डॉ. महेश सांख्यधर का नाटक-संग्रह ‘घटती ज़िन्दगी का अहसास’ की समीक्षा – डॉ. सुषमा देवी
मानव वानरी प्रवृति से आज तक अछूता नहीं हो पाया है। अनुकरण के माध्यम से जीवन में ज्ञान का संचय करते-करते कब वह स्वयं एक कुशल अभिनेता बन जाता है, इस बात का स्वयं उसे ही एहसास नहीं हो पाता है। ऐसा माना जाता हैं कि जो जितना ही कुशल अभिनय करने में सक्षम होता है, वह उतना ही आनंदमय व् सफल जीवन का भोक्ता होता है। नाटक साहित्य की एक प्रमुख और प्रभावशाली विधा है, जिसमें जीवन की घटनाओं, भावनाओं, संघर्षों तथा सामाजिक यथार्थ का मंचीय प्रस्तुतीकरण किया जाता है। ‘नाटक’ शब्द संस्कृत धातु ‘नट्’ से बना है, जिसका अर्थ है अभिनय करना। नाटक में कथानक, पात्र, संवाद, अभिनय, मंच-सज्जा तथा संगीत आदि तत्वों का समन्वय होता है। यह दृश्य और श्रव्य दोनों माध्यमों से दर्शकों तक अपनी बात पहुँचाता है, इसलिए इसे दृश्यकाव्य भी कहा जाता है।
नाटक केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम भी है। नाटक समाज की समस्याओं, मानवीय मूल्यों, सांस्कृतिक परंपराओं तथा ऐतिहासिक घटनाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। इसके माध्यम से दर्शकों में संवेदनशीलता, नैतिक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है। प्राचीन काल से ही पौराणिक आख्यानों को आधार बनाकर नाट्य प्रस्तुति होती रही है। इसके द्वारा भाषा और अभिव्यक्ति कौशल का सम्यक विकास भी होता है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नाट्य गतिविधियाँ विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, आत्मविश्वास तथा रचनात्मकता का परिमार्जन करती हैं। नाटक समाज, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए मानव जीवन को समृद्ध बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनता है।
डॉ. महेश सांख्यधर का नाटक-संग्रह ‘घटती ज़िन्दगी का अहसास’ समकालीन भारतीय समाज, राजनीति, संस्कृति, शिक्षा, धर्म और सामाजिक न्याय के विविधमुखी प्रश्नों को केंद्र में रखकर लिखी गई उल्लेखनीय कृति है। यह संग्रह कुल उन्नीस नाटकों से सजा हुआ समाज के लगभग सभी विषयों की पड़ताल करता है। ‘गुरु-दक्षिणा’, ‘यक्ष के प्रश्न’, ‘संभवामि युगे-युगे’ जैसे नाटक में नाटककार ने पौराणिक विषयों को लेकर समसामयिक विसंगतियों को प्रभावी प्रस्तुति दी है।
‘घटती ज़िंदगी का एहसास’ नाटक में पीढ़ियों के अंतराल को विवेक नामक पात्र के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए लेखक ने निर्द्वंद्व संवाद रचना की है। नायक रामप्रसाद अपने ख़याली दुनिया में जीते-जीते कब तेरह बच्चो की सेना खड़ी कर देते हैं, इसका एहसास उन्हें बहुत देर से होता है। विवेक और हरिऊँ अपने पिता की गलतियों को जहाँ खोलते हैं, लेखक मानो तटस्थ होकर सब पाठकों के समक्ष रख देना चाहते हैं। यह नाटक केवल एक परिवार की त्रासदी ही नहीं, अपितु उस व्यापक सामाजिक मानसिकता पर भी कुठाराघात करता है, जो संतानोत्पत्ति को सहज अधिकार मान कर उनके पालन-पोषण, शिक्षा और भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से नहीं लेती हैं। नाटक समाज के उस वर्ग के प्रति सीधा प्रश्न है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ी संख्या में बच्चों को जन्म देता है। इसमें आर्थिक यथार्थ और सामाजिक उत्तरदायित्व दोनों के प्रति सजगता निहित हैं। संतान का जन्म केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक दायित्व भी है। हरिऊँ का कथन परिवार की दरिद्रता और अव्यवस्था के मूल कारण की ओर तीक्ष्ण प्रहार करता है, तथा पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है|
