थी सो एक बकरी मरको गयी। अब वो आदमी चबूतरे पो सिर को हाथ लगाको अलडा अलडा को रोरै। लोगा बौलीं, क्या ना समझ है, मुरगी बकरी पो इत्ता रौरै।

नाक छींक को, एक गिलास पानी को उनूँ बोल्या, भई मैं मुरगी बकरी पो नइं रोरौं। मैं मौत के फरिश्ते को मेरे घरका पता मालूम हो गया बोलको डरको रोरौं।

लेखक आगे लिखता है.. जरासीम और कीड़ों से भरा पानी पीको मौत के फरिश्ते कू दावत देने वाली बात है कि नईं।

फिल्में और दकनी

फिल्म बाज़ार के गीत और गज़लों को काफी लोकप्रियता मिली थी। विशेषकर तलत अजीज की आवाज़ में मख़्दूम की ग़ज़ल- फिर छिड़ी रात बात फूलों की- रात है या बारात फूलों की.. खास बात यह है कि इस फिल्म में कई किरदार दकनी बोलते देखाई देते हैं। फिल्म बाज़ार में फारूक शेख के रूप में सज्जू का किरदार कहता है-

“चूड़ियाँ ले लो चूडियाँ, रंगबिरंगी चूड़ियां, गोरे गोरे हाथां की सगाई, आशिक के मन कू भाई।”

जब नायिका धानी चूड़ियाँ पूछती है तो नायक कहता है-

“अब धानी चूड़ियाँ काँ से लौं मैं, एइच इत्ती मुश्किल से मिली। हफ्ते भर की कमई गई ना इसमें।”

फिल्म निर्देशक सागर सरहदी इस दकनी लहजे फिल्म में आत्मसात करने के लिए कई दिन तक अपने कलाकारों के साथ हैदराबाद में रहे थे। इत्तेफाक ही समझिए के बाद के दिनों में मेरी मुलाक़ात सागर सरहदी, नसीरुद्दीन शाह और फारुक शेख से हुई थी। फारूक शेख ने बताया था कि उन्होंने हैदराबाद के फराशा होटल में बैठकर दकनी का लहजा सीखा था। उनका फिल्म में एक बहुत ही लंबा संवाद है। वे अपनी प्रेमिका की शादी एक अधेड़ उम्र के धनी व्यक्ति से होते देख कुछ इस तरह बोल पड़ते हैं-

“सरकार, आप पैसेवाले लोग हैं सरकार, आपके पास जरिया है, ताकत है, खुदा का दिया सोबिच है सरकार, एक से एक हसीन लड़की आपकु मिल जाती, शबनम जैसी लड़की आप रोज खरीद सकते सरकार, मैं भौत ग़रीब आदमी हूँ सरकार, मैं भौत ग़रीब हूँ। आप मेरेपो रहम करो, आपके हाथ जोड़तौं, आपके पाँव पड़तौं, शबनम को छोड़ दो सरकार, मेरे पास मेरी खाली शबनमीच है सरकार। मेरी जिंदगी, मेरी कायनात है उनूं, मैं उसकू भौत प्यार करतौं सरकार, मैं उसकू भौत प्यार करतौं, शबनम को मरेसे आप मत छीनो।”

नसीरुद्दीन शाह से जब मैंने हैदराबाद और हैदराबादियों के बारे में एक सवाल किया तो उन्होंने हैदराबादी हास्य का उदाहरण देते हुए एक घटना का उल्लेख किया था।

जिन दिनों फिल्म बाज़ार की शूटिंग हैदराबाद में चल रही थी, फारूक़ शेख और नसीरुद्दीन शाह साइकिल रिक्शे में बैठकर आबिड्स के जीपीओ से चारमीनार की ओर जा रहे थे। उन दिनों पहली बार आबिड्स पर ट्रैफिक सिग्नल लगाया गया था। सिग्नल लाल देखकर साइकिल रिक्शावाला रुक गया। पीछे एक कार आकर रुकी जिसका ड्राइवर बार-बार हार्न बजा रहा था। कुछ देर तो उसने हार्न की आवाज़ सुनी और फिर तंग आकर पलटकर कहा- भौत बजाए तो हरी हो जाती क्या?

