ग़ज़ल – 1
अब वो परवाने कहाँ जो शम्अ के थे साथ जलते
मर गयी शायद महब्बत अब नहीं पत्थर पिघलते
खाये धोखे ज़िंदगी में इस क़दर हमने कि यारो
पाने को साथी पुराने अब नहीं अरमाँ मचलते
जंग का मैदान हो या खेल हो शतरंज का ही
जीत पाने की ललक में हम नहीं दुश्मन को छलते
लाख चाहे साजिशों की बदलियाँ सूरज को ढक लें
जो उजाले बाँटते हैं वे नहीं बे-वक़्त ढलते
बारिशें रहमत की थीं पर थी फटी किस्मत की चादर
ग़र मिला होता रफ़ूगर छोड़ घर हम क्यूँ निकलते
इस क़दर आँखों में उसकी इक कशिश देखी कि अब तो
बस उसी की जुस्तुजू है उसके ही सपने हैं पलते
दूर कितने भी हैं दोनों पर मिले हैं दिल जो अपने
फासले मीलों के भी ये अब नहीं हमको हैं खलते
ग़ज़ल – 2
फ़साने को गवारा कर रहे हैं
हकीकत से किनारा कर रहे हैं
जो कहते हैं ख़सारा कर रहे हैं,
समझ लो कुछ इशारा कर रहे हैं
जो चाहेंगे निकालेंगे वो मतलब
कुछ ऐसा इस्ति’आरा कर रहे हैं
कभी दो जिस्म इक जाँ रहने वाले
बस इक पल में किनारा कर रहे हैं
नहीं था चाँद जो किस्मत में अपनी
मुक़द्दर को सितारा कर रहे हैं
गले मिलने को तरसे बाप के हम
नसीहत पर गुज़ारा कर रहे हैं
ग़ज़ल – 3
हर किसी को दुश्मनी महँगी पड़ी
पर मुझे तो दोस्ती महँगी पड़ी
बात लोगों ने बनाई क्या से क्या
दरमियाँ ये ख़ामुशी महँगी पड़ी
क्या कहा था और क्या समझा गया
दोस्तों में शायरी महँगी पड़ी
गाँव छूटा खेत छूटे सब गया
शहर की ये नौकरी महँगी पड़ी
खुल गये सब राज़ उनके सामने
मुख़बिरी जज़्बात की महँगी पड़ी
ख़ुद में ख़ुद को खो दिया मैंने कहीं
यार तेरी मुर्शिदी महँगी पड़ी
- आशुतोष कुमार