‘हरिऊँ- मतलब यह कि जब पाल-पोस नहीं सकते तो इतने पैदा क्यों करते हो?’ (पृष्ठ- 38)
लेखक ने बेटियों की पीड़ा, उपेक्षा और सामाजिक असमानता के गहरे स्वर को व्यक्त किया है। नाटक में लड़कियाँ परिवार की समस्त समस्याओं के लिए स्वयं को दोषी मानने के लिए विवश हैं। नाटक में पितृसत्तात्मक मानसिकता पर कटु कटाक्ष किया गया है, जिसमें पुत्रियों के जन्म को प्रायः बोझ समझा जाता है। नाटक की स्त्री पात्र अपनी इसी हताशा और आत्मग्लानि को व्यक्त करती है। नाटककार यहाँ बेटियों की स्थिति को अत्यंत संवेदनशील ढंग से चित्रित करते हैं, और समाज के सामने यह प्रश्न रखते हैं कि क्या किसी बच्चे का जन्म स्वयं उसका अपराध हो सकता है? यह संवाद दर्शकों के मन में करुणा उत्पन्न करने के साथ ही सामाजिक चेतना को भी झकझोरता है।
‘लता-ममता-(एक साथ) पाप के भागीदार न पापा हैं, न मम्मी! इसकी भागीदार तो हम लड़कियाँ हैं, जो पैदा होते ही मर न गयीं । ‘(पृष्ठ- 38)
नाटक में रामप्रसाद की मानसिकता पारंपरिक ग्रामीण सोच का प्रतिनिधित्व करती है। भारतीय समाज में लंबे समय तक यह धारणा प्रचलित रही कि अधिक संतान का अर्थ अधिक श्रमशक्ति और अधिक आर्थिक समृद्धि है। परिवार की दुरावस्था को देखते हुए नायक की आत्मस्वीकृति उसके चरित्र को गहराई प्रदान करती है और उसे केवल दोषी नहीं, बल्कि परिस्थितियों और सामाजिक मान्यताओं का शिकार व्यक्ति भी सिद्ध करती है।
‘रामप्रसाद- गलती मेरी यह थी कि मैं समझता था कि जितने ही लोग अधिक होंगे उतना ही परिश्रम अधिक होगा और उतनी ही जमीन अधिक होगी|’ (पृष्ठ- 39)
नाटक का करुण चरम बिंदु जहाँ एक पिता की आत्मग्लानि, असहायता और विफलता की अनुभूति अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त हुई है। वह समझ चुका है कि संसाधनों की कमी ने उसके बच्चों का बचपन, शिक्षा और सुख छीन लिया है। यह केवल व्यक्तिगत पश्चाताप नहीं, बल्कि उन लाखों अभिभावकों की मानसिक पीड़ा का प्रतिनिधित्व करता है जो आर्थिक अभावों के कारण अपने बच्चों को बेहतर जीवन नहीं दे पाते। नायक की विवशता दर्शकों के हृदय को उद्वेलित कर देती है।
‘रामप्रसाद-….बच्चो को मैंने घुटन, कलह, मुसीबतों के सिवा दिया ही क्या है? दे भी क्या सकता था?’ (पृष्ठ- 39)
‘गुरु दक्षिणा’ नाटक में एकलव्य-द्रोणाचार्य प्रसंग की पारंपरिक व्याख्या को चुनौती देते हुए नाटककार ने उसे नए वैचारिक परिप्रेक्ष्य में स्थापित किया है । इन संवादों में न केवल पात्रों की मनःस्थिति व्यक्त होती है, बल्कि सामाजिक न्याय, सत्ता-संरचना, इतिहास-लेखन और सत्य की स्वीकृति जैसे गहरे प्रश्न भी उठाए गए हैं। यह नाटक का वैचारिक केंद्र है, जहाँ द्रोणाचार्य केवल एक गुरु नहीं रह जाते, बल्कि उस व्यक्ति के रूप में उभरते हैं, जो सत्ता और सत्य के संबंध को समझता है। राजपरिवार के शिष्यों का उल्लेख यह संकेत देता है कि इतिहास और समाज में सत्ता-संपन्न वर्ग का कथन अधिक विश्वसनीय माना जाता है, जबकि वंचित और