एक गीत काफी महशूर हुआ था। हम काले हैं तो क्या हवा, दिल वाले हैं…. 1965 की बॉलीवुड फिल्म ‘गुमनाम’ का यह गीत मुहम्मद रफी ने गाया था और मशहूर अभिनेता महमूद (महमूद अली) और हेलेन पर फिल्माया गया था। इसी से प्रेरित होकर 1982 में फिल्म देश प्रेमी में किशोर कुमार द्वारा गाया गया और अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी पर फिल्माया गया गाना “खातून की खिदमत में सलाम अपुन का…” शामिल किया गया।

महमूद के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने हैदराबादी शैली को हास्यपूर्ण तरीके से चित्रित किया है। उन्होंने इसके लिए कई बार हैदराबाद का दौरा किया और इसे सीखने का प्रयास भी किया, लेकिन उनके लहजे पर हैदराबाद से अधिक हैदराबाद कर्नाटक की शैली का प्रभाव रहा।

दकनी भाषा को आधार बनाकर हिंदी की कलात्मक फिल्मों को नया आयाम दने में श्याम बेनेगल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। श्याम बेनेगल का संबंध हैदराबाद से था। उन्होंने बचपन इस भाषा का उपयोग किया था। जब उन्होंने फिल्मों का निर्माण किया तो एक दो नहीं लगभग कई फिल्में दकनी परिवेश में बनायीं, जिसमें अंकूर, निशांत, मंडी, सुसमन और वेल डन अब्बा शामिल हैं। हरी भरी और कोंदुरा में भी कुछ किरदार दकनी बोलते हुए दिखाई देते हैं।

1974 में श्याम बेनेगल की फिल्म अंकूर ज़मींदार की बीवी, पुलिस पटेल और फिर नौकरानी लक्ष्म के रूप में शबाना आज़मी का किरदार दकनी बोलते हुए दिखाई देते हैं। नौकरानी लक्ष्मी के किरदार के कुछ संवाद इस तरह से हैं-

जब ज़मीनदार पूछता है कि.. तेरा मरद क्यों आया है?

“वो सरकार मैं लेको अइ, सरकार से काम मंगलेव बोलके। पाप बेचारा बेकार है सरकार। पैले कुम्हार का काम करता था। भौत अच्छे बरतना बनाता था। पन अब गांव में मट्ठी के बरतना कौनबी नइं ले रईं। यूनियन की हुकूमत आइ जब से सब लोगां एलमुनियम के बरतना ले रैं। कुम्हार तो भुक्के मररैं सरकार। … क्या बोलूं सरकार उसकू सुनने कु बोलने कु नइं आता। मुक्का है पाप बिचारा। … बंडी चलाइंगा सरकार, ज़रूर चलाइंगा।

फिल्म के आखरी संवाद हैं.. इसको … क्यों मारा माठीमिले, इने मूँ नई सो पाप काम मांगने आया था। तेरे दिल में काला था, इस वास्ते करा ना तू। तेरी दाल मिट्टी में मिले। तू बड़ा आदमी अपने घर का हुइंगा समझे। हम तेरे खरीदे गुलाम नइं हैं। हमकू तेरा काम नइं होना, तेरा पैसा नइं होना, तेरा कुछ नइं होना। सोब अपने मुर्दे के साथ लेजा तू। मेरे मरद कु मारा, तेरेकु परमात्मा की मार पड़िंगी, तू कब्बी नइं पनपींगा, तूने ग़रीबों की हाय लिये ना,.तू कब्बी नइं पनपेगा।

श्याम बेनेगल की फिल्म निशांत 1975 में रिलीज़ हुई थी। इसके लगभग सभी किरदार हल्की फुल्की उर्दू और दकनी में संवाद बोलते नज़र आते हैं। पत्नी के अपहरण की घटना के बाद मास्टर (गिरीश कर्नाड)  पुलिस पटेल (कुलभूषण खर्बंदा) से शिकायत करने पहुँचता है। वह चाहता है कि रात में ही शिकायत दर्ज हो, तब पुलिस पटेल कहता है-