हाशिए के समुदायों की आवाज़ को प्रायः संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। नाटक में वृक्षों और पशु-पक्षियों का प्रतीकात्मक प्रयोग अत्यंत प्रभावशाली है। नाटक में प्रकृति स्वयं साक्षी है, किंतु उसकी गवाही भी सामाजिक पूर्वाग्रहों के कारण स्वीकार नहीं की जाएगी। यह कथन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि इतिहास अक्सर विजेताओं और शक्तिशाली वर्गों द्वारा लिखा जाता है। वे स्वीकार करते हैं कि सामाजिक संरचना में सत्य की प्रतिष्ठा केवल उसके तथ्यात्मक होने से नहीं होती, बल्कि उसे स्वीकार करने वाली शक्तियों पर निर्भर करती है।
‘तुम नहीं जानते वत्स! कुछ सत्य ऐसे होते हैं, जिन्हें दुनिया अपने आँखों से देखने पर भी असत्य मानती है| ये शिष्य राजपरिवार के हैं, इनके कथन को कौन सच मान लेगा? ये वृक्ष, ये पशु-पक्षी यदि कहेंगे भी तो माना जाएगा कि चाटुकारी अथवा भयवश कह रहे हैं और कालांतर में जब मैं, तुम, ये सब नहीं रहेंगे तब?’ (पृष्ठ: 52-53)
एकलव्य के व्यक्तित्व की उदात्तता को नाटक का यह संवाद प्रकट करता है-
‘एकलव्य-आचार्य! (रोता है) यह अँगूठा मैंने दिया है। स्वेच्छा से दिया है। अपने वचन और अपने मन की शांति से दिया है। इसे स्वीकार कीजिए। गुरूजी! इसे स्वीकार कीजिए।(पृष्ठ: 53)
यहाँ वह पीड़ित अवश्य है, किंतु पराजित नहीं। उसके भीतर गुरु के प्रति श्रद्धा और अपने वचन के प्रति निष्ठा दोनों विद्यमान हैं। विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि एकलव्य बार-बार “स्वेच्छा से दिया है” कहता है। यह कथन नाटककार की मौलिक व्याख्या का हिस्सा है। पारंपरिक कथा में जहाँ एकलव्य को अन्याय का शिकार माना जाता है, वहीं यहाँ वह अपने निर्णय का स्वामी बनकर सामने आता है। वह परिस्थितियों का दास नहीं, बल्कि नैतिक निर्णय लेने वाला चेतन व्यक्तित्व है। संवाद में बार-बार “इसे स्वीकार कीजिए” का आग्रह उसकी मानसिक व्यथा को भी व्यक्त करता है। वह चाहता है कि उसका बलिदान केवल शारीरिक अंग-त्याग बन कर न रह जाए, बल्कि गुरु-शिष्य संबंध की गरिमा का प्रतीक बन सके। इस प्रकार एकलव्य का चरित्र करुणा और गरिमा दोनों का संगम बन जाता है।
महेश सांख्यधर ने यहाँ द्रोणाचार्य के चरित्र को एक नई दृष्टि के साथ प्रस्तुत किया है। वे अँगूठा स्वीकार कर लेते हैं, किंतु अर्जुन की श्रेष्ठता को स्वीकार नहीं करते। यह स्वीकारोक्ति द्रोणाचार्य के भीतर चल रहे नैतिक संघर्ष को उद्घाटित करती है। एकलव्य का कटा हुआ अँगूठा अन्याय, प्रतिभा-दमन और सामाजिक असमानता का स्थायी प्रमाण बन जाता है। यह केवल एक व्यक्ति के बलिदान का चिह्न नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का दस्तावेज़ है, जिसने योग्यता से अधिक सामाजिक स्थिति को महत्व दिया है। यहाँ नाटककार इतिहास की प्रचलित धारणाओं को उलट देते हैं। यदि स्वयं द्रोणाचार्य यह स्वीकार करते हैं कि अर्जुन एकलव्य से श्रेष्ठ नहीं था, तो परंपरागत “अर्जुन-सर्वश्रेष्ठ” की अवधारणा प्रश्नांकित हो जाती है। इस प्रकार संवाद मिथकीय कथा को समकालीन सामाजिक विमर्श से जोड़ देता है। नाटककार ने उपदेशात्मक शैली से बचते हुए पात्रों के माध्यम से अपने विचार व्यक्त किए हैं। भावुकता और वैचारिकता का संतुलन इन संवादों की सबसे बड़ी विशेषता है। विशेषतः द्रोणाचार्य के संवादों में आत्मस्वीकृति, अपराधबोध और ऐतिहासिक चेतना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है, जो ‘गुरु दक्षिणा’ नाटक की वैचारिक शक्ति और रचनात्मक मौलिकता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनके माध्यम से महेश सांख्यधर ने एकलव्य-द्रोणाचार्य प्रसंग को सामाजिक न्याय, इतिहास की राजनीति और ज्ञान पर एकाधिकार के प्रश्नों से जोड़कर नए अर्थ प्रदान किए हैं। द्रोणाचार्य का यह आत्मस्वीकार कि “अर्जुन तुमसे श्रेष्ठ है, यह मैं स्वीकार नहीं कर सकता” भारतीय मिथकीय परंपरा के पुनर्पाठ का अत्यंत साहसिक और विचारोत्तेजक संवाद है। वे पाठक को केवल अतीत की कथा नहीं सुनाते, बल्कि उसे वर्तमान समाज में सत्य, न्याय, अवसर और समानता के प्रश्नों पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
‘वत्स! मैं अँगूठा स्वीकार करता हूँ, किंतु यह स्वीकार नहीं कर सकता कि अर्जुन तुमसे श्रेष्ठ है। यह प्रमाण सदैव अमिट रहेगा।’ (पृष्ठ: 53)
‘बहू’ भारतीय समाज में व्याप्त दहेज-प्रथा की अमानवीयता, पारिवारिक लालच और स्त्री-विरोधी मानसिकता को उजागर करने वाला एक हृदयविदारक सामाजिक नाटक है। यह नाटक केवल दहेज-हत्या की एक घटना का चित्रण नहीं करता, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता की पड़ताल भी करता है, जिसके कारण एक शिक्षित और सभ्य दिखने वाला परिवार अमानवीयता की सारी सीमाएँ तोड़ देता है। नाटककार ने यथार्थवादी घटनाओं, मार्मिक संवादों और आदर्शवादी निष्कर्ष के माध्यम से समाज को एक स्पष्ट नैतिक संदेश देने का प्रयास किया है।
‘बहू’ नाटक रेवती नामक पात्र की त्रासदीपूर्ण जीवन पर आधारित है। वह पर्याप्त दहेज लेकर ससुराल आती है, किंतु जयनारायण और उसके परिवार की लोभी वृत्तियाँ असीम होती हैं। उसकी सास बिटोला, ननद गीता और पति कृपाल लगातार अधिक दहेज लाने की माँग करते हैं। जब उनकी इच्छाएँ पूरी नहीं होती हैं, तो वे रेवती को जला देते हैं। इस प्रकार नाटक दहेज-प्रथा के उस विकृत स्वरूप को सामने लाता है, जिसमें विवाह प्रेम, विश्वास और सामाजिक संबंध का माध्यम न होकर आर्थिक लेन-देन का व्यापार बन जाता है। वर्तमान समाज में आए दिन घटने वाली ऐसी घटनाएँ नाटक को अधिक प्रासंगिक बना देती हैं।
रेवती की हत्या केवल एक स्त्री की हत्या नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदना, पारिवारिक नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की भी हत्या है। नाटककार यह दिखाते हैं कि लालच मनुष्य को किस हद तक गिरा सकता है। नाटक का सबसे प्रभावशाली पक्ष जयनारायण के चरित्र में दिखाई देता है। प्रारंभ में वह दहेज-लोलुप मानसिकता का प्रतिनिधि है, किंतु रेवती की मृत्यु के बाद उसका अंतःकरण उसे चैन से जीने नहीं देता। जयनारायण का अपराधबोध अत्यंत स्वाभाविक और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुआ है। रेवती का “भयानक चेहरा” उसके मन में एक स्थायी स्मृति बन गया है। यह दृश्यात्मक बिंब उसके मानसिक दंड का प्रतीक है। यहाँ नाटककार इस बात की ओर इंगित करते हैं कि कानून से बच जाना संभव हो सकता है, किंतु अपने अंतःकरण की अदालत से बचना कठिन है।
‘जयनारायण- मुझे उसका भयानक चेहरा हर समय घूरता लगता है। मैंने सबसे बड़ा पाप किया है। रेवती शायद बच जाती। पुलिस के डर से हम उसे अस्पताल नहीं ले गए। उसे चिता पर भी जीवित रख दिया गया था।’ (पृष्ठ:65)