“माटसाब, ज़िंदगी में भौत सारे कामा साथ-साथ करना पड़तैं जी। .. माटसाब मैं पान नइं खाया तो उनी वापिस आ जाती क्या। नै ना, तो फिर इत्ती जल्दी कैकू। ज़रा आराम से बैठको पूरी बात बताव ना, मक़सद, जो हो गया सो गया। सिरे सिर मारे तो क्या हुइंगा। कुछ हुंगा क्या। नै ना। खाना पीना छोड़ दिये, तो उने आ जाती क्या। नै ना। उल्टा तुमीच बीमार पड़तैं। अब तुम बीमार पड़तैं तो उने आजाती क्या। नै ना। मस्साब ज़रा अक़ल से काम लो जी। इत्ती रात को कुछ हुंगा क्या। नै ना। मास्साब शिकायत आजीज दर्ज करे तो उने वापिस आ जाती क्या, नै ना। फिर इत्ती जल्दी कैकू, उने मरतो नइं गइ ना। अब उनी वापिस आती तो उसकू घर में रख लेतैं क्या।”

फिल्म मंडी दकनी में गंभीर संवाद का एक उत्तम उदाहरण है। मंडी श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित 1983 की एक लोकप्रिय फिल्म है फिल्म है। लेखक गुलाम अब्बास की क्लासिक उर्दू लघु कहानी आनंदी पर आधारित है। इसे आश्चर्य ही कहा जाएगा सत्यदेव दुबे, शमा जैदी और श्याम बेनेगल आधुनिक उर्दू की कहानी को पूरी तरह से दकनी में बदल दिया था। एक वेश्यालय की ज़मीन को हथियाने की राजनेताओं की चालों को दर्शाती इस फिल्मे में शबाना आज़मी , स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह, नीना गुप्ता, ओम पुरी, सईद जाफरी, अन्नू कपूर, सतीश कौशिक, पंकज कपूर, अमरीश पुरी, इला अरुण और केके रैना, कुलभूषण खरबंदा, अनीता कंवर, रत्ना पाठक शाह और सोनी राजदान जैसे कई कलाकार दकनी बोलते नज़र आते हैं। इस फिल्म ने नितीश रॉय के लिए सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए 1984 का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता था। इस फिल्म को 1984 में फिल्मोस्ताव, बॉम्बे में भारतीय पैनोरमा में चुना गया था, और लॉस एंजिल्स प्रदर्शनी, हांगकांग अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव और लंदन फिल्म महोत्सव  में आमंत्रित किया गया था। मंडी ने 12 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते थे। स्मिता पाटिल और कुछ पुरुष किरदारों को छोड़ दें तो मंडी के लगभग सभी महिला किरदार दकनी बोलते नज़र आते हैं।

वेल डन अब्बा श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित 2010 की भारतीय राजनीतिक व्यंग्य वाली हिंदी फिल्म है, जिसमें बोमन ईरानी, मिनिषा लांबा और समीर दत्तानी ने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं। यह 2007 की मराठी फिल्म, जौ तिथे खाउ की रीमेक है।यह तीन लघु कहानियों पर आधारित थी: जिलानी बानो की नरसइयां की बावड़ी, संजीव की फुलवा का पुल और जयंत कृपलानी की स्टिल वाटर्स। पटकथा जयंत कृपलानी और अशोक मिश्रा द्वारा लिखी गई थी, जिन्होंने संवाद भी लिखे थे। इसने सामाजिक मुद्दों पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का 2009 का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता।

अरमान अली के रूप में बोम्मन इरानी के कुछ संवाद यहाँ पेश हैं-

“साब मैं..बहाने नइं साब, एक टाइम क्या हुआ बोले तो मैं बावडी में गिर गया साब.. ए बावड़ी डेढ़ हुशारों की हुशारी और घुमाने वालों का अड्डा था साब, बाताँ की मशीनगन घन घुमा को मेरा दिल दिमाग और गुर्दे चिंद्या बना दिये साब। वे टेररिस्टाँ के बाप थे साब। थोड़ा वक़त दिंगे तो समझ में अइंगा ना साब।”