नाटक की करुणा और यथार्थबोध इसको चरम पर पहुँचा देता है। “रेवती शायद बच जाती”, यह वाक्य जयनारायण की आत्मस्वीकृति है। वह केवल हत्या का दोषी नहीं, बल्कि उपचार न कराने और मानवीय कर्तव्य की उपेक्षा का भी अपराधी है। इस प्रकार लेखक ने अपराध की सामाजिक और नैतिक दोनों परतों को उद्घाटित किया है। नाटक में भूदेव और गोपीनाथ जैसे पात्र नैतिक चेतना के प्रतिनिधि हैं। ये पात्र कथानक को केवल त्रासदी तक सीमित नहीं रहने देते, बल्कि उसे सामाजिक सुधार की दिशा प्रदान करते हैं। भूदेव के सामने जयनारायण का पश्चाताप यह संकेत करता है कि समाज में अभी भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो नैतिक मूल्यों को जीवित रखे हुए हैं। भूदेव केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज की विवेकशील चेतना का प्रतीक हैं।
‘गोपीनाथ- उपस्थित अतिथि एवं बारातीगण! हम अर्थात मैं और मेरी पत्नी आपके सामने जल हाथ में लेकर प्रतिज्ञा करते हैं कि पुत्र के विवाह में दहेज़ नहीं लेंगे। हमने यह भी निश्चय किया है कि ऐसे विवाहों का बहिष्कार करेंगे, जिनमें दहेज़ रूपी दैत्य का लेन-देन होगा।’ (पृष्ठ: 78)
गोपीनाथ के संवाद में दहेज-विरोधी सामाजिक आंदोलन का उद्घोष व्यक्त हुआ है। यहाँ “दहेज रूपी दैत्य” का रूपक अत्यंत सार्थक है। दैत्य वह नकारात्मक शक्ति है, जो समाज का विनाश करती है। नाटककार ने दहेज को इसी विनाशकारी प्रवृत्ति के रूप में चित्रित किया है। गोपीनाथ की प्रतिज्ञा केवल व्यक्तिगत संकल्प नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का आह्वान है। नाटक का अंत आदर्शवादी है। जयनारायण पश्चाताप करता है, गोपीनाथ दहेज-विरोधी प्रतिज्ञा लेता है और कृपाल ग्लानि के कारण आत्महत्या कर लेता है। यह अंत पाठक को नैतिक संतोष प्रदान करता है। कृपाल की आत्महत्या विशेष रूप से उल्लेखनीय है, उसने लालच और सामाजिक दबाव में आकर अपनी पत्नी की हत्या की, किंतु अंततः उसका विवेक जाग उठता है। आत्महत्या उसके अपराध का प्रायश्चित तो नहीं है, किंतु उसके मानसिक विघटन और आत्मग्लानि का चरम रूप अवश्य सिद्ध होता है। चूँकि वास्तविक जीवन में अपराधी हमेशा इस प्रकार पश्चाताप नहीं करते, फिर भी सामाजिक नाटकों में आदर्शवादी परिणति का उद्देश्य समाज को सकारात्मक दिशा देना होता है।
‘चलो लौट चलें’ नाटक भारतीय ग्रामीण जीवन, शहरी विस्थापन, श्रम-संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन की जटिल समस्याओं को केंद्र में रखकर लिखा गया एक विचारोत्तेजक सामाजिक नाटक है। यह नाटक प्रेमचन्दीय परंपरा की याद दिलाता है, क्योंकि इसमें गाँव, किसान, मजदूर, सामाजिक विषमता और जीवन-संघर्ष जैसे विषय अत्यंत सहजता और यथार्थपरकता के साथ चित्रित हुए हैं। जिस प्रकार प्रेमचन्द ने ग्रामीण भारत के आर्थिक और सामाजिक संकटों को साहित्य का विषय बनाया था, उसी प्रकार महेश सांख्यधर भी बदलते समय में गाँव और शहर के द्वंद्व को अपने नाटक का आधार बनाते हैं।
नाटक का केंद्रीय पात्र गोकुल है, जो जमींदारी और बंधुआ मजदूरी जैसी शोषणकारी परिस्थितियों से मुक्ति पाने के लिए गाँव छोड़कर शहर की ओर पलायन करता है। यह कथा केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन लाखों ग्रामीण मजदूरों की कहानी है, जो बेहतर जीवन की तलाश में शहरों का रुख करते हैं। शहर की ओर रुख करने वाले गोकुल से उसकी माँ कहती है-
“शहर में गाँव जैसे लोग नहीं होंगे? वे क्या बेगार नहीं लेंगे?” (पृ. 85)
नाटक के मूल प्रश्न को उद्घाटित करता है। यह संवाद अनुभवजन्य लोकबुद्धि का प्रतिनिधित्व करता है। माँ जानती है कि शोषण केवल गाँव की समस्या नहीं है; उसका स्वरूप बदल सकता है, किंतु उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता। यह कथन भविष्य की घटनाओं का संकेत भी देता है। गोकुल जिस मुक्ति की तलाश में शहर जाता है, वह वहाँ भी उसे प्राप्त नहीं होती।
नाटककार ने शहर को केवल अवसरों के केंद्र के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है, बल्कि उसके भीतर छिपी हुई अमानवीयता को भी उजागर किया है। गोकुल दस वर्षों तक कठोर श्रम करता है, किंतु उसकी आर्थिक स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं होता। यह स्थिति आधुनिक शहरी जीवन की उस विडंबना को सामने लाती है जहाँ श्रम तो बहुत है, पर श्रमिक का जीवन सुरक्षित नहीं है।
यहाँ लेखक शहरीकरण की प्रक्रिया पर प्रश्न उठाते हैं। शहर विकास और आधुनिकता के प्रतीक माने जाते हैं, किंतु मजदूर वर्ग के लिए वे अनेक बार असुरक्षा, अस्थिरता और शोषण के केंद्र बन जाते हैं। गोकुल का अनुभव इसी यथार्थ का प्रतिनिधित्व करता है। नाटक में अध्यापक वीरेंद्र का चरित्र विशेष महत्व रखता है। वह केवल एक पात्र नहीं, बल्कि लेखक की वैचारिक दृष्टि का प्रतिनिधि प्रतीत होता है। जब गोकुल अपने गाँव से आए रघुवीर को काम दिलाने के लिए उसके पास ले जाता है, तब वीरेंद्र शहर की वास्तविकता को अत्यंत तीखे शब्दों में सामने रखता है-
“चैन से दो रोटियाँ खाना चाहो तो गाँव लौट जाओ और सिर पर टोकरी में घर उठाये फिरना चाहो; फुटपाथ पर पड़े रहना चाहो; या बेमौत मरना चाहो तो घूमो शहर में।” (पृ. 90)
इस संवाद में शहर की चमक-दमक के पीछे छिपी त्रासदी का सशक्त चित्रण करता है। “सिर पर टोकरी में घर उठाये फिरना” महानगरीय जीवन की अस्थिरता का प्रतीक है, जहाँ व्यक्ति के पास स्थायी आवास तक नहीं होता। फुटपाथ पर जीवन बिताने वाले मजदूरों की वास्तविकता को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है। लेखक की व्यंग्यात्मक शैली इसे और अधिक प्रभावशाली बनाती है। लेखक सीधे उपदेश नहीं देते, बल्कि पात्र के माध्यम से ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, जो पाठक को सोचने के लिए बाध्य करती है। नाटक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि लेखक गाँव को केवल अतीत की स्मृति के रूप में नहीं देखते, बल्कि बदलते हुए ग्रामीण भारत की संभावनाओं को भी रेखांकित करते हैं।
“वीरेंद्र-यहाँ तुम काम ढूँढ़ते हो और गाँव में काम तुम्हें ढूँढ़ेगा। अब गाँव में मजदूरी बिना हीला-हुज्जत तो मिलती है, सम्मान भी मिलता है।” (पृ. 93)
यह वाक्य ग्रामीण जीवन के एक नए स्वरूप की ओर संकेत करता है। यहाँ लेखक उस परिवर्तन को रेखांकित करते हैं, जो स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण समाज में धीरे-धीरे आया है। पहले जहाँ मजदूरों को जमींदारों के शोषण का सामना करना पड़ता था, वहीं अब रोजगार और श्रम के अवसर अपेक्षाकृत बढ़े हैं। लेखक का विश्वास है कि गाँव केवल पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का आधार भी बन सकता है।