रिक्शा चलाते हुए… “उत्ता पढ़ा लिखा होता तो आप कू बिठा लेको घदे के वैसा खींच को कैकू लेके जाता मैं। अच्छा तशरीफ की तश्तरी काँसे आरी साब ये।”

जब रिक्शावाला कुछ पैसे बढ़ के लेने पर सवारी पूछीती है कि .. “अल्लाह को क्या मूँ दिखाइंगे   तो रिक्शाचालक कहता है-  अल्लाह से पैले मेरी जोरू बच्चों को जवाब देना पड़ता साब।”

हैदराबादी फिल्मों की शुरुआत 1998 में नागेश कुकनूर की फिल्म ‘हैदराबाद ब्लूज़’ से हुई थी। 2005 में कुंटा निखिल ने हास्य विषय पर एक फिल्म ‘द इंग्लिश’ बनाई। यह फिल्म बड़ी सफल रही। इस फिल्म से तीन किरदार सलीम फेकू (मस्त अली), जहांगीर (अजीज नासिर), इस्माइल भाई (डी सी श्रीवास्तव) रातों-रात लोगों की पसंद गए। फिर हैदराबाद में फिल्म निर्माण का एक सिलसिला सा चल निकला, लेकिन सोशल मीडिया ने उसे दम तोड़ने पर मजबूर कर दिया। वह छोटे-छोटे शॉट और रील में परिवर्तित हो कर रह गया। इनमें हास्य के रूप में संवादों की भाषा में दकनी का उपयोग किया गया। फिल्में अधिक सफल न होने के कारणों में एक यह भी रहा कि हैदराबादी फिल्म निर्माताओं ने कभी भी अपनी फिल्म के लिए एक अनुभवी पटकथा लेखक, संवाद लेखक, संपादक या गीतकार की सेवाएँ प्राप्त नहीं कीं। अदनान साजिद (गुल्लू दादा), के.बी. जानी (खैरुद्दीन बेग जानी) जैसे कुछ कलाकार ज़रूर लोकप्रिय हुए, लेकिन उनका दायरा भी सीमित रहा। इस तरह बात केवल हास्य और मनोरंजन तक सीमित रही।

एक आलोचक ने इसके बारे में लिखा था कि हास्य के एक ही अंदाज से लोग ऊब चुके हैं। एक समय था, जब बब्बन खान का ‘अदरक के पंजे’ और हामिद कमाल और सुबहानी का ‘डेढ़ मुतवाले’ हैदराबादियों को हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देते थे। अगर आप बिना कोई नवीनता लाए अपनी कला को 40 साल बाद भी दोहराते रहेंगे तो नई पीढ़ी इसे स्वीकार नहीं करेगी।

सोशल मीडिया पर वायरल दकनी ड्रामों की भाषा

तफ्फू वी लॉग्स पर आपा किराक हो गये शीर्षक से एक रील काफी वायरल हुई। बहन भाई से मिलने आती है और भावज और भाई के साथ उसका संवाद का उद्देश्य यूं तो हास्य है, लेकिन,  भाभी जब कहती है कि उसकी तबियत कुछ नहीं है तो-ननद बोल पड़ती है- “तुम बरस के बारा महीने ऐसीच रहते, शादी के दिन भी यइच रोना था और आज भी यइच है। अल्ला मेरे भई कू सबर देव, जो उनी कमारा ना, वो पूरी कमई उसकी दवइय्यों में दवाखानों में जारी। ऊं- दवाखाना, ईं- दवाखाना है, तुमारेकु तो खाली।”