यद्यपि इस दृष्टिकोण में कुछ आदर्शवाद भी दिखाई देता है, क्योंकि आज भी अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी और पलायन की समस्या मौजूद है। फिर भी नाटककार का उद्देश्य ग्रामीण जीवन के सकारात्मक पक्षों को सामने लाना है। नाटक की एक उल्लेखनीय विशेषता इसका हास्य-व्यंग्य है। गंभीर सामाजिक प्रश्नों को उठाते हुए भी लेखक बोझिलता से बचते हैं। संवादों में सहज हास्य और तीखा व्यंग्य दोनों उपस्थित हैं। यही कारण है कि नाटक सामाजिक संदेश देते हुए भी मनोरंजक बना रहता है। महेश सांख्यधर की यह शैली प्रेमचन्द की परंपरा की याद दिलाती है, जहाँ सामाजिक आलोचना के साथ लोकभाषा और व्यंग्य का संतुलित प्रयोग मिलता है। नाटक का एक केंद्रीय संदेश यह भी है कि मनुष्य के लिए केवल रोजगार ही पर्याप्त नहीं है; उसे सम्मान भी चाहिए। शहर में गोकुल को श्रम तो मिलता है, किंतु सम्मान और सुरक्षा नहीं मिलती। दूसरी ओर गाँव में श्रम के साथ सामाजिक पहचान और आत्मीयता भी मिलती है। यह दृष्टिकोण नाटक को केवल आर्थिक विमर्श तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि उसे मानवीय संबंधों और सामाजिक गरिमा के प्रश्नों से भी जोड़ देता है।
‘पाप का बाप’ नाटक परिवार नियोजन जैसे गंभीर विषय को लेकर हास्य-व्यंग्य शैली में लिखा गया है। ‘अथ मूल्यांकन केन्द्रम्’ नाटक में परीक्षा व्यवस्था की बखिया उधेड़ी गई है। ‘यक्ष के प्रश्न’ नाटक के माध्यम से राजनैतिक भ्रष्टाचार को प्रस्तुत किया गया है। ‘चुनाव बाबू’ नाटक में लोकतंत्रीय चुनावी ढाँचे के दरकने की टीस को अनुभूत किया जा सकता है। ‘इंडिया गेट पर संभल का पाट’ यथास्थितिवादियों पर करारा व्यंग्य है, जबकि ‘बड़ी उम्र है आपकी’ भ्रष्टाचार पर केन्द्रित नाटक है।
पौराणिक आख्यानों पर आधारित नाटक ‘वरदान’ में राम और जटायु पात्र के माध्यम से लेखक ने सतयुग से शठयुग तक की यात्रा को व्यक्त किया है। ‘कैलेंडरी सराय’ में अंग्रेजी और अंग्रेजीयत का कच्चा चिट्ठा खोला गया है। इस नाटक में लेखक ने देशभक्ति का नया राग अपने ढंग से छेड़ा है। ‘एक आवेदन नरक के लिए’ नाटक में विषय तो भ्रष्टाचार ही है, किंतु लेखकीय अंदाज़ अनूठा बन पड़ा है। ‘डीओजी साब’ नाटक प्रशासनिक ढीलेपन के साथ ही लोकतंत्र के चौथे खंभे पत्रकारिता के पत्रकारीय सत्य से भी पर्दा उठाता है। ‘स्पष्टीकरण’ नाटक में शैक्षणिक तंत्र के भ्रष्ट स्वरूप को चित्रित किया गया है। ‘संकल्प’ नशामुक्ति की प्रेरणा देने वाला किस्सागोईप्रधान नाटक है। ‘हैप्पी होली डे टू यू’ इस संग्रह का आखिरी नाटक है, इसमें स्त्रीवाद, क्षेत्रवाद, आतंकवाद आदि विविध वादों के स्याह स्वरूप को व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
महेश सांख्यधर की भाषा सरल, संवादधर्मी और प्रभावशाली होने के साथ ही अनावश्यक अलंकरणों से मुक्त हैं। उनकी भाषा में लोकजीवन की सहजता और वैचारिक लेखन की स्पष्टता दोनों ही देखी जा सकती हैं। नाटकों के संवाद पाठक को सीधे संबोधित करते प्रतीत होते हैं। उनमें तर्क है, संवेदना है और प्रश्नाकुलता भी है। यही कारण है कि पाठक केवल घटनाओं का मूक दर्शक नहीं रहता, बल्कि विचार-प्रक्रिया का सहभागी बन जाता है। उनकी भाषा में व्यंग्य का भी महत्वपूर्ण स्थान है। व्यंग्य के माध्यम से वे सामाजिक विसंगतियों को अधिक तीक्ष्णता से प्रस्तुत करते हैं। यद्यपि उपलब्ध अंशों से संपूर्ण नाट्य-संरचना का मूल्यांकन संभव नहीं है, फिर भी यह स्पष्ट है कि लेखक संवाद और विचार के संतुलन को बनाए रखने का प्रयास करते हैं।
उनके नाटक विचारप्रधान हैं, किंतु वे केवल वैचारिक घोषणापत्र नहीं बनते। वे पात्रों और परिस्थितियों के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्त करते हैं। मिथक, इतिहास और समकालीन यथार्थ का संयोजन उनके शिल्प की उल्लेखनीय विशेषता है। वर्तमान भारत अनेक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। असमानता, बेरोजगारी, शिक्षा का संकट, पर्यावरणीय समस्याएँ और सामाजिक विभाजन जैसे प्रश्न लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। ऐसे समय में ‘घटती ज़िन्दगी का अहसास’ जैसे नाटक-संग्रह विशेष महत्व रखते हैं, क्योंकि वे पाठक को इन समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। वे केवल समस्याओं का वर्णन नहीं करते, बल्कि उनके कारणों और परिणामों पर भी विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं।
लेखक अपने समय के महत्वपूर्ण प्रश्नों से मुठभेड़ करने का साहस रखते हैं। वे लोकप्रियता या सुविधा के लिए जटिल विषयों से बचते नहीं हैं। हालाँकि, विचारप्रधान साहित्य के सामने हमेशा यह चुनौती रहती है कि कहीं विचार पात्रों और घटनाओं पर हावी न हो जाए। यदि नाटकीयता की अपेक्षा वैचारिक विमर्श अधिक हो जाए तो मंचीय प्रभाव कदाचित कम होने लगता है। फिर भी सामाजिक सरोकारों से युक्त साहित्य में यह एक स्वाभाविक जोखिम है। सांख्यधर के नाटक इस जोखिम को स्वीकार करते हुए भी अपने उद्देश्य में काफी हद तक सफल दिखाई देते हैं। उनका लक्ष्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का विस्तार करना भी है।
‘घटती ज़िन्दगी का अहसास’ डॉ. महेश सांख्यधर का एक महत्वपूर्ण नाटक-संग्रह है, जो भारतीय समाज के ज्वलंत प्रश्नों को केंद्र में रखकर लिखा गया है। यह संग्रह सामाजिक न्याय, शिक्षा, लोकतंत्र, आदिवासी अस्मिता, धर्म, राजनीति और मानवीय मूल्यों जैसे विषयों पर गंभीर विचार प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से ‘गुरु दक्षिणा’ नाटक भारतीय मिथकीय परंपरा के पुनर्पाठ का एक सशक्त उदाहरण है, जो एकलव्य की कथा को समकालीन सामाजिक न्याय के विमर्श से जोड़ता है। संग्रह का व्यापक वैचारिक फलक, प्रश्नाकुल दृष्टि, सामाजिक प्रतिबद्धता और संवादधर्मी भाषा इसे समकालीन हिंदी नाट्य-साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। यह कृति उन पाठकों, शोधार्थियों और रंगकर्मियों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जो साहित्य को केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और वैचारिक संवाद का उपकरण भी मानते हैं। अपने समय की व्याकुलताओं, अंतर्विरोधों, चुनौतियों और संभावनाओं को अभिव्यक्त करने के कारण ‘घटती ज़िन्दगी का अहसास’ एक सार्थक, विचारोत्तेजक और नए वैचारिक विमर्श को जन्म देने वाला नाटक-संग्रह सिद्ध होता है।

- डॉ. सुषमा देवी
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी, भाषा, साहित्य मानविकी संकाय,नालंदा विश्वविद्यालय, राजगीर- 803116, बिहार, भारत