प्रो. नसीमुद्दीन फरीस उर्दू और दकनी में शोध के क्षेत्र में प्रमुख विद्वानों में से एक हैं। आधुनिक दकनी पर उनका मानना है कि समय गुज़रने का साथ-साथ भाषा के मानक बदलते रहते हैं। उर्दू के विकास के बाद दकनी का दौर समाप्त हो गया। वे दकनी साहित्य का काल अधिकतम अठारहवीं सदी तक मानते हैं। उनका मानना है कि दकनी का एक सीमित क्षेत्र रहा है, उसमें लिखे गये साहित्य को दकन से बाहर दिल्ली, लखनऊ या बिहार के रहने वालों में समझा जाना मुश्किल है। आधुनिक दकनी में शायरी तो की गयी, लेकिन वह हास्य-व्यंग्य तक समीति रही। मनोरंजन के उद्देश्य से इसका उपयोग ज़रूर हुआ, लेकिन वह भी सीमित दायरे में। उनके विषय पति-पत्नी, घरेलु औरतों की बातें या फिर अधिकतर राजनीतिक लीडरों तक सिमटे रहे। विशेष यह कि इसमें मानसिक और वैचारिक स्तर पर गंभीर विषयों को नहीं लिखा गया। वे कहते हैं कि जिस तरह प्रेमचंद की कहानियों और मीर अम्मन की बाग़ो बहार में किरदारों के परिवेश के अनुसार उनके संवादों में स्थानीय भाषा का उपयोग हुआ है, दकनी का उपयोग भी उसी तरह संवादों के रूप में हुआ है।

किसी भी भाषा के लिए सत्ता में जो लोग हैं, उनका समर्थन ज़रूरी है। दकनी में न केवल शायरी की जा रही थी, बल्कि गद्य भी लिखा जा रहा था। पहले दौर का सिलसिला वली दकनी तक शानदार रहा। वली दकनी के दिल्ली जाकर आने के बाद दकनी में लोकल फ्लेवर की खुसुसियात कम होने लगीं। उत्तर भारतीय शब्दों का चलन बढ़ गया था। दकनी में भाषा में परिवर्तन आने लगे थे। दकनी में दकनियत कम होने लगी थी।

जब हिंदुस्तान की सत्ता का मुख्यालय औरंगाबाद स्थानांतरित हुआ तो जो बीजापुर, गुलबर्गा, हैदराबाद, अहमदनगर जैसे शहर जो पूर्व में सत्ता के केंद्र थे, जहाँ दकनी साहित्य का समर्थन हो रहा था, उसको कुछ विराम सा लग गया। लिखने पढ़ने वाले कम हो गये। वो जागीरदार जो दकनी साहित्यकारों का उत्साह बढ़ाते थे, उनका प्रभाव भी कम हो गया था। सन 1700 के बाद औरंगाबाद में उत्तर भारतीय प्रभाव बढ़ गया। इससे दो बातें हुई, दकनी गद्य लगभग कम हो गया, हालाँकि शायरी में यदा कदा लेखन का दौर जारी रहा,लेकिन औरंगाबाद के मुख्यालय बनने के कारण दिल्ली का मुहावरा चल पड़ा और दकनी भाषा में साहित्य रचना कर्म कम होता गया।

किसी भी भाषा के विकास में सत्तारुढ़ वर्ग की बड़ी भूमिका होती है। हैदराबाद, औरंगाबाद और आस पास के क्षेत्रों में दकनी के स्थान पर अब दिल्ली और उत्तर की भाषा में साहित्य रचा जाने लगा। इस तरह एक-दो वर्ष नहीं, बल्कि लगभग 200 वर्ष दकनी साहित्य का सिलसिला टूटा रहा।

सूफी परंपरा की बड़ी भूमिका दकनी साहित्य में रही। वो जब यहाँ आये तो स्थानीय लोगों से जुड़ने के लिए उन्होंने स्थानीय लोगों को समझ आने वाली भाषा का प्रयोग किया। इससे दकनी के प्रारंभ और विकास में उनके योगदान का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

दकनी के आधुनिक फ्लेवर का प्रारंभ  हैदराबाद में उस्मानिया विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद होता है। कुछ लोगों ने दकनी में लेखन का विचार किया और प्रोत्साहित करना शुरू किया। रहीम साहब मियाँ ने आवाज़ और शेर दोनों मिलाकर नये प्रयोग किया, जिसे उर्दू में सौती शायरी भी कहते हैं। शब्द और ध्वनि के मिश्रण से वो अपनी अभिव्यक्ति को सुंदर बनाया था। हालांकि उनपर लोगों ने अधिक ध्यान नहीं दिया। उसके बाद नज़ीर दहकानी दकनी के शायर ही नहीं, बल्कि वे दकनी के वकील कहे जा सकते हैं। उनका मानना था कि दकनी घरों में तो हैं, लेकिन लेखन में नहीं हैं। यह खास बात दकन के साथ बनी रही, बल्कि साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र में उर्दू हिंदी का प्रभाव बढ़ने के बावजूद घरों से दकनी को बाहर नहीं निकाला जा सका। आज भी घर की महिलाएं और महिलाओं का साथ संवाद में पुरुष बी दकनी बोलते हैं। सत्तारुढ़ और प्रभावी समाज में उर्दू स्थापित होने के बावजूद बाज़ारों और गली कूचों में दकनी के बोलचाल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। घरों में उसकी सुरक्षा की गयी। आज भी हम घरों में इसी भाषा का प्रयोग करते हैं। नज़ीर दहकानी ने दकनी में लेखन का आंदोलन चलाया गया।

क्रिया और सहायक क्रियाओं तथा संबोधनों के साथ साथ बहुवचनों में दकनी शब्दों का उपयोग ही किया जाता है।

डॉ. मुस्तफा कमाल का दावा है कि जदीद दकनी (आधुनिक दकनी) का नाम उन्होंने ही दिया। वे कहते हैं कि जब उस्मानिया विश्वविद्यालय की पत्रिका मुजल्ला का दकनी विशेशांक प्रकाशित किया गया तो उसमें तत्कालीन दकनी लेखन को जदीद दकनी का नाम दिया गया।

फजलुर्रहमान के ड्रामों में, मख़्दूम, मीर हसन ने बज़्मे तमसील स्थापित की थी। इनके लिखे ड्रामों में संवादों में दकनी का प्रभाव अधिक था।

प्रोफ़ेसर शाह मैरी ने अपनी बात इन शब्दों के साथ समाप्त की, “सुनामी आ रही है, भूकंप आ रहे हैं, इतिहास हमारे हाथ से निकलता जा रहा है। यदि हम दक्कन की राजधानी में दकनी की रक्षा नहीं करेंगे तो कोई भी इसकी रक्षा नहीं करेगा। याद रखना! जिस प्रकार हमारी पलकें हमारी आँखों की रक्षा करती हैं, उसी प्रकार हमें अपने दक्कनी साहित्य की रक्षा करनी होगी।

मैं अपनी बात एक प्रश्न से समाप्त करता हूँ। आज जब देशी भाषाओं के साथ-साथ कुछ लोगों को उर्दू-हिंदी के अस्तित्व का प्रश्न भी सताने लगा है, तो इस भाषा की वकालत करने वाले कहते हैं की क्या आपको अपनी भाषा में बातचीत करने पर गर्व का अनुभव होता है। फिर भारतेंदु की पंक्तियाँ भी बहुत दोहरायी जाती है कि –निज भाषा हित आहे….

यही सवाल दकनी से भी किया जा सकता है और यही प्रश्न दकनी के विख्यात साहित्यकार मुल्लावजही के सामने भी था। उसने कहा था-

दक्खन सा नईं ठार संसार में
पंज फाजिलाँ का है उस ठार में
दखन है नगीना अंगूठी है जग
अंगूठी कूँ हुरमत नगीना है लग
दखन मुलुक कूँ धन अजब साज है
कि सब मुलुक सिर और दखन ताज है

  • एफ एम सलीम
    ब्यूरो चीफ, डेली हिंदी मिलाप, हैदराबाद
    [email protected], (9848996343)
    मूल रूप से पत्रकार, कहानी, कविता, ललित निबंध एवं आलोचना सहित विभिन्न विधाओं में लेखन, 13 पुस्तकें प्रकाशित।

